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उपनिषद – वेदक अन्तिम फल – सुयोग्य लेल मात्र रहस्योद्घाटन करैछ – वेदान्त बनबैछ

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उपनिषद

उपनिषद आरण्यक केर अन्त मे अबैत अछि । यदि संहिता केँ एकटा वृक्षक समान मानल जाय, तँ ब्राह्मण ओकर फूल थिक तथा आरण्यक ओकर फल थिक जे अपरिपक्व (बिनु पाकल) अबस्था मे अछि, जखन कि उपनिषद पाकल फल थिक । ज्ञानमार्ग द्वारा परमात्मा आ आत्मा केर अद्वैत (अभेद) केँ प्राप्त करबाक प्रत्यक्ष विधि उपनिषद सब मे वर्णित अछि । यद्यपि उपनिषद मे अनुशासन सिखबाक विभिन्न विधि सब (विद्या), यज्ञ आर देवता सभक पूजा आदिक आवश्यक उल्लेख भेटैत अछि, मुदा मूलतः एकर मुख्य विषय दार्शनिक अन्वेषण तथा मोनक ओहेन अबस्था सँ निपटब अछि जाहि मे सबटा बन्धन नष्ट भ’ जाइत अछि ।

एहि आधार पर, वेद केर सामान्यतः दुइ भाग मानल जाइत अछि, अर्थात् कर्मकाण्ड (अनुष्ठान सँ सम्बन्धित भाग) तथा ज्ञानकाण्ड (ज्ञान सँ सम्बन्धित भाग) । एकरा पूर्व मीमांसा आर उत्तर मीमांसा सेहो कहल जाइत छैक ।

कर्मकांडक विश्लेषण कयलाक बाद, महर्षि जैमिनी ई विचार व्यक्त कयलनि जे ई वैदिक दर्शन केर अन्तिम उत्पाद या फल छी । हुनकर ग्रन्थ केँ पूर्व मीमांसा कहल जाइत छन्हि । ऋषि वेद व्यास द्वारा ज्ञानकांड केर एहि प्रकारक विश्लेषण सँ ई निष्कर्ष निकलल जे ई वेदक सार छी आर एकरा ओ सूत्र सभक रूप मे प्रस्तुत कयलनि – जेकरा ब्रह्मसूत्र कहल जाइछ । कर्मकांडक तुलना मे ज्ञानकांडक ‘उपनिषद भाग’ बड छोट आ संक्षिप्त रूप मे अछि । जेतय जैमिनीक पूर्व मीमांसा सूत्र मे १००० खंड अछि, ओतय ब्रह्मसूत्र मे मात्र १९२ खंड अछि । जेना एकटा गाछ मे पत्ता बहुते रहैत छैक, लेकिन फूल आ फल अपेक्षाकृत कम भेल करैत छैक, तहिना वेदक गाछ मे सेहो कर्मकांड रूपी पत्ता बहुते होइत छैक आर उपनिषद भाग गाछहि केर फल सब जेकाँ बड कम होइत छैक । विदेशी विद्वान आ दार्शनिक लोकनि अपन बौद्धिक दृष्टिकोण मे सत्यम् या पारलौकिक सत्यक सीमा धरि पहुँचबाक लेल पर्याप्त गहिराइ धरि खोज नहि कय सकलाह । बुद्धि द्वारा प्राप्त निष्कर्ष केर प्रायोगिक सत्यापन (व्यवहारिक सत्यता परखनाय) आवश्यक छैक । उपनिषदक खास विशेषता, जे कि आन दार्शनिक प्रणाली नहि दैछ, ओ ई छैक जे एकरा मे मंत्र सब रहैत छैक जे कि दार्शनिक विचार केँ मंत्रक कम्पन द्वारा यथार्थ अनुभव मे रूपान्तरित करैत छैक ।

आन दर्शन सभक विपरीत, जे बौद्धिक शोध केर प्रकृति मे होइत छैक, वेदक कर्मकांड एकटा एहेन जीवन-पद्धतिक निर्देश करैछ जे एहि मे निहित दर्शन केँ आत्मसात करब सम्भव करैत छैक । यदि कियो एकर निर्देश सभक अनुसार जीवन बितबैत अछि त एहि सँ विचार सब मे शुद्धता अबैत छैक, ओकरा मे सांसारिक गतिविधि सब सँ विमुखता अबैत छैक ।  जँ एहि स्तर पर कियो उपनिषद सब लगनपूर्वक अध्ययन करैत अछि त ई केवल एकटा मानसिक अभ्यासे टा नहि, बल्कि एकटा जीवन-पद्धति, मानू केकरो जीवनक अनुभवक एकटा हिस्सा बनि जाइत छैक ।

दार्शनिक अनुभवक एहि शिखर पर मात्र आत्मा आ परम सत्ता (जीव आ ब्रह्म) केर अद्वैत स्पष्ट होइत अछि । एहि अबस्था तक पहुँचबाक लेल, एक व्यक्ति, जे अपना मोन केँ कर्म द्वारा अनुकूलित कय लैछ, सब गतिविधि त्यागिकय संन्यासी बनि जाइत अछि । एहि अबस्था मे, लोक स्वयं केँ ओहेन ज्ञान हासिल करय मे लगा लैत अछि जेकरा महावाक्य कहल जाइत छैक । हरेक वेद मे कतेको महावाक्य या महान बात सब छैक । लेकिन चारि टा – प्रत्येक वेद सँ एकटा – अत्यन्त महत्वपूर्ण, विचारोत्तेजक आर शक्तिशाली होइत छैक । ई जीव तथा ब्रह्म केर अद्वैतताक वर्णन करैछ । यदि एकर जाप कयल जाय आ गहन ध्यान कयल जाय त अद्वैत केँ वास्तव मे अनुभव कयल जा सकैछ । ई चारि गोट महावाक्य चारि टा उपनिषद मे समाहित अछि । यद्यपि संहिता आर ब्राह्मण भाग मे प्रतिपादित कतेको अनुष्ठान या कर्म, पूजाक विविधता आर जीवन पद्धति सब मौजूद अछि, जखन यात्राक अन्त धरि पहुँचब आर अन्तिम उद्देश्य केँ प्राप्त करबाक बात अबैत अछि, तखन केवल उपनिषद टा सहायक होइत अछि ।

ऋग्वेदक ऐतरेय उपनिषद मे एकटा महावाक्य (महान कहावत) अछि जे कहैछ कि केवल उत्कृष्ट वास्तविक अनुभव मात्र ब्रह्म छी – “प्रज्ञानं ब्रह्म” । “अहं ब्रह्मास्मि” – “हम ब्रह्म छी”, शुक्ल यजुर्वेदक बृहदारण्यक उपनिषद सँ एकटा आर महावाक्य छी । तैत्तरीय उपनिषद केर चारिम अध्याय मे थोड़ेक अलग महावाक्य अछि – “अहमस्मि ब्रह्माहमस्मि”। सामवेद केर छांदोग्य उपनिषद मे एकटा गुरुक अपना शिष्य केँ एहि आशय केर शिक्षा देबाक रूप मे महावाक्य अछि “वैह तूँ छँ” – “तत् त्वम् असि” । आत्मे ब्रह्म छी – “अयमात्मा ब्रह्म” अथर्ववेद केर मांडुक्य उपनिषद केर महावाक्य अछि ।

आध्यात्मिक जिज्ञासु लोकनि केँ आदि शंकराचार्यक संक्षिप्त आर सारगर्भित सलाह “सोपान पंचक” मे निहित अछि, जे पाँच टा श्लोक केर एक श्रृंखला अछि जे आध्यात्मिक उत्थान केर सीढ़ी पर उठायल जायवला डेग केर रूपरेखा प्रस्तुत करैत अछि । ओ आरम्भ मे कहैत छथि, “वेद केर अध्ययन आर पाठ करू; ओहि मे कहल गेल विभिन्न अनुष्ठान/कार्य करू,” आर निष्कर्ष दैत छथि: “महावाक्य सब द्वारा निर्देशित रहू, ओकर निरन्तर ध्यान करू तथा ब्रह्म केर स्थिति धरि पहुँचू ।” एहि प्रकारें, ई देखल जा सकैत अछि जे उपनिषद सब मे वेद सभक अन्तिम सन्देश आर उद्देश्य निहित अछि । तेँ, एकरा “वेदान्त” कहल जाइत छैक, जाहि मे अन्त शब्दक अर्थ “समाप्त” होइत छैक । उपनिषद दुइ अर्थ मे वेदक समाप्ति थिक । प्रत्येक (वेद) शाखा केँ लेलापर, पहिने संहिता, फेर ब्राह्मण आर फेर आरण्यक अबैत छैक, जेकरा अन्तिम भाग मे उपनिषद अबैत छैक । एकर दोसर अर्थ ई छैक: वेद केर अन्तिम लक्ष्य या उद्देश्य उपनिषद मे निहित छैक । एहि प्रकारे, उपनिषद वेदक “अन्त” थिक, दुनू अर्थ मे – पाठ्य प्रस्तुति और अन्तिम उत्पाद (फल) केर प्राप्ति ।

नगर मे एकटा मन्दिर छैक, मन्दिर उपर एकटा गुम्बद छैक, गुम्बदक शिखर छैक, ई सबटा ऊँचाइ केर आरोही (बढ़ैत) क्रम मे छैक । एहि प्रकारे, उपनिषद वेदक शिखर आर अन्त थिकैक ।

“उप-नि-षद” केर अर्थ अछि “लग मे बैसनाय” । शिष्य केँ गुरु लग बैसाकय जे सिखायल जाइत छल, सैह उपनिषद थिक । एकर अर्थ “ओ जे अहाँ केँ ब्रह्म लग (समीप) पहुँचाबैत अछि” सेहो लेल जा सकैछ । जेना उपनयन (जनेउ संस्कार) केर अर्थ दुनू तरहें लेल जा सकैछ, यानि “गुरु लग लय गेनाय” या “परमात्मा लग लय गेनाय”, उपनिषद सेहो दोहरा व्याख्याक अनुमति दैत अछि । शिष्य केर नजदीक रहिकय शिक्षा देबाक तात्पर्य अछि जे सिखायल गेल बात एक गुप्त व्यक्तिगत सलाह रूप मे अछि । ई ओहि लोक लेल नहि अछि जे मानसिक रूप सँ प्रशिक्षित नहि अछि जे ओहि शिक्षा केँ आत्मसात करय । तेँ उपनिषद सूक्ष्म सत्य केर प्रतिपादन करैत स्पष्ट रूप सँ कहैछ: “ई उपनिषद छी । ई उपनिषद छी ।” वेद मे जे किछु छुपल अछि ओकरा रहस्य कहल जाइत छैक । उपनिषद एहने गोपनीय, व्यक्तिगत निर्देश अछि जे ओ (शिष्य) ग्रहण करबा योग्य छथि ।

हरिः हरः!!

Upanishads

Upanishads come towards the end of the Aaranyakas. If the Samhita is likened to a tree, the Braahmana are its flowers and the Aaranyakas are its fruit, in an un-ripened state, the Upanishads are the ripe fruits. The direct method of realising through the path of knowledge (jnaana maarga) the nonduality (Abhedha) of the Supreme Being and the soul are explained in the Upanishads. Although Upanishads contain reference to various disciplines of learning (Vidyas), Yajnas and worship of devatas, etc. essentially, their main theme is a philosophical enquiry and dealing with that state of the mind with all shackles destroyed.

On this basis, the Vedas are generally considered to have two portions, viz., Karma Kaanada (portion dealing with action or rituals) and Jnaana Kaanda (portion dealing with knowledge). These are also referred to as Poorva Mimaamsa and Uttara Mimaamsa.

After analyzing the Karma Kaanda, Maharshi Jaimini expressed the view that it was the end-product or fruit of Vedic philosophy. His treatise is called Poorva Mimaamsa. Similar analysis of the Jnaana Kaanda by Sage Veda Vyasa led to the conclusion that it was the quintessence of the Vedas and these he stated in the form of aphorisms – Brhama Sutra. Compared to the Karma Kaanda, the Upanishad portion of Jnaana Kaanda is very small in extent and is in a condensed form. Whereas Jaimini’s Poorva Mimaamsaa Sutras contain 1000 sections, the Brahma Sutra has only 192 sections. Just as a tree has a profusion of leaves but only a relatively small number of flowers and fruits, so also the tree of Veda has many leaves in the form of Karma Kaanda and the Upanishad portions are much fewer like the fruits of a tree. Foreign scholars and philosophers in their intellectual approaches have no delved deep enough to touch the fringe of Satyam or Transcendental Truth. Experimental verification of the conclusion which is reached by the intellect is necessary. The special characteristic of the Upanishads, which other philosophical systems do not share, is that they contain mantras which translate philosophical thought through the aid of vibrations of the mantras into actual experience.

Unlike other philosophies, which are in the nature of intellectual research, the Karma Kaanda of the Vedas prescribe a way of life which would make it possible for the realisation of its philosophy. If one lived according to its dictates, it would lead to purity of thought, when one could withdraw from worldly activities. If, at this stage, one studied the Upanishads assiduously, it would not be merely a mental exercise but a way of life, a part of one’s experience of life, as it were.

It is at this summit of philosophical experience that the non-duality of the Soul and Supreme Being (Jiva and Brahma), becomes clearer. It is to reach this stage that a person, who has conditioned his mind by the performance of Karma, has to leave all activities and become a Sanyaasi. At this stage, one gets initiated into what are called, Mahaavaakyas. Each of the Vedas has many Mahavaakyas or great sayings. But four – one from each Veda – are very important, thought-provoking and powerful. These spell out the non-duality of Jiva and Brahma. If these are chanted and one meditates deeply, the non-duality will be actually experienced. These four Mahaavakyas are contained in four Upanishads. Although there exist numerous rituals or karmas, varieties of worship and ways of life as propounded in the Samhita and Braahmana portions, when it comes to reaching the end of the journey and realizing the ultimate objective, the Upanishads alone are of help.

There is a Mahaavaakya (great saying) in Aitareya Upanishad of the Rig Veda which says that exalted actual experience alone is Brahman – “Prajnanam Brahma”. “Aham Brahmasmi” – “I am Brahman”, is another Mahaavaakya from the Brihadhaaranyaka Upanishad of Sukla Yajur Veda. The fourth chapter of the Taittareeya Upanishad contains a slightly different Mahaavaakya – “Ahamasmi Brahmahamasmi”. There is Mahaavaakya in Chaandogya Upanishad of the Sama Veda in the form of a Guru teaching his disciple to the effect that “that thou art” – “Tat Tvam Asi”. The Atma (soul) is Brahma – “Aayamaatma Brahma” is the Mahaavaakya from Maandukya Upanishad of Atharva Veda.

Adi Sankaracharya’s terse and pithy advice to spiritual aspirants is contained in “Sopaana Panchaka”, a string of five verses which outlines the steps to be be taken on the ladder of spiritual ascent. He starts by saying, “Study and recite the Vedas; perform the various rituals/acts prescribed therein,” and concludes: “Be guided by the Mahaavaakyas, meditate on them constantly and reach the state of Brahman.” Thus, it will be seen that the Upanishads contain the ultimate message and purpose of the Vedas. They are, therefore, known as “Vedanta”, the word Anta meaning “end”. Upanishads are the end of the Vedas in two senses. When each (Veda) Saakha is taken, first comes the Samhita, then the Braahmana and then the Aaranyaka, at whose concluding portion comes the Upanishad. The second sense in which it is understood in this: The ultimate goal or aim of the Vedas is contained in the Upanishads. Thus, the Upanishads are the “End” of the Vedas both in the sense of textual presentation and realisation of the end-product.

A temple in a town, a Gopura for the temple, the summit of the Gopura are all in an ascending order of height. Likewise, the Upanishads are the summit and end of Vedas.

“Upa – ni – shada” means “to sit by the side”. What was taught by making the disciple sit by the side of the teacher is the Upanishads. It can also be taken to mean “that which makes you reach the side of or near Brahman”. Just as Upanayana (the sacred thread ceremony) can be taken to mean both ways, viz., “leading to the Guru” or “leading to the Paramaatma”, the Upanishads also permit a dual interpretation. Instructing by keeping close to the disciple implies that the thing taught is in the nature of a secret personal advice. It is not for those who are not mentally conditioned to absorb the teaching. That is why the Upanishads, when propounding subtle truths, say pointedly: “This is Upanishad. This is Upanishad.” That which is latent in the Vedas is called Rahasya or secret. The Upanishads are such confidential personalised instructions to those fit to receive them.

Harih Harah!!

उपनिषद

उपनिषद आरण्यकों के अंत में आते हैं । यदि संहिता को एक वृक्ष के समान माना जाए, तो ब्राह्मण उसके फूल हैं और आरण्यक उसके फल हैं जो अपरिपक्व अवस्था में हैं, जबकि उपनिषद पके फल हैं । ज्ञानमार्ग द्वारा परमात्मा और आत्मा के अद्वैत (अभेद) को प्राप्त करने की प्रत्यक्ष विधि उपनिषदों में वर्णित है । यद्यपि उपनिषदों में विभिन्त तरह का अनुशासन (विद्या) सीखने का, यज्ञ और देवताओं की पूजा आदि का उल्लेख है, फिर भी मूलतः उनका मुख्य विषय दार्शनिक अन्वेषण और मन की उस अवस्था से निपटना है जिसमें सभी बंधन नष्ट हो जाते हैं ।

इस आधार पर, वेदों के सामान्यतः दो भाग माने जाते हैं, अर्थात् कर्मकाण्ड (कर्मकाण्ड या अनुष्ठानों से संबंधित भाग) और ज्ञानकाण्ड (ज्ञान से संबंधित भाग) । इन्हें पूर्व मीमांसा और उत्तर मीमांसा भी कहा जाता है ।

कर्मकांड का विश्लेषण करने के बाद, महर्षि जैमिनी ने यह विचार व्यक्त किया कि यह वैदिक दर्शन का अंतिम उत्पाद या फल है । उनके ग्रंथ को पूर्व मीमांसा कहा जाता है । ऋषि वेद व्यास द्वारा ज्ञान कांड के इसी प्रकार के विश्लेषण से यह निष्कर्ष निकला कि यह वेदों का सार है और इसे उन्होंने ब्रह्म सूत्र नामक सूत्रों के रूप में प्रस्तुत किया । कर्म कांड की तुलना में, ज्ञान कांड का उपनिषद भाग बहुत छोटा और संक्षिप्त रूप में है । जहाँ जैमिनी के पूर्व मीमांसा सूत्र में १००० खंड हैं, वहीं ब्रह्म सूत्र में केवल १९२ खंड हैं । जिस प्रकार एक वृक्ष में पत्तियाँ तो प्रचुर होती हैं, परन्तु फूल और फल अपेक्षाकृत कम होते हैं, उसी प्रकार वेद के वृक्ष में भी कर्म कांड रूपी पत्तियाँ बहुत होती हैं और उपनिषद भाग वृक्ष के फलों की तरह बहुत कम होते हैं । विदेशी विद्वानों और दार्शनिकों ने अपने बौद्धिक दृष्टिकोणों में सत्यम् या पारलौकिक सत्य की सीमा को छूने के लिए पर्याप्त गहराई तक नहीं खोजी है । बुद्धि द्वारा प्राप्त निष्कर्ष का प्रायोगिक सत्यापन आवश्यक है । उपनिषदों की एक विशेष विशेषता, जो अन्य दार्शनिक प्रणालियों में नहीं है, यह है कि उनमें मंत्र होते हैं जो मंत्रों के कंपन की सहायता से दार्शनिक विचारों को वास्तविक अनुभव में रूपांतरित करते हैं ।

अन्य दर्शनों के विपरीत, जो बौद्धिक शोध की प्रकृति के हैं, वेदों का कर्मकांड एक ऐसी जीवन-पद्धति का निर्देश करता है जो इसके दर्शन की प्राप्ति को संभव बनाती है । यदि कोई इसके निर्देशों के अनुसार जीवन व्यतीत करता है, तो इससे विचारों में शुद्धता आती है, जब वह सांसारिक गतिविधियों से विमुख हो सकता है । यदि इस स्तर पर कोई उपनिषदों का लगनपूर्वक अध्ययन करता है, तो यह केवल एक मानसिक अभ्यास नहीं, बल्कि एक जीवन-पद्धति, मानो जीवन के अनुभव का एक अंग बन जाता है ।

दार्शनिक अनुभव के इस शिखर पर ही आत्मा और परम सत्ता (जीव और ब्रह्म) का अद्वैत स्पष्ट होता है । इस अवस्था तक पहुँचने के लिए, एक व्यक्ति, जिसने अपने मन को कर्मों के द्वारा वातानुकूलित कर लिया है, को सभी कार्यों को त्यागकर संन्यासी बनना पड़ता है । इस अवस्था में, व्यक्ति स्वयं को ऐसा ज्ञान प्राप्त करने में लगा लेता है जिसे महावाक्य कहा जाता है । प्रत्येक वेद में कई महावाक्य या महान बातें हैं । लेकिन चार – प्रत्येक वेद से एक – बहुत महत्वपूर्ण, विचारोत्तेजक और शक्तिशाली हैं । ये जीव और ब्रह्म की अद्वैतता का वर्णन करते हैं । यदि इनका जाप किया जाए और गहन ध्यान किया जाए, तो अद्वैत का वास्तव में अनुभव किया जा सकेगा । ये चार महावाक्य चार उपनिषदों में समाहित हैं । यद्यपि संहिता और ब्राह्मण भागों में प्रतिपादित कई अनुष्ठान या कर्म, पूजा की विविधता और जीवन पद्धतियाँ मौजूद हैं, जब यात्रा के अंत तक पहुँचने और अंतिम उद्देश्य को प्राप्त करने की बात आती है, तो केवल उपनिषद ही सहायक होते हैं ।

ऋग्वेद के ऐतरेय उपनिषद में एक महावाक्य (महान कहावत) है जो कहता है कि केवल उत्कृष्ट वास्तविक अनुभव ही ब्रह्म है – “प्रज्ञानं ब्रह्म” । “अहं ब्रह्मास्मि” – “मैं ब्रह्म हूं”, शुक्ल यजुर्वेद के बृहदारण्यक उपनिषद से एक और महावाक्य है । तैत्तरीय उपनिषद के चौथे अध्याय में थोड़ा अलग महावाक्य है – “अहमस्मि ब्रह्माहमस्मि”। सामवेद के छांदोग्य उपनिषद में एक गुरु के अपने शिष्य को इस आशय की शिक्षा देनेवाले रूप में महावाक्य है “वही तूँ है” – “तत् त्वम् असि” । आत्मा ही ब्रह्म है – “अयमात्मा ब्रह्म” अथर्ववेद के मांडुक्य उपनिषद का महावाक्य है ।

आध्यात्मिक जिज्ञासुओं को आदि शंकराचार्य की संक्षिप्त और सारगर्भित सलाह “सोपान पंचक” में निहित है, जो पाँच श्लोकों की एक श्रृंखला है जो आध्यात्मिक उत्थान की सीढ़ी पर उठाए जाने वाले कदमों की रूपरेखा प्रस्तुत करती है । वे आरंभ में कहते हैं, “वेदों का अध्ययन और पाठ करो; उनमें बताए गए विभिन्न अनुष्ठान/कार्य करो,” और निष्कर्ष देते हैं: “महावाक्यों द्वारा निर्देशित रहो, उनका निरंतर ध्यान करो और ब्रह्म की स्थिति तक पहुँचो ।” इस प्रकार, यह देखा जा सकता है कि उपनिषदों में वेदों का अंतिम संदेश और उद्देश्य निहित है । इसलिए, इन्हें “वेदांत” कहा जाता है, जिसमें अंत शब्द का अर्थ “अंत” है । उपनिषद दो अर्थों में वेदों का अंत हैं । प्रत्येक (वेद) शाखा को लेने पर, पहले संहिता, फिर ब्राह्मण और फिर आरण्यक आता है, जिसके अंतिम भाग में उपनिषद आता है । इसका दूसरा अर्थ यह है: वेदों का अंतिम लक्ष्य या उद्देश्य उपनिषदों में निहित है । इस प्रकार, उपनिषद वेदों का “अंत” हैं, दोनों ही अर्थों में – पाठ्य प्रस्तुति और अंतिम उत्पाद की प्राप्ति ।

नगर में एक मंदिर, मंदिर के लिए एक गोपुर, गोपुर का शिखर, ये सभी ऊँचाई के आरोही क्रम में हैं । इसी प्रकार, उपनिषद वेदों का शिखर और अंत हैं ।

“उप-नि-षद” का अर्थ है “पास बैठना” । शिष्य को गुरु के पास बिठाकर जो सिखाया जाता था, वही उपनिषद है । इसका अर्थ “वह जो आपको ब्रह्म के निकट या समीप पहुँचाता है” भी लिया जा सकता है । जिस प्रकार उपनयन (जनेऊ संस्कार) का अर्थ दोनों प्रकार से लिया जा सकता है, अर्थात् “गुरु की ओर ले जाना” या “परमात्मा की ओर ले जाना”, उपनिषद भी दोहरी व्याख्या की अनुमति देते हैं । शिष्य के निकट रहकर शिक्षा देने का तात्पर्य है कि सिखाई गई बात एक गुप्त व्यक्तिगत सलाह के रूप में है । यह उन लोगों के लिए नहीं है जो मानसिक रूप से प्रशिक्षित नहीं हैं कि वे इस शिक्षा को आत्मसात करें । इसीलिए उपनिषद सूक्ष्म सत्यों का प्रतिपादन करते हुए स्पष्ट रूप से कहते हैं: “यह उपनिषद है । यह उपनिषद है ।” वेदों में जो कुछ छिपा है उसे रहस्य कहते हैं । उपनिषद ऐसे गोपनीय, व्यक्तिगत निर्देश हैं जो उन्हें ग्रहण करने के योग्य हैं ।

हरिः हरः!!

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