यज्ञ
वेदक अनेकों गुण मध्य सँ ‘यज्ञ’ या वैदिक अनुष्ठान एकर एकटा महत्वपूर्ण पक्ष थिक ।
यज्ञ मे वेद मंत्र सभक संग अग्निक सहायता सँ निर्धारित अनुष्ठान करब शामिल अछि । यज्ञ मूल शब्द ‘यज’ सँ बनल अछि, जेकर अर्थ अछि पूजा कयनाय – बलिदान कयनाय । परमात्मा आ देवता सभक प्रति समर्पण केर भावना सहित पूरा मन सँ कोनो अनुष्ठान करब “यज्ञ” थिक ।
जेना कि पहिनहिं कहल जा चुकल अछि, “मंत्र” केर अर्थ अछि ओ जे जप करयवलाक रक्षा करैत अछि । जप कयनिहार लोक केर रक्षा कयनाइये मंत्र केर कार्य थिक । “मनन” या ध्यानात्मक जप, मन केँ (ध्यान मे) शामिल करैत कोनो शब्द केर बेर-बेर उच्चारण करब थिक । यद्यपि सामान्यतः मंत्रक उच्चारण श्रव्य रूप सँ कयनाय होइत छैक, गोटेक मामिला मे, शब्द केर श्रव्य रूप सँ उच्चारण कयनाय जरूरी नहि होइत छैक । शब्द केर मौन उच्चारण सँ सेहो, तंत्रिका केन्द्र मे आवश्यक लाभकारी कम्पन उत्पन्न होइत छैक । वेद मंत्र केर रूप मे उच्च स्वर मे उच्चारित कयलापर, एकर एकटा भव्य प्रभाव होइत छैक, जे तखनहुँ उत्साहवर्धक होइत छैक जखन कि एकर अर्थ ज्ञात नहि रहैछ । जे मन मे विद्यमान अछि आर मौन रूप सँ उच्चारित कयल जाइत छैक, वैह उच्चारित करय सँ आ अनुवादित भेला पर शब्द रूप मे प्रकट होइत अछि । जरूरत मन, वाणी व शरीर केर कार्य सभक एकीकरण केर अछि – मनो वाक कायं – जे पूर्ण संलग्नताक प्रतीक अछि । अर्थात्, मनन, या ध्यानात्मक उच्चारण, मुख सँ ध्वनिक रूप मे निकलैत अछि आर यज्ञहि जेकाँ शरीरक माध्यम सँ क्रियाक रूप मे अभिव्यक्त होइत अछि । यैह लेल, यज्ञ वैदिक आदेश सब मे सँ एकटा सबसँ महत्वपूर्ण अछि ।
अन्य धर्म मे उपलब्ध नहि अछि
अन्य धर्म सब मे कर्मकांडवाद नहि भेटैत अछि । चूँकि ई वेद पर आधारित अछि, ताहि लेल हमरा लोकनिक धर्म केँ “वैदिक मतम्” या वैदिक धर्म कहल जाइछ । एहि मे आर आजुक दुनिया मे प्रचलित अन्य धर्म सब मे एकटा पैघ अन्तर छैक । ईसाई धर्म, इस्लाम आर एहने अन्य धर्म सब एहि बात पर ज़ोर दैत अछि जे केवल एकटा ईश्वर छथि जिनकर पूजा सब केँ करबाक चाही । वेद सेहो कहैत अछि जे विद्यमान् छथि ओ एक्के टा भगवान् छथि – जिनका मे सब आत्मा रूप मे समाहित अछि ।
लेकिन “एक ईश्वर” केर एहि अवधारणाक अनुभव केवल ज्ञान द्वारा – आत्मनिरीक्षण द्वारा मात्र कयल जा सकैत अछि । बोध केर एहि अवस्था तक पहुँचय वास्ते उच्चस्तरक मानसिक अनुशासन केर आवश्यकता होइत छैक । जखन हम सब एकटा ईश्वर केर संग एकाकार भ’ जाइत छी, त फेर ई संसार हमरा सभक अनुभूति केर विषय नहि रहि जाइछ । हमरा सब केँ ओ अबस्था केँ प्राप्त करय पड़त जेतय बोध केवल अपना जीवन केँ अनुशासित कयला मात्र सँ प्राप्त होइत अछि, जे नहियो चाहैत सांसारिक विषय सब मे उलझल रहैछ । वर्तमान जीवन मे, हमरा सब केँ धर्मक मार्ग पर चलबाक चाही, एहेन अनुष्ठान सब करबाक चाही जे मन केँ शुद्धि आ परिपक्वता दिश ल’ जाय । ओहि अबस्था मे, सांसारिक बन्धन सब टुटि जायत । वेद हमरा लोकनि केँ एहि लक्ष्यक प्राप्ति लेल असंख्य मार्ग व साधन प्रदान कयलक अछि । एहि मे सँ सबसँ महत्वपूर्ण कर्म यज्ञ थिक । यज्ञ एकटा ईश्वर केँ समर्पित नहि भ’ कय विभिन्न देवता लोकनि केँ आहुति देनाय होइछ, लेकिन अन्ततः कर्मक फल एकटा ईश्वर केँ समर्पित करब होइछ । ई यज्ञ हमरा लोकनिक आस्थाक विशिष्ट उदाहरण थिक आर अन्यत्र नहि भेटैछ ।
यज्ञ मे अनेकों पदार्थ सब मंत्रोच्चारक संग अग्नि केँ समर्पित करब आवश्यक होइत छैक । एहि तरहें कयल गेल आहुति केँ “होम” कहल जाइत छैक । अग्नि केँ समर्पित भेलाक बादो, एकर अर्थ ई नहि छैक जे सब आहुति अग्नि (आइगे टा) लेल छैक । अग्नि केँ मंत्र केर माध्यम सँ नाम लयकय जेहो किछु समर्पित कयल जाइत छैक, ओ अग्नि केर हिस्सा मे अबैत छैक । बाकी (और) रुद्र, विष्णु, इंद्र, वरुण, वायु, सोम आदि अन्य देवता लोकनि वास्ते समर्पित आहुति सब केँ अग्नि द्वारा ग्रहण त कयल जाइछ, मुदा अग्नि ओकरा अपना लग नहि रखैत अछि, ओकरा सब केँ ओकर गन्तव्य (इच्छित देवता जिनका लेल हविष्य अग्नि केँ देल गेल तिनका लग) धरि पहुँचा दैत अछि । अपन वैदिक आस्था तथा अन्य आस्था सब मे मुख्य अन्तर यैह छैक जे, यद्यपि हम सब केवल एकटा ईश्वर केर अस्तित्व केर पुष्टि करैत छी, तैयो हम सब अग्निक माध्यम सँ नहि केवल ईश्वर केँ, बल्कि आनो-आन देवता सबकेँ सेहो आहुति अर्पित करैत छी ।
हम सब कहैत छी जे मानवताक सेवा कयला सँ ईश्वर प्रसन्न होइत छथि । सामाजिक कार्यकर्ता कहैत अछि, “मानवहि केर सेवा ईश्वर केर सेवा थिक; समाजहि केर सेवा ईश्वर केर सेवा थिक” । यैह प्रकारे, यज्ञ द्वारा ईश्वर केर रचना मे सँ देवता लोकनिक सेवा कयला सँ हमरा लोकनि केँ ईश्वरक कृपा प्राप्त होइत अछि ।
वेद मे एहि बातक जोरदार घोषणा कयल गेल छैक जे एकमात्र ईश्वर स्वयं केँ अनेक देवत्व मे विभाजित कयलनि अछि । जखनहुँ कोनो विशिष्ट देवत्व केर उल्लेख होइछ, हुनका परमात्मे कहल जाइत छन्हि, जाहि सँ पता चलैत अछि जे वेद केवल एकेश्वरवाद मात्र केर प्रतिपादन करैत अछि । एतय देवत्व आर एक ईश्वर केर बीचक भेद आ अन्तर पर बल देल गेल अछि । चूँकि अनेक देवत्व सभक उल्लेख ईश्वर केर रूप मे कयल गेल अछि, ताहि लेल वेद केँ बहुदेववाद केर प्रतिपादक कहब अनुचित होयत । वेद अनेक देवत्व सभक माध्यम सँ प्रकट एकटा ईश्वर केर बात करैत अछि । ब्रह्मांड केर प्रबंधन केँ विनियमित करबाक लेल, ओ अनेकों देवत्व केर रचना कयलनि अछि । ई देवत्व विभिन्न कार्य सभक संचालन करबाक लेल अछि । देवत्व केर रचना ओहि प्रकारे कयल गेल अछि जेना हमरा सभक । ओ हमरा सब केँ स्वयं सँ उत्पन्न कयलनि अछि । अद्वैत केर अनुसार, जीवात्मा (व्यक्तिगत आत्मा) आर परमात्मा (ब्रह्मांडीय आत्मा) एक्के छथि । एहि प्रकार सँ ओ (परमात्मा) सेहो देवत्वक प्रतिनिधित्व करैत छथि । तैयो, जाबत धरि हम सब अद्वैतवादी विश्वास केँ आत्मसात करबाक लेल पूर्णतया परिपक्व नहि भ’ जाइत छी, वेद मे ई मान्यता अछि जे हमरा सब केँ स्वयं देवता लोकनि सँ अलग मानबाक चाही तथा पारस्परिक लाभ लेल निर्धारित यज्ञ (कर्म) व पूजा-अर्चना करबाक चाही । प्रकृतिक तत्व तथा अन्य शक्ति सब परमात्मा द्वारा निर्धारित देवता (देवत्व) सब द्वारा संचालित व नियंत्रित होइत अछि । तेँ, यदि हमरा सब केँ और हमरा सभक आस-पास केर संसार केँ प्राकृतिक शक्ति सभक लाभकारी प्रभाव प्राप्त करबाक अछि, तँ हम सब सम्बन्धित देवता सब केँ अलग-अलग प्रसन्न करय पड़त । वेद कहैत अछि जे यज्ञ (निर्धारित अनुष्ठान) द्वारा देवता सब केँ प्रसन्न कयल जा सकैछ । जखन आध्यात्मिक जागृति होइत अछि, आर जखन मनुष्य केँ परमात्माक प्रत्यक्ष अनुभव होइत छैक, तखन देवता सब केँ अलग-अलग प्रसन्न करबाक आवश्यकता समाप्त भ’ जाइत छैक । लेकिन, जाबत धरि हम सब ओहि स्तर पर बनल रहैत छी जाहि मे विषय और वस्तु केर अलग-अलग ज्ञान रहैत अछि (द्वैत), त हमरा सब केँ अलग-अलग देवता लोकनिक पूजा करय पड़त । वेद मे यैह आदेश अछि ।
अनुष्ठानक त्रिगुणात्मक लाभ
यज्ञ (अनुष्ठान) केर त्रिगुणात्मक लाभ छैक । पहिल, एहि संसार मे रहैत देवता लोकनिक कृपा सँ स्वयं आ अपना आस-पासक लोक केर कल्याण सुनिश्चित करब । दोसर, मृत्युक बाद देवलोक मे सुखपूर्वक रहब । ई जीवन देवता सभ लोक यानि देवलोक मे रहैछ, से हमेशाक लेल नहि होइत छैक । हम सब ओतय ताबत धरि रहि सकैत छी जाबत धरि हमरा सभक पुण्य बनल रहत । देवलोक मे भेटयवला सुख भक्त (अत्यन्त भक्ति मे लागल लोक) या ज्ञानी (आध्यात्मिक रूप सँ उन्नत व्यक्ति) केर पूर्ण आनन्द सँ कोनो तरहें तुलना योग्य (बराबर) नहि होइत छैक । आदि शंकराचार्य अपन “मनीष पंचकम” मे स्पष्ट रूप सँ कहलनि अछि जे इन्द्र (देवता सभक राजा) केर सुख, आत्मसाक्षात्कार प्राप्त आत्माक वास्तविक आनन्दक एकटा छोटो टा अंश नहि होइछ । तैयो, स्वर्गलोक केर जीवन एहि संसार केर अस्तित्वक तुलना मे स्वर्गे होइछ । अतः, सुख प्राप्ति केर कामना सँ अनुष्ठान कयनाय पहिने कहल गेल त्रिविध लाभ मे सँ दोसर अछि ।
तेसर सबसँ महत्वपूर्ण अछि । गीता मे यैह कहल गेल अछि: बिना कोनो फल या फलक इच्छाक यज्ञ कयनाय । एहि लोक मे कल्याण आर मृत्युक बाद देवलोक मे सुखी जीवन, फल या पुरस्कार छी । एकर कामना कएने बिना, यदि कियो व्यक्ति संसार केर कल्याण लेल, अपन लाभ केर चिन्ता कएने बिना आर आसक्ति रहित भ’ कय यज्ञ केँ अपन कर्तव्य बुझिकय करय, त एहि सँ मनक शुद्धि शीघ्रहि भ’ जाइत छैक । ई हमरा सब केँ ज्ञानमार्ग पर लय जाइत अछि, जेकर लक्ष्य मोक्ष या जन्म-मृत्युक चक्र सँ मुक्ति आर पूर्ण आनन्द केर स्थिति छैक । संक्षेप मे, हम सब अनन्त मे विलीन भ’ जाइत छी ।
आदि शंकराचार्य, जे अद्वैत केर सार केर रूप मे आत्मसाक्षात्कार आर सच्चा ज्ञानक उपदेश देलनि, कहलनि अछि, “वेदो नित्यमधीयतां तदुदितं कर्म स्वनुष्ठीयतां ।” (वेद केर निरन्तर अध्ययन करू; ओहि मे बतायल गेल अनुष्ठान सब केँ नीक जेकाँ करू ।) ई स्पष्टतः तेसर लाभक दिश संकेत करैत अछि । ओ ई बात हमरा सब केँ एहि संसार या स्वर्ग मे सुख-सुविधापूर्वक जीवन जियय मे सक्षम बनेबाक लेल नहि कहने रहथि । हुनकर आशय रहनि जे व्यक्तिगत फल केर आशा कएने बिना अनुष्ठान कयला सँ दृष्टिक स्पष्टता आ मन केँ पवित्रता प्राप्त होयत ।
देवता आर मानवजातिक बीच पारस्परिक सहयोग
एहि प्रकारे, अनुष्ठान सभक पालन वेदक सबसे महत्वपूर्ण पक्ष थिक । भगवान कृष्ण गीता मे एकर उल्लेख कएने छथि ।
जखन ब्रह्मा सृष्टिक रचना कयलनि, त ओ मनुष्य सब द्वारा कयल जायवला यज्ञ सभक सेहो रचना कयलनि । भगवद् गीता कहैत अछि, “यज्ञ करैत रहू । ओहि सँ प्राप्त होयबला लाभ सभक फलस्वरूप सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करू । एहि यज्ञ केँ कामधेनु मानू ।”
वेद मंत्र सृष्टिक मूल कारण छी, एहि लेल वेद मंत्र सभक उच्चारण मात्र टा सँ देवता अपन कम्पन सँ साक्षात प्रकट भ’ जाइत छथि । यज्ञ मे मंत्र सभक उच्चारण डाक लिफाफा पर पता लिखबाक समान अछि । केवल तखनहिं जखन मंत्रोच्चारक संग आहुति देल जाय, अग्नि देवता लोकनि तक सन्देश पहुँचाबैत छथि ।
पशु सब मे, बिलाइड़, कुकुर, घोड़ा, हाथी आ सिंह, ऊपर बतायत गेल क्रम मे, एक-दोसर सँ क्रमशः अधिक शक्तिशाली होइत अछि । एहिना, सृष्टि मे सेहो एहेन प्राणी सब अछि जाहि मे मनुष्यहु सब सँ बेसी शक्ति होइत छैक । ओ देवता थिकाह । एहि लोक मे ओ सब पंचतत्व मे सह-अस्तित्व मे रहैत छथि, लेकिन देवलोक मे हुनकर एकटा अलग रूप छन्हि । यदि मंत्र केर सही जाप से पूर्ण लाभ प्राप्त होइत अछि, त हम सब हुनका लोकनि केँ एतय हुनकर भौतिक लाभक संग-संग देवलोक मे सेहो साकार रूप मे देखि सकैत छी । परमात्मा मे हुनकर आविर्भाव एहि मंत्रक मूल ध्वनि सब सँ उत्पन्न स्पन्दन सभक परिणामस्वरूप होइत अछि । दोसर शब्द मे, मंत्र देवता सभक शब्द रूप थिक ।
यज्ञ मे, कोनो विशेष देवता सँ सम्बन्धित मंत्र केर जाप ओहि देवताक आह्वान करैत अछि । जे लोक आध्यात्मिक रूप सँ उन्नत छथि, ओ सब हुनका साक्षात् देखि सकैत छथि । भले हि ओ नग्न आँखि सँ नहि देखाय पड़थि, तैयो हुनकर उपस्थिति सूक्ष्म रूप सँ अनुभव कयल जा सकैत अछि । तथापि, हुनका सब केँ प्रत्यक्ष रूप सँ आहुति देनाय उचित नहि अछि । केवल अग्नि मे देल गेल आहुति, निर्धारित मंत्र सभक जाप केर संग, ओकरा एहेन रूप प्रदान करत जाहि सँ ओ देवता लोकनि केँ स्वीकार्य भ’ जाइन्ह ।
केकरो ई आश्चर्य नहि हेबाक चाही जे अग्नि जखन अधिकांश हवन सामग्री केँ भस्मे कय देलक अछि आ शेष यज्ञकर्ता प्रसाद रूप मे अपने ग्रहण कय लेलनि, तखन हवन सामग्री अपन गन्तव्य धरि केना पहुँचि सकैत अछि । देवता लोकनिक शरीर अपना सब जेकाँ पंच तत्व (पृथ्वी, जल, तेज, वायु आ आकाश) सँ निर्मित नहि छन्हि । हुनका सब केँ अपना सब द्वारा ग्रहण कयल जायवला भौतिक भोजनक आवश्यकता नहि छन्हि । हमरहु सब केँ, पाचन अंग शरीर द्वारा अवशोषण सँ पहिने भोजनक विभिन्न रूप सब मे परिवर्तित करैत अछि । एहि तरहें, यज्ञ अग्नि हवन सामग्री केँ देवता सब लग पहुँचाबय सँ पहिने ओकरा सूक्ष्म अबस्था मे परिवर्तित कय दैत छैक । ई परिवर्तन सेहो मंत्रहि केर शक्तिक कारण होइत छैक ।
एकटा सामान्य उदाहरण लैत छी । आइयो, पश्चिमी लोक सभक एकटा प्रथा अनुसार, रात्रि भोज मे स्वास्थ्य तथा कल्याणक वास्ते टोस्ट केर प्रस्ताव राखल जाइत छैक । एकटा खाइत अछि आर दोसर केँ लाभ भेटैत छैक, यैह मान्यता छैक । एना केना भ’ सकैत छैक ? ई सद्भावनाक संकेत थिक । विचार ई छैक जे, यदि विचार-शक्ति केर हस्तांतरणक माध्यम सँ ईमानदारी आ पूर्ण विश्वासक संग कयल जाय, त एहेन परिणाम सम्भव छैक ।
जखन परमात्माक विचार तरंग सब मंत्रक रूप मे कम्पन सभक रूप मे हमरा सब लग अबैत अछि, तखन ओ अनिवार्यतः कल्याणकारी शक्ति होयत । निर्धारित मंत्र अनुसार पूर्णतः अर्पित आहुति, देवता लोकनिक शक्ति या सामर्थ्य केँ बढ़बैत छन्हि । यद्यपि ओ सब हमरा सब सँ श्रेष्ठ छथि, तैयो हुनकर शक्ति सीमित छन्हि । हुनकहु सभक इच्छा सब आर आवश्यकता सब होइत छन्हि ।
केवल यज्ञ टा हुनका लोकनि केँ सन्तुष्ट कय सकैत अछि । जँ ओ सब एहि संसार मे हमरा सभक जीवन केँ बेहतर बनबय मे हमरा लोकनि केँ सहयोग करय चाहैत छथि, तँ हमरो सब केँ हुनकर आवश्यकता सभक पूर्ति लेल यज्ञ कयकेँ हुनकर शक्ति बढ़ाबय मे सहायता करबाक चाही । यदि हम सब हुनकर कल्याण लेल समर्पित मन सँ एना करैत छी, तँ ओहो सब हमरा सब पर कृपा बरसाकर प्रत्युत्तर देताह ।
यद्यपि देवता हमरा सबपर निर्भर छथि, हमरा सब केँ ई नहि बिसरबाक चाही जे ओ सब श्रेष्ठ प्राणी छथि । हमरा सब केँ हुनका उचित सम्मान करबाक चाही । आन धर्म सीधा एक्के टा ईश्वर केँ श्रद्धांजलि अर्पित करैत अछि, हुनकर सीधा प्रार्थना करैत अछि । अनुष्ठान सभक माध्यम सँ विविध दिव्य शक्ति सब केँ प्रसन्न करबा जेकाँ कोनो तरीका नहि छैक । अपना सभक धर्म मे, केवल संन्यासी सब, अर्थात् जे सांसारिक धन आर सुख सभक त्याग कय देलक अछि, तिनके सब टा केँ देवता सब लग जेबाक जरूरत नहि छन्हि, बल्कि हुनका लोकनि केँ सीधे ईश्वर (परमात्मा) सँ प्रार्थना करबाक चाहियनि । आर लोक केँ देवता लोकनि केँ प्रसन्न करबाक चाहियनि आर हुनकर कृपा सँ कल्याणक कामना सेहो करबाक चाहियनि । देवता सब केँ प्रसन्न करबाक लेल हवन, यज्ञ आदि करय पड़ैत छैक ।
एकरा एक गोट सांसारिक उदाहरण सँ बुझबैत छी: मानि लिय’, कोनो देशक राजा धरि सभक सीधा पहुँच नहि भ’ सकैत छैक । लोक अपन अनेकों शिकायत सभक निवारण लेल सरकारी अधिकारी सब लग जाइत अछि । अधिकार अपन व्यक्तिगत क्षमता मे नहि, बल्कि राजा या सरकार केर निर्देशन मे कार्य करैत छथि । लोक सीधे राजा या राज्य केर मुखिया लग नहि जा सकैछ, भले ही ओ अप्रत्यक्ष रूप सँ लोकक आवश्यकता सभक पूर्ति करैत होइथ ।
एहि प्रकारे, अपन धर्म मे कतेको प्रथा सब एहि प्रकारे निर्धारित अछि । परमेश्वर सम्राट थिकाह । नागरिक सम्पूर्ण मानव जाति अछि । वरुण, अग्नि आ वायु आदि अधिकारी छथि । हमरा सब केँ हुनकहि माध्यम सँ अपन लाभ प्राप्त करबाक चाही ।
हम सब देवता लोकनि केँ अधिक शक्ति प्रदान करबाक लेल यज्ञ करैत छी । हम जे आहुति दैत छी, से देवता सभक लेल भोजन थिकन्हि । केवल वैह वस्तु सब देवता सब धरि पहुँचैत अछि जे हम अपना अधिकारक त्याग (बलिदान) कयकेँ अर्पित करैत छथि । अग्नि मे समर्पित वस्तु सब निश्चित रूप सँ देवता लोकनि केँ अर्पित कयल जेबाक चाही । एहि लेल आहुति दैत समय हम सब कहैत छी, “न मम” – “हमरा लेल नहि” । देवता सब लेल भोजन अग्निक माध्यमहि सँ अबैत छन्हि । तहिना, अग्नि आर वेद मंत्र सभक माध्यम सँ हमरा लोकनि अपन दिवंगत पूर्वज लोकनिक आत्मा केँ सेहो आहुति दैत छी ।
यज्ञक महत्व या उद्देश्य
केवल अपनहि सभक धर्म टा मे अनुष्ठानक अस्तित्व केर कारण सभक विश्लेषण करैत, आउ जीविकाक व्यवहारिक स्वरूप पर एक नज़रि दी । यदि कोनो क्षेत्र विशेष मे कोनो वस्तुक प्रचुर उत्पादन होइत अछि, त हम सब ओकरा दोसर क्षेत्र मे पठबैत छी जेतय ओकर कमी छैक आ ओहि क्षेत्र सँ ओ वस्तु प्राप्त करैत छी जे ओ सब बदला मे दय सकैत हो आ जे हमरा सभक पास नहि हो । जखन बढ़इ आर राजमिस्त्री जेहेन कारीगर हमरा सब लेल काज करैत अछि, तखन हम सब ओकरा सब केँ ओकर आजीविका लेल आवश्यक मजदूरी दैत छी । हम सब गाय केँ चारा खुआबैत छी आ बदला मे ओ हमरा सब केँ दूध दैत अछि । हम सब सरकार केँ कर दैत छियैक, जे हमरा सभक सुरक्षा आर विभिन्न सुविधा सभक प्रबंध करैत अछि । तहिना, अन्य लोकक संग सेहो हमरा सभक किछु द्विपक्षीय समझौता होइत अछि ।
इंजीनियर केवल नहर केर माध्यम सँ वर्षा जल केर उचित प्रवाह आर जलाशय सब मे भंडारणक व्यवस्था कय सकैत अछि; ओ वर्षा नहि करा सकैत अछि । यदि हमरा सब केँ वर्षा करेबाक हो, त हमरा सब केँ किछु वस्तु (हविष्य) देवलोक मे पठाबय पड़त । ई पारस्परिक विनिमय समझौता वैह थिक जेकर सन्दर्भ गीता दैत अछि जखन ओ कहैत अछि:
सहयज्ञा प्रजासृष्टा पुरोवाच प्रजापतिः । अनेनप्रसाविष्यध्वमेष वोऽस्त्त्विष्टकामाधुक् ।
देवान् भावयतानेन ते देवा भावयन्तुवः । परस्परं भावयंतः श्रेयस परमवाप्स्यथ ॥
“अहाँ यज्ञ सभक माध्यम सँ देवता सब केँ प्रसन्न करैत छी – देवता लोकनि अहाँ केँ वर्षा आर एहेन आरो चीज सब सँ प्रसन्न करथि । एहि तरहें, एक-दोसरक मदति कयला सँ अहाँ समृद्ध भ’ सकैत छी ।”
रास्ता अलग-अलग लेकिन मंजिल एक
संक्षेप मे कहल गेल अछि, यज्ञ केर अर्थ होइछ मंत्रक माध्यम सँ प्रत्येक देवता केँ तर्पण देनाय । एक अर्थ मे, साम वेदक मंत्र देवताक रूप थिक । यज्ञ मे अर्पित पदार्थहि जेकाँ, एहि मंत्र सभक शब्द देवता लोकनि लेल भोजन बनि जाइत छन्हि आर एहि तरहें हुनकर शक्ति मे वृद्धि होइत छन्हि । एहि प्रकार सँ, मंत्र केर अनेक उद्देश्य होइत छैक । हम सब विभिन्न कर (टैक्स) केर भुगतान करैत छी जे सरकारक राजस्व मे वृद्धि करैत अछि । तैयो, विभिन्न स्थान सब पर विभिन्न प्रकारक कर केर भुगतानी करय पड़ैत अछि, जेना आयकर, बिक्री कर, भूमि कर, वाहन कर, आदि । प्रत्येक केर लेल एकटा अलग प्राधिकारी द्वारा एकटा अलग तरहक रसीद जारी कयल जाइत अछि । एहि तरहें, प्रत्येक अनुष्ठानक लेल एकटा अलग मंत्र, देवता, यज्ञ वस्तु, समय आदि होइत अछि । एहि प्रकारे, यद्यपि प्रत्येक (अनुष्ठान) करबाक एकटा अलग प्रक्रिया छैक, अन्तिम लक्ष्य परमपिता परमात्मा केँ प्रसन्न करब छैक । हम सब जनैत छी जे यद्यपि विभिन्न कार्यालय सब मे भुगतान कयल जाइत छैक, सबटा कर सरकारक राजस्व मे जमा होइत छैक । त हमरा सब केँ विभिन्न देवता सभक वास्ते कय गेल विभिन्न यज्ञ सब एहि देवता लोकनिक माध्यम सँ परमपिता परमात्मा धरि पहुँचयवला मनबाक चाही ।
हरिः हरः!!
Yajna
Of the various merits of the Vedas, Yajna or performance of Vedic ritual is one important aspect of it.
Yajna involves the performance of the prescribed ritual with the aid of Fire or Agni to the accompaniment of Veda mantras. Yajna is derived from the root word ‘Yaj’, which means to worship – to sacrifice. To perform a rite or ritual whole-heartedly with a feeling of devotion to the Paramaatma or Supreme Self and the devatas is “Yajna”.
As already explained earlier, “mantra” means that which protects the chanter. To offer protection which chanted is the job of the mantra. “Manana” or meditative chant is to utter a word repeatedly with the mind also involved in it. Though ordinarily mantras have to be recited audibly, in some cases, it is not necessary to utter the word audibly. Even by silent utterance of the words, the necessary beneficial vibrations are created in the nerve centres. The same when chanted aloud, as Veda mantra, has a grandeur which has an exhilarating effect, even when its meaning is not known. That which exists in the mind and is uttered silently comes out in words when chanted aloud and is translated the requirement is for the unification of the functions of the mind, the speech and the body – mano vaak kaayam – representing total involvement. That is to say manana, or meditative utterance, comes out in sound through the mouth and get expressed through the body as action as in the case with a Yajna. Therefore, Yajna is one of the most important of the Vedic injunctions.
Not available in other faiths
Ritualism as such is not found in other faiths. Since it is based on vedas, our faith is called “Vaideeka Matam” or Vedic faith. There is one big difference between this and the other faiths that are prevalent in the world today. Christianity, Islam and such faiths stress that there is only one God whom all should worship. The Vedas also say that what exists is a single God – who includes all souls.
But this concept of “one God” can only be experienced by introspection through knowledge. To reach such a stage of realisation calls for a high degree of mental discipline. When we are unified with the one God, the world ceases to exist as an object of our perception. We have to attain that stage where realisation results only through disciplining our lives which, willy-nilly, are involved with worldly matters. Living as now, we should follow the path of Dharma, do the rituals which lead to the cleansing of the mind and its maturity. At that stage, the worldly ties will be snapped. The Vedas have given us innumerable ways and means towards such an end. Of these, the most important karma is Yajna. Yajna is offering oblations to various divinities instead of to one God, but ultimately, surrendering the fruit of the action to one God. This Yajna is peculiar to our faith and is not found elsewhere.
Yajna requires many substances to be consigned to Agni (fire) attended by the chant of mantras. This kind offering is called “Homa”. Although consigned to Agni, it does not mean that the offering are all meant for Agni. What is specifically offered to Agni by name through mantras falls to Agni’s share. And those offerings meant for other divinities, like Rudra, Vishnu, Indra, Varuna, Vaayu, Soma, etc., are, though accepted by Agni, dispatched to their destination by Agni without keeping them for himself. The main difference between our Vedic faith and the other faiths is that, although affirming the existence of only one God, we offer oblations not only to Him but to other divinities through Agni.
We say that God is pleased if humanity is served. Social workers proclaim “service to man is service to God; service to society is service to God”. Similarly, serving the divinities who are amongst God’s creations by Yajna earns for us God’s grace.
The Vedas proclaim emphatically that the one and only God has split itself into so many divinities. Whenever a particular divinity is mentioned, it is described as Paramaatma itself, which shows that the Vedas postulate monotheism only. The emphasis is on the distinction and difference between the divinities and the one God. Because many divinities are mentioned as God, it is incorrect to label the Vedas as postulating polytheism. It talks of one God manifested through many divinities. To regulate the management of the Universe, He has created many divinities. These divinities are meant to administer various functions. The divinities have been created in the same manner as ourselves. He has created us from out of Himself. According to Advaita, the Jeevaatma (the individual soul) and Paramaatma (the cosmic soul) are one and the same. Likewise, He (the Paramaatma) represents the divinities too. Even so, until we fully ripen to absorb the Advaitic faith, the Vedas postulate that we should assume ourselves to be separate entities from the divinities and perform the prescribed Yajnas and Poojas, for mutual benefit. The elements and other forces of nature are contained and regulated by the Devas (divinities) as ordained by the Paramaatma. Therefore, if we and the world around are to get the beneficial effects of natural forces, we have to please the respective Devas individually. The Veda says that Devas can be pleased by Yajna (stipulated rituals). When spiritual awakening occurs, and when one has direct experiences of the Paramaatma, the need to propitiate the Devas separately ceases to exist. But, so long as we remain at the level where the subject and object are separately cognised (Dvaita), we have to offer worship to individual Devas. This is what the Vedas ordain.
The threefold benefits of rituals
Yajna (ritual) has threefold advantages. One is to ensure well-being for ourselves and those around us through the grace of the Devas whilst living in this world. The second is to live happily after death in the world of Devas. This life is in the world of the Devas or Devaloka, not for ever. We can live there only so long as our merits (Punya) last. The happiness available in Devaloka is in no way comparable to the total bliss (Aananda) of the Bhakta (highly devout) or the Jnani (spiritually evolved). Adi Sankaracharya, in his “Maneesha Panchakam”, has categorically affirmed that the happiness of Indra (the king of Devas) is not even a small fraction of the real Aananda of the realised soul. Nevertheless, life in Swargaloka (heaven) is paradise compared to the existence in this world. So, the performance of rituals with the desire to attain happiness is the second of the threefold benefits stated earlier.
The third is the most important. This is what is stated in the Gita : the performance of Yajna without desiring any results or reward. Well-being in this world and a happy life in Devaloka after death are results or rewards. Without wishing for these, if one should perform the Yajna as one’s duty for the well-being of the world and without any thought of gain for one’s self and without attachment, it speedily leads to purification of the mind. This in turn takes us on the path of knowledge (Jnaana maarga), whose destination is Moksha or release from the cycle of birth and death and the state of total bliss. In short, we merge with the Infinite.
Aadi Sankaracharya who preached the realisation of the self and true knowledge as the essence of Advaita has said, “Vedo Nityam Adheeyataam Taduditam Karma Swanushtheeyataam.” (Study the Vedas constantly; do well the rituals prescribed therein.) This obviously refers to the third benefit. He did not say this to enable us to live luxuriously in this world or in Swarga or heaven. His intention was that performance of the rituals without the expectation of personal reward would lead to clarify of vision and purity of the mind.
Mutual help between Devas and mankind
The performance of rituals is thus the most important aspect of Vedas. Lord Krishna has referred to this in the Gita.
When Brahma originally created the world, he also created the Yajnas for performance by men. “Continue to perform the Yajnas. Live Well as a result of the benefits that would follow. Regard this Yajna as Kaamadhenu,” says the Bhagavad Gita.
The Veda mantras being the root cause of creation, the mere chanting of Veda mantras would by their vibrations, make the Devas appear in person. The chanting of mantras in a yajna is like writing the address on a postal envelope. Only if the oblations are made with the chanting, would Agni carry the message to the Devas.
Amongst animals, the cat, the dog, the horse, the elephant and the lion have progressively more power than the other in the order mentioned. Likewise in creation, there are beings who have more power than the mortals. They are the Devas. They coexist in the five elements in this world but in Devaloka have an individual form. If full benefits are attained by correctly chanting the mantras, we can see them in their corporeal form in Devaloka in addition to their material favours here. Their appearance in the Paramaatma is as a result of the vibrations caused by the basic sounds of these mantras. Putting it differently, one can say that the mantras are the forms in sound (Sabda Roopa) of the Devas.
In Yajna, the chant of a mantra pertaining to a particular Deva calls forth that Deva. Those who are spiritually evolved can see them in person. Even if not visible to the naked eye, their presence will be subtly felt. Even so, directly offering oblation to them is not proper. Only oblations made in Agni (fire), along with the chant of the prescribed mantras, will make them assume the form in which they become acceptable to the Devas.
One must not wonder as to how the oblations can reach their destination when fire has consumed most of them and the rest has been eaten by the performer of the Yajna as Prasad. The Devas do not have bodies physically constituted like ours by the five elements (Earth, Water, Light, Air and Space). They do not need the type of material food that we consume. Even for us, the digestive organs convert the food into different forms before absorption by the body. In the same way, the sacrificial fire converts the oblation to a subtle state before carrying it to the Devas. This transformation is also due to the power of the mantras.
Let us take an ordinary example. Even today, at a dinner according to the custom of Westerners, toasts are proposed for the health and well-being. One eats and the other gets the benefit, that is the belief. How can this happen? These are indications of goodwill. The idea is that, if done with sincerity and full force of conviction through thought-power transfer, such results are possible.
When the thought waves of the Paramaatma have come to us in the form of vibrations which are mantras, they must perforce be only beneficial forces. The oblation, offered strictly in accord with the stipulated mantras, increases the power or potency of the Devas. Although superior to ours, their power is also limited. They also have desires and needs.
The Yajnas alone can satisfy these. If they are to help us to improve our lives in this world here, we should also help to increase their power by doing Yajnas to satisfy their requirements. If we do these with a mind dedicated to their welfare, they also would respond by showering their favours on us.
Although the Devas depend on us, we should not forget that they are superior beings. We should show them proper respect. Other religions directly pay their homage to a single God, offering prayers to Him direct. There is no such method as pleasing diverse divine forces through rituals. In our religion, only Sanyasins, i.e. those who have renounced worldly riches and pleasures need not approach the Devas but pray to God directly. Others should please the Devas and seek well-being through their benevolence. In order to please the Devas, oblation, yajnas, etc., have to be done.
To illustrate this by a mundane example: All cannot have direct access to, say, the king of a country. People approach the officials of government for the redress of their various grievances. The officials do not act in their personal capacity but under the direction of the king or Government. People cannot directly approach the king or head of the state even though he is the one who indirectly attends to their needs.
So, many practices in our religion are similarly ordained. Parameswara is the emperor. The citizens are the entire mankind. Varuna, Agni and Vayu, etc. are the officials. We should get our benefits through them.
We perform Yajnas to give more power to the Devas. The oblations we give constitute the food for Devas. Only things that we offer renouncing our right in them reach the Devas. Things consigned to the fire should unequivocally be offered to the Devas. This is why when offering an oblation we say, “na mama” – “not for me”. The path that the food for Devas takes in through Agni. Similarly, through Agni and Veda mantras we give offerings to the spirits of our departed ancestors.
The significance or the purpose of the Yajnas
In analysing the reason why in our religion alone the rituals exist, let us have a look at the behavioural pattern of sustenance. If a particular region produces a certain commodity in plenty we send it over to another region where it is scarce and obtain from that other region what it could give in return and what we do not have. When craftsmen such as carpenters and masons work for us, we give them wages which are necessary for their livelihood. We feed the cow and it gives us milk in return. We pay taxes to the Government, which provides for our safety and for other amenities. Similarly, we have certain bilateral arrangements with the other worlds.
Engineers can only arrange for the proper flow of rain water through canals and for storage in reservoirs; they cannot make rain. If we are to get rains, we must send some commodities to the Devaloka. This mutual exchange agreement is what Gita refers to when it says:
Sahayajnaa Prajaasrushtaa Purovaacha Prajaapatih. Anenaprasaavishyadhvamesha Voasttvishtakaamadhuk.
Devaan Bhavayaatena Te Devaa Bhaavayantuvah. Parasparam Bhavayantah Sreyasparamavaapsyatha.
“You please the Devas through Yajnas – let the Devas please you by rains and such other things. Thus, helping each other may you prosper.”
Different routes but same destination
Briefly stated, Yajna means offering libation to each Deva through mantras. In a sense, the Saama Veda mantras constitute the form of Devata. Like the substances offered in sacrifice, the words of these mantras become the food, as it were, for the Devatas and thus increase their power. Mantra, thus, has a manifold purpose. We pay different taxes which go to swell the government’s revenue. Nevertheless, there are different places where the different types of taxes have to be paid, viz., income tax, sales tax, land tax, vehicle tax, etc. A different kind of receipt is issued for each by a different authority. Likewise, for each ritual, there is a separate Mantra, Devata, sacrificial object, time, etc. Thus, although there is a different procedure for performing each, the ultimate goal is to please the Supreme Being. We know that although paid in different offices, all taxes are credited to the Government’s revenue. We should regard the various Yajnas done to various Devatas as reaching the Supreme Being, through these Devatas.
यज्ञ
वेदों के विभिन्न गुणों में से, यज्ञ या वैदिक अनुष्ठान इसका एक महत्वपूर्ण पहलू है।
यज्ञ में वेद मंत्रों के साथ अग्नि की सहायता से निर्धारित अनुष्ठान करना शामिल है । यज्ञ मूल शब्द ‘यज’ से बना है, जिसका अर्थ है पूजा करना – बलिदान करना । परमात्मा और देवताओं के प्रति समर्पण की भावना के साथ पूरे मन से कोई अनुष्ठान करना “यज्ञ” है ।
जैसा कि पहले ही बताया जा चुका है, “मंत्र” का अर्थ है वह जो जप करने वाले की रक्षा करता है । जप किए गए व्यक्ति की रक्षा करना ही मंत्र का कार्य है । “मनन” या ध्यानात्मक जप, मन को शामिल करते हुए किसी शब्द का बार-बार उच्चारण करना है । यद्यपि सामान्यतः मंत्रों का उच्चारण श्रव्य रूप से करना होता है, कुछ मामलों में, शब्द का श्रव्य रूप से उच्चारण करना आवश्यक नहीं होता है । शब्दों के मौन उच्चारण से भी, तंत्रिका केंद्रों में आवश्यक लाभकारी कंपन उत्पन्न होते हैं । वेद मंत्र के रूप में जब इसे ज़ोर से उच्चारित किया जाता है, तो इसमें एक भव्यता होती है जिसका प्रभाव उत्साहवर्धक होता है, भले ही इसका अर्थ अज्ञात हो । जो मन में विद्यमान है और मौन रूप से उच्चारित किया जाता है, वही उच्चारित और अनुवादित होने पर शब्दों में प्रकट होता है । आवश्यकता मन, वाणी और शरीर के कार्यों के एकीकरण की है – मनो वाक कायं – जो पूर्ण संलग्नता का प्रतीक है । अर्थात्, मनन, या ध्यानपूर्ण उच्चारण, मुख से ध्वनि के रूप में निकलता है और यज्ञ की तरह शरीर के माध्यम से क्रिया के रूप में अभिव्यक्त होता है । इसलिए, यज्ञ वैदिक आदेशों में सबसे महत्वपूर्ण है ।
अन्य धर्मों में उपलब्ध नहीं
अन्य धर्मों में कर्मकांडवाद नहीं पाया जाता । चूँकि यह वेदों पर आधारित है, इसलिए हमारे धर्म को “वैदिक मतम्” या वैदिक धर्म कहा जाता है । इसमें और आज दुनिया में प्रचलित अन्य धर्मों में एक बड़ा अंतर है । ईसाई धर्म, इस्लाम और ऐसे ही अन्य धर्म इस बात पर ज़ोर देते हैं कि केवल एक ही ईश्वर है जिसकी सभी को पूजा करनी चाहिए । वेद भी कहते हैं कि जो विद्यमान है वह एक ही ईश्वर है – जिसमें सभी आत्माएँ समाहित हैं ।
लेकिन “एक ईश्वर” की इस अवधारणा का अनुभव केवल ज्ञान द्वारा आत्मनिरीक्षण द्वारा ही किया जा सकता है । बोध की ऐसी अवस्था तक पहुँचने के लिए उच्च स्तर के मानसिक अनुशासन की आवश्यकता होती है । जब हम एक ईश्वर के साथ एकाकार हो जाते हैं, तो संसार हमारी अनुभूति का विषय नहीं रह जाता । हमें उस अवस्था को प्राप्त करना होगा जहाँ बोध केवल अपने जीवन को अनुशासित करके ही प्राप्त होता है, जो न चाहते हुए भी सांसारिक विषयों में उलझा रहता है । वर्तमान जीवन में, हमें धर्म के मार्ग पर चलना चाहिए, ऐसे अनुष्ठान करने चाहिए जो मन की शुद्धि और परिपक्वता की ओर ले जाएँ । उस अवस्था में, सांसारिक बंधन टूट जाएँगे । वेदों ने हमें इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए असंख्य मार्ग और साधन प्रदान किए हैं । इनमें से सबसे महत्वपूर्ण कर्म यज्ञ है । यज्ञ एक ईश्वर को समर्पित न होकर विभिन्न देवताओं को आहुति देना है, लेकिन अंततः कर्म का फल एक ईश्वर को समर्पित करना है । यह यज्ञ हमारी आस्था का विशिष्ट उदाहरण है और अन्यत्र नहीं मिलता ।
यज्ञ में अनेक पदार्थों को मंत्रोच्चार के साथ अग्नि को समर्पित करना आवश्यक होता है । इस प्रकार की आहुति को “होम” कहा जाता है । अग्नि को समर्पित होने के बावजूद, इसका अर्थ यह नहीं है कि सभी आहुति अग्नि के लिए ही हैं । अग्नि को मंत्रों के माध्यम से नाम लेकर जो कुछ भी समर्पित किया जाता है, वह अग्नि के हिस्से में आता है । और रुद्र, विष्णु, इंद्र, वरुण, वायु, सोम आदि अन्य देवताओं के लिए समर्पित आहुतियों को अग्नि द्वारा ग्रहण तो किया जाता है, परंतु अग्नि उन्हें अपने पास नहीं रखते हुए, उन्हें उनके गंतव्य तक पहुँचा देते हैं । हमारी वैदिक आस्था और अन्य आस्थाओं में मुख्य अंतर यह है कि, यद्यपि हम केवल एक ईश्वर के अस्तित्व की पुष्टि करते हैं, फिर भी हम अग्नि के माध्यम से न केवल ईश्वर को, बल्कि अन्य देवताओं को भी आहुति अर्पित करते हैं ।
हम कहते हैं कि मानवता की सेवा करने से ईश्वर प्रसन्न होते हैं । सामाजिक कार्यकर्ता कहते हैं, “मानव सेवा ही ईश्वर की सेवा है; समाज सेवा ही ईश्वर की सेवा है” । इसी प्रकार, यज्ञ द्वारा ईश्वर की रचनाओं में से देवताओं की सेवा करने से हमें ईश्वर की कृपा प्राप्त होती है ।
वेदों में इस बात की जोरदार घोषणा की गई है कि एकमात्र ईश्वर ने स्वयं को अनेक देवत्वों में विभाजित किया है । जब भी किसी विशिष्ट देवत्व का उल्लेख होता है, उसे परमात्मा ही कहा जाता है, जिससे पता चलता है कि वेद केवल एकेश्वरवाद का ही प्रतिपादन करते हैं । यहाँ देवत्वों और एक ईश्वर के बीच के भेद और अंतर पर बल दिया गया है । चूँकि अनेक देवत्वों का उल्लेख ईश्वर के रूप में किया गया है, इसलिए वेदों को बहुदेववाद का प्रतिपादक कहना अनुचित है । वेद अनेक देवत्वों के माध्यम से प्रकट एक ईश्वर की बात करते हैं । ब्रह्मांड के प्रबंधन को विनियमित करने के लिए, उन्होंने अनेक देवत्वों की रचना की है । ये देवत्व विभिन्न कार्यों का संचालन करने के लिए हैं । देवत्वों की रचना उसी प्रकार की गई है जैसे हमारी । उन्होंने हमें स्वयं से उत्पन्न किया है । अद्वैत के अनुसार, जीवात्मा (व्यक्तिगत आत्मा) और परमात्मा (ब्रह्मांडीय आत्मा) एक ही हैं । इसी प्रकार, वे (परमात्मा) भी देवत्वों का प्रतिनिधित्व करते हैं । फिर भी, जब तक हम अद्वैतवादी विश्वास को आत्मसात करने के लिए पूरी तरह परिपक्व नहीं हो जाते, वेदों में यह मान्यता है कि हमें स्वयं को देवताओं से अलग मानना चाहिए तथा पारस्परिक लाभ के लिए निर्धारित यज्ञ और पूजा-अर्चना करनी चाहिए । प्रकृति के तत्व और अन्य शक्तियाँ परमात्मा द्वारा निर्धारित देवताओं (देवत्व) द्वारा संचालित और नियंत्रित होती हैं । इसलिए, यदि हमें और हमारे आस-पास के संसार को प्राकृतिक शक्तियों के लाभकारी प्रभाव प्राप्त करने हैं, तो हमें संबंधित देवताओं को अलग-अलग प्रसन्न करना होगा । वेद कहता है कि यज्ञ (निर्धारित अनुष्ठान) द्वारा देवताओं को प्रसन्न किया जा सकता है । जब आध्यात्मिक जागृति होती है, और जब व्यक्ति को परमात्मा का प्रत्यक्ष अनुभव होता है, तो देवताओं को अलग-अलग प्रसन्न करने की आवश्यकता समाप्त हो जाती है । लेकिन, जब तक हम उस स्तर पर बने रहते हैं जहाँ विषय और वस्तु का अलग-अलग ज्ञान होता है (द्वैत), हमें अलग-अलग देवताओं की पूजा करनी होगी । वेदों में यही आदेश है ।
अनुष्ठानों के त्रिगुणात्मक लाभ
यज्ञ (अनुष्ठान) के त्रिगुणात्मक लाभ हैं । पहला, इस संसार में रहते हुए देवताओं की कृपा से स्वयं और अपने आस-पास के लोगों का कल्याण सुनिश्चित करना । दूसरा, मृत्यु के बाद देवलोक में सुखपूर्वक रहना । यह जीवन देवताओं के लोक यानि देवलोक में है, यह हमेशा के लिए नहीं होता । हम वहाँ तभी तक रह सकते हैं जब तक हमारे पुण्य बने रहें । देवलोक में मिलने वाला सुख भक्त (अत्यंत भक्ति में लगा हुआ व्यक्ति) या ज्ञानी (आध्यात्मिक रूप से उन्नत व्यक्ति) के पूर्ण आनंद से किसी भी प्रकार तुलना योग्य (बराबर) नहीं है । आदि शंकराचार्य ने अपने “मनीष पंचकम” में स्पष्ट रूप से कहा है कि इंद्र (देवों के राजा) का सुख, आत्मसाक्षात्कार प्राप्त आत्मा के वास्तविक आनंद का एक छोटा सा अंश भी नहीं है । फिर भी, स्वर्गलोक का जीवन इस संसार की अस्तित्व की तुलना में स्वर्ग ही है । अतः, सुख प्राप्ति की कामना से अनुष्ठान करना पहले बताए गए त्रिविध लाभों में से दूसरा है ।
तीसरा सबसे महत्वपूर्ण है । गीता में यही कहा गया है: बिना किसी फल या फल की इच्छा के यज्ञ करना । इस लोक में कल्याण और मृत्यु के बाद देवलोक में सुखी जीवन, फल या पुरस्कार हैं । इनकी कामना किए बिना, यदि कोई व्यक्ति संसार के कल्याण के लिए, अपने लाभ की चिंता किए बिना और आसक्ति रहित होकर यज्ञ को अपना कर्तव्य समझकर करे, तो इससे मन की शुद्धि शीघ्र ही हो जाती है । यह हमें ज्ञानमार्ग पर ले जाता है, जिसका लक्ष्य मोक्ष या जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति और पूर्ण आनंद की स्थिति है । संक्षेप में, हम अनंत में विलीन हो जाते हैं ।
आदि शंकराचार्य, जिन्होंने अद्वैत के सार के रूप में आत्मसाक्षात्कार और सच्चे ज्ञान का उपदेश दिया, ने कहा है, “वेदो नित्यमधीयतां तदुदितं कर्म स्वनुष्ठीयतां ।” (वेदों का निरंतर अध्ययन करो; उनमें बताए गए अनुष्ठानों को भली-भाँति करो ।) यह स्पष्टतः तीसरे लाभ की ओर संकेत करता है । उन्होंने यह बात हमें इस संसार या स्वर्ग में सुख-सुविधापूर्वक जीवन जीने में सक्षम बनाने के लिए नहीं कही थी । उनका आशय था कि व्यक्तिगत फल की आशा किए बिना अनुष्ठान करने से दृष्टि की स्पष्टता और मन की पवित्रता प्राप्त होगी ।
देवताओं और मानवजाति के बीच पारस्परिक सहयोग
इस प्रकार, अनुष्ठानों का पालन वेदों का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है । भगवान कृष्ण ने गीता में इसका उल्लेख किया है ।
जब ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना की, तो उन्होंने मनुष्यों द्वारा किए जाने वाले यज्ञों की भी रचना की । भगवद् गीता कहती है, “यज्ञ करते रहो । उससे प्राप्त होने वाले लाभों के फलस्वरूप सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करो । इस यज्ञ को कामधेनु मानो ।”
वेद मंत्र सृष्टि के मूल कारण हैं, इसलिए वेद मंत्रों के उच्चारण मात्र से ही देवता अपने कंपन से साक्षात प्रकट हो जाते हैं । यज्ञ में मंत्रों का उच्चारण डाक लिफाफे पर पता लिखने के समान है । केवल तभी जब मंत्रोच्चार के साथ आहुति दी जाए, अग्नि देवताओं तक संदेश पहुँचाती है ।
पशुओं में, बिल्ली, कुत्ता, घोड़ा, हाथी और सिंह, ऊपर बताए गए क्रम में, एक-दूसरे से क्रमशः अधिक शक्तिशाली होते हैं । इसी प्रकार, सृष्टि में भी ऐसे प्राणी हैं जिनमें मनुष्यों से भी अधिक शक्ति होती है । वे देवता हैं । इस लोक में वे पंचतत्वों में सह-अस्तित्व में रहते हैं, लेकिन देवलोक में उनका एक अलग रूप है । यदि मंत्रों के सही जाप से पूर्ण लाभ प्राप्त होता है, तो हम उन्हें यहाँ उनके भौतिक लाभों के साथ-साथ देवलोक में भी साकार रूप में देख सकते हैं । परमात्मा में उनका आविर्भाव इन मंत्रों की मूल ध्वनियों से उत्पन्न स्पंदनों के परिणामस्वरूप होता है । दूसरे शब्दों में, मंत्र देवताओं के शब्द रूप हैं ।
यज्ञ में, किसी विशेष देव से संबंधित मंत्र का जाप उस देव का आह्वान करता है । जो लोग आध्यात्मिक रूप से उन्नत हैं, वे उन्हें साक्षात् देख सकते हैं । भले ही वे नग्न आँखों से दिखाई न दें, फिर भी उनकी उपस्थिति सूक्ष्म रूप से अनुभव की जा सकती है । फिर भी, उन्हें प्रत्यक्ष रूप से आहुति देना उचित नहीं है । केवल अग्नि में दी गई आहुति, निर्धारित मंत्रों के जाप के साथ, उन्हें वह रूप प्रदान करेगी जिससे वे देवताओं को स्वीकार्य हो जाएँ ।
किसी को यह आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि जब अग्नि ने अधिकांश हवन सामग्री भस्म कर दी है और शेष यज्ञकर्ता ने प्रसाद के रूप में ग्रहण कर लिया है, तो हवन सामग्री अपने गंतव्य तक कैसे पहुँच सकती है । देवताओं का शरीर हमारी तरह पंच तत्वों (पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश) से निर्मित नहीं है । उन्हें हमारे द्वारा ग्रहण किए जाने वाले भौतिक भोजन की आवश्यकता नहीं है । हमारे लिए भी, पाचन अंग शरीर द्वारा अवशोषण से पहले भोजन को विभिन्न रूपों में परिवर्तित करते हैं । इसी प्रकार, यज्ञ अग्नि हवन सामग्री को देवताओं तक पहुँचाने से पहले उसे सूक्ष्म अवस्था में परिवर्तित कर देती है । यह परिवर्तन भी मंत्रों की शक्ति के कारण होता है ।
एक सामान्य उदाहरण लेते हैं । आज भी, पश्चिमी लोगों की प्रथा के अनुसार, रात्रि भोज में स्वास्थ्य और कल्याण के लिए टोस्ट का प्रस्ताव रखा जाता है । एक खाता है और दूसरे को लाभ मिलता है, यही मान्यता है । ऐसा कैसे हो सकता है ? ये सद्भावना के संकेत हैं । विचार यह है कि, यदि विचार-शक्ति के हस्तांतरण के माध्यम से ईमानदारी और पूर्ण विश्वास के साथ किया जाए, तो ऐसे परिणाम संभव हैं ।
जब परमात्मा की विचार तरंगें मंत्रों के रूप में कंपनों के रूप में हमारे पास आती हैं, तो वे अनिवार्यतः कल्याणकारी शक्तियाँ ही होंगी । निर्धारित मंत्रों के अनुसार पूर्णतः अर्पित आहुति, देवताओं की शक्ति या सामर्थ्य को बढ़ाती है । यद्यपि वे हमसे श्रेष्ठ हैं, फिर भी उनकी शक्ति सीमित है । उनकी भी इच्छाएँ और आवश्यकताएँ होती हैं ।
केवल यज्ञ ही इन्हें संतुष्ट कर सकते हैं । यदि वे इस संसार में हमारे जीवन को बेहतर बनाने में हमारी सहायता करना चाहते हैं, तो हमें भी उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु यज्ञ करके उनकी शक्ति बढ़ाने में सहायता करनी चाहिए । यदि हम उनके कल्याण के लिए समर्पित मन से ऐसा करते हैं, तो वे भी हम पर कृपा बरसाकर प्रत्युत्तर देंगे ।
यद्यपि देवता हम पर निर्भर हैं, हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वे श्रेष्ठ प्राणी हैं । हमें उनका उचित सम्मान करना चाहिए । अन्य धर्म सीधे एक ही ईश्वर को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं, उनकी सीधी प्रार्थना करते हैं । अनुष्ठानों के माध्यम से विविध दिव्य शक्तियों को प्रसन्न करने जैसा कोई तरीका नहीं है । हमारे धर्म में, केवल संन्यासियों, अर्थात् जिन्होंने सांसारिक धन और सुखों का त्याग कर दिया है, को ही देवताओं के पास जाने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि उन्हें सीधे ईश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए । अन्य लोगों को देवताओं को प्रसन्न करना चाहिए और उनकी कृपा से कल्याण की कामना करनी चाहिए । देवताओं को प्रसन्न करने के लिए, हवन, यज्ञ आदि करने पड़ते हैं ।
इसे एक सांसारिक उदाहरण से समझाएँ: मान लीजिए, किसी देश के राजा तक सभी की सीधी पहुँच नहीं हो सकती । लोग अपनी विभिन्न शिकायतों के निवारण के लिए सरकारी अधिकारियों के पास जाते हैं । अधिकारी अपनी व्यक्तिगत क्षमता में नहीं, बल्कि राजा या सरकार के निर्देशन में कार्य करते हैं । लोग सीधे राजा या राज्य के मुखिया के पास नहीं जा सकते, भले ही वह अप्रत्यक्ष रूप से उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति करता हो ।
इस प्रकार, हमारे धर्म में कई प्रथाएँ इसी प्रकार निर्धारित हैं । परमेश्वर सम्राट हैं । नागरिक संपूर्ण मानव जाति हैं । वरुण, अग्नि और वायु आदि अधिकारी हैं । हमें उनके माध्यम से अपना लाभ प्राप्त करना चाहिए ।
हम देवताओं को अधिक शक्ति प्रदान करने के लिए यज्ञ करते हैं । हम जो आहुति देते हैं, वह देवताओं के लिए भोजन है । केवल वही वस्तुएँ देवताओं तक पहुँचती हैं जिन्हें हम अपने अधिकार का त्याग करके अर्पित करते हैं । अग्नि में समर्पित वस्तुएँ निश्चित रूप से देवताओं को अर्पित की जानी चाहिए । इसीलिए आहुति देते समय हम कहते हैं, “न मम” – “मेरे लिए नहीं” । देवताओं के लिए भोजन अग्नि के माध्यम से ही आता है । इसी प्रकार, अग्नि और वेद मंत्रों के माध्यम से हम अपने दिवंगत पूर्वजों की आत्माओं को आहुति देते हैं ।
यज्ञों का महत्व या उद्देश्य
केवल हमारे धर्म में ही अनुष्ठानों के अस्तित्व के कारणों का विश्लेषण करते हुए, आइए जीविका के व्यवहारिक स्वरूप पर एक नज़र डालें । यदि किसी क्षेत्र विशेष में किसी वस्तु का प्रचुर उत्पादन होता है, तो हम उसे दूसरे क्षेत्र में भेजते हैं जहाँ उसकी कमी है और उस क्षेत्र से वह प्राप्त करते हैं जो वह बदले में दे सकता है और जो हमारे पास नहीं है । जब बढ़ई और राजमिस्त्री जैसे कारीगर हमारे लिए काम करते हैं, तो हम उन्हें उनकी आजीविका के लिए आवश्यक मजदूरी देते हैं । हम गाय को चारा खिलाते हैं और वह बदले में हमें दूध देती है । हम सरकार को कर देते हैं, जो हमारी सुरक्षा और अन्य सुविधाओं का प्रबंध करती है । इसी प्रकार, अन्य लोकों के साथ हमारे कुछ द्विपक्षीय समझौते हैं ।
इंजीनियर केवल नहरों के माध्यम से वर्षा जल के उचित प्रवाह और जलाशयों में भंडारण की व्यवस्था कर सकते हैं; वे वर्षा नहीं करा सकते । यदि हमें वर्षा करानी है, तो हमें कुछ वस्तुएँ देवलोक में भेजनी होंगी । यह पारस्परिक विनिमय समझौता वही है जिसका संदर्भ गीता देती है जब वह कहती है:
सहयज्ञा प्रजासृष्टा पुरोवाच प्रजापतिः । अनेनप्रसाविष्यध्वमेष वोऽस्त्त्विष्टकामाधुक् ।
देवान् भावयतानेन ते देवा भावयन्तुवः । परस्परं भावयंतः श्रेयस परमवाप्स्यथ ॥
“आप यज्ञों के माध्यम से देवताओं को प्रसन्न करते हैं – देवता आपको वर्षा और ऐसी अन्य चीजों से प्रसन्न करें । इस प्रकार, एक-दूसरे की मदद करने से आप समृद्ध हो सकते हैं ।”
रास्ते अलग-अलग लेकिन मंजिल एक
संक्षेप में कहा गया है, यज्ञ का अर्थ है मंत्रों के माध्यम से प्रत्येक देवता को तर्पण देना । एक अर्थ में, साम वेद मंत्र देवता का रूप हैं । यज्ञ में अर्पित पदार्थों की तरह, इन मंत्रों के शब्द देवताओं के लिए भोजन बन जाते हैं और इस प्रकार उनकी शक्ति में वृद्धि होती है । इस प्रकार, मंत्र का अनेक उद्देश्य होता है । हम विभिन्न करों का भुगतान करते हैं जो सरकार के राजस्व में वृद्धि करते हैं । फिर भी, विभिन्न स्थानों पर विभिन्न प्रकार के करों का भुगतान करना पड़ता है, जैसे आयकर, बिक्री कर, भूमि कर, वाहन कर, आदि । प्रत्येक के लिए एक अलग प्राधिकारी द्वारा एक अलग प्रकार की रसीद जारी की जाती है । इसी प्रकार, प्रत्येक अनुष्ठान के लिए एक अलग मंत्र, देवता, यज्ञ वस्तु, समय आदि होता है । इस प्रकार, यद्यपि प्रत्येक को करने की एक अलग प्रक्रिया है, अंतिम लक्ष्य परमपिता परमात्मा को प्रसन्न करना है । हम जानते हैं कि यद्यपि विभिन्न कार्यालयों में भुगतान किया जाता है, सभी कर सरकार के राजस्व में जमा होते हैं । हमें विभिन्न देवताओं के लिए किए गए विभिन्न यज्ञों को इन देवताओं के माध्यम से परमपिता परमात्मा तक पहुँचने वाला मानना चाहिए ।
हरिः हरः!!

1 Comment
Badd neek san likh k samuchit baat sab ehi lekh k made pta cholal. Mon prafullit bho jait aichh eh sab padhla san.
Johan hamsab kono yagya sab devta sab lel karait chhi t hunke madhyam san parmatma sab lag pahunch jait chhain.
“वेदो नित्यमधीयतां तदुदितं कर्म स्वनुष्ठीयतां ।” (वेद केर निरन्तर अध्ययन करू; ओहि मे बतायल गेल अनुष्ठान सब केँ नीक जेकाँ करू ।)