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वेदांग – शिक्षाः वेदक नाक तथा फेफड़ा

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वेदांग – शिक्षाः वेदक नाक तथा फेफड़ा

वेदक छः अंग मे सँ सब सँ प्रथम (मुख्य) अंग शिक्षा अछि । एकरा वेदक नाक (नासिका) कहल जा सकैत अछि । नासिकाक कार्य केवल गन्ध चिन्हबाक, जे कि एकटा छोट भूमिका थिक, ततबे धरि नहि अछि । बेसी महत्वपूर्ण (भूमिका) श्वास क्रिया सेहो एहि अंग (नासिका) केर माध्यम सँ होइछ । जाहि प्रकारे नाक हमरा सब केँ श्वास लय मे सक्षम बनबैत अछि, जे बदला मे प्राणशक्ति केँ बनाकय रखैत अछि, ताहि प्रकार सँ शिक्षा वेद मंत्र सभक प्राणवायु थिक ।

वेद मंत्र सभक प्राण केन्द्र कतय स्थित अछि ? वेद मंत्र केर प्रत्येक अक्षरक उच्चारण परिमाण, या समय केर अवधि, केर अनुसार सही ढंग सँ कयल जेबाक चाही । एकरा अक्षर शुद्धि – अक्षर शुद्धता कहल जाइत छैक । समय अवधिक अलावा, ध्वनिक स्वर केर सेहो नियम अछि – उच्च, मध्यम या निम्न । उच्च, निम्न तथा मध्यम स्वर सब केँ क्रमशः उदात्तम्, अनुदात्तम् आर स्वरितम् कहल जाइत छैक । यदि ई सब अपन उचित स्थान सब पर रहत, त ध्वनि केँ स्वर-शुद्ध कहल जाइत छैक जाहि मे स्वर शुद्धता रहैत छैक । एहि प्रकारे मंत्र तखनहिं फल दय सकैत अछि जखन अक्षर आर स्वर शुद्धताक आवश्यकता सब पूर्ण रूप सँ पूरा होयत । मंत्रक उचित उच्चारण पर एतेक जोर देल जाइत अछि जे मंत्रक लेल उच्चारण, बजबाक शैली आ बजबाक सुर जेहेन आवश्यकता सब ओकर अर्थहु सँ बेसी महत्वपूर्ण होइछ ।

अर्थ नहियो जनला पर, सही स्वर-उच्चारण अपेक्षित परिणाम केर गारन्टी दैत अछि । अतः वेदक जीवन, जे केवल मंत्र सभक एकटा श्रृंखला अछि, केवल ध्वनि टा सँ चलैत अछि । आउ बिच्छू केर कटला पर उपचार करयवला मंत्र केँ ली । एकर अर्थ प्रकट नहि कयल जेबाक चाही । एहि मे निहित शब्द सब मे अपार शक्ति अछि । विभिन्न ध्वनि सभक विभिन्न प्रभाव होइत छैक । वार्षिक पुण्यतिथि मंत्र (श्राद्ध मंत्र) केर उच्चारण संस्कृत मे करब कियैक आवश्यक अछि, अंग्रेजी या कोनो आ भाषा मे नहि ? कियैक तँ, अंग्रेजी या तमिल मे ओकर ध्वनि भिन्न होइत छैक आ ओकर प्रभावकारिता, जे पूर्णरूप सँ ओकर ध्वनि मे निहित छैक, से नष्ट भ’ जाइत चैक । यदि मंत्र जपयवला केर किछु दांत टुटि जाइक आ परिणामस्वरूप ओ ध्वनि सभक उच्चारण ठीक सँ नहि कय पाबथि, त मंत्र जप केर शुद्धता प्रभावित होयत आर प्रभावकारिता या त खत्म (नष्ट) भ’ जायत या कम भ’ जायत । एहि प्रकारे वेदक लेल उच्चारण आ स्वर-गुणवत्ता, सब किछु महत्वपूर्ण अछि ।

एकर शुद्धता सुनिश्चित करबाक लेल कि कयल जेबाक चाही ?

‘शिक्षा’ ध्वन्यात्मकता (ध्वनिविज्ञान phonetics) – अक्षर केर ध्वनि (sounds of syllables), उच्चारण केर श्रुतिमधुरता (euphony) केर नियम सब केँ निर्धारित करैत अछि । शिक्षा शास्त्र केर कार्य वैदिक शब्द सभक मानदंड निर्धारित करब अछि ।

ध्वनिविज्ञान कोनो भाषाक उच्चारण केर विधि निर्धारित करैत अछि । कोनो अन्य भाषाक तुलना मे, वैदिक भाषाक मामिला मे ध्वनिविज्ञान सबसँ महत्वपूर्ण अछि, कियैक तँ हम सब देखैत छी जे ध्वनि मे परिवर्तन सँ परिणाम आर प्रभाव मे परिवर्तन भ’ जाइत छैक ।

एहि द्वारे शिक्षा, जे वैदिक ध्वनिविज्ञान छी, केँ वेदपुरुषक छह अंग सब मे सबसँ महत्वपूर्ण मानल गेल अछि ।

वेदक मुकुट मानल जायवला ‘उपनिषद’ मे सेहो शिक्षाक उल्लेख भेटैत अछि । तैत्तरीय उपनिषद “शिक्षा वल्ली” नामक अध्याय सँ आरम्भ होइछ । पहिल मंत्र कहैछ “शिक्षां व्याख्यानम्” – आउ हम सब शिक्षा (शीक्षा) केर व्याख्या करी । एतय, वैदिक ग्रंथ सब मे अन्यत्र जेकाँ, ‘शिक्षा’ केँ ‘शीक्षा’ कहल गेल अछि, जाहि मे स्वर ‘इ’ केँ ‘ई’ मे दीर्घित कयल गेल अछि । आदि शंकराचार्य अपन भाष्य मे एकर उल्लेख कयलनि अछि, “धैर्यम् छंदशाम्” । वैदिक भाषाक लेल दीर्घीकरण, अर्थात् काव्यात्मक स्वतंत्रताक अनुसार, छोटकी “इ” दीर्घ “ई” बनि जाइत अछि । हमरा पहिनहिं ई उल्लेख करबाक मौका भेटल छल जे वैदिक भाषा केँ संस्कृत नहि कहल जाइछ, बल्कि एकरा “छंदस्” कहल जाइत अछि । अतः “छंदस्” वेद सब मे प्रयुक्त विशेष भाषा केँ सन्दर्भित करैत अछि ।

हारमोनियम, ओबो आ बाँसुरी जेहेन वायु वाद्ययंत्र सब मे, विभिन्न संगीत स्वर उत्पन्न करबाक वास्ते, किछु गणना सभक आधार पर छिद्र सब सँ वायु केँ बाहर निकालल जाइत अछि । मानव कंठ केर सेहो एहने व्यवस्था छैक । ई केवल कंठहि टा नहि थिक । नाभि केर ठीक नीचाँ स्थित “मूलाधार” सँ श्वास विभिन्न प्रकार सँ उपर दिश प्रवाहित होइत अछि जाहि सँ वाणी या राग उत्पन्न होइत अछि । ईश्वर मनुष्यक लेल जे वाद्य यंत्र बनौलनि अछि, से मानव निर्मित वाद्य यंत्र सब, जेना बांसुरी या हारमोनियम, सँ कतहु बेसी श्रेष्ठ अछि । ई वाद्य यंत्र केवल साधारण ध्वनि टा उत्पन्न कय सकैत अछि । ‘अ’, ‘क’, ‘च’, ‘ङ’ जेहेन अक्षर सभक ध्वनि उत्पन्न नहि कयल जा सकैछ । केवल मानव वाणी टा एहि ध्वनि सब केँ उत्पन्न करबाक क्षमता रखैत अछि । पशु-पक्षी एहि सब मे सँ किछु शब्द तोतराकय बाजि सकैछ, लेकिन मनुष्यक निकट नहि पहुँचि सकैछ, जे एहेन हजारों ध्वनि सब उत्पन्न कय सकैत अछि ।

चूँकि मनुष्य केँ मात्र एहेन ध्वनि सब उत्पन्न करबाक क्षमता प्रदान कयल गेल छैक, ताहि द्वारे ओकर महत्व स्पष्ट अछि । यदि एतेक महत्वपूर्ण सम्पत्ति व्यर्थक बात सब आ बकबकी मे नष्ट भ’ जाय तँ ई दुःखक बात होयत । एकर उपयोग ईश्वरीय शक्ति सब केँ एकत्रित कयनाय, समग्र विश्व केर कल्याण करय आ स्वयं केँ उन्नत करबाक लेल कयल जेबाक चाही । एहि तीनू कार्य केँ करबाक वास्ते, ऋषि लोकनि ध्वनि केँ वेद मंत्रक रूप मे ग्रहण कयलनि आ हमरा सब केँ प्रदान कयलनि । एहि तथ्य केँ खुब नीक जेकाँ बुझनहिये पर हम सब बुझि सकैत छी जे शिक्षाक विज्ञान कियैक विकसित भेल आ प्रतिष्ठित भाषाविद सब तथा वैज्ञानिक सब द्वारा देल गेल उच्चारण, शिक्षा सूक्ष्मतम विवरणक संग बतबैत अछि जे श्वास केँ पेटक गड्ढा (आँत) सँ केना निकलबाक अछि आ कतेक विन्दु सब केँ छूबाक अछि आ मुंह सँ बाहर निकलय सँ पहिने कतेक अलग-अलग तरीका सँ मुड़बाक आ घुमबाक अछि । एहि तरहें ध्वनि सभक शुद्धता सुनिश्चित कयल गेल अछि ।

जखन वायु हमरा लोकनिक भीतर मे एतेक अलग-अलग तरीका सँ यात्रा करैत अछि, त ओ वास्तव मे स्वयं एकटा योग शास्त्र बनि जाइत अछि । हमरा पहिनहिं ई उल्लेख करबाक मौका भेटल छल जे नाड़ी केन्द्र सब सँ श्वासक गुजरय सँ उत्पन्न कम्पन सभक कारण, विभिन्न भावना व शक्ति सब उत्पन्न भेल आर एहि कम्पन सब बाहरी दुनिया पर सेहो अपन प्रतिक्रिया व्यक्त कयलक । यैह कारण छैक जे लोक अपन श्वास केँ नियंत्रित करैत अछि आ योगिक शक्ति सब प्राप्त करैत अछि, ओकर महत्व (कद) मंत्र जपयवला आ आत्मसाक्षात्कार करयवला लोकक समान होइत छैक ।

शिक्षा शास्त्र बतबैत अछि जे प्रत्येक शब्दांश केर ध्वनि केना उत्पन्न कयल जेबाक चाही, ओकर स्वर कतेक ऊंच या नीच हेबाक चाही आर ध्वनि कतेक देर धरि चलबाक चाही । अन्तिम उल्लेखित अवधि केँ ‘मात्रा’ कहल जाइत छैक । मात्रा छोट आ लम्बा ध्वनि सब सँ सम्बन्धित अछि । ‘लघु’ ध्वनि केँ ‘हर्स्व’ कहल जाइछ जेकर अर्थ अछि ‘छोट’ । लम्बा ध्वनि केँ ‘दीर्घ’ कहल जाइछ । मिश्रित आ संयुक्त शब्द केँ शब्दांश सब मे विभाजित कएने बिना ओकर उच्चारण केना कयल जाय आ वेद सभक जाप सिखयवला लेल आवश्यक गोटेक आर दिशानिर्देश शिक्षा शास्त्र मे निहित अछि । ‘क’ ध्वनि गर्दनि आ गलाक बीच केर क्षेत्र सँ निकलबाक चाही । ‘थ’ जेहेन ध्वनि जीभ केँ किछु दांत सब पर बन्द कय केँ उत्पन्न करबाक होइत छैक । ‘न’ जेहेन किछु ध्वनि सब मुंहक तालू या छत केर सम्पर्क मे अयला सँ जीभ सँ निकलैत अछि । ‘म’ जेहेन अन्य ध्वनि सब कसिकय संकुचित (दाबिकय) ठोर सँ अबैछ । यदि हम सब ओहि निर्धारित विधि सभक बारीकी सँ पालन आ अभ्यास करी जे शरीरक कोन अंग आ मांसपेशी सब केँ विशेष ध्वनि सब उत्पन्न करबाक लेल व्यायाम करेबाक चाही, तखन मात्र हम सब ध्वनि विज्ञानक स्तर सँ उठिकय मंत्र योग या शब्द योग केर स्तर धरि पहुँचि गेल रहब ।

मूल भाषा केवल संस्कृत अछि

हम कहैत छी जे कोनो शब्दक ध्वनि ओकर अर्थहु सँ बेसी महत्वपूर्ण होइत छैक । एहि विषय पर बात करिते, हमर मोन मे एकटा आरो बात अबैत अछि । ‘छंदस’, जे वैदिक भाषा छी आर संस्कृत, जे ओहि सँ निकलल अछि, ताहि मे कतेको एहेन शब्द अछि जेकर ध्वनि ओकर अर्थक सूचक अछि ।

उदाहरण लेल, ‘दन्त’ शब्द लेल जाउ जेकर अर्थ दाँत छैक । एकर उच्चारण लेल, ज़्यादातर दाँतहि केर प्रयोग होइत अछि, आर जीभ कखनहुँ-कखनहुँ हल्का सा काज करैत अछि । एकटा प्रयोग सँ पता चलत जे बिना दाँतवला लोक वास्ते ई (दन्त) बजनाय कतेक मुश्किल छैक । ओ सब एकर स्पष्ट उच्चारण नहि कय सकैत छथि ।

एतय तुलनात्मक भाषाविज्ञान केर छात्रक लेल किछु रोचक अछि जे भाषा सभक कालक्रम केँ निर्धारण करैत समय छोट-छोट बातहु सब पर ध्यान दैत छथि । संस्कृत, ग्रीक, लैटिन, जर्मन आदि जे ट्यूटनिक समूह सँ सम्बन्धित अछि (अंग्रेजी सेहो एहि मे शामिल अछि) आर आधुनिक फ्रेंच तथा अन्य भाषा सब जे सेल्टिक समूह सँ सम्बन्धित अछि, भाषाविद सभक मुताबिक, एक्कहि टा मूल भाषा सँ उत्पन्न भेल अछि, जेकरा इंडो-यूरोपीय (भारोपीय) भाषा समूह से सम्बन्धित कहल जाइत छैक, हालाँकि विद्वान सब द्वारा ओहि मूल भाषा केँ दृढ़ता सँ स्थापित नहि कयल गेल अछि । ओ सब ई स्वीकार नहि करैत छथि जे संस्कृत (जाहि मे वैदिक भाषा ‘छंदस’ सेहो शामिल अछि) मूल आधार या मूल भाषा छी । लेकिन ‘दन्त’ जेहेन शब्द एकर मूल भाषा हेबाक दावा केँ पर्याप्त समर्थन करैत अछि ।

अंग्रेजी मे ‘डेंटल’ शब्द केर अर्थ वैह अछि – दाँत । हम सब ‘दन्त’ आर ‘डेन्ट’ मे समानता देखि सकैत छी । फ्रेंच व लैटिन केर संगत शब्द सेहो ध्वनि मे ‘दन्त’ केर समान अछि । कहबाक तात्पर्य ई अछि जे संस्कृत मे ‘द’ के बजाय ‘त’ ध्वनि प्रमुख अछि । तखन ई तर्क देल जा सकैत अछिः “ठीक अछि – ध्वनि सब मे समानता भ’ सकैत छैक, मुदा एहि सँ ई केना स्थापित होइछ जे संस्कृत मूल भाषा छी ?” जेना कि पहिने बतायल गेल अछि, संस्कृत मे ‘दन्त’ शब्दक सही उच्चारण करबाक लेल अहाँ सबटा दाँतक आवश्यकता होइत अछि । अहाँ आन भाषा सब मे ‘डेंटल’ जेहेन आरो शब्द सभक उच्चारण करबाक प्रयास करैत छी । दाँत सभक ओहि मे बेसी भूमिका नहि होइत छैक । ‘दन्त’ ध्वनि जीभक तालू केँ छूबय सँ उत्पन्न होइत अछि । यदि शब्द स्वयं अर्थ केँ स्पष्ट रूप सँ इंगित करैत अछि, ई ई आवश्यकता केवल ‘दन्त’ टा मे पूरा होइत अछि, जे स्पष्ट रूप सँ एक व्युत्पन्न छी ।

किछु आरो मामिला सब मे, वर्तनी मे कनिक टा परिवर्तन कयला सँ एकटा निकट सँ संबद्ध शब्द बनि जाइत छैक । सिंह केर मुख्य लक्षण कि छैक ? पीड़ा देनाय – हिंसा । “हिंसा” शब्द ‘सिंह’ केँ प्रतिस्थापित कयलक । कश्यप, ऋषि सब मे प्रथम, देवता, असुर व मानव जाति केर प्रवर्तक रहथि । हुनकर ई नाम केना पड़लनि ? ओ सत्य केर दर्शन कयलनि । अर्थात्, ओ ईश्वर केर सच्चा रूप केँ देखलनि । संस्कृत मे बुद्धि या ज्ञान केँ दृश्यम् – दृष्टि सेहो कहल जाइत अछि । संस्कृत मे “देखयवला” केर अर्थ “पश्यक” अछि, जे थोड़बे परिवर्तनक संग “कश्यप” बनि गेल । पश्यक सँ कश्यप ।

उच्चारणक नियम

शिक्षा शास्त्र उच्चारणक विभिन्न पहलु सभक विवरण प्रस्तुत करैत अछि, जेना उच्चारण, स्वर, अबधि, स्वर (मात्रा), स्वर-तार (बलम्), समता (सनम्) आर संयोजन (संथानम्) । एहि सँ ई सुनिश्चित होइत अछि जे परिणामी ध्वनि यथासंभव पूर्ण हो । ई आगू बतबैत अछि जे मानव शरीर केर कोन अंग सब सँ कोन अक्षरक ध्वनि उत्पन्न होइत अछि आर कोन तरहक प्रयास सँ ओकरा उत्पन्न कयल जाइत अछि । ई सब अत्यन्त व्यावहारिक व वैज्ञानिक अछि । एहि मे कहल गेल अछि जे जखन कोनो अक्षरक ध्वनि उत्पन्न करबाक लेल ठोर केँ एकटा निश्चित सीमा धरि जोड़य पड़ैत अछि, तखन निर्देशक पालन कयला पर ध्वनि पूर्ण रूप सँ उत्पन्न होइत अछि ।

जखन हम ई कहैत छी, त हमरा एकटा आर बात याद अबैत अछि । ठोर तखनहि काज करैत अछि जखन ‘प’, ‘म’, ‘व’ जेहेन अक्षर उच्चारित होइछ । ‘क’, ‘ङ’, ‘च’, ‘ज्ञ’, ‘ज’, ‘ण’, ‘ठ’, ‘न’ आदि अक्षर सब मे ठोरक प्रयोग नहि होइछ । कियो गोटे ठोरक प्रयोग सँ रहित शब्द सब सँ रामायणक रचना कयलनि अछि । ओकरा ‘निरोष्ट रामायण’ कहैत छैक । ओष्ट ठोर थिक, जाहि सँ ओष्ट्रक, यानी ऊँट बनल अछि । ऊँटक ठोर बहुत उभरल रहैत छैक । निरोष्टक अर्थ अछि बिना ठोरवला । भ’ सकैत छैक ओ अपन कुशलता (दक्षता-प्रवीणता) देखेबाक लेल ई रचना कयलनि अछि । लेकिन हमरा एकर एकटा आरो कारण बुझय मे आबि रहल अछि । ओ (रचयिता) शारीरिक स्वच्छताक प्रति अनुकरणीय व्यक्ति रहल हेताह । शायद ओ एहि ध्वनि सब केँ मुंह सँ (आँइठ करैत) बाजिकय भगवानक नाम केँ अशुद्ध (कलंकित) नहि करय चाहैत छलथि ।

महर्षि पाणिनि (व्याकरणाचार्य) अपन ‘पाणिनीय शिक्षा’ मे एकटा सुन्दर श्लोकक माध्यम सँ कहलनि अछि जे वैदिक शब्द सभक उच्चारण कतेक सावधानी आ एकाग्रता सँ कयल जेबाक चाही:

व्याघ्री यथा हरेत् पुत्रान्, दंष्ट्राभ्यां च न पीडयेत् । भीत पतनादेताभ्यां, तद्वत् वर्णान् प्रयोजयेत् ॥

वैदिक अक्षर सभक उच्चारण बहुत स्पष्ट हेबाक चाही । ध्वनि धुआँयल (धुन्धला) नहि हेबाक चाही । ध्वनि पिछरैत या धीमा नहि हेबाक चाही । दोसर दिश, ओकरा अत्यधिक जोर सँ (भूकिकय) नहि बजबाक चाही । ओकरा नहि तँ ढील दय केँ या लापरवाही सँ बजबाक चाही आ नहिये रुकि-रुकिकय बजबाक चाही । एकर तुलना एकटा मादा बाघिन सँ कयल जा सकैत अछि । बाघिन अपन बच्चा सब केँ केना लय जाइत अछि ? बिलाइड़ आ बाघिन अपन बच्चा सब केँ अपनहि दाँत सँ पकड़ैत अछि । दाँत बच्चाकेँ मजगुती सँ पकड़ैत छैक जाहि सँ कि बच्चा पिछरिकय खसि नहि पड़ैक, लेकिन संगहि, दाँत ओकरा कोनो चोट या दर्द सेहो नहि पहुँचाबय । एहि तरहें, शब्द सभक उच्चारण सेहो कोमलता सँ लेकिन दृढ़ता सँ करबाक चाही । एना पाणिनि कहैत छथि ।

वैह पाणिनि वेदांगक ऐगला महत्वपूर्ण अंग ‘व्याकरण’ मे अमूल्य योगदान देलनि अछि । पाणिनिक अतिरिक्त कतेको आर ऋषि सब सेहो शिक्षा पर लिखलनि अछि । एना प्रतीत होइत अछि जे एहि विषय पर लगभग ३० टा पाठ अछि । पाणिनी आर याज्ञवल्क्य एहि मे सब सँ महत्वपूर्ण छथि ।

विभिन्न भाषाक लिपि

लिपि ‘रेखा, वृत्त आ बिन्दु बनाकय’, विभिन्न अक्षर सभक ध्वनि सब केँ दर्शाबैत अछि । यैह विभिन्न भाषाक लिपि केर मूल थिक । अंग्रेजी आर सम्बद्ध भाषा सभक वर्णमाला रोमन लिपि मे कहल जाइत अछि । पहिने ब्राह्मी नामक एक लिपि भेल करैक । सम्राट अशोकक आदेश एहि लिपि मे अछि । एहि सँ वर्तमान संस्कृत (नागरी व ग्रन्थ) एवं दक्षिण भारतीय भाषा सभक लिपि सब उत्पन्न भेल अछि ।

ब्राह्मी लिपिक दुइ भाग मे सँ एक, जेकरा ‘पल्लव ग्रन्थ’ कहल जाइत छल आर जे दक्षिण मे प्रचलित छल, ताहि सँ द्रविड़ भाषा सभक विभिन्न लिपि सभक उत्पत्ति भेल अछि ।

सबटा आधुनिक भारतीय भाषा सभक लिपि ब्राह्मी सँ उत्पन्न भेल अछि । लेकिन, यदि अहाँ मूल ब्राह्मी लिपि केँ देखब, तँ अहाँ केँ किछुओ परिचित नहि लागत । ताहि द्वारे ‘ब्राह्मी लिपि’ शब्द केर प्रयोग कोनो अज्ञात चीज़ केँ दर्शेबाक लेल कयल जाय लागल ।

‘खरोष्ठी’ नामक एकटा लिपि अछि । “खर-ओष्टम्” केर अर्थ अछि गधाक ठोर । जाहि प्रकारे गधाक ठोर बाहर निकलल रहैत छैक, ताहि प्रकारे ओहि भाषाक अक्षर सभक चक्र गधाक ठोर जेकाँ बाहर निकलल रहैत अछि । ई फारसी भाषाक लिपि थिक ।

जाहि प्रकारे यूरोप मे कतेको भाषा सब मे रोमन लिपिक प्रयोग होइत अछि, ताहि प्रकार भारत मे एकटा प्रचलित लिपि ब्राह्मी अछि । ई कतेको उत्तर भारतीय भाषा सब मे प्रयुक्त देवनागरी लिपि सँ स्पष्ट होइत अछि ।

यदि कोनो भाषाक ध्वन्यात्मक ज्ञान केँ नीक जेकाँ बुझि लेल जाय, त आरो बहुत रास बात सब हमरा सब लेल स्पष्ट भ’ जायत । अंग्रेज़ी मे, हम सोचि सकैत छी जे ‘व’ ध्वनि केँ दर्शेबाक लेल दुइ गोट अक्षर V आ W कियैक अछि । अंग्रेज़ीक एकटा प्रोफ़ेसर एक बेर एहि अन्तर केँ बुझेने रहथि । जेतय V के प्रयोग होइत अछि, ओतय हमरा सब केँ निचुलका ठोर केँ मोड़िकय उपरका दाँत केँ ओहि सँ स्पर्श कराकय ध्वनि उत्पन्न करबाक होइत छैक । जखन कि, जखन W केर प्रयोग होइत अछि, तखन दाँतक प्रयोग नहि करबाक रहैछ, ध्वनि निकालय सँ पहिने दुनू ठोर केँ गोल बनेबाक लेल आंशिक रूप सँ बन्द करबाक होइत छैक । ताहि लेल भारतीय भाषा सब मे सरस्वती आर ईश्वर शब्द ‘V’ सँ लिखल जाइत अछि, ‘W’ सँ नहि ।

कोनो आन भाषाक तुलना मे, संस्कृत मे उच्चारण वर्तनीक बिल्कुल अनुरूप होइत अछि । अंग्रेज़ी मे, यैह चीज़ भ्रामक होइत अछि । हालहि मे हम अखबार मे पढ़लहुँ : “Legislature Wound Up”। अन्जानहि मे हम ‘wind’ शब्दक भूतकालिक कृदंत केँ ‘wound’ पढ़ि लेलहुँ, जेकर अर्थ होइछ चोट । एक्के टा वर्तनी केँ अलग-अलग उच्चारण कयलापर बिल्कुल अलग अर्थ निकलैत छैक । एतय ‘would up’ केर अर्थ बन्द करब छैक । एतय धरि कि ‘wind’ शब्दक उच्चारण सेहो हवाक लेल ‘Vind’ आर चारू दिश बन्हबाक लेल ‘Vynd’ करय पड़ैत छैक । एहि प्रकारे बहुते रास गड़बड़ी सब भ’ जाइत छैक ।

केवल संस्कृत मे, दुइ गोट अपवाद केँ छोड़िकय, उच्चारण मे वर्तनीक कारण कोनो परिवर्तन नहि होइछ । ई पूर्णतया ध्वन्यात्मक वर्तनी अछि । ई दुनू (अपवाद) कोन अछि ? हम बुझबैत छी ।

एकटा परिवर्तन ओ अछि जे ‘प’ के पाछाँ विसर्ग अयलापर होइत छैक । विसर्ग, कमोबेश ‘ह’ ध्वनि लैत अछि । राम: केर उच्चारण ‘रामह’ होयबाक चाही । एकरा पूरे ‘ह’ करबाक बदला, एकरा हल्का (ध्वनि – उच्चारण) करबाक चाही । यैह विसर्ग, ‘प’ के संग अयला पर ‘फ’ भ’ जाइत छैक । यदि शब्दक उच्चारण केवल वर्णमालाक ध्वनिक आधार पर कयल जाय, त ओ गलत हेतैक ।

ब्रह्मा, वह्नि आदि शब्दक एहि तरहें लिखबाक रहैत छैक, लेकिन ओकर उच्चारण ब्रम्हा, आर वन्हि टा करय पड़ैत छैक । एहि दुनूक अलावे, संस्कृत मे उच्चा आ लिपि मे कोनो अन्तर नहि छैक ।

ओ भाषा जाहि मे सब ध्वनि अछि 

उपरोक्त (चर्चा) सँ ई स्पष्ट अछि जे संस्कृत मे ‘फ़’ ध्वनि विद्यमान अछि । एहेन कोनो ध्वनि नहि छैक जे एहि मे स्थान नहि पबैत होइ । हम सब सामान्यतः मानैत छी जे ‘ज़्हा’ (Zha) अक्षर केवल तमिल टा मे उपलब्ध अछि । संस्कृतक मूल भाषा, वैदिक भाषा मे ‘ज़्हा’ ध्वनि अछि । यजुर्वेद मे कतेको स्थान सब पर आर तलवकार सामवेद मे जेतय ‘त’ (T) अक्षर अबैत है, ओतय ओकरा ‘ज़्हा’ केर रूप मे उच्चारित करय पड़ैछ । एहि तरहें ऋग्वेद मे सेहो, गोटेक स्थान सब पर, ‘ज़्हा’ ध्वनि उत्पन्न करय पड़ैछ । ऋग्वेदक प्रथम सूक्त केर पहिल शब्द मे, जेकर उच्चारण ‘अग्नि मीलय’ (Agni Meelay) छैक, ‘लय’ (Lay) केँ ‘ज़्हय’ (Zhay) मे बदलय पड़ैत छैक, जाहि सँ ओ “अग्नि मीज़्हय” भ’ जाइत अछि, जे तमिल भाषा जेकाँ पूर्ण ‘ज़्हा’ त नहि, मुदा ओकर आसपासहिक एकटा ध्वनि थिक ।

फ़्रेंच मे सेहो, ‘ज़्हा’ केर निकट एकटा ध्वनि अछि । लेकिन फ़्रेंच आर संस्कृत दुनू मे, ‘ज़्हा’ ध्वनि केँ दर्शेबाक लेल कोनो अलग अक्षर नहि अछि । फ़्रांसीसी भाषा मे ‘ज’ (J) आर ‘ग’ (G) अक्षरों का प्रयोग ‘ज़्हा’ (Zha) प्रभाव उत्पन्न करबाक लेल कयल जाइछ । संस्कृत मे, केवल ‘ल’ (La) अक्षर टा ‘ज़्हा’ केर सूचक अछि । एना कहल जाइत अछि जे चीनी भाषा मे सेहो ‘ज़्हा’ अक्षर होइत अछि । ‘रामः’ आर ‘पंडितः’ मिलिकय ‘रामपंडितः’ बनैत अछि । संस्कृत मे ‘फ़’ (f) ध्वनि केँ “उपदानीयम्” कहैत छैक, जेकर शाब्दिक अर्थ अछि कोनो पाइप या नली सँ आगि फूंकब । तखनहिं ‘फ़’ ध्वनि उत्पन्न भ’ सकैत अछि ।

भारतीय तथा विदेशी भाषा एवं लिपि 

भारतीय भाषा सभक एकटा विशिष्ट विशेषता छैक । शब्दक उच्चारण ठीक ओहि प्रकारें कयल जेबाक चाही जेना अक्षरक ध्वनि अनुसार हेबाक चाही । आउ अंग्रेज़ीक ‘world’ शब्द केँ ली । उच्चारण करैत समय, प्रारम्भिक अक्षरक उच्चारण ‘वी’ (we) या ‘वो’ (wo) जेकाँ नहि होइछ, बल्कि किछु एकर बीचक होइत छैक, जे स्पष्ट रूप सँ परिभाषित नहि अछि । ‘Often’ मे ‘ट’ (t) अक्षर और ‘walk’ और ‘talk’ में ‘ल’ (l) अक्षर केँ सेहो एहि तरहें नुकाबय पड़ैत छैक, जेकरा लिपि (लेख्यरूप) मे स्पष्ट रूप सँ इंगित नहि कयल जा सकैत छैक । एहि प्रकारें, अन्य भाषा सब मे एहेन कतेको अस्पष्ट ध्वनि सब छैक । एकरा ‘अव्यक्त’ – अस्पष्ट ध्वनि – कहल जाइत छैक । हमरा सभक समस्त भारतीय भाषा सब मे केवल स्पष्ट ध्वनि टा होइत अछि ।

अक्षर आर ओकर ध्वनिक बारे मे सीधा नियमक बदला मे अन्य भाषा सब मे बहुते रास भ्रम छैक । उदाहरणक लेल, ‘C’ अक्षर ‘Ka’ अक्षर केर सूचक भ’ सकैत अछि । ‘C’, ‘K’ या ‘Q’ सँ सम्बन्धित तीन टा ध्वनि सब मे सँ कोनो ध्वनि भ’ सकैत अछि । भारतीय भाषा सभक संग एना नहि होइत छैक । अंग्रेजी मे ‘f’ केर ध्वनि केँ दर्शेबाक लेल वर्तनीक तीन टा तरीका अछि, जेना ‘fairy’, ‘philosophy’ आर ‘rough’ । हालाँकि ‘C’ अक्षर अधिकांशतः ‘Sa’ ध्वनि केर सूचक होइछ, अंग्रेजी मे ‘C’ सँ शुरू होयवला अधिकांश शब्द सभक उच्चारण ‘Ka’ ध्वनिक संग होइत छैक । केवल गोटेक उदाहरण जेना cell, celluloid आर cinema मे ‘C’, ‘Sa’ केर ध्वनि छैक ।

जखन अहाँ ‘fat’ कहैत छी, त ‘a’ एक तरह सँ ध्वनि करैछ । ‘fast’ मे वैह ‘a’ केर ध्वनि अलग तरह सँ होइत छैक । गोटेक वर्तनी आर उच्चारण मे बहुत कम समानता छैक । ‘station’ आर ‘nation’ मे  ‘tion’ केर उच्चारण ‘shun’ (शन) होइत छैक । चूँकि अंग्रेज़ी आ रोमन वर्णमाला आरो-आर भाषा सभक लिपि मे मात्र २६ टा अक्षर होइत छैक, तेँ ओकरा सिखनाय आसान छैक । दोसर दिश, भारतीय भाषा सब सिखनाय ज़्यादा कठिन छैक कियैक तँ ओहि मे अक्षरक संख्या ज़्यादा होइत छैक । लेकिन, अगर कियो भरि साल किंडरगार्टन कक्षा मे कड़ा मेहनत करय, त ओकरा भाषा मे पढ़नाय आसान भ’ जाइत छैक । लेकिन अंग्रेज़ीक मामिला मे, मास्टर डिग्री पास कयलाक बादो, सही उच्चारणक लेल शब्दकोश देखय पड़ैत छैक ।

भारतीय भाषा सभक ई गुण संस्कृत भाषा मे आरो बेसी उपलब्ध छैक । एहि सँ हमर ई मतलब नहि अछि जे विदेशी भाषा सब संस्कृत सँ कमतर (कमजोर) अछि । हम तँ बस भाषा सभक विशिष्टताक किछु तथ्यात्मक विवरण बता रहल छी । हमर विचार ध्वनिक छवि प्रस्तुत करब अछि, जे अनन्त (शब्दब्रह्मात्मक) केर ध्वनि अछि, आर जेकर सबसे स्पष्ट अभिव्यक्ति संस्कृत मे भेटैत अछि ।

सब गोटे केँ ई अनुभव (महसूस) करबाक चाही जे सबटा भाषा साझा सम्पत्ति थिक । तखन केकरो दोसर केँ दुसबाक (कोसबाक) मौका नहि रहत । भाषाक मुद्दा पर, अगर ई मूलभूत तथ्य बुझि लेल जाय जे भाषा मात्र संचारक माध्यम रूप मे काज करबाक लेल अछि, तखन अपन मातृभाषाक प्रति प्रेम आ दोसरक भाषाक प्रति घृणाक वर्तमान उन्माद (यतास्थिति मे दोसरक भाषा प्रति विद्वेष भावना) दूर भ’ जायत । व्यापक सोच आर अंतर्राष्ट्रीय दृष्टिकोणक आवश्यकता पर एतेक बात सुननाय आर भाषा सभक मामिला मे एतेक संकीर्ण व संकुचित विचार रखनाय दुखद अछि ।

अक्ष माला – मोतियों की माला

रुद्र-अक्ष-माला शब्दक अर्थ अछि ‘रुद्राक्ष’क दानाक माला, जेकर बारे मे मानल जाइछ जे ई रुद्रक नेत्र सँ निकलल अछि । एतय ‘अक्ष’ केर अर्थ आँखि भेल । ‘अक्ष माला’ कहबाक कि अर्थ भेल ? एहि मामिला मे ‘अक्ष’क अनुवाद आँखि करब उचित नहि अछि । ई वर्णमालाक सबटा अक्षर केँ दर्शाबैत अछि जे ‘अ’ से शुरू भ’ कय ‘क्ष’ पर समाप्त होइत अछि । संस्कृत वर्णमाला मे, ‘अ’ पहिल अक्षर थिक आ ‘क्ष’ अन्तिम । जाहि प्रकारे हम सब पूर्णता या समग्रता केँ दर्शेबाक लेल अंग्रेजी मे ‘a’ to ‘z’ कहैत छी, तहिना संस्कृत मे हम सब ‘अकारादि क्षकारान्त:’ कहैत छी, अर्थात ‘अ’ सँ शुरू भ’ कय ‘क्ष’ पर समाप्त । अक्षर सभक कुल संख्या ५० (पचास) छैक । तेँ एकटा अक्षमाला मे पचास गोट दाना (मनका) हेतैक ।

स्वर – उच्चारण केर महत्व

हम पहिनहिं बता चुकल छी जे मंत्र सभक जाप केर अभ्यास करैत समय बहुते सावधानी अपनेबाक चाही कियैक तँ यदि शब्द आर ध्वनि मे शुद्धता सुनिश्चित नहि कयल गेल त नहि केवल फायदा (लाभ) कम होयत, बल्कि गलत स्वर-उच्चारण सँ अशुभ या विपरीत प्रभाव सेहो भ’ सकैत अछि । वेदन मे एकटा कथा जे एहि बात केँ स्पष्ट रूप सँ दर्शाबैत अछि – (तैत्तरीय संहिता – २.४.१२) ।

“त्वष्टा”, जे इन्द्रक प्रति उदासीन रहथि, कोनो कारणवश एकटा एहेन पुत्र चाहैत छलथि जे इन्द्र केँ मारि सकय जाहि सँ ओ इन्द्र सँ अपन पुरान हिसाब चुकता कय सकथि । ताहि लेल ओ ‘इंद्रस्सत्रुर वर्धस्व’ मंत्रक जाप करैत एकटा होम (अग्नि-यज्ञ) कयलनि । एकर जाप करैत समय, ‘इन्द्र’ केर उच्चारण सम स्वर मे (अर्थात बिना बढ़ेने या घटेने) करब सही तरीका छल । शत्रु मे ‘त्रु’ उच्च हेबाक चाहैत छल, आर एहि प्रकारे ‘वर्धस्व’ सेहो उच्च हेबाक चाहैत छल । यदि ऊपर वर्णित अनुसार कहल जाय, तँ एकर अर्थ होयत ‘त्वष्टाक पुत्र पैघ भ’ कय इन्द्रक वध करय’ । केवल ध्वनिक प्रभावकारिताक आधार पर, ओकरा पैघ भ’ कय इन्द्रक वध कय देबाक चाहैत छल । लेकिन त्वष्टा उच्चारण मे त्रुटि कयलथि । अर्थात्, ओ ‘इन्द्र’ मे ‘द्र’ केँ ऊँच स्वर कय देलनि, ‘शत्रु’ केर उच्चारण समान रूप सँ भेल आर ‘वर्धस्व’ मे ‘र्ध’ केँ ऊँच करबाक बदला नीचाँ कय देलनि । परिणामस्वरूप, ‘ओकरा इन्द्र केर वध करबाक लेल पैघ बनय दी’ केर बदला, अर्थ उलटा भ’ गेलैक । यद्यपि शब्द व अक्षर सब मे कोनो परिवर्तन नहि कयल गेल रहैक, तैयो स्वर मे त्रुटिक कारण, परिणाम त्वष्टाक इच्छाक ठीक विपरीत भेलैक । हुनकर पुत्र केर इन्द्र हत्या कय देलनि । एहि प्रकारे पिता अपन पुत्र, वृत्र केर इन्द्रक हाथे मृत्युक लेल उत्तरदायी भेलाह ।

वेद मे वर्णित एहि घटना दिश एकटा श्लोक ध्यान आकर्षित करैत अछि जाहि सँ कि हमरा सब केँ वेद मंत्रक वाचन (स्वर) व उच्चारण मे अधिक सावधानी अपनेबाक लेल सावधान कयल जा सकय ।

मंत्रो हीनस्स्वरतो वर्णतो वा, मिथ्याप्रयुक्तो न तमर्थमाह, स वाग् वज्रो यजमानं हिनस्ति, यथेन्द्रशत्रुः स्वरतोऽपराधात् ।

किछु छोट-मोट अन्तर सब

एखन धरि हम बतेलहुँ जे वेद केँ अक्षरतः पूर्ण केना होयबाक चाही । हमर बातक प्रमाणक रूप मे, अहाँ देखि सकैत छी जे रामेश्वरम सँ लयकय हिमालय तक, भारतक सब स्थान पर – चाहे सामाजिक सम्पर्क हो या नहि हो, भारत मे विद्यमान वेदक सम्पूर्ण संस्करण ९९% एक्के जेकाँ अछि, शब्द या अक्षर मे कोनो अन्तर नहि अछि, भले ओकरा मुद्रित या लिखित पुस्तक सभक सहायता बिने संरक्षित कयल गेल होइक आर वैदिक ग्रन्थ पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक रूप सँ प्रसारित होइत रहल होइक । कि एकर मतलब ई भेल जे एखनहुँ धरि एकटा छोटो टा अन्तर अछि ? हाँ । अछि । प्रत्येक क्षेत्रक प्रत्येक शाखा केर दोसर क्षेत्रक शाखा सँ थोड़ेक टा अन्तर होइत छैक । कि एकर अनुमति देल जा सकैत अछि ? ई कहलाक बाद कि एकटा छोटो टा अन्तर विनाशकारी अन्तर उत्पन्न कय सकैत अछि, एहि एक प्रतिशत केर छोट सन अन्तर केँ सेहो केना बर्दाश्त (स्वीकार) कयल जा सकैत अछि ? यदि केवल एक्के टा सही रूप भ’ सकैत अछि, तखन १% केर अन्तरो अपेक्षित परिणाम नहि दय सकैत अछि । या, एहि सँ भिन्न परिणाम प्राप्त भ’ सकैत अछि । एहि प्रश्नक एकटा उत्तर अछि । ई सत्य छैक जे मंत्रक शब्द सब मे परिवर्तन परिणाम केँ ओहि प्रकारे विकृत कय देत जेना निर्धारित औषधि मे परिवर्तन रोगक उपचार केँ प्रभावित करैत अछि । लेकिन, ई मात्र रोगी पर लागू होइत छैक; ओकरा स्वयं औषधि नहि बदलबाक चाही । चिकित्सक पुर्जा (नुस्खा – दबाय के नाम आ खेबाक तरीका खोराक आ समय आदि) बदैल सकैत छथि । कोनो रोगक उपचारक लेल कतेको रास औषधि सब होइत छैक । एहेन मामिला मे, चिकित्सक द्वारा कोनो एक औषधिक सिफारिश करब आर दोसरक नहि, ताहि मे कोनो गलत नहि छैक । एक्के रोगक मामिला मे सेहो, चिकित्सक शरीरक विभिन्न अंग (देहक आकार) सभक अनुरूप (औषधिक) मिश्रण केर अवयव (विभिन्न सामग्री सभक परिमाण) मे परिवर्तन कय सकैत छथि ।

तहिना, विभिन्न शाखा सब मे ऋषि लोकनि द्वारा शब्द सब मे अन्तर जानि-बुझिकय कयल गेल अछि । ई ओहि लोक सभक अनुकूल बनायल गेल अछि जे बाद (समय अयलापर) एकर जाप करय अओता । एहि परिवर्तन सबकेँ नियंत्रित करयवला नियम ‘प्रातिसाख्य’ ग्रन्थ सब मे स्पष्ट रूप सँ वर्णित अछि । प्रातिसाख्य केर शाब्दिक अर्थ अछि ‘प्रांतीय’ । शब्द सब मे अन्तर बहुत कम छैक । एहि परिवर्तन सब सँ कोनो खास फर्क नहि पड़ैत छैक । कमोबेश समान ध्वनिवला शब्द सभक प्रयोग एक केर स्थान पर कयल गेल छैक – एहेन शब्द जे आपस मे घनिष्ठ रूप सँ जुड़ल रहैत अछि ।

क्षेत्रीय भाषा सब सँ प्रभावित वैदिक ध्वनि सब

जखन विभिन्न भारतीय भाषा सभक बीचक अन्तर सभक जाँच ओहि क्षेत्र सँ सम्बन्धित वेद सभक शब्द सब मे छोट-छोट अन्तर सभक आलोक मे कयल जाइछ, त ई चौंकाबयवला निष्कर्ष निकलैत अछि जे विशिष्ट संस्कृति सब तथा सांस्कृतिक अन्तर वैदिक ध्वनि सभक अन्तर केर कारण भेल अछि । हम अपन भाषाविज्ञान सम्बन्धी खोज सभक परिणाम बतबैत छी । ‘द’, ‘र’, ‘ल’, ‘ल्ल’ और ‘झ’ ध्वनि सब एक-दोसरक निकटवर्ती अछि । यदि कोनो बच्चा केँ ‘रेल’ या ‘रमा’ कहय लेल कहल जाय, त ओ ‘देल’ या ‘दमा’ कहत । एना एहि लेल अछि कियैक तँ ‘द’ आर ‘र’ ध्वनि मे निकटवर्ती अछि । चूँकि ‘द’ केँ ‘र’ मे बदलल जा सकैछ, तेँ ‘ल’ केँ ‘द’ में बदलल जा सकैछ । ‘ल’ और ‘ल्ल’ वास्तव मे निकटवर्ती अछि । ‘ल’ और ‘झ’ केर बीच समानता पर जोर देबाक कोनो आवश्यकता नहि छैक ।

आउ आब हम सब ओहि क्षेत्र सब केँ ली जेतय प्रत्येक वेद अत्यधिक लोकप्रिय अछि तथा प्रयुक्त भाषाक विशिष्टता सभक परीक्षण करी ।

आइ-काल्हि किछु लोक सब बीच ई अभियान चलि रहल अछि जे वेद आर्य सबक अछि आ द्रविड़ धर्म ओहि सँ भिन्न अछि । त आउ द्रविड़ सभक धरतीक तीन टा क्षेत्र केँ ली । यानी तमिल, तेलुगु आर कन्नड़ । तमिल मे ‘झ’, तेलुगु मे ‘द’ और कन्नड़ मे ‘ल’ केर विशेषता अछि । उदाहरण लेल, एकटा संस्कृत शब्द अछि, प्रवाल । ई तमिल मे ‘पवझम’ (मूंगा) केर समान अछि । एकरा तेलुगु मे ‘पगदालु’ आर कन्नड़ मे ‘हवल्ला’ कहल जाइत छैक । प्रवाल तमिल मे पवझा बनि गेल अछि । ‘पगदालु’ मे प्रवाल मे आबयवला ‘व’ ‘ग’ बनि गेल अछि । यैह भाषाक विशेषता अछि । एहि प्रकारे, जखन कन्नड़ मे ‘प्रवाल’ हवल्ला बनि जाइत अछि, तँ पहिले अक्षर मे बड़का परिवर्तन आबि जाइछ । तमिल आर तेलुगु मे ‘प्र’ केँ ‘प’ मे बदलबाक एकटा छोट सन परिवर्तन अछि, लेकिन कन्नड़ मे ई ‘ह’ बनि गेल अछि । लेकिन यैह ओहि भाषाक विशेषता थिक । अन्य भाषा सब मे जे ‘प’ अछि, से कन्नड़ मे ‘ह’ बनि जाइत अछि । पम्पा, हम्पा बनि जाइत अछि, जे आगू चलिकय हम्पी मे बदैल जाइत छैक, जेना: (हम्पी केर खंडहर) । यद्यपि आर्य या द्रविड़ सभक रूप मे अलग-अलग चिन्हनाय सम्भव नहि छैक, तैयो एक्के जाति दुइ भाग मे विभाजित अछि: ओ जेकर भाषा संस्कृत सँ सम्बद्ध अछि आर ओ जेकर भाषा विशुद्ध रूप सँ द्रविड़ अछि । शोध सँ आब ई निष्कर्ष प्राप्त भेल अछि । आगूक शोध सँ ई सिद्ध भ’ सकैत अछि जे ई भाषागत अन्तर सेहो उचित नहि अछि, बल्कि सब भाषा एक्के गोट मूल भाषा सँ उत्पन्न भेल अछि । ऋग्वेदे पश्चिमी भारत मे, जाहि मे महाराष्ट्र आर कर्नाटक शामिल अछि, अधिकतर प्रयोग मे अछि, तेँ ऋग्वेद मे ‘lla’ ध्वनिक प्रयोग भेल अछि । वैदिक ‘lla’ ओहि भाषा मे सेहो समा गेल अछि जेकरा द्रविड़ भाषा कन्नड़ मानल जाइत छैक आर जे प्रचलन मे अछि ।

पूर्वी तट आर ओहि सँ सटल आंध्र प्रदेश केँ मिलाकय, ९८% लोक यजुर्वेद सँ सम्बन्धित अछि । शेष २% ऋग्वेदीक अछि । ई कहल जा सकैत अछि जे आंध्र मे व्यावहारिक रूप से कियो सामवेदी नहि अछि । चूँकि सबसँ महत्वपूर्ण यजुर्वेद अछि, तेँ ऋग्वेदिक मंत्र मे प्रयुक्त ‘lla’ स्वाभाविक रूप सँ ‘da’ मे बदैल जाइछ । एतय, क्षेत्रीय भाषा, तेलुगु मे सेहो, जे आन भाषा सब मे ‘lla’ अछि, ओ ‘da’ बनि गेल अछि ।

तमिलनाडु मे, बादक समय मे, यजुर्वेदी प्रमुख भ’ गेल, लेकिन आंध्र जेकाँ नहि । तमिलनाडु मे ई कहल जा सकैछ जे ८०% यजुर्वेदी अछि, शेष १५% सामवेदी अछि आर शेष ५% ऋग्वेदी अछि । हालाँकि वर्तमान मे यैह स्थिति छैक, तैयो एहि बातक प्रमाण अछि जे अतीत मे सामवेदक तमिलनाडु मे आजुक तुलना मे बेसी प्रभाव छल । ई अनुमान लगेनाय उचित छैक जे सामवेदक सबटा १००० शाखा सभक अनुयायी तमिलनाडु मे रहय ।

मलयालम ओ भाषा थिक जे वर्तमान केरल मे प्रचलित अछि । हम तेलुगु और कन्नड़ संग मलयालम केर उल्लेख एहि द्वारे नहि कयलहुँ कियैक तँ पल्लव जेकाँ इहो बादक युग केर छी । लगभग १००० वर्ष पहिने धरि केरल तमिल भाषी क्षेत्रक हिस्सा रहय आर ओतय तमिले प्रचलित छलैक । फेर तमिल सँ मलयालम केर विकास भेल । तमिल ‘झ’ जे तेलुगु मे ‘द’ आर कन्नड़ मे ‘ल्ल’ बनि जाइछ, मलयालम मे ‘झ’ टा रहल । ताहि लेल, वेद शाखा सभक उच्चारण मे अन्तर केर आधार पर, विभिन्न क्षेत्रीय भाषा सब द्वारा उपयुक्त विशिष्ट वर्णमाला सब विकसित कयल गेल अछि ।

हम एखन धरि जे किछु कहलहुँ, से वर्तमान द्रविड़ कहायवला क्षेत्रहि धरि सीमित छल । आब हम एकरा अखिर भारतीय आ अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर देखय जा रहल छी ।

उत्तरी भारत मे ‘य’ केर स्थान पर ‘ज’ आर ‘व’ केर स्थान पर ‘ब’ केर प्रयोग करबाक रिबाज अछि । ई नहि केवल बोलचाल मे, बल्कि साहित्यिक प्रयोग मे सेहो प्रचलित अछि । ‘व’ केर ‘ब’ बनि गेनाय बंगाल मे सब सँ बेसी ध्यान देबा योग्य अछि; आ तहिना उत्तर प्रदेश, पंजाब सँ आरो उत्तर मे ‘य’ केर ‘ज’ बनि जेनाय । बंगाल में, पाणिनि सूत्र ‘वबयोर्भेदम्’ (‘व’ और ‘ब’ केर अदला-बदली वर्जित नहि अछि) केर पूर्णतः पालन कयल जाइत अछि । बंगाल मे, सब ‘व’ केँ ‘ब’ मे बदलि देल जाइत छैक । वास्तव मे, ‘वंग’ ‘बंगाल’ बनि गेल अछि । वंगवासी ‘बंगवासी’ बनि गेल छथि । हुनका सब केँ स्वयं सेहो एहि गलतीक बोध छन्हि । बंगाल मे, एहि गलती केँ सुधारबाक लेल एकटा परीक्षा आयोजित कयल गेल छल । एकर नाम ‘वंग परिषद’ रहैक । ओकर मनसाय (इरादा) भविष्यक सम्पूर्ण प्रकाशन सब मे ‘ब’ केर बदला ‘व’ केर उपयोग करब छलैक । एना करैत, ओ सब अन्जानहि मे ‘ब’ केँ ‘व’ मे बदलि देलनि, सही शब्द ‘वंग बंधु’, जेकरा मूल रूप सँ ग़लती सँ ‘बंग बंधु’ कहल जाइत छलैक, आब एकटा आर अर्थ मे ‘वंग वंधु’ बनि गेल छल ।

उत्तर मे, किछु हद धरि, आर आनो क्षेत्र सब मे सेहो, ‘व’ केर स्थान पर ‘ब’ केर प्रयोग होइत अछि । बिहार वास्तव मे ‘विहार’ थिक । ई ओ स्थान छल जेतय बुद्ध विहार केर भरमार छल । ‘रास बिहारी’ कियो आर नहि बल्कि ‘रास विहारी’ स्वयं छथि। ‘व’ केर उच्चारण ‘ब’ कियैक करैत अछि ? प्रातिसाख्य मे ई प्रावधान छैक जे ओहि क्षेत्रक एकटा निश्चित निश्चित शाखाक लोक सब केँ एहिना कहबाक चाही । वैदिक मंत्रोच्चारक लेल जे आदेश छल, तेकर पालन सामान्य प्रयोजन सभक लेल सेहो वाणी एवं लिपि मे कयल जाइत छल । एहि सँ पता चलैत अछि जे एक समय मे एहि क्षेत्र मे शिक्षाक नियम सभक ईमानदारी सँ पालन कयल जाइत छल ।

हम पहिनहिं कहने रही जे यजुर्वेद पूरा देश मे बहुसंख्यक लोक द्वारा प्रयोग मे आनल जाइत छल । हम इहो कहने रही जे एहि वेदक दुइ गोट संस्करण छल, अर्थात् कृष्ण यजुर्वेद और शुक्ल यजुर्वेद । एहि मे सँ, दक्षिण मे कृष्ण यजुस सबसँ अधिक प्रचलित अछि; उत्तर मे ई अधिकतर शुक्ल यजुस अछि ।

शुक्ल यजुस केर अनेक शाखा सब मे सँ एकटा मध्यंदिन शाखा अछि । उत्तर मे एकर उत्साहपूर्वक पालन कयल जाइत अछि । एकर प्रातिसाख्य मे कहल गेल अछि जे ‘य’ केर स्थान पर ‘ज’ केर प्रयोग स्वीकार्य अछि । एहि मे इहो कहल गेल अछि जे ‘ष’ केर स्थान पर ‘ख/क’ केर प्रयोग कयल जा सकैत अछि । एहि द्वारे जखन दक्षिण मे ‘यत् पुरुषेन हविषा’ कहल जाइछ, त उत्तर मे ‘जत् पुरुषेन हविखा/हविका’ कहल जाइछ । समय केर संग उत्तर मे कतेको शब्द सभक मामिला मे यैह परिवर्तन अपनायल गेल अछि । ‘यमुना’ केर नाम ‘जमुना’ भ’ जाइत छैक, ‘योगी’ केर नाम ‘जोगी’ भ’ जाइत छैक, ‘यात्रा’ केर नाम ‘जात्रा’ भ’ जाइत छैक इत्यादि । जखन ‘ष’ केर नाम ‘ख/क’ भ’ जाइछ, त ‘ऋषि’ केर नाम ‘ऋकि’ भ’ जाइछ । ‘क्ष’ और ‘ष’ निकट सम्बन्धी अछि, अछि न ? तेँ उत्तर मे ‘क्ष’ सेहो ‘ख/क’ बनि जाइत अछि । ‘क्षीरम्’ ‘खीर’ बनि जाइत अछि । एहि प्रकारे हम सब उदाहरण दैत रहि सकैत छी ।

आब हम अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चलैत छी । आउ हम सब ईसाई धर्म आर बाइबिलक जन्मस्थान फ़िलिस्तीन चली; इज़राइल आ अन्य सेमेटिक देश सब दिश । मुसलमान लोकनिक कुरानक आधार ईसाई  लोकनिक पुरना नियम थिक । पुरना नियम मे जे उल्लेख अछि, वैह कुरान मे सेहो अबैत अछि । लेकिन अरबी मे उच्चारण बदैल जाइत अछि । जोसफ ‘यूसुफ़’ बनि जाइत अछि । जेहोवा यहोवा बनि जाइत अछि । ई अन्तर केवल ईसाई धर्म आर इस्लामहि टा मे नहि पाओल जाइछ । ईसाई देश सब मे सेहो, किछु भाषा सब मे ‘य’ ध्वनि प्रमुख अछि । किछु अन्य भाषा सब मे, ‘ज’ ध्वनि हावी भ’ जाइछ । यदि कियो यूनान दिश जाय, त ‘ज’ ध्वनि सामने अबैत अछि ।

शोध सँ पता चलल अछि जे एकर कारण वेद थिक । वेद मे ‘याह्वान’ कहल जायवला देवता कियो आर नहि, बल्कि जेहोवा (यहोवा) छथि । एहेन कहल जाइत छैक जे ‘द्वौपिता’ बृहस्पति (जुपिटर) छथि । यदि संस्कृतक कोनो शब्दक आरम्भ मे अर्ध व्यंजन अबैत अछि, त ओकरा कोनो अन्य भाषा मे बजबाक समय हटा देल जाइत छैक । एहि प्रकारे ‘दौ पितृ’ ‘यौउ पितर’ बनि जाइत अछि, जे ‘जुपिटर’ (बृहस्पति) छथि ।

जखन ‘य’ केँ ‘ज’ मे परिवर्तनक परिणामस्वरूप मूल याह्वान आ दोपितर, यहोवा आ जुपिटर बनि जाइत छथि, त एकर कि अर्थ भेल ? कि ई एहि निष्कर्षक समर्थन नहि करैछ जे जखन वैदिक रीति सब सर्वव्यापी छल, त यूनानक आसपासक क्षेत्र मे यजुर्वेदक मध्यंदिन शाखा टा अधिकतर प्रचलन मे छल ?

कि वैदिक उच्चारण सब क्षेत्रीय भाषा केँ प्रभावित कयलक ? या क्षेत्रीय भाषा वैदिक उच्चारण केँ नियंत्रित कयलक ?

हम ई देखेबाक लेल कहलहुँ जे कोनो विशेष क्षेत्र मे वेद मे प्रयुक्त शब्द ओहि क्षेत्रक बोलचाल आ लिखित भाषा मे सेहो अबैत छल । एहि सँ ई स्पष्ट अछि जे वेद सब देश मे प्रचलित छल ।

ई कहब वास्तव मे सही छैक जे वैदिक शिक्षा नियम क्षेत्रीय भाषा सब मे प्रमुख ध्वनि बनि गेल अछि कियैक तँ प्रातिसाख्य नियम कोनो एक क्षेत्रक लेल नहि बनायल गेल छलैक; ई ओहि सब क्षेत्रक लेल बनायल गेल रहैक जेतय एकटा शाखा प्रचलित छल । चाहे काश्मीर हो या कामरूप (आधुनिक असम), जैमिनी साम केर जाप करयवला व्यक्ति ‘ष’ कहैत छल, जखन कि दोसरा ‘द’ या ‘ल्ल’ कहैत छल । शुक्ल यजुर्वेदक जाप करयवला व्यक्ति चाहे कोनो भाषा मे बाजय, चाहे ओकरा मातृभाषा गुजराती हो या मराठी या किछु आर, ओकरा केवल ‘द’ केर टा प्रयोग करबाक चाही । प्रातिसाख्य, जे कोनो विशेष क्षेत्रक लेल नहि छल, बल्कि नियम सभक एकटा सामान्य पुस्तक छल, से एहि प्रकारे अक्षर-ध्वनि सब केँ परिभाषित कएने अछि । समयक संग, जेतय कोनो विशेष शाखाक बेसी प्रचलन भेलैक, ताहि अक्षरक विशिष्टता ओहि क्षेत्रीय भाषा मे सेहो व्याप्त भ’ गेल ।

शिक्षा शास्त्र केर बारे मे अन्य उल्लेखनीय बात सब

हम कहैत छी जे वैदिक ध्वनि सब केँ नहि बदलबाक चाही; स्वर मे सेहो परिवर्तन नहि हेबाक चाही । तथापि, हम एखन धरि ई स्पष्ट कयलहुँ जे शिक्षा शास्त्रक अनुसार, शाखाक भेदक आधार पर किछु छोट-मोट परिवर्तन केना स्वीकार्य अछि । तहिना, स्वर केर मामिला मे सेहो, छोट-मोट परिवर्तन स्वीकार्य अछि ।

हम पहिने कहने रही जे वैदिक जप मे संहिता, पद आ क्रम विधा सब होइत छैक । वेद पर संहिता अंशक जप केर विधि सब मे एहेन अन्तर सब केँ प्रातिसाख्य केर स्वीकृति प्राप्त छैक, जे शिक्षा शास्त्रक एकटा भाग थिक ।

एहि विषय केँ केवल ध्वनि मानिकय हल्का मे लेबाक कोनो औचित्र नहि छैक । जे किछु अछि, से ध्वनिये टा मे अछि । तेँ, शिक्षा शास्त्र ओ नासिका (नाक) थिक जाहि सँ वेदपुरुष साँस लैत छथि ।

संस्कृत वर्णमाला मे ५० ध्वनि (अक्षर) वेद सँ आयल अछि । यदि ज्ञ अक्षर केर अलग मानि लेल जाय, त हमरा सब लग ५१ अक्षर होइत अछि । एकरा मातृका कहल जाइत छैक । एकर कय टा अर्थ छैक । सब सँ महत्वपूर्ण बात जे मातृ शब्दक अर्थ ‘माता’ अछि, जे ब्रह्मांडीय माँक प्रतीक अछि । ई ५१ अक्षर वैह पराशक्ति (महाशक्ति) केर छवि छी । यदि समस्त ब्रह्मांडक रचना पराशक्तिक देन छी आ यदि सृष्टि ध्वनिक माध्यम सँ भेल अछि, त एकर अर्थ भेल जे पराशक्ति एहि ५१ अक्षरक साक्षात् रूप थिकीह । शिक्षा शास्त्र कहैत अछि जे ई ५१ अक्षर पराशक्ति केर शरीरक विभिन्न अंग सभक प्रतिनिधित्व करैत अछि आर इहो परिभाषित करैत अछि जे कोन अक्षर कोन अंगक प्रतिनिधित्व करैत अछि । हमरा सभक देश मे, शक्ति पीठक ५१ टा आसन ब्रह्मांडीय माताक शरीरक ५१ अंग सँ जुड़ल रहबाक कारण अस्तित्व मे आयल अछि ।

यदि शिक्षा शास्त्रक महिमा वेदपुरुष केर नाक केर समान मानल जाइछ, त एकर महत्व एहि बात सँ आरो बढ़ि जाइत अछि जे एहि मे मौजूद अक्षर सब केँ मिलाकय दिव्य शक्तिमाता, पराशक्तिक पूर्ण छविक निर्माण कयल जाइत अछि ।

हरिः हरः!!

The Vedangas – Shiksha: The Nose and the Lungs of the Vedas

Of the six organs (Anga) of the Vedas, the most primary Anga is Siksha. It can be called the nose of the Vedas. The function of the nose does not stop at discerning smells which is a minor role. The more important breathing is done only through this organ. Just as the nose enables us to breathe, which, in turn, sustains the life-force, Siksha is the life-breath of the Veda mantras.

Where is the life centre of the Veda mantras located? Each letter of the Veda mantra must be uttered correctly within the parimaana, or duration in time, as laid down. This is called Akshara Shuddhi – syllable purity. In addition to the time duration, there are rules as to the pitch of the sound – high, middle or low. The high, low and middle pitches are respectively called udaattam, anudaattam and swaritam. If these in their proper places, then the sound is said to be swara-shuddha having tonal purity. Thus mantras can yield results only if the requirements of syllable and tonal purity are fully satisfied. The emphasis on proper recital of the mantras is so great that more important to the mantras are these requirements of pronunciation and accent and pitch than even their meaning.

Even if one does not know the meaning, the correct intonation guarantees the expected results. Therefore, the life of the Vedas which are only a string of mantras, is sustained by sound alone. Let us take the mantra which cures scorpion bite. Its meaning is not to be divulged. The words it contains have all the potency. Various sounds have various effects. Why is it necessary to utter the annual death anniversary mantra (Sraadha mantra) in Sanskrit and not in English or any other language? Because, their sound is different in English or Tamil and their efficacy which is all in the sound is lost. If some teeth of those who chant mantras are lost and consequently they cannot utter the sounds properly then the purity of the mantra chant would suffer and the efficacy either lost or diminished. Thus pronunciation and the tonal quality are all important for Vedas.

What is to be done to ensure its purity?

‘Siksha’ lays down the rules of phonetics – sounds of syllables of pronunciation – euphony. The function of the Siksha Saastra is to fix the parameters of Vedic words.

Phonetics is fixing the method of pronunciation of a language. More than for any other language, phonetics are most important in the case of the Vedic language, because we see that change in sound leads to change in results and effect.

Hence Siksha which is Vedic Phonetics has been regarded as the most important of the six Angas (organs) of the veda Purusha.

Upanishads which are the crown of the Vedas also make mention of Siksha. The Taittareeya Upanishad begins with the chapter called “Siksha Valli”. The first mantra says (Sikshaam Vyaakhyaasyaamah). Let us explain Sikhsa (Seeksha). Here, as also elsewhere in Vedic texts ‘Siksha’ is referred to as “Seeksha” withe vowel ‘e’ lengthened to ‘ee’. Adi Sankara mentions in his Bhashya, “Dhairgyam Chandhasam”. Elongation for Vedic language, that is to say according to the poetic licence, the short “e” becomes the long “ee”. We had occasion to mention earlier that the Vedic language is not called Sanskrit and that it is called “Chandas”. “Chandasam” therefore refers to the special language used in Vedas.

In the wind instruments such as the harmonium, oboe and flute, air is let out through apertures on the basis of certain calculations, to produce various musical notes. The human throat has also a similar arrangement. It is not merely the throat. From the seat of the “Mooladhaara” which is just below the navel, the breath is made to travel upwards in various patterns which results in speech or melody. The musical instrument which God has designed for man is much superior to those produced by man, e.g., the flute or the harmonium. These latter can produce only ordinary sound. Sounds of letters such as ‘A’, ‘Ka’, ‘Cha’, ‘Nga’ cannot be produced. The human voice alone has the ability to produce these sounds. Birds and animals can lisp some of these words but can come nowhere near man who can raise thousand of such sounds.

Because man alone has been gifted with the ability to make such sounds, his importance is obvious. It would be a pity if such an important asset is frittered away in idle talk and chatter. These should be used to harness divine forces, to do good to the world at large and to elevate oneself. In order to perform these three jobs, the Rishis have caught the sounds as Veda Mantras and given them to us. Only if this fact is fully grasped, can one understand why the science of Siksha has been evolved and pronunciation give of distinguished philologists and scientists, the Siksha lays down with elaboration down to the minutest detail, how the breath has to originate from the pit of the stomach and touch so many points and twist and roll in many different ways, before it escapes through the mouth. That is how the purity of the sounds has been ensured.

When the air travels within us in such different ways, it becomes in effect a Yoga Sastra by itself. We had occasion to mention earlier that, due to the vibrations created by the passage of breath through the pulse centres, various emotions were created and forces generated and how these vibrations had their reaction on the outside world too. That is why those who control their breath and attain yogic powers have the same stature as those who chant mantras and realise the self.

Siksha Saastra explains how the sound of each syllable should be produced, how high or low should its pitch and how longs should the sound last. The last mentioned one viz., duration is called maatra. Maatra deals with short and long sounds. The short sound is called Harsva meaning ‘short’. The long sound is called ‘Deergha’. Matters such how to pronounce compound and compounded words without splitting them into syllables and certain other guidelines necessary for those learning to chant Vedas are contained in the Siksha Saastra. The sound ‘Ka’ has to emanate from the region between the neck and throat. Sound like ‘tha’ have to be produced by the tongue closing over certain teeth. Some like ‘Na’ come out of the tongue in contact with the palate or roof of the mouth. Other like ‘Ma’ come through closely compressed lips. The labiodentals like ‘Va’ are formed by the overlap the lower lip on the lower teeth and so on. This Saastra is built on highly scientific line. If we closely follow and practice the methods laid down as to which parts of the body and muscles should be exercised to produce particular sounds, we would have risen from the level of the mere science of phonetics to the level of Mantra Yoga or Sabhda Yoga.

The Basic Language Is Only Sanskrit

I say the sound of a word is more important than even its meaning. Whilst on the subject, another point occurs to me. ‘Chandas’, which is the Vedic language and Sanskrit, which has been hewn out of it, contain many words whose sounds are indicative of their meaning.

For example, take the word ‘Danta’ which means tooth. For its utterance, the teeth are mostly used, with the tongue acting lightly off and on. A trial will show how difficult it is for the toothless to utter it. They cannot clearly pronounce it.

There is something of interest here to students of comparative philology who take note of even trivial points in determining the chronology of languages. Sanskrit, Greet, Latin, German etc. which belong to the Teutonic group (English also is included in this) and modern French and other languages which belong to the Celtic group are, in the opinion of philologists, derived from one parent language, which is said to belong to the Indo-European group of languages though which that parent language has not been firmly established by scholars. They do not accept that Sanskrit (which is meant to include the Vedic language ‘Chandas’) is the original base or parent language. But words such a ‘Danta’ amply support its claim to be regarded as such.

The word ‘Dental’ in English means the same thing – of teeth. We can see the similarity in ‘Dant’ and ‘Dent’. The corresponding words in French and Latin are also akin in sound to ‘Dant’. This is to say that ‘t’ sound is prominent instead of ‘da’ as in Sanskrit. It might then be argues: “Well – maybe there is a similarity in sounds but how does it establish that Sanskrit is the parent language?” As mentioned earlier, you need all the teeth to correctly intone the word ‘Danta’ in Sanskrit. You try and say the other words like ‘Dental’ in the other tongues. The teeth have not much role to play. The ‘Dent’ sound is created by the tongue touching the roof of the mouth. If the word itself were to indicate the meaning unmistakably, then this requirement is fully met only in the ‘Danta’ is obviously a derivative.

In certain other cases, a light change of spelling results in a closely allied word. What is the chief characteristic of a lion? To torment – Himsa. “Himsa” has given place to ‘Simha’ the lion. Kaasyapa, the first amongst the Rishis, was the procreator of the Devatas, Asuras, and also mankind. How did he get his name? He saw the Truth – Satya. That is to say, he saw the true form of God. Wisdom or Jnaana in Sanskrit is also called Drisyam – sight. The Sanskrit for one who sees is “Pasyaka”, which with slight change became “Kasyapa. Kasyap out of Pashyak.

Laws of Pronunciation

The Siksha Saastra lays down the details of the various aspects of pronunciation, e.g. enunciation, (uchchaarana), tone (swara), duration (maatra), pitch (balam), evenness (sanam) compounding (santhaanam). This ensures that the sound that results is as perfect as perfect can be. It further says from what parts of the human body certain syllable sound have to originate and through what kind of effort they are are to be brought forth. All this is highly practical and scientific. It is says when the lips are to be joined to a certain extent to produce a letter-sound, low, the sound is produced to perfection when the instructions are followed.

I am reminded of something else, when I say this. The lip functions only when letters such as ‘Pa’, ‘Ma’, ‘Va’, are uttered. Letters such as ‘Ka’, ‘Nga’, ‘Cha’, ‘Gna’, ‘Ja’, ‘Nna’, ‘Tha’, ‘Na’, etc. do not invoke the use of the lips. Someone has composed a Ramayana with words not involving the use of the lips. That is called ‘Niroshta Ramayana’. Oshta is lip, from which has come Oushtraka, the camel. The camel has very prominent lips. Niroshtam means without lips. It might be that he composed the piece to show his skill. But another reason for it strikes me. He must have been a man with exemplary sense of bodily cleanliness. He perhaps did not want to sully God’s name by mouthing the sounds.

Maharishi Paanini (the Grammarian) indicates through a beautiful stanza in his ‘Paanineeya Siksha’ how carefully and attentively the Vedic words are to be chanted:

Vyaaghree Yathaa Haret Putraan, Damshtraabhyaamcha Na Peedayet, Bheeta Patanaadetabhyaam, Tadwat Varnaan Prayojayet

The Vedic letters must be spoken very lucidly. The sounds should not blurred. The sound should not slip down or fade out. On the other hand, they should not be barked out. They should neither be loosely or casually mounted nor spat out in staccato tones. The comparison is with a mother tiger. How does the tiger carry its young? Cats and tigers carry their young by their teeth. The teeth grip the cub firmly so that the cub does not slip and fall, but, at the same time, the teeth do not cause any hurt or pain. Likewise, the words are to be pronounced delicately but firmly. So says Paanini.

The same paanini has made an invaluable contribution to the Vedaanga, next in importance – ‘Vyaakarana’ (grammar). In addition to Paanini many other sages have written on Siksha. There appear to be some 30 texts on the subject. Paanini’s and Yaajnavalkya’s are the most important of these.

The Script of Various Languages

The script indicates, by means of drawing, (lines, loops and dots) the sounds of various letters. That is the origin of the scripts of various languages. The alphabet of English and allied languages is said to be in the Roman Script. There used to be a script called Braahmi. The edicts of Emperor Asoka are in that script. From this are derived the scripts of the present-day Sanskrit (Naagari and Grantha) and those of the South Indian Languages.

From one our of the two divisions of the Braahmi script, which was called ‘Pallava Grantha’ and which was in use in the South various scripts of the Dravidian languages have originated.

All the modern Indian language scripts have originated from the Braahmi. But, if you look at the original Braahmi script, nothing will look familiar. That is why the expression ‘Braahmi script’ came to be used to denote something not known.

There is a script called ‘Kharoshti’. “Khara-Oshtam” means donkey’s lips. Just as the donkey’s lips protrude out, the loops of alphabets in that language protrude our like the lips of a donkey. This is the script of the Persian language.

Just as, in Europe, the Roman script is used by many languages, one common script in India is Braahmi. This is evident from the Devnaagari script used by many northern Indian languages.

If the phonetics of a language are clearly grasped, many more things will become clear to us. In English, we may wonder why there are two letters V and W to denote the ‘Va’ sound. A professor of English once explained the difference. Where V is used, we must produce the sound by folding the lower lip and allowing the upper set of teeth to touch it. Whereas, when W is used, the teeth are not to be used, both lips are to be partially closed to make a round before releasing the sound. Therefore the words Sarasvati And Isvara in the Indian languages are best spelt with a V and not a W.

More than in any other language, the pronunciation in Sanskrit closely and fully follows the spelling. In English, things are confusing. Recently I read in the papers: “Legislature wound up”. Absent-mindedly I read the past participle of the word ‘wind’ as ‘wound’ meaning an injury. The same spelling pronounced differently has totally different meanings. Here ‘would up’ means to close down. Even the word ‘wind’ has to be pronounced as ‘Vind’ to denote air and as ‘Vynd’ to denote binding around. Thus there is a lot of mix-up.

In Sanskrit alone, but for two exceptions, changes in pronunciation do not occur from spelling. It is purely phonetic spelling. Which are these two? Let me explain.

One is the change that occurs when the visarga occurs before ‘Pa’. The visarga, more or less, takes the sound of ‘ha’. Rama: must be pronounced ‘Ramaha’. Instead of fully making it sound ‘ha’ it should be softened. The same visarga, when it comes before ‘Pa’ becomes ‘fa’. If the word is pronounced solely based on the sound belonging to the alphabet, it would be wrong.

Words like Brahma, Vahni, etc. have to be written like that but have to be pronounced as Bramha, A Vanhi. Except for these two, pronunciation and script are not divergent in Sanskrit.

The Language That Has All The Sounds

From the foregoing, it is clear that, in Sanskrit, the sound ‘f’ does exist. There is no sound that does not find a place in it. We commonly believe that the letter ‘Zha’ is available only in Tamil. The parent language of Sanskrit, the Vedic language does have the ‘Zha’ sound. In many places in Yajur Veda and where the letter ‘Ta’ comes in Talavakaara Saama Veda, it has to be sounded as ‘Zha’. Similarly in Rig Veda too, at some places, the ‘Zha’ sound has to be produced. In the first word in the first Sookta of Rig Veda which reads as ‘Agni Meelay’, the ‘lay’ has to be thus changed to ‘Zha’ to read as – “Agni Meezhay” not the full ‘Zha’ as in the Tamil language but a sound somewhere around it.

In French too, there is a sound close to ‘Zha’. But both in French and Sanskrit, there is no separate letter to indicate the ‘Zha’ sound. The letters J and G, in French, are used to produce the ‘Zha’, effect. In Sanskrit, the letter ‘La’ alone is indicative of ‘Zha’. It is claimed that the Chinese language has also A ‘Zha’. ‘Ramah’ plus ‘Panditah’ becomes ‘Ramapanditah’. The ‘f’ sound in Sanskrit is called “Upadaaneeyam” which literally means to blow the fire through a pipe or tube. Then only the ‘f’ sound can result.

Indian And Foreign Language And Scripts

There is a common characteristic peculiar to Indian languages. The words are to be pronounced exactly as the letter sounds would warrant. Let us take the word ‘world’, in English. When pronounced the initial letter is neither to be sounded as ‘we’ or ‘wo’ but something in between, not clearly defined. The letter “T’ in “often’ so also the ‘L’ in ‘walk’ and ‘talk’ has similarly to be glossed over, which gloss-over is not capable of being indicated clearly in script. There are thus many such unclear sounds in other languages. These are called ‘Avyakta’ – unclear sounds. All our Indian languages contain clear sounds only.

Instead of direct rule about the letter and its sound, there is lot of confusion in other languages. For e.g., the letter ‘C’ can be indicative of the syllable ‘Ka’. Any one of three sounds pertaining to C, K, or Q can be so. This is not so with Indian languages. In English there are three ways of spelling to indicate the sound of ‘f’, e.g. ‘fairy’, ‘philosophy’ and ‘rough’. Although the letter ‘C’ is mostly indicative of the ‘Sa’ sound, most of the words beginning with ‘C’ in English are pronounced with the ‘Ka’ sound. Only in some instances like cell, celluloid and cinema has ‘C’ the sound of ‘Sa’.

When you say ‘fat’, the ‘a’ sound in one way. In ‘Fast’ the same sound differently. Some spellings and pronunciations have very little in common. In ‘station’ and ‘nation’ the ‘tion’ is pronounced as ‘shun’. Since the script of English and other languages which use the Roman alphabet, have only 26 letters, it is easy to learn them. On the other hand, Indian languages are more difficult to learn as they contain many more letters. But, if for a whole year, one takes the trouble to slog at the Kindergarten class, then reading in that language becomes easy. But in the case of English, even after crossing the Master’s level, one has to refer to the dictionary for correct pronunciation.

This merit, which the Indian languages have, is present more fully in the Sanskrit language. By this I do not mean to say that the foreign languages are inferior to Sanskrit. I am merely pointing out some factual details of the peculiarities in languages. My idea is to project the image of sound which is the sound of the infinite (Sabdabramaatmaka), as finding its clearest expression in Sanskrit.

Everyone should feel that all languages are common property. Then there be no occasion for anyone to berate another. On the issue of language only if the fundamental fact that language is solely meant to serve as the medium of communication is understood the present frenzy of love for one’s mother tongue and hatred for another’s will go away. It is pathetic to hear so much talk on the need for broad-mindedness and international outlook but having such narrow and parochial views in the matter of languages.

Aksha Maala – String of Beads

The word Radra-Aksha-Maala means a beaded string of ‘Rudraaksha’ beads, which is believed to have come out of Rudra’s eyes. ‘Aksha’ here means the eye. What does it mean when one says ‘Aksha Maala’? It is not right to translate ‘Aksha’ as the eye in this case. It stands for all the letters of the alphabet beginning from ‘A’ (अ) and ending with ‘Ksha’ (क्ष). In Sanskrit alphabet, A is the first letter and ‘Ksha’ the last. Just as we say ‘A’ to ‘Z’ in English to indicate completeness or totality, in Sanskrit we say Akaaraadi Kshakaaraantaha, i.e., beginning with ‘a’ and ending with ‘ksha’. The total number of letters is fifty. So in an Akshamaala there will be fifty beads.

The Importance of Intonation

I have already mentioned that great care should be exercised in practising the chant of mantras are not only would it result in the loss of benefits if perfection in word and sound is not ensured but bad intonation may lead to malefic or contrary effects. There is a story in the Vedas unmistakably illustrating this – (Taittareeya Samhita – 2.4.12).

“Tvasthta”, who was not well disposed towards Indra, for some reason wanted a son capable of killing Indra so that he could set the old scores with Indra. So he performed a Homa (Fire-Sacrifice) chanting a mantra: ‘Indrassatrur Vardhasva’. When chanting it, the correct way was to utter ‘Indra’ in even tone (i.e. without raising or lowering it). In Satru, the true should have been high, and similarly ‘Vardhasva’ should have been high. If said, as above, it would mean ‘let Tvashta’s son grow up to kill Indra’. By the efficacy of the sound alone, he should have grown up and killed Indra. But Tvashta erred in pronunciation. That is, he raised high the ‘dra’ in ‘Indra’, the ‘Satru’ was said evenly and in ‘Vardhasva’ the ‘rdha’ was lowered instead of being raised. As a result, instead of ‘let him grow up as the killer of Indra’, the meaning got topsyturvy. Although the words and letters were not changed, due to the fault in intonation, the result was just contrary to what Tvashta wanted. His son was killed by Indra. Thus the father became responsible for the death of his son, Vrtra (वृत्र), at the hands of Indra.

A sloka draws attention to this incident mentioned in the Vedas in order to caution us to be more careful in intonation and pronunciation of Veda mantras.

Mantroheena swarato varnathovas, Mithyaaprayukto na tamarthmaaha, Savaak vajro yajamaanam hinasti, Yathendrasatruh swaratoaparaadhaat.

Some Small Diferences

So far I have said about how the Vedas should be syllable perfect. As proof of what I said, you may see that from Rameshwaram to Himalayas, in all places in India – with or without any social contacts, all the versions of the Vedas now existing in India are 99% the same, without any difference in word or letter, even though they have been preserved without the aid of printed or written books and the Vedic texts have been passed from generation to generation by word of mouth. Does this mean there is a small difference still? Yes. There is. Every Saakha in each region has a slight difference with its counterpart in another region. Can this be permitted? After saying that even a small difference would make a disastrous difference, how can even this small one per cent difference be tolerated? If there can be only one correct form, another with even a 1% difference cannot yield the expected result. Or, it should lead to a different result. There is an answer to this poser. It is true that a change in the wording of mantras would pervert the result just as a change in the prescribed medicine would affect the cure of illness. But, this only applies to the patient; he should not by himself change the medicine. The doctors can change the prescription. There are several medicines to treat a disease. In such cases, there is nothing wrong in the doctor recommending a a particular medicine and not the other. Even in the case of the same disease, the doctor may alter the ingredients of a mixture to suit differences in physique.

So also, the difference in words has been knowingly and deliberately made by the Rishis in the various Saakhas. This has been designed to suit those who may come later (in time) to chant them. The rules governing these changes are clearly spelt out in ‘Praatisaakhya’ texts. The Praatisaakhya literally means ‘provincial’. The differences in the words are very slight. The changes do not make an appreciable difference. Words with more or less similar sounds are used one for the other – words which are closely allied.

Vedic Sounds as Influenced by Regional Languages

When the differences between the various Indian languages are examined in the light of the small differences in the word of the Vedas pertaining to the region, the startling conclusion emerges that the distinctive cultures and cultural differences have been caused by the differences in Vedic sounds. Let me state the result of my philological enquiries. The sounds ‘da’, ‘ra’, ‘la’, ‘lla’ and ‘zha’ are close to each other. If a child is asked to say ‘rail’ or ‘Rama’, it would say ‘dail’ or ‘dama’. This is because ‘da’ and ‘ra’ are close in sound. Since ‘da’ can change to ‘ra’, it follows that ‘la’ can change to ‘da’. ‘la’ and ‘lla’ are really close. There is no need to stress the affinity between ‘la’ and ‘zha’.

Let us now take those regions where each Veda is vastly popular and examine the peculiarities of the language used.

These days there is a campaign going on among some that the Vedas belong to the Aryans and that Dravidianism is different from it. So let us take the three regions in the land of the Dravidians. That is, let us take Tamil, Telugu and Kannada. In Tamil, the peculiarity is ‘zha’, in Telugu it is ‘da’ and in Kannada it is ‘la’. For example, there is a Sanskrit word, Pravaala. It is the same as ‘Pavazham’ in Tamil (coral). This is called ‘Pagadaalu’ in Telugu and Havalla in Kannada. Pravaala has become Pavazha in Tamil. In ‘Pagadaalu’ the V appearing in Pravaala has become ‘Ga’. This is the characteristic of the language. Similarly when ‘Pravaala’ becomes the Havalla in Kannada, the first letter itself undergoes a major change. ‘Pra’ changing into ‘Pa’ in Tamil and Telugu is only a minor transformation but, in Kannada, it has become Ha. But this is the special characteristic of that language. What is ‘Pa’ in other languages becomes ‘Ha’ in Kannada. Pampa becomes Hampa, further changing into Hampi e.g.: (Hampi ruins). Although not distinguishable separately as Aryans or Dravidian, the same race is divided into those whose language is affiliated to Sanskrit and those whose language is purely Dravidian. This is the conclusion now available from research. Further research might well prove that even this language difference is not warranted but all languages have descended from a common parent language. It is the Rig Veda that is mostly in use in the Wester India, including Maharashtra and Karnataka, that is why the ‘lla’ sound is in usage in Rig Veda. The Vedic ‘lla’ has crept into what thought to be the Dravidian language Kannada and is in vogue.

Taking the easter coast and the land adjoining it, viz., the Andhra region, 98% of the people belong to Yajur Veda. The rest of the 2% are Rig Vedis. It can be said that, in Andhra, there are practically no Saama Vedis. Since the most important thing is the Yajur Veda, the ‘lla’ which appears in the Rig Vedic chant is naturally changed to ‘da’. Here, also in the regional language, Telugu, what is ‘lla’ in other language has become ‘da’.

In the Tamil Nadu, in later times, the Yajur Vedins became predominant but not to the extent as in Andhra. In Tamil Nadu it may be said that 80% are Yajur Vedis and of the rest 15% are Saama Vedis and the balance of 5% Rig Vedis. Although, at present, this is the position, there is evidence to show that, in times past, Saama Veda held more sway in Tamil Nadu than now. It is a fair guess that all the 1000 Saakhas of Saama Veda had their followers in Tamil Nadu.

Malayalam is the language in use in what is now called Kerala. The reason why I did not mention Malayalam in the same breath as Telugu and Kannada was that, like the Pallavas, this, belongs to a later age. Until about 1000 years ago Kerala was part of Tamil speaking land and the language in use there was Tamil. Then Malayalam was evolved from Tamil. The Tamil ‘zha’ which becomes ‘da’ in Telugu and ‘lla’ in Kannada remained as ‘zha’ in Malayalam. Therefore, based on the differences in pronunciation of Veda Saakhas, the various regional languages have developed suitable individualistic alphabets.

What I said so far is confined to the land of the what is now called Dravidians. I am now going to look at it on an all-India and inter-national level.

It is custom in Northern India to use ‘Ja’ instread of ‘Ya’ and ‘ba’ instead of ‘va’. This is not only in colloquial use but is also in literary usage. ‘Va’ becoming ‘Ba’ is most noticeable in Bengal; ‘ya’ becoming ‘ja’ in Uttar Pradesh, the Punjab and further North. In Bengal, the Paanini sutra ‘vaabayorabhedam’ (‘va’ and ‘ba’ do not preclude interchange) is followed in totality. In Bengal, all ‘va’ is changed to ‘ba’. In fact, ‘vanga’ has become ‘Bengal’. Vangavaasi has become ‘Bangabaasi’. They themselves realise the error of this. In Bengal, an examination was held to correct this error. Its name was ‘Vanga Parishad’. Their intention was to use ‘V’ instead of ‘b’ in all future publications. In so doing, they unwittingly changed ‘b’ into ‘v’, where such a change was not warranted. ‘Bandhu’ (meaning a relative) was changed to ‘Vandhu’. The correct term ‘Vanga Bandhu’ which was originally wrongly called ‘Banga Bandhu’, has now again become wrong in another way as ‘Vanga Vandhu’.

In the north, to a certain extent, and in other regions too, ‘ba’ is used instead of ‘va’. Bihar is really ‘Vihar’. This was the place which abounded in Buddha Vihars. ‘Rash Bihari’ is none other than ‘Rash Vihari’. Whey do they pronounce ‘v’ as ‘b’? The Praathisaakya lays down that those belonging to a certain Saakha in that region should say so. That injunction which was meant for Vedic chant was followed in speech and script for ordinary purposes also. This shows that, at one time, the laws of Siksha were faithfully followed in this region.

I said earlier that the Yajur Veda was in use by the majority in the whole country. I also said that this Veda had two versions, viz., the Krishna Yajur Veda and the Sukla Yajur Veda. Of these, the most prevalent in the South is the Krishna Yajus; that in the north is mostly Sukla Yajus.

One of the many Saakhas of Sukla Yajus is Maadhyaandina Saakha. This is zealously practised in the North. Its Praatisaakhya says it is permissible for ‘ja’ to be sued in place of ‘ya’. It also says that ‘ka’ can be used in place of ‘sha’. That is why when in the south one says ‘Yath Purshena Havisha’, it is uttered by them in the North yas ‘Jat Purushena Havika’. In course of time this change has been adopted in the case of many words in the North. The ‘Yamuna’ becomes the Jamuna’, ‘Yogi’ becomes ‘Jogi’, ‘Yatra’ becomes ‘Jatra’ and so on. When ‘sha’ is changed to ‘ka’, ‘Rishi’ becomes ‘Riki’. ‘Ksha’ and ‘sha’ are near relatives, aren’t they? Therefore in the North ‘ksha’ also becomes ‘ka’. ‘Kshiram’ is ‘Khir’. We can thus go on citing examples.

Let us now go to the inter-national level. Let us go the Palestine, the birthplace of Christianity and the Bible; to Israel and other Semetic countries. The basis of the Koran of the Muslims is the Old Testament of the Christians. Those appearing in the Old Testament also make their appearance in the Koran. But in Arabis the pronunciation changes. Joseph become ‘Yusuf’. Jehovah become Yahovah. This difference is not only found between Christianity and Islam. Even amongst the Christian nations, the ‘ya’ sound is predominant in certain languages. In some others, the ‘ja’ sound takes over. If one goes towards Greece, the ‘j’ sound surfaces.

Research has revealed that the cause of this is the Vedas. The Devata called ‘Yahvan’ in the Vedas is none other that Jehovah (Yehova). Doupita is Jupiter, it is said. If a half consonant comes at the beginning of a word Sanskrit, it is dropped when it is said in another language. Thus ‘dou pitar’ is ‘yow pitar’, which is ‘Jupiter’.

What does this lead to, when the original Yahvan and Doupitar as a result of the change of ‘ya’ to ‘ja’ become Jehovah and Jupiter? Does this not support the inference that when Vedic practices were universal, in the area around Greece, the Maadhyaandina Saakha of the Yajur Veda was mostly in use?

Did the Vedic pronunciation influence the regional language? Or did the regional language regulate Vedic pronunciation?

All I said to show that the words in use in Vedas in a particular region also figured in the spoken and written language of that region. From this, it is evident that the Vedas were in vogue in all countries.

It is indeed correct to say that the Vedic Siksha rules have come to be the principal sound in the regional languages because the Praatisaakhya rule was not made from one region; it was made for all regions where a Saakha was in use. Whether in Kashmir or in Kamarup (modern Assam), person chanting Jaimini Saama would say ‘sha’ where other would say ‘do’ or ‘lla’. Whatever be the language spoken by a person who chants it, one who chants the Sukla Yajur Veda, whether his mother tongue is Gujarati or Marathi or whatever else, he should use ‘da’ only. The Praatisaakhya which was not meant for any particular region but is a general book of rules, has thus defined the letter-sounds. In course of time, wherever a particular Saakha was much in use, the peculiarity of the letter in question infiltrated into the regional language too.

The Other Noteworthy Points About Siksha Saastra

I say that the Vedic sounds should not be changed; the tone should not be altered. Nevertheless, I have so far explained how, based on the differences in Saakha, some small changes are permissible according to the Siksha Saastra. Likewise, in the matter of Swara (pitch), minor variations are permissible.

I said earlier that, in Vedic chant, there are the Samhita, Pada and Krama modes. Such differences in the methods of chant of the samhita portions on Vedas have the sanction of Praatisaakhya which are a part of the Siksha Saastra.

There is no warrant for treating the matter lightly as merely one of sound. All that there, is in the sound. Therefore, the Siksha Saastra is the nose through which the Veda Purusha breathes.

The 50 sounds (syllables) in the Sanskrit alphabet have come from the Vedas. If the letter gnya (ज्ञ) is taken as separate, we have 51 letters. They are called Maatruka (मातृका). There are many meanings to this. Most importantly, Maatru is ‘Mata’ which stands for the cosmic mother. The 51 letters are in the image of that Paraasakti (super power). If all the universe owes its creation to the Paraasakti and if creation was made through the medium of sound, it follows that Paraasakti should be the personification of the 51 letters. The Siksha Saastra says that these 51 syllables represent the various parts of Paraasakti’s body and even define which syllable represents which part. In our country, the 51 seats of the Sakti cult have come into being as having connection with the 51 parts of cosmic body.

If the stature of the Siksha Saastra is enhanced by being likened to the nose of the Veda Purusha, its importance is further increased by the syllables in it being regarded as adding up to create the full image of Paraasakti, the divine Mother.

Harih Harah!!

वेदांग – शिक्षा: वेदों की नासिका और फेफड़े

वेदों के छह अंगों में से सबसे प्रमुख अंग शिक्षा है । इसे वेदों की नासिका कहा जा सकता है । नासिका का कार्य केवल गंध पहचानने तक ही सीमित नहीं है, जो एक छोटी भूमिका है । अधिक महत्वपूर्ण श्वास क्रिया भी इसी अंग के माध्यम से होती है । जिस प्रकार नाक हमें श्वास लेने में सक्षम बनाती है, जो बदले में प्राणशक्ति को बनाए रखती है, उसी प्रकार शिक्षा वेद मंत्रों की प्राणवायु है ।

वेद मंत्रों का प्राण केंद्र कहाँ स्थित है ? वेद मंत्र के प्रत्येक अक्षर का उच्चारण परिमाण, या समय की अवधि, के अनुसार सही ढंग से किया जाना चाहिए । इसे अक्षर शुद्धि – अक्षर शुद्धता कहते हैं । समय अवधि के अलावा, ध्वनि के स्वर के भी नियम हैं – उच्च, मध्यम या निम्न । उच्च, निम्न और मध्यम स्वरों को क्रमशः उदात्तम्, अनुदात्तम् और स्वरितम् कहा जाता है । यदि ये अपने उचित स्थानों पर हों, तो ध्वनि को स्वर-शुद्ध कहा जाता है जिसमें स्वर शुद्धता होती है । इस प्रकार मंत्र तभी फल दे सकते हैं जब अक्षर और स्वर शुद्धता की आवश्यकताएँ पूरी तरह से पूरी हों । मंत्रों के उचित उच्चारण पर इतना ज़ोर दिया जाता है कि मंत्रों के लिए उच्चारण, बोलने की शैली और बोलने का सुर जैसी आवश्यकताएँ उनके अर्थ से भी ज़्यादा महत्वपूर्ण हैं ।

अर्थ न जानने पर भी, सही स्वर-उच्चारण अपेक्षित परिणाम की गारंटी देता है । अतः वेदों का जीवन, जो केवल मंत्रों की एक श्रृंखला है, केवल ध्वनि से ही चलता है । आइए बिच्छू के काटने पर उपचार करने वाले मंत्र को लें । इसका अर्थ प्रकट नहीं किया जाना चाहिए । इसमें निहित शब्दों में अपार शक्ति है । विभिन्न ध्वनियों के विभिन्न प्रभाव होते हैं । वार्षिक पुण्यतिथि मंत्र (श्राद्ध मंत्र) का उच्चारण संस्कृत में करना क्यों आवश्यक है, अंग्रेजी या किसी अन्य भाषा में नहीं ? क्योंकि, अंग्रेजी या तमिल में उनकी ध्वनि भिन्न होती है और उनकी प्रभावकारिता, जो पूरी तरह से ध्वनि में निहित है, नष्ट हो जाती है । यदि मंत्र जपने वालों के कुछ दांत टूट जाएँ और परिणामस्वरूप वे ध्वनियों का उच्चारण ठीक से न कर पाएँ, तो मंत्र जप की शुद्धता प्रभावित होगी और प्रभावकारिता या तो नष्ट हो जाएगी या कम हो जाएगी । इस प्रकार वेदों के लिए उच्चारण और स्वर-गुणवत्ता, सभी महत्वपूर्ण हैं ।

इसकी शुद्धता सुनिश्चित करने के लिए क्या किया जाना चाहिए?

‘शिक्षा’ ध्वन्यात्मकता (ध्वनिविज्ञान phonetics) – अक्षरों की ध्वनियाँ (sounds of syllables), उच्चारण की श्रुतिमधुरता (euphony) के नियमों को निर्धारित करती है । शिक्षा शास्त्र का कार्य वैदिक शब्दों के मानदंड निर्धारित करना है ।

ध्वनिविज्ञान किसी भाषा के उच्चारण की विधि निर्धारित करता है । किसी भी अन्य भाषा की तुलना में, वैदिक भाषा के मामले में ध्वनिविज्ञान सबसे महत्वपूर्ण है, क्योंकि हम देखते हैं कि ध्वनि में परिवर्तन से परिणाम और प्रभाव में परिवर्तन होता है

इसलिए शिक्षा, जो वैदिक ध्वनिविज्ञान है, को वेदपुरुष के छह अंगों में सबसे महत्वपूर्ण माना गया है ।

वेदों के मुकुट माने जाने वाले उपनिषदों में भी शिक्षा का उल्लेख मिलता है । तैत्तरीय उपनिषद “शिक्षा वल्ली” नामक अध्याय से आरंभ होता है । पहला मंत्र कहता है “शिक्षां व्याख्यानम्” – आइए हम शिक्षा (सीख) की व्याख्या करें । यहाँ, वैदिक ग्रंथों में अन्यत्र की तरह, ‘शिक्षा’ को ‘शीक्षा’ कहा गया है, जिसमें स्वर ‘इ’ को ‘ई’ में दीर्घित किया गया है । आदि शंकर ने अपने भाष्य में इसका उल्लेख किया है, “धैर्यम् छंदशाम्” । वैदिक भाषा के लिए दीर्घीकरण, अर्थात् काव्यात्मक स्वतंत्रता के अनुसार, छोटा “इ” दीर्घ “ई” बन जाता है । हमें पहले यह उल्लेख करने का अवसर मिला था कि वैदिक भाषा को संस्कृत नहीं कहा जाता है, बल्कि इसे “छंदस्” कहा जाता है । अतः “छंदस्” वेदों में प्रयुक्त विशेष भाषा को संदर्भित करता है ।

हारमोनियम, ओबो और बाँसुरी जैसे वायु वाद्यों में, विभिन्न संगीत स्वर उत्पन्न करने के लिए, कुछ गणनाओं के आधार पर छिद्रों से वायु को बाहर निकाला जाता है । मानव कंठ की भी ऐसी ही व्यवस्था है । यह केवल कंठ ही नहीं है । नाभि के ठीक नीचे स्थित “मूलाधार” से श्वास विभिन्न प्रकार से ऊपर की ओर प्रवाहित होती है जिससे वाणी या राग उत्पन्न होता है । ईश्वर ने मनुष्य के लिए जो वाद्य यंत्र बनाए हैं, वे मानव निर्मित वाद्य यंत्रों, जैसे बांसुरी या हारमोनियम, से कहीं श्रेष्ठ हैं । ये वाद्य यंत्र केवल साधारण ध्वनि ही उत्पन्न कर सकते हैं । ‘अ’, ‘क’, ‘च’, ‘ङ’ जैसे अक्षरों की ध्वनियाँ उत्पन्न नहीं की जा सकतीं । केवल मानव वाणी ही इन ध्वनियों को उत्पन्न करने की क्षमता रखती है । पशु-पक्षी इनमें से कुछ शब्द तुतलाकर बोल सकते हैं, लेकिन मनुष्य के निकट नहीं पहुँच सकते, जो ऐसी हज़ारों ध्वनियाँ उत्पन्न कर सकता है ।

चूँकि मनुष्य को ही ऐसी ध्वनियाँ उत्पन्न करने की क्षमता प्रदान की गई है, इसलिए उसका महत्व स्पष्ट है । यदि इतनी महत्वपूर्ण संपत्ति व्यर्थ की बातों और बकबक में नष्ट हो जाए तो यह दुःख की बात होगी । इनका उपयोग ईश्वरीय शक्तियों को एकत्रित करने, समग्र विश्व का कल्याण करने और स्वयं को उन्नत करने के लिए किया जाना चाहिए । इन तीनों कार्यों को करने के लिए, ऋषियों ने ध्वनियों को वेद मंत्रों के रूप में ग्रहण किया और हमें प्रदान किया । इस तथ्य को पूरी तरह से समझने पर ही हम समझ सकते हैं कि शिक्षा का विज्ञान क्यों विकसित हुआ और प्रतिष्ठित भाषाविदों और वैज्ञानिकों द्वारा दिए गए उच्चारण, शिक्षा सूक्ष्मतम विवरण के साथ बताती है कि श्वास को पेट के गड्ढे से कैसे निकलना है और कितने बिंदुओं को छूना है और मुख से बाहर निकलने से पहले कितने अलग-अलग तरीकों से मुड़ना और घूमना है । इस प्रकार ध्वनियों की शुद्धता सुनिश्चित की गई है ।

जब वायु हमारे भीतर इतने अलग-अलग तरीकों से यात्रा करती है, तो वह वास्तव में स्वयं एक योग शास्त्र बन जाती है । हमें पहले यह उल्लेख करने का अवसर मिला था कि नाड़ी केंद्रों से श्वास के गुजरने से उत्पन्न कंपनों के कारण, विभिन्न भावनाएँ और शक्तियाँ उत्पन्न हुईं और इन कंपनों ने बाहरी दुनिया पर भी अपनी प्रतिक्रिया कैसे व्यक्त की । यही कारण है कि जो लोग अपनी श्वास को नियंत्रित करते हैं और योगिक शक्तियाँ प्राप्त करते हैं, उनका कद मंत्र जपने वालों और आत्मसाक्षात्कार करने वालों के समान होता है ।

शिक्षा शास्त्र बताता है कि प्रत्येक शब्दांश की ध्वनि कैसे उत्पन्न की जानी चाहिए, उसका स्वर कितना ऊंचा या नीचा होना चाहिए और ध्वनि कितनी देर तक चलनी चाहिए । अंतिम उल्लेखित अवधि को मात्रा कहा जाता है । मात्रा छोटी और लंबी ध्वनियों से संबंधित है । लघु ध्वनि को ‘हर्स्व’ कहा जाता है जिसका अर्थ है ‘छोटा’ । लंबी ध्वनि को ‘दीर्घ’ कहा जाता है । मिश्रित और संयुक्त शब्दों को शब्दांशों में विभाजित किए बिना उनका उच्चारण कैसे किया जाए और वेदों का जाप सीखने वालों के लिए आवश्यक कुछ अन्य दिशानिर्देश शिक्षा शास्त्र में निहित हैं । ‘क’ ध्वनि गर्दन और गले के बीच के क्षेत्र से निकलनी चाहिए । ‘थ’ जैसी ध्वनि जीभ को कुछ दांतों पर बंद करके उत्पन्न करनी होती है । ‘न’ जैसी कुछ ध्वनियां मुंह के तालू या छत के संपर्क में आने से जीभ से निकलती हैं । ‘म’ जैसी अन्य ध्वनियां कसकर संकुचित होठों से आती यदि हम उन निर्धारित विधियों का बारीकी से पालन और अभ्यास करें कि शरीर के किन अंगों और मांसपेशियों को विशेष ध्वनियाँ उत्पन्न करने के लिए व्यायाम कराना चाहिए, तो हम मात्र ध्वनि विज्ञान के स्तर से उठकर मंत्र योग या शब्द योग के स्तर तक पहुँच गए होंगे ।

मूल भाषा केवल संस्कृत है

मैं कहता हूँ कि किसी शब्द की ध्वनि उसके अर्थ से भी ज़्यादा महत्वपूर्ण होती है । इस विषय पर बात करते हुए, मेरे मन में एक और बात आती है । ‘छंदस’, जो वैदिक भाषा है और संस्कृत, जो उससे निकली है, में कई ऐसे शब्द हैं जिनकी ध्वनियाँ उनके अर्थ की सूचक हैं ।

उदाहरण के लिए, ‘दंत’ शब्द लीजिए जिसका अर्थ है दाँत । इसके उच्चारण के लिए, ज़्यादातर दाँतों का ही प्रयोग होता है, और जीभ कभी-कभी हल्के से काम करती है । एक प्रयोग से पता चलेगा कि बिना दाँत वाले लोगों के लिए इसे बोलना कितना मुश्किल है । वे इसका स्पष्ट उच्चारण नहीं कर सकते ।

यहाँ तुलनात्मक भाषाविज्ञान के छात्रों के लिए कुछ दिलचस्प है जो भाषाओं के कालक्रम का निर्धारण करते समय छोटी-छोटी बातों पर भी ध्यान देते हैं । संस्कृत, ग्रीक, लैटिन, जर्मन आदि जो ट्यूटनिक समूह से संबंधित हैं (अंग्रेजी भी इसमें शामिल है) और आधुनिक फ्रेंच तथा अन्य भाषाएँ जो सेल्टिक समूह से संबंधित हैं, भाषाविदों के अनुसार, एक ही मूल भाषा से उत्पन्न हुई हैं, जिसे इंडो-यूरोपीय भाषा समूह से संबंधित कहा जाता है, हालाँकि विद्वानों द्वारा उस मूल भाषा को दृढ़ता से स्थापित नहीं किया गया है । वे यह स्वीकार नहीं करते कि संस्कृत (जिसमें वैदिक भाषा ‘छंदस’ भी शामिल है) मूल आधार या मूल भाषा है । लेकिन ‘दंत’ जैसे शब्द इसके मूल भाषा होने के दावे का पर्याप्त समर्थन करते हैं ।

अंग्रेजी में ‘डेंटल’ शब्द का अर्थ वही है – दांत । हम ‘दंत’ और ‘डेंट’ में समानता देख सकते हैं । फ्रेंच और लैटिन के संगत शब्द भी ध्वनि में ‘दंत’ के समान हैं । कहने का तात्पर्य यह है कि संस्कृत में ‘द’ के बजाय ‘त’ ध्वनि प्रमुख है । तब यह तर्क दिया जा सकता है: “ठीक है – ध्वनियों में समानता हो सकती है, लेकिन इससे यह कैसे स्थापित होता है कि संस्कृत मूल भाषा है ?” जैसा कि पहले बताया गया है, संस्कृत में ‘दंत’ शब्द का सही उच्चारण करने के लिए आपको सभी दांतों की आवश्यकता होती है । आप अन्य भाषाओं में ‘डेंटल’ जैसे अन्य शब्दों का उच्चारण करने का प्रयास करते हैं । दांतों की इसमें ज़्यादा भूमिका नहीं होती । ‘दंत’ ध्वनि जीभ के तालू को छूने से उत्पन्न होती है । यदि शब्द स्वयं अर्थ को स्पष्ट रूप से इंगित करता है, तो यह आवश्यकता केवल ‘दंत’ में ही पूरी होती है, जो स्पष्ट रूप से एक व्युत्पन्न है ।

कुछ अन्य मामलों में, वर्तनी में थोड़ा सा परिवर्तन करने से एक निकट से संबद्ध शब्द बन जाता है । सिंह का मुख्य लक्षण क्या है ? पीड़ा देना – हिंसा । “हिंसा” ने ‘सिंह’ को प्रतिस्थापित किया है । कश्यप, ऋषियों में प्रथम, देवताओं, असुरों और मानव जाति के प्रवर्तक थे । उनका यह नाम कैसे पड़ा ? उन्होंने सत्य का दर्शन किया । अर्थात्, उन्होंने ईश्वर के सच्चे रूप को देखा । संस्कृत में बुद्धि या ज्ञान को दृश्यम – दृष्टि भी कहा जाता है । संस्कृत में “देखने वाले” का अर्थ “पश्यक” है, जो थोड़े से परिवर्तन के साथ “कश्यप” बन गया । पश्यक से कश्यप ।

उच्चारण के नियम

शिक्षा शास्त्र उच्चारण के विभिन्न पहलुओं का विवरण प्रस्तुत करता है, जैसे उच्चारण, स्वर, अवधि, स्वर (मात्रा), स्वर-तार (बलम्), समता (सनम्) और संयोजन (संथानम्) । इससे यह सुनिश्चित होता है कि परिणामी ध्वनि यथासंभव पूर्ण हो । यह आगे बताता है कि मानव शरीर के किन अंगों से किसी अक्षर की ध्वनि उत्पन्न होती है और किस प्रकार के प्रयास से उसे उत्पन्न किया जाता है । यह सब अत्यंत व्यावहारिक और वैज्ञानिक है । इसमें कहा गया है कि जब किसी अक्षर की ध्वनि उत्पन्न करने के लिए होठों को एक निश्चित सीमा तक जोड़ना होता है, तो निर्देशों का पालन करने पर ध्वनि पूर्ण रूप से उत्पन्न होती है ।

जब मैं यह कहता हूँ, तो मुझे एक और बात याद आती है । होंठ तभी काम करते हैं जब ‘प’, ‘म’, ‘व’ जैसे अक्षर उच्चारित होते हैं । ‘क’, ‘ङ’, ‘च’, ‘ज्ञ’, ‘ज’, ‘ण’, ‘ठ’, ‘न’ आदि अक्षरों में होंठों का प्रयोग नहीं होता । किसी ने होंठों के प्रयोग से रहित शब्दों से रामायण की रचना की है । उसे ‘निरोष्ट रामायण’ कहते हैं । ओष्ट होंठ है, जिससे ओष्ट्रक, यानी ऊँट बना है । ऊँट के होंठ बहुत उभरे हुए होते हैं । निरोष्ट का अर्थ है बिना होंठों वाला । हो सकता है उन्होंने अपनी कुशलता दिखाने के लिए यह रचना की हो । लेकिन मुझे इसका एक और कारण समझ आ रहा है । वे शारीरिक स्वच्छता के प्रति अनुकरणीय व्यक्ति रहे होंगे । शायद वे इन ध्वनियों मुंह से बोलकर भगवान के नाम को कलंकित नहीं करना चाहते थे ।

महर्षि पाणिनि (व्याकरणाचार्य) ने अपनी ‘पाणिनीय शिक्षा’ में एक सुंदर श्लोक के माध्यम से बताया है कि वैदिक शब्दों का उच्चारण कितनी सावधानी और एकाग्रता से किया जाना चाहिए:

व्याघ्री यथा हरेत् पुत्रान्, दंष्ट्राभ्यां च न पीडयेत् । भीत पतनादेताभ्यां, तद्वत् वर्णान् प्रयोजयेत् ॥

वैदिक अक्षरों का उच्चारण बहुत स्पष्ट होना चाहिए । ध्वनि धुंधली नहीं होनी चाहिए । ध्वनि फिसलनी या धीमी नहीं होनी चाहिए । दूसरी ओर, उन्हें अत्यधिक जोर से (भौंककर) नहीं बोलना चाहिए । उन्हें न तो ढीला या लापरवाही से बोलना चाहिए और न ही रुक-रुक कर बोलना चाहिए । इसकी तुलना एक मादा बाघिन से की जा सकती है । बाघिन अपने बच्चों को कैसे ले जाती है ? बिल्लियाँ और बाघिन अपने बच्चों को अपने दांतों से पकड़ते हैं । दांत बच्चे को मजबूती से पकड़ते हैं ताकि बच्चा फिसलकर गिर न जाए, लेकिन साथ ही, दांत उसे कोई चोट या दर्द भी न पहुँचाएँ । इसी तरह, शब्दों का उच्चारण भी कोमलता से लेकिन दृढ़ता से करना चाहिए । ऐसा पाणिनि कहते हैं ।

उसी पाणिनि ने वेदांग के अगले महत्वपूर्ण अंग ‘व्याकरण’ मे अमूल्य योगदान दिया है । पाणिनि के अतिरिक्त कई अन्य ऋषियों ने भी शिक्षा पर लिखा है । ऐसा प्रतीत होता है कि इस विषय पर लगभग ३० पाठ हैं । पाणिनी और याज्ञवल्क्य इनमें से सबसे महत्वपूर्ण हैं ।

विभिन्न भाषाओं की लिपि

लिपि, रेखाएँ, वृत्त और बिंदु बनाकर, विभिन्न अक्षरों की ध्वनियों को दर्शाती है । यही विभिन्न भाषाओं की लिपियों का मूल है । अंग्रेजी और संबद्ध भाषाओं की वर्णमाला रोमन लिपि में कही जाती है । पहले ब्राह्मी नामक एक लिपि हुआ करती थी । सम्राट अशोक के आदेश इसी लिपि में हैं । इसी से वर्तमान संस्कृत (नागरी और ग्रंथ) और दक्षिण भारतीय भाषाओं की लिपियाँ उत्पन्न हुई हैं ।

ब्राह्मी लिपि के दो भागों में से एक, जिसे ‘पल्लव ग्रंथ’ कहा जाता था और जो दक्षिण में प्रचलित था, से द्रविड़ भाषाओं की विभिन्न लिपियों की उत्पत्ति हुई है ।

सभी आधुनिक भारतीय भाषाओं की लिपियाँ ब्राह्मी से उत्पन्न हुई हैं । लेकिन, यदि आप मूल ब्राह्मी लिपि को देखें, तो आपको कुछ भी परिचित नहीं लगेगा । इसीलिए ‘ब्राह्मी लिपि’ शब्द का प्रयोग किसी अज्ञात चीज़ को दर्शाने के लिए किया जाने लगा ।

‘खरोष्ठी’ नामक एक लिपि है । “खर-ओष्टम” का अर्थ है गधे के होंठ । जिस प्रकार गधे के होंठ बाहर निकले होते हैं, उसी प्रकार उस भाषा के अक्षरों के चक्र गधे के होंठों की तरह बाहर निकले होते हैं । यही फ़ारसी भाषा की लिपि है ।

जिस प्रकार यूरोप में कई भाषाओं में रोमन लिपि का प्रयोग होता है, उसी प्रकार भारत में एक प्रचलित लिपि ब्राह्मी है । यह कई उत्तर भारतीय भाषाओं में प्रयुक्त देवनागरी लिपि से स्पष्ट होता है ।

यदि किसी भाषा के ध्वन्यात्मक ज्ञान को अच्छी तरह समझ लिया जाए, तो और भी बहुत सी बातें हमारे लिए स्पष्ट हो जाएँगी । अंग्रेज़ी में, हम सोच सकते हैं कि ‘व’ ध्वनि को दर्शाने के लिए दो अक्षर V और W क्यों हैं । अंग्रेज़ी के एक प्रोफ़ेसर ने एक बार इस अंतर को समझाया था । जहाँ V का प्रयोग होता है, वहाँ हमें निचले होंठ को मोड़कर और ऊपरी दाँतों को उससे स्पर्श कराकर ध्वनि उत्पन्न करनी होती है । जबकि, जब W का प्रयोग होता है, तो दाँतों का प्रयोग नहीं करना होता, ध्वनि निकालने से पहले दोनों होंठों को गोल बनाने के लिए आंशिक रूप से बंद करना होता है । इसलिए भारतीय भाषाओं में सरस्वती और ईश्वर शब्द ‘V’ से लिखे जाते हैं, ‘W’ से नहीं ।

किसी भी अन्य भाषा की तुलना में, संस्कृत में उच्चारण वर्तनी के बिल्कुल अनुरूप होता है । अंग्रेज़ी में, चीज़ें भ्रामक होती हैं । हाल ही में मैंने अखबारों में पढ़ा: “Legislature Wound Up”। अनजाने में मैंने ‘wind’ शब्द के भूतकालिक कृदंत को ‘wound’ पढ़ लिया, जिसका अर्थ है चोट । एक ही वर्तनी को अलग-अलग उच्चारण करने पर बिल्कुल अलग अर्थ निकलते हैं । यहाँ ‘would up’ का अर्थ बंद करना है । यहाँ तक कि ‘wind’ शब्द का उच्चारण भी हवा के लिए ‘Vind’ और चारों ओर बाँधने के लिए ‘Vynd’ करना पड़ता है । इस प्रकार बहुत सारी गड़बड़ियाँ हो जाती हैं ।

केवल संस्कृत में, दो अपवादों को छोड़कर, उच्चारण में वर्तनी के कारण कोई परिवर्तन नहीं होता । यह पूरी तरह से ध्वन्यात्मक वर्तनी है । ये दोनों कौन सी हैं ? मैं समझाता हूँ ।

एक परिवर्तन वह है जो ‘प’ से पहले विसर्ग आने पर होता है । विसर्ग, कमोबेश ‘ह’ ध्वनि लेता है । राम: का उच्चारण ‘रामह’ होना चाहिए । इसे पूरी तरह ‘ह’ करने के बजाय, इसे हल्का करना चाहिए । यही विसर्ग, ‘प’ के साथ आने पर ‘फ’ हो जाता है । यदि शब्द का उच्चारण केवल वर्णमाला की ध्वनि के आधार पर किया जाए, तो वह गलत होगा ।

ब्रह्मा, वह्नि आदि शब्दों को इसी तरह लिखना होता है, लेकिन उनका उच्चारण ब्रम्हा, और वन्हि ही करना होता है । इन दोनों के अलावा, संस्कृत में उच्चारण और लिपि में कोई अंतर नहीं है ।

वह भाषा जिसमें सभी ध्वनियाँ हैं

उपरोक्त से यह स्पष्ट है कि संस्कृत में ‘फ़’ ध्वनि विद्यमान है । ऐसी कोई ध्वनि नहीं है जो इसमें स्थान न पाती हो । हम सामान्यतः मानते हैं कि ‘ज़्हा’ (Zha) अक्षर केवल तमिल में ही उपलब्ध है । संस्कृत की मूल भाषा, वैदिक भाषा में ‘ज़्हा’ ध्वनि है । यजुर्वेद में कई स्थानों पर और तलवकार सामवेद में जहाँ ‘त’ अक्षर आता है, वहाँ उसे ‘ज़्हा’ के रूप में उच्चारित करना पड़ता है । इसी प्रकार ऋग्वेद में भी, कुछ स्थानों पर, ‘ज़्हा’ ध्वनि उत्पन्न करनी पड़ती है । ऋग्वेद के प्रथम सूक्त के पहले शब्द में, जिसका उच्चारण ‘अग्नि मीलय’ है, ‘लय’ को ‘ज़्हय’ में बदलना पड़ता है, जिससे वह “अग्नि मीज़्हय” हो जाता है, जो तमिल भाषा की तरह पूर्ण ‘ज़्हा’ नहीं, बल्कि उसके आसपास कहीं एक ध्वनि है ।

फ़्रेंच में भी, ‘ज़्हा’ के निकट एक ध्वनि है । लेकिन फ़्रेंच और संस्कृत दोनों में, ‘ज़्हा’ ध्वनि को दर्शाने के लिए कोई अलग अक्षर नहीं है । फ़्रांसीसी भाषा में ‘ज’ और ‘ग’ अक्षरों का प्रयोग ‘ज़्हा’ प्रभाव उत्पन्न करने के लिए किया जाता है । संस्कृत में, केवल ‘ला’ अक्षर ही ‘ज़्हा’ का सूचक है । ऐसा कहा जाता है कि चीनी भाषा में भी ‘ज़्हा’ अक्षर होता है । ‘रामः’ और ‘पंडितः’ मिलकर ‘रामपंडितः’ बनता है । संस्कृत में ‘फ़’ ध्वनि को “उपदानीयम्” कहते हैं, जिसका शाब्दिक अर्थ है किसी पाइप या नली से आग फूंकना । तभी ‘फ़’ ध्वनि उत्पन्न हो सकती है ।

भारतीय और विदेशी भाषाएँ और लिपियाँ

भारतीय भाषाओं की एक विशिष्ट विशेषता है । शब्दों का उच्चारण ठीक उसी प्रकार किया जाना चाहिए जैसा अक्षर की ध्वनि के अनुसार होना चाहिए । आइए अंग्रेज़ी के ‘world’ शब्द को लें । उच्चारण करते समय, प्रारंभिक अक्षर का उच्चारण ‘वी’ या ‘वो’ जैसा नहीं होता, बल्कि कुछ इसके बीच का होता हे, जो स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं है । ‘Often’ में ‘ट’ अक्षर और ‘walk’ और ‘talk’ में ‘ल’ अक्षर को भी इसी प्रकार छिपाना होता है, जिसे लिपि में स्पष्ट रूप से इंगित नहीं किया जा सकता । इस प्रकार, अन्य भाषाओं में ऐसी कई अस्पष्ट ध्वनियाँ हैं । इन्हें ‘अव्यक्त’ – अस्पष्ट ध्वनियाँ – कहा जाता है । हमारी सभी भारतीय भाषाओं में केवल स्पष्ट ध्वनियाँ ही होती हैं ।

अक्षर और उसकी ध्वनि के बारे में सीधे नियम के बजाय, अन्य भाषाओं में बहुत भ्रम है । उदाहरण के लिए, ‘C’ अक्षर ‘Ka’ अक्षर का सूचक हो सकता है । ‘C’, ‘K’ या ‘Q’ से संबंधित तीन ध्वनियों में से कोई भी ध्वनि हो सकती है । भारतीय भाषाओं के साथ ऐसा नहीं है । अंग्रेजी में ‘f’ की ध्वनि को दर्शाने के लिए वर्तनी के तीन तरीके हैं, जैसे ‘fairy’, ‘philosophy’ और ‘rough’ । हालाँकि ‘C’ अक्षर अधिकांशतः ‘Sa’ ध्वनि का सूचक है, अंग्रेजी में ‘C’ से शुरू होने वाले अधिकांश शब्दों का उच्चारण ‘Ka’ ध्वनि के साथ होता है । केवल कुछ उदाहरणों जैसे cell, celluloid और cinema में ‘C’, ‘Sa’ की ध्वनि है ।

जब आप ‘fat’ कहते हैं, तो ‘a’ एक तरह से ध्वनि करता है । ‘fast’ में वही ध्वनि अलग तरह से होती है । कुछ वर्तनी और उच्चारण में बहुत कम समानता है । ‘station’ और ‘nation’ में  ‘tion’ का उच्चारण ‘shun’ (शन) होता है । चूँकि अंग्रेज़ी और रोमन वर्णमाला वाली अन्य भाषाओं की लिपि में केवल २६ अक्षर होते हैं, इसलिए उन्हें सीखना आसान है । दूसरी ओर, भारतीय भाषाएँ सीखना ज़्यादा कठिन है क्योंकि उनमें अक्षरों की संख्या ज़्यादा होती है । लेकिन, अगर कोई पूरे साल किंडरगार्टन कक्षा में कड़ी मेहनत करे, तो उस भाषा में पढ़ना आसान हो जाता है । लेकिन अंग्रेज़ी के मामले में, मास्टर डिग्री पास करने के बाद भी, सही उच्चारण के लिए शब्दकोश देखना पड़ता है ।

भारतीय भाषाओं का यह गुण संस्कृत भाषा में और भी ज़्यादा मौजूद है । इससे मेरा यह मतलब नहीं है कि विदेशी भाषाएँ संस्कृत से कमतर हैं । मैं तो बस भाषाओं की विशिष्टताओं के कुछ तथ्यात्मक विवरण बता रहा हूँ । मेरा विचार ध्वनि की छवि प्रस्तुत करना है, जो अनंत (शब्दब्रह्मात्मक) की ध्वनि है, और जिसकी सबसे स्पष्ट अभिव्यक्ति संस्कृत में मिलती है ।

सभी को यह महसूस करना चाहिए कि सभी भाषाएँ साझा संपत्ति हैं । तब किसी को भी दूसरे को कोसने का कोई अवसर नहीं रहेगा । भाषा के मुद्दे पर, अगर यह मूलभूत तथ्य समझ लिया जाए कि भाषा केवल संचार के माध्यम के रूप में काम करने के लिए है, तो अपनी मातृभाषा के प्रति प्रेम और दूसरी भाषा के प्रति घृणा का वर्तमान उन्माद दूर हो जाएगा । व्यापक सोच और अंतर्राष्ट्रीय दृष्टिकोण की आवश्यकता पर इतनी बातें सुनना और भाषाओं के मामले में इतने संकीर्ण और संकुचित विचार रखना दुखद है ।

अक्ष माला – मोतियों की माला

रुद्र-अक्ष-माला शब्द का अर्थ है ‘रुद्राक्ष’ के मनकों की माला, जिसके बारे में माना जाता है कि यह रुद्र के नेत्रों से निकला है । यहाँ ‘अक्ष’ का अर्थ आँख है । ‘अक्ष माला’ कहने का क्या अर्थ है ? इस मामले में ‘अक्ष’ का अनुवाद आँख करना उचित नहीं है । यह वर्णमाला के सभी अक्षरों को दर्शाता है जो ‘अ’ से शुरू होकर ‘क्ष’ पर समाप्त होते हैं । संस्कृत वर्णमाला में, ‘अ’ पहला अक्षर है और ‘क्ष’ अंतिम । जिस प्रकार हम पूर्णता या समग्रता को दर्शाने के लिए अंग्रेजी में ‘a’ to ‘z’ कहते हैं, उसी प्रकार संस्कृत में हम ‘अकारादि क्षकारान्त:’ कहते हैं, अर्थात ‘अ’ से शुरू होकर ‘क्ष’ पर समाप्त । अक्षरों की कुल संख्या पचास है । इसलिए एक अक्षमाला में पचास मनके होंगे ।

स्वर-उच्चारण का महत्व

मैं पहले ही बता चुका हूँ कि मंत्रों के जाप का अभ्यास करते समय बहुत सावधानी बरतनी चाहिए क्योंकि यदि शब्द और ध्वनि में शुद्धता सुनिश्चित नहीं की गई तो न केवल लाभ की हानि होगी, बल्कि गलत स्वर-उच्चारण से अशुभ या विपरीत प्रभाव भी हो सकते हैं । वेदों में एक कथा है जो इस बात को स्पष्ट रूप से दर्शाती है – (तैत्तरीय संहिता – २.४.१२) ।

“त्वष्टा”, जो इंद्र के प्रति उदासीन था, किसी कारणवश एक ऐसा पुत्र चाहता था जो इंद्र को मार सके ताकि वह इंद्र से पुराना हिसाब चुकता कर सके । इसलिए उसने ‘इंद्रस्सत्रुर वर्धस्व’ मंत्र का जाप करते हुए एक होम (अग्नि-यज्ञ) किया । इसका जाप करते समय, ‘इंद्र’ का उच्चारण सम स्वर में (अर्थात बिना बढ़ाए या घटाए) करना सही तरीका था । शत्रु में ‘त्रु’ उच्च होना चाहिए था, और इसी प्रकार ‘वर्धस्व’ भी उच्च होना चाहिए था । यदि ऊपर वर्णित अनुसार कहा जाए, तो इसका अर्थ होगा ‘त्वष्टा का पुत्र बड़ा होकर इंद्र का वध करे’ । केवल ध्वनि की प्रभावकारिता के आधार पर, उसे बड़ा होकर इंद्र का वध कर देना चाहिए था । लेकिन त्वष्टा ने उच्चारण में त्रुटि की । अर्थात्, उन्होंने ‘इंद्र’ में ‘द्र’ को ऊँचा कर दिया, ‘शत्रु’ का उच्चारण समान रूप से हुआ और ‘वर्धस्व’ में ‘र्ध’ को ऊँचा करने के बजाय नीचा कर दिया । परिणामस्वरूप, ‘उसे इंद्र का वध करने के लिए बड़ा होने दो’ के बजाय, अर्थ उलट गया । यद्यपि शब्दों और अक्षरों में कोई परिवर्तन नहीं किया गया था, फिर भी स्वर में त्रुटि के कारण, परिणाम त्वष्टा की इच्छा के ठीक विपरीत हुआ । उनके पुत्र की इंद्र ने हत्या कर दी । इस प्रकार पिता अपने पुत्र, वृत्र की इंद्र के हाथों मृत्यु के लिए उत्तरदायी हुआ ।

वेदों में वर्णित इस घटना की ओर एक श्लोक ध्यान आकर्षित करता है ताकि हमें वेद मंत्रों के उच्चारण और उच्चारण में अधिक सावधानी बरतने के लिए सावधान किया जा सके ।

मंत्रो हीनस्स्वरतो वर्णतो वा, मिथ्याप्रयुक्तो न तमर्थमाह, स वाग् वज्रो यजमानं हिनस्ति, यथेन्द्रशत्रुः स्वरतोऽपराधात् ।

कुछ छोटे-मोटे अंतर

अब तक मैंने बताया कि वेदों को अक्षरतः पूर्ण कैसे होना चाहिए । मेरी बात के प्रमाण के रूप में, आप देख सकते हैं कि रामेश्वरम से लेकर हिमालय तक, भारत के सभी स्थानों पर – चाहे सामाजिक संपर्क हो या न हो, भारत में विद्यमान वेदों के सभी संस्करण ९९% एक जैसे हैं, शब्द या अक्षर में कोई अंतर नहीं है, भले ही उन्हें मुद्रित या लिखित पुस्तकों की सहायता के बिना संरक्षित किया गया हो और वैदिक ग्रंथ पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक रूप से प्रसारित होते रहे हों । क्या इसका मतलब यह है कि अभी भी एक छोटा सा अंतर है ? हाँ । है । प्रत्येक क्षेत्र की प्रत्येक शाखा का दूसरे क्षेत्र की शाखा से थोड़ा सा अंतर होता है । क्या इसकी अनुमति दी जा सकती है ? यह कहने के बाद कि एक छोटा सा अंतर भी विनाशकारी अंतर पैदा कर सकता है, इस एक प्रतिशत के छोटे से अंतर को भी कैसे बर्दाश्त किया जा सकता है ? यदि केवल एक ही सही रूप हो सकता है, तो १% का भी अंतर अपेक्षित परिणाम नहीं दे सकता । या, इससे भिन्न परिणाम प्राप्त हो सकते हैं । इस प्रश्न का एक उत्तर है । यह सत्य है कि मंत्रों के शब्दों में परिवर्तन परिणाम को उसी प्रकार विकृत कर देगा जैसे निर्धारित औषधि में परिवर्तन रोग के उपचार को प्रभावित करता है । लेकिन, यह केवल रोगी पर लागू होता है; उसे स्वयं औषधि नहीं बदलनी चाहिए । चिकित्सक नुस्खा बदल सकते हैं । किसी रोग के उपचार के लिए कई औषधियाँ होती हैं । ऐसे मामलों में, चिकित्सक द्वारा किसी एक औषधि की सिफारिश करना और दूसरी की नहीं, इसमें कुछ भी गलत नहीं है । एक ही रोग के मामले में भी, चिकित्सक शरीर के विभिन्न अंगों के अनुरूप मिश्रण के अवयवों में परिवर्तन कर सकता है ।

इसी प्रकार, विभिन्न शाखाओं में ऋषियों द्वारा शब्दों में अंतर जानबूझकर किया गया है । इसे उन लोगों के अनुकूल बनाया गया है जो बाद में (समय आने पर) इनका जाप करने आएँगे । इन परिवर्तनों को नियंत्रित करने वाले नियम ‘प्रातिसाख्य’ ग्रंथों में स्पष्ट रूप से वर्णित हैं । प्रातिसाख्य का शाब्दिक अर्थ है ‘प्रांतीय’ । शब्दों में अंतर बहुत कम है । इन परिवर्तनों से कोई खास फर्क नहीं पड़ता । कमोबेश समान ध्वनियों वाले शब्दों का प्रयोग एक के स्थान पर किया गया है – ऐसे शब्द जो आपस में घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए हैं ।

क्षेत्रीय भाषाओं से प्रभावित वैदिक ध्वनियाँ

जब विभिन्न भारतीय भाषाओं के बीच के अंतरों की जाँच उस क्षेत्र से संबंधित वेदों के शब्दों में छोटे-छोटे अंतरों के आलोक में की जाती है, तो यह चौंकाने वाला निष्कर्ष निकलता है कि विशिष्ट संस्कृतियाँ और सांस्कृतिक अंतर वैदिक ध्वनियों के अंतर के कारण हैं । मैं अपनी भाषाविज्ञान संबंधी खोजों का परिणाम बताता हूँ । ‘द’, ‘र’, ‘ल’, ‘ल्ल’ और ‘झ’ ध्वनियाँ एक-दूसरे के निकटवर्ती हैं । यदि किसी बच्चे को ‘रेल’ या ‘रमा’ कहने को कहा जाए, तो वह ‘दैल’ या ‘दमा’ कहेगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि ‘द’ और ‘र’ ध्वनि में निकटवर्ती हैं । चूँकि ‘द’ को ‘र’ में बदला जा सकता है, इसलिए ‘ल’ को ‘द’ में बदला जा सकता है । ‘ल’ और ‘ल्ल’ वास्तव में निकटवर्ती हैं । ‘ल’ और ‘झ’ के बीच समानता पर ज़ोर देने की कोई आवश्यकता नहीं है ।

आइए अब हम उन क्षेत्रों को लें जहाँ प्रत्येक वेद अत्यधिक लोकप्रिय है और प्रयुक्त भाषा की विशिष्टताओं का परीक्षण करें ।

इन दिनों कुछ लोगों में यह अभियान चल रहा है कि वेद आर्यों के हैं और द्रविड़ धर्म उनसे भिन्न है । तो आइए द्रविड़ों की धरती के तीन क्षेत्रों को लें । यानी तमिल, तेलुगु और कन्नड़ । तमिल में ‘झ’, तेलुगु में ‘द’ और कन्नड़ में ‘ल’ की विशेषता है। उदाहरण के लिए, एक संस्कृत शब्द है, प्रवाल । यह तमिल में ‘पवझम’ (मूंगा) के समान है । इसे तेलुगु में ‘पगदालु’ और कन्नड़ में ‘हवल्ला’ कहते हैं । प्रवाल तमिल में पवझा बन गया है । ‘पगदालु’ में प्रवाल में आने वाला ‘व’ ‘ग’ बन गया है । यही भाषा की विशेषता है । इसी प्रकार, जब कन्नड़ में ‘प्रवाल’ हवल्ला बन जाता है, तो पहले अक्षर में ही बड़ा परिवर्तन आ जाता है । तमिल और तेलुगु में ‘प्र’ का ‘प’ में बदलना एक छोटा सा परिवर्तन है, लेकिन कन्नड़ में यह ‘ह’ बन गया है । लेकिन यही उस भाषा की विशेषता है । अन्य भाषाओं में जो ‘प’ है, वह कन्नड़ में ‘ह’ बन जाता है । पम्पा, हम्पा बन जाता है, जो आगे चलकर हम्पी में बदल जाता है, जैसे: (हम्पी के खंडहर) । यद्यपि आर्यों या द्रविड़ों के रूप में अलग-अलग पहचानना संभव नहीं है, फिर भी एक ही जाति दो भागों में विभाजित है: वे जिनकी भाषा संस्कृत से संबद्ध है और वे जिनकी भाषा विशुद्ध रूप से द्रविड़ है । शोध से अब यही निष्कर्ष प्राप्त हुआ है । आगे के शोध से यह सिद्ध हो सकता है कि यह भाषागत अंतर भी उचित नहीं है, बल्कि सभी भाषाएँ एक ही मूल भाषा से उत्पन्न हुई हैं । ऋग्वेद ही पश्चिमी भारत में, जिसमें महाराष्ट्र और कर्नाटक शामिल हैं, अधिकतर प्रयोग में है, इसीलिए ऋग्वेद में ‘lla’ ध्वनि का प्रयोग हुआ है । वैदिक ‘lla’ उस भाषा में भी समा गया है जिसे द्रविड़ भाषा कन्नड़ माना जाता है और जो प्रचलन में है ।

पूर्वी तट और उससे सटे आंध्र प्रदेश को मिलाकर, ९८% लोग यजुर्वेद से संबंधित हैं । शेष २% ऋग्वेदियों के हैं । यह कहा जा सकता है कि आंध्र में व्यावहारिक रूप से कोई साम वेदियाँ नहीं हैं । चूँकि सबसे महत्वपूर्ण यजुर्वेद है, इसलिए ऋग्वेदिक मंत्र में प्रयुक्त ‘lla’ स्वाभाविक रूप से ‘da’ में बदल जाता है । यहाँ, क्षेत्रीय भाषा, तेलुगु में भी, जो अन्य भाषाओं में ‘lla’ है, वह ‘da’ बन गया है ।

तमिलनाडु में, बाद के समय में, यजुर्वेदी प्रमुख हो गए, लेकिन आंध्र की तरह नहीं । तमिलनाडु में यह कहा जा सकता है कि ८०% यजुर्वेदी हैं, शेष १५% सामवेदी हैं और शेष ५% ऋग्वेदीय हैं । हालाँकि वर्तमान में यही स्थिति है, फिर भी इस बात के प्रमाण हैं कि अतीत में सामवेद का तमिलनाडु में आज की तुलना में अधिक प्रभाव था । यह अनुमान लगाना उचित है कि सामवेद की सभी १००० शाखाओं के अनुयायी तमिलनाडु में थे ।

मलयालम वह भाषा है जो वर्तमान केरल में प्रचलित है । मैंने तेलुगु और कन्नड़ के साथ मलयालम का उल्लेख इसलिए नहीं किया क्योंकि पल्लवों की तरह यह भी बाद के युग की है । लगभग १००० वर्ष पहले तक केरल तमिल भाषी क्षेत्र का हिस्सा था और वहाँ तमिल ही प्रचलित थी । फिर तमिल से मलयालम का विकास हुआ । तमिल ‘झ’ जो तेलुगु में ‘द’ और कन्नड़ में ‘ल्ल’ बन जाता है, मलयालम में ‘झ’ ही रहा । इसलिए, वेद शाखाओं के उच्चारण में अंतर के आधार पर, विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं ने उपयुक्त विशिष्ट वर्णमालाएँ विकसित की हैं ।

मैंने अब तक जो कुछ कहा है, वह वर्तमान द्रविड़ कहे जाने वाले क्षेत्र तक ही सीमित है । अब मैं इसे अखिल भारतीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर देखने जा रहा हूँ ।

उत्तरी भारत में ‘य’ के स्थान पर ‘ज’ और ‘व’ के स्थान पर ‘ब’ का प्रयोग करने का रिवाज है । यह न केवल बोलचाल में, बल्कि साहित्यिक प्रयोग में भी प्रचलित है । ‘व’ का ‘ब’ बन जाना बंगाल में सबसे अधिक ध्यान देने योग्य है; उत्तर प्रदेश, पंजाब और आगे उत्तर में ‘य’ का ‘ज’ बन जाना । बंगाल में, पाणिनि सूत्र ‘वबयोर्भेदम्’ (‘व’ और ‘ब’ की अदला-बदली वर्जित नहीं है) का पूर्णतः पालन किया जाता है । बंगाल में, सभी ‘व’ को ‘ब’ में बदल दिया जाता है । वास्तव में, ‘वंग’ ‘बंगाल’ बन गया है । वंगवासी ‘बंगवासी’ बन गए हैं । उन्हें स्वयं इस गलती का एहसास है । बंगाल में, इस गलती को सुधारने के लिए एक परीक्षा आयोजित की गई थी । इसका नाम ‘वंग परिषद’ था । उनका इरादा भविष्य के सभी प्रकाशनों में ‘ब’ के बजाय ‘व’ का उपयोग करना था । ऐसा करते हुए, उन्होंने अनजाने में ‘ब’ को ‘व’ में बदल दिया, सही शब्द ‘वंग बंधु’, जिसे मूल रूप से ग़लती से ‘बंग बंधु’ कहा जाता था, अब एक और अर्थ में ‘वंग वंधु’ बन गया है ।

उत्तर में, कुछ हद तक, और अन्य क्षेत्रों में भी, ‘व’ के स्थान पर ‘ब’ का प्रयोग होता है । बिहार वास्तव में ‘विहार’ है । यह वह स्थान था जहाँ बुद्ध विहारों की भरमार थी । ‘रास बिहारी’ कोई और नहीं बल्कि ‘रास विहारी’ ही हैं । ‘व’ का उच्चारण ‘ब’ क्यों करते हैं ? प्रातिसाख्य में यह प्रावधान है कि उस क्षेत्र के एक निश्चित शाखा के लोगों को ऐसा ही कहना चाहिए । वैदिक मंत्रोच्चार के लिए जो आदेश था, उसका पालन सामान्य प्रयोजनों के लिए भी वाणी और लिपि में किया जाता था । इससे पता चलता है कि एक समय में इस क्षेत्र में शिक्षा के नियमों का ईमानदारी से पालन किया जाता था ।

मैंने पहले कहा था कि यजुर्वेद पूरे देश में बहुसंख्यक लोगों द्वारा प्रयोग में लाया जाता था । मैंने यह भी कहा था कि इस वेद के दो संस्करण थे, अर्थात् कृष्ण यजुर्वेद और शुक्ल यजुर्वेद । इनमें से, दक्षिण में कृष्ण यजुस सबसे अधिक प्रचलित है; उत्तर में यह अधिकतर शुक्ल यजुस है ।

शुक्ल यजुस की अनेक शाखाओं में से एक मध्यंदिन शाखा है । उत्तर में इसका उत्साहपूर्वक पालन किया जाता है । इसकी प्रातिसाख्य में कहा गया है कि ‘य’ के स्थान पर ‘ज’ का प्रयोग स्वीकार्य है । इसमें यह भी कहा गया है कि ‘ष’ के स्थान पर ‘ख’ (क) का प्रयोग किया जा सकता है । इसीलिए जब दक्षिण में ‘यत् पुरुषेन हविषा’ कहा जाता है, तो उत्तर में ‘जत् पुरुषेन हविखा/हविका’ कहा जाता है । समय के साथ उत्तर में कई शब्दों के मामले में यह परिवर्तन अपनाया गया है । ‘यमुना’ का नाम ‘जमुना’ हो जाता है, ‘योगी’ का नाम ‘जोगी’ हो जाता है, ‘यात्रा’ का नाम ‘जात्रा’ हो जाता है इत्यादि । जब ‘ष’ का नाम ‘क’ हो जाता है, तो ‘ऋषि’ का नाम ‘ऋकि’ हो जाता है । ‘क्ष’ और ‘ष’ निकट संबंधी हैं, है ना ? इसलिए उत्तर में ‘क्ष’ भी ‘ख/क’ बन जाता है । ‘क्षीरम्’ ‘खीर’ बन जाता है । इस प्रकार हम उदाहरण देते रह सकते हैं ।

अब हम अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चलते हैं । आइए हम ईसाई धर्म और बाइबिल के जन्मस्थान फ़िलिस्तीन चलें; इज़राइल और अन्य सेमेटिक देशों की ओर । मुसलमानों के कुरान का आधार ईसाइयों का पुराना नियम है । पुराने नियम में जो उल्लेख हैं, वे कुरान में भी आते हैं । लेकिन अरबी में उच्चारण बदल जाता है । जोसफ ‘यूसुफ़’ बन जाता है । जेहोवा यहोवा बन जाता है । यह अंतर केवल ईसाई धर्म और इस्लाम में ही नहीं पाया जाता । ईसाई देशों में भी, कुछ भाषाओं में ‘य’ ध्वनि प्रमुख है । कुछ अन्य भाषाओं में, ‘ज’ ध्वनि हावी हो जाती है । यदि कोई यूनान की ओर जाए, तो ‘ज’ ध्वनि सामने आती है ।

शोध से पता चला है कि इसका कारण वेद हैं । वेदों में ‘याह्वान’ कहे जाने वाले देवता कोई और नहीं, बल्कि जेहोवा (यहोवा) हैं । ऐसा कहा जाता है कि ‘द्वौपिता’ बृहस्पति (जुपिटर) हैं । यदि संस्कृत के किसी शब्द के आरंभ में अर्ध व्यंजन आता है, तो उसे किसी अन्य भाषा में बोलते समय हटा दिया जाता है । इस प्रकार ‘दौ पितृ’ ‘योउ पितर’ बन जाता है, जो ‘जुपिटर’ (बृहस्पति) हैं ।

जब ‘य’ के ‘ज’ में परिवर्तन के परिणामस्वरूप मूल याह्वान और दोपितर, यहोवा और जुपिटर बन जाते हैं, तो इसका क्या अर्थ है ? क्या यह इस निष्कर्ष का समर्थन नहीं करता कि जब वैदिक रीतियाँ सर्वव्यापी थीं, तो यूनान के आसपास के क्षेत्र में यजुर्वेद की मध्यंदिन शाखा ही अधिकतर प्रचलन में थी ?

क्या वैदिक उच्चारण ने क्षेत्रीय भाषा को प्रभावित किया ? या क्षेत्रीय भाषा ने वैदिक उच्चारण को नियंत्रित किया ?

मैंने यह दिखाने के लिए कहा कि किसी विशेष क्षेत्र में वेदों में प्रयुक्त शब्द उस क्षेत्र की बोलचाल और लिखित भाषा में भी आते थे । इससे यह स्पष्ट है कि वेद सभी देशों में प्रचलित थे ।

यह कहना वास्तव में सही है कि वैदिक शिक्षा नियम क्षेत्रीय भाषाओं में प्रमुख ध्वनि बन गए हैं क्योंकि प्रातिसाख्य नियम किसी एक क्षेत्र के लिए नहीं बनाया गया था; यह उन सभी क्षेत्रों के लिए बनाया गया था जहाँ एक शाखा प्रचलित थी । चाहे कश्मीर हो या कामरूप (आधुनिक असम), जैमिनी साम का जाप करने वाला व्यक्ति ‘ष’ कहता था, जबकि दूसरा ‘द’ या ‘ल्ल’ कहता था । शुक्ल यजुर्वेद का जाप करने वाला व्यक्ति चाहे किसी भी भाषा में बोले, चाहे उसकी मातृभाषा गुजराती हो या मराठी या कुछ और, उसे केवल ‘द’ का ही प्रयोग करना चाहिए । प्रातिसाख्य, जो किसी विशेष क्षेत्र के लिए नहीं थी, बल्कि नियमों की एक सामान्य पुस्तक थी, ने इस प्रकार अक्षर-ध्वनियों को परिभाषित किया है । समय के साथ, जहाँ भी किसी विशेष शाखा का अधिक प्रचलन हुआ, उस अक्षर की विशिष्टता उस क्षेत्रीय भाषा में भी व्याप्त हो गई ।

शिक्षा शास्त्र के बारे में अन्य उल्लेखनीय बातें

मैं कहता हूँ कि वैदिक ध्वनियों को नहीं बदलना चाहिए; स्वर में भी परिवर्तन नहीं होना चाहिए । फिर भी, मैंने अब तक यह स्पष्ट किया है कि शिक्षा शास्त्र के अनुसार, शाखा के भेदों के आधार पर कुछ छोटे-मोटे परिवर्तन कैसे स्वीकार्य हैं । इसी प्रकार, स्वर के मामले में भी, छोटे-मोटे परिवर्तन स्वीकार्य हैं ।

मैंने पहले कहा था कि वैदिक जप में संहिता, पद और क्रम विधाएँ होती हैं । वेदों पर संहिता अंशों के जप की विधियों में ऐसे अंतरों को प्रातिसाख्य की स्वीकृति प्राप्त है, जो शिक्षा शास्त्र का एक भाग है ।

इस विषय को केवल ध्वनि मानकर हल्के में लेने का कोई औचित्य नहीं है । जो कुछ है, वह ध्वनि में ही है । इसलिए, शिक्षा शास्त्र वह नासिका है जिससे वेदपुरुष साँस लेते हैं ।

संस्कृत वर्णमाला में ५० ध्वनियाँ (अक्षर) वेदों से आई हैं । यदि ज्ञ अक्षर को अलग मान लिया जाए, तो हमारे पास ५१ अक्षर होते हैं । इन्हें मातृका कहा जाता है । इसके कई अर्थ हैं । सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मातृ शब्द का अर्थ ‘माता’ है, जो ब्रह्मांडीय माँ का प्रतीक है । ये ५१ अक्षर उस पराशक्ति (महाशक्ति) की छवि हैं । यदि समस्त ब्रह्मांड की रचना पराशक्ति की देन है और यदि सृष्टि ध्वनि के माध्यम से हुई है, तो इसका अर्थ है कि पराशक्ति ही इन ५१ अक्षरों का साक्षात् रूप हैं । शिक्षा शास्त्र कहता है कि ये ५१ अक्षर पराशक्ति के शरीर के विभिन्न अंगों का प्रतिनिधित्व करते हैं और यह भी परिभाषित करते हैं कि कौन सा अक्षर किस अंग का प्रतिनिधित्व करता है । हमारे देश में, शक्ति पंथ के 51 आसन ब्रह्मांडीय शरीर के ५१ अंगों से जुड़े होने के कारण अस्तित्व में आए हैं ।

यदि शिक्षा शास्त्र की महिमा वेदपुरुष की नाक के समान मानी जाती है, तो इसका महत्व इस बात से और भी बढ़ जाता है कि इसमें मौजूद अक्षरों को मिलाकर दिव्य माँ, पराशक्ति की पूर्ण छवि का निर्माण किया जाता है ।

हरिः हरः!!

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