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दस उपनिषद

2211 भ्यूज

दस उपनिषद

आदि शंकराचार्य दस उपनिषद केर चयन कयलनि, जेकरा दसोपनिषद कहल जाइत अछि तथा ओहि पर भाष्य लिखलनि । ओ ओहि मे प्रतिपादित अद्वैतवादी (अद्वैत) सिद्धान्त पर प्रकाश देलनि । रामानुज आ माधव, जे बाद मे भेलाह, ओहो लोकनि एहि दस उपनिषद पर भाष्य लिखलनि मुदा हुनका लोकनि मे सँ प्रत्येक द्वारा अपन सम्बन्धित सिद्धान्त पर  जोर देल गेल, जेना विशिष्ट-अद्वैत (योग्य गैर-द्वैतवाद) तथा द्वैत (द्वैतवाद) ।

निम्नलिखित श्लोक मे दस उपनिषदक वर्णन अछि:

ईश–केन–कठ–प्रश्न–मुण्ड–माण्डूक्य–तित्तिरः ।
ऐतरेयं च छान्दोग्यं बृहदारण्यकं तथा ॥

आदि शंकराचार्य अपन भाष्य सेहो उपरोक्त ग्रंथहि केर क्रम मे लिखने छथि ।

ईशावास्य उपनिषद

इश या ईशा ईशावास्य उपनिषद थिक । ई शुक्ल यजुर्वेद संहिताक अन्त मे अबैत अछि । एकरा एना एहि लेल कहल जाइत छैक जे इकर शुरुआत ‘ईशा वास्याम्’ शब्द सँ होइत छैक । ईशावास्य ई कहिकय शुरू होइत अछि जे ईश्वर या भगवान पूरे दुनिया मे व्याप्त छथि आर हमरा लोकनि केँ सबटा काजक फल केवल हुनकहि अर्पित कय केँ, ‘परमात्मा तत्त्व’ केर आनन्द उठेबाक अबस्था धरि पहुँचबाक चाही ।

ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् ।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम् ॥

जड़-चेतन प्राणीवला ई समस्त सृष्टि परमात्मा सँ व्याप्त अछि । मनुष्य एकर पदार्थ सभक आवश्यकतानुसार भोग करय, लेकिन ‘ई सब हमर नहि छी’ भावक संग ओकर संग्रह नहि करय ।

केनोपनिषद

‘केन’ केनोपनिषद् थिक । एकरा तलवकार उपनिषद सेहो कहल जाइत छैक कियैक तँ ई सामवेदक जैमिनी शाखाक तलवगार ब्राह्मण मे अबैत अछि । एकटा कहावत छैक जे “केन मे जे हरा गेल अछि से ताकू” । एहि उपनिषद मे वर्णन अछि जे केना स्वयं देवी (दिव्य) माता अम्बिका द्वारा देवता लोकनिक राजा इन्द्र केँ दिव्य ज्ञान प्रदान कयल गेल, जखन देवता सब अपन अभिमानक कारण अनादि-अन्तहीन परमात्मा केँ नहि पाबि सकलाह, हालांकि ओ सब उपर-नीचाँ सब दिश सब तरहें तकलनि । परा शक्ति (अम्बिका) कहैत छथि जे हमरा सभक समस्त शक्ति महाशक्ति या परमशक्ति सँ उत्पन्न होइत अछि । आदि शंकराचार्य सेहो, आर किछु उपनिषद सब जेकाँ, एहि उपनिषदक शब्द-दर-शब्द व्याख्या करय सँ सन्तुष्ट हेबाक बदला, एकटा अलग भाष्य, वाक्य-दर-वाक्य लिखलनि अछि । दोसर शब्द मे, एहि उपनिषद केँ आदि शंकर सँ दुइ गोट भाष्य प्राप्त करबाक गौरव प्राप्त अछि । एहि उपनिषद केँ मुख्य रूप सँ ध्यान मे राखियकय, आदि शंकर, दिव्य माता पर भक्ति रचना, “सौन्दर्य लहरी” मे कहैत छथि: “कृपया अपन चरण हमर सिर पर सेहो राखू, ओ पवित्र चरण जे अहाँ वेदमाताक सिर पर रखने छी ।” वेदान्त जेकाँ, उपनिषद सब केँ वेदशीर्ष या श्रुतिशीर्ष सेहो कहल जाइत छैक, अर्थात वेदक शीर्ष या श्रुतिक शीर्ष । उपनिषदहि वेदक अन्तिम भाग या अन्त थिक आर संगहि, सब भाग मे सब सँ महत्वपूर्ण (शीर्षभाग जेकाँ) अछि । ई कहनाय जे देवी माताक चरण वेदमाताक शीर्ष पर विराजमान अछि, ई कहबाक समान भेल जे ओ उपनिषद सब पर विराजमान छथि ।

केवल केनोपनिषद टा मे देवी माता ‘ज्ञानमाता’क रूप मे प्रकट होइत छथि । ‘सामागणप्रिया’ केर नामक अनुरूप, जे ‘ललिता सहस्रनाम’ मे वर्णित हुनकर विशेषता सब मे सँ एक अछि, हुनकर महिमा सामवेदक एहि उपनिषद मे विशेष रूप सँ प्रकट होइत अछि ।

यदि हम कहैत छी, “हम एकटा वस्तु देखैत छी”, त द्वैत स्थापित भ’ जाइत अछि – ओ वस्तु जे देखाय पड़ैत अछि आ ओ कर्ता जे ओकरा देखैत अछि । हम अपन शरीर केँ एकटा वस्तुक रूप मे (वस्तुनिष्ठ रूप सँ) देखि पबैत छी । जखन हम कहैत छी, “हमर शरीर स्वस्थ अछि या अस्वस्थ अछि”, तखन ऐ एकटा वस्तु बनि जाइत अछि । एकर अर्थ ई भेल जे स्वयं केँ “हम” कहयवला कोनो व्यक्ति, स्वयं केर एक गोट पृथक इकाई केर रूप मे कर्ता मानिकय, कोनो वस्तु केँ देखैत अछि । ई (कर्ता) जे देखैत अछि, से “आत्मा” थिक । एहि “कर्ता” केँ नहि त बुझल जा सकैत अछि, आ नहिये बोधगम्य अछि ई । जँ एना छैक, त ओ वास्तविक ‘कर्ता’ बनि जाइत अछि । वास्तविक आत्मा ‘हम’ किन्नहुं वस्तु नहि नहि बनि सकैछ, बल्कि केवल ‘कर्ता’ मात्र रहि सकैछ । तेँ, शरीर आदि वस्तु केँ छोड़िकय, ‘हम’ नामक ई कर्ता केवल अपना आप मे पृथक रूप सँ विद्यमान रहि सकैत अछि, लेकिन ओकरा जनबाक लेल विवश नहि कयल जा सकैत अछि । जननाय एकटा पृथक वस्तुक कल्पना करनाय होइछ । आत्माक मामिला मे ई घटना बेतुका अछि आर एकरा स्थापित नहि कयल जा सकैछ ।

यदि हमरा सब केँ एकरा जनबाक अछि, त ज्ञाता केँ आत्मा सँ भिन्न हेबाक चाही । हमरा सब मे एहेन कि भ’ सकैत अछि जे वास्तविक आत्मा सँ भिन्न हो ? आत्मा सँ अलग एहेन कि अछि जानि सकैत अछि ? किछो नहि । एहि द्वारे, ‘आत्माक ज्ञान’, ‘स्वयं केँ जननाय’ जेहेन अभिव्यक्ति सब मे, जनबाक क्रिया कोनो विषय केँ देखयवला व्यक्ति केर सामान्य नियमक अनुरूप नहि होइछ । ‘स्वयं द्वारा स्वयं केर अनुभव कयनाय’ एहि क्रिया केँ जननाय आर ज्ञान कहल जाइत छैक । एहि लेल केनोपनिषद कहैत अछि: “जे कहैत अछि जे ओ आत्मा केँ जनैत अछि, ओ ओकरा नहि जनैछ; जे ओकरा नहि जनबाक स्तर पर रहैत अछि, से ओकरा जनैत अछि; जे ओकरा देखैत अछि, ओ ओकरा नहि देखैछ; जे इकरा नहि देख सकैछ, ओ एकरा देख सकैत अछि ।”

कठोपनिषद

उपनिषद ‘कथा’ या कठोपनिषद या कठकोपनिषद कृष्ण यजुर्वेद केर कठक शाखा मे अबैत अछि । एहि मे मृत्युक देवता (यम) आर नचिकेता (एक ब्रह्मचारी बालक) केर बीच संवाद अछि, जे एहि प्रश्न पर विचार करैत अछि जे मृत्युक बाद आत्माक कि होइत छैक । हालाँकि ऐ एकटा कहानी जेकाँ शुरू होइत छैक, लेकिन ई एकटा महान सत्यक व्याख्या करैत अछि । भगवद् गीता मे, भगवान कृष्ण एहि उपनिषद केर शब्द सब केँ दोहराबैत छथि । उदाहरणक लेल:

न जायते म्रियते वा विपश्चिन्नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित्‌ ।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥ (K-II-18)

‘एहि ‘प्रज्ञामय’ केर न जन्म होएत छैक न मरण; न ई कतहु सँ आयल अछि, न ई कोनो व्यक्ति विशेष छी; ई अजन्मल, नित्य, शाश्वत आ पुराण थिक । शरीरक हनन भेलो पर एकर हनन नहि होइत छैक ।” 

मक्कइ केर दुनू डंठल सँ अलग कय केँ एकटा ढेर बन देल जाइत छैक । नारियलक पत्ता सँ पातर त्वचा केँ छिलिकय एकटा झाड़ूक छड़ी देखाय दैत छैक । ताहि तरहें, शरीर रूपी वस्तु सँ, विषय रूपी आत्मा केँ सेहो सहजता से मुदा दृढ़तापूर्वक अलग कय देबाक चाही आर आत्मा केँ स्वयं अस्तित्वमान रहबाक चाही । काम, क्रोध, घृणा, भय, ई सबटा मोनक बात थिकैक, आत्माक नहि । भूख, प्यास आर एहने आर-आर इच्छा सब शरीर सँ सम्बन्धित छैक, आत्मा सँ नहि । अतः, हमरा सब केँ ओहेन समस्त वस्तु ओ पदार्थ सब केँ चिन्हबाक अभ्यास करबाक चाही जे आत्मा सँ भिन्न अछि । यदि हम सब एहि तरहक सोच केर निरन्तर अभ्यास करैत रहब, त ई गहींर जैड़ जमा चुकल भावना जे ‘हम’ केवल शरीर तथा मन छी, से क्षीण होबय लागत आ अन्ततः लुप्त भ’ जायत । हम सब शरीर आर मन पर आक्रमण करयवला अनेक अशुद्धि सब मे उलझने बिना शुद्ध आत्मा बनि सकैत छी । हमरा सब केँ अपन देहधारी शरीर केँ आत्माक नजदीक स्थित एकटा आवरण मनबाक ​​चाही । हमरा सब केँ मन केँ शरीरक एकटा बाह्य वस्तुक रूप मे देखबाक लेल प्रशिक्षित करबाक चाही ।

जखन हम सब एहि संसार मे रहैत छी आर जखन हमरा सब केँ एतय आ एखन ई अनुभव होइत अछि जे हम शरीर मे विद्यमान छी, तखन हमरा सब केँ शरीर केँ ‘हम नहि’ – ‘हमर नहि’ मनबाक अभ्यास शुरू कय देबाक चाही । तखन, मृत्युक बाद मोक्ष प्राप्तिक बारे सोचनाय आवश्यक नहि होयत । मोक्षक अर्थ छैक सबटा आसक्ति सब सँ मुक्ति । एहि प्रकारे एकटा मुक्त आत्मा (जीवनमुक्त) ओ अछि जे एहि संसार मे शरीरक चेतना हरा दैत अछि आर बाह्य भोग सभक सहारा लेने बिना, अपना भीतर आत्मगत रूप सँ (आत्माराम केर) सुख पबैत अछि । वेद आर वेदान्त केर परम उद्देश्य मनुष्य केँ मुक्त आत्मा बनेनाय छैक । भगवान कृष्ण भगवद्गीता मे यैह कहैत छथि: “शरीर सँ प्राण निकलय सँ पहिने (प्राक् शरीर विमोक्षणात्), एहि संसार मे रहिते (“इहैव”), जे काम आ क्रोध केर शक्ति सब केँ नियंत्रित करैत अछि तथा योग (परमात्मा सँ एकरूपता) केर अबस्था मे स्थिर भ’ जाइत अछि, ओ शाश्वत आनन्द केर आनन्द लैत अछि ।” अर्थात्, यदि कियो व्यक्ति एहि संसार मे रहैते आत्माक वास्तविक स्वरूप केँ जानि लैत अछि, आर एना अनुभव प्राप्त कय लैत अछि, त शरीरक नष्टो भेला पर कोनो फर्क नहि पड़ैत छैक, कियैक तँ ओ जिबित रहिते एकरा अपन नहि मानने छल । एहि प्रकार सँ, मृत्यु केँ शरीर धारण करय सँ पहिनहिये ओ शरीर त्यागि देने छल । शरीर शब्द मे मन सेहो शामिल अछि । यदि ई हमर नहि छी, त मृत्युक कोनो महत्व नहि छैक, कियैक तँ एकर हमरा उपर कोनो प्रभाव नहि पड़त ।

कियैक तँ ओ नश्वरता (मृत्यु) सँ मुक्त भ’ जाइत अछि, ओ अमर भ’ जाइत अछि । एहि अबस्था मे बनल रहबाक क्रिया केर उल्लेख पुरुष सूक्त जेहेन विभिन्न मंत्र सब मे कयल गेल छैक, जे कर्म काण्ड मे अबैत अछि । उपनिषद मे, एहि विषय केँ बेर-बेर दोहरायल गेल छैक ।

हमरा सभक लेल दुःखक कारण शरीर आर ओकर माध्यम सँ मन थिक । दुःखक अभाव आर सदैव आनन्दित रहनाइये सब धर्म मे ‘स्वर्ग’ – मोक्ष – कहल गेल छैक । अद्वैत सिद्धान्त केर अलावा, सब धर्म कहैत अछि जे शाश्वत आनन्दक आनन्द लेबाक लेल, व्यक्ति केँ कोनो आन लोक मे जाय पड़त । आदि शंकराचार्य सिद्ध कयलनि अछि जे यैह लोक मे रहैते, शारीरिक आसक्ति केर पूर्णतः त्याग कय केँ तथा आत्मा मे गहराइ सँ स्थित भ’ कय, व्यक्ति अन्य लोक सभक तुलना मे बेसी आनन्दक अनुभव कय सकैत अछि । ब्रह्म सूत्र भाष्य (१.१.४) मे ओ कहैत छथि: तदेतत् अशरीरत्वं मोक्षाख्यं । हम सब आमतौर पर अशरीरी सँ जे बुझैत छी, ओ आकाशवाणी होइछ (आकाश सँ आबि रहल आवाज होइत अछि जे बिना शरीरक होइत छैक) । ‘अशरीर’ शब्द केर अर्थ केवल शरीर रहित होयब होइत छैक । ‘हम शरीर छी’ एहि बोधक लोप टा अशरीरत्वं थिक – शरीर रहित अवस्था थिक । आचार्य मोक्ष केर परिभाषा एहि प्रकार देलनि अछि: यदि इच्छा सब धीरे-धीरे कम भ’ जाय आर अन्ततः विलुप्त भ’ जाय, त शरीरक प्रति आसक्ति पूरापूरी गायब भ’ जायत । तखन भीतर केर आत्मा प्रकाशित भ’ जायत । एकरा लेल आन लोक सब मे जेबाक आवश्यकता नहि छैक । वेद आ वेदान्त एकरे ‘इहैव-इहैव’ कहैत छैक – यानि एतहि अछि – एतहि अछि ।

स्मृति अर्थात् भगवद्गीता कहैत अछि जे एहि आनन्दमय अबस्था धरि पहुँचय मे बाधा दयवला दुइ गोट मुख्य शत्रु अछि – इच्छा आ क्रोध । एकर प्रमाण छांदोग्य उपनिषद मे छैक जे एकटा श्रुति थिक ।

मधवन्मर्त्यं  वाइद्गं शरीरमात्रं मृत्युना तदस्यामृतस्या शरीरस्यात्मनोऽधिष्ठानमात्तो वै सशरीरः प्रियाप्रियाभ्यां नवै सशरीरस्य सतः प्रियाप्रियथोरपहतिरस्यशरीरंवाव सन्तं नप्रियाप्रिये स्पृशतः (छान्दोग्योपनिषद् – 8-12-1)

(सही सम्पादनक आवश्यकता अछि, मूलस्रोत देखलाक बादे सुधार सम्भव होयत)

अभिव्यक्ति प्रिय आ अप्रिय अछि, जेकर अर्थ भेल पसन्द आ नापसन्द । ‘पसन्द’ इच्छा होइछ; ‘नापसंद’ होइछ जुनून । छान्दोग्य कहैत अछि, ”बिना शरीरवला व्यक्ति केँ पसन्द आर नापसन्द प्रभावित नहि करैछ ।” दोसर शब्द मे, ई कहैत अछि जे, यदि अहाँ पसन्द आर नापसन्द सँ मुक्त होबय चाहैत छी, त अहाँ केँ शरीर केँ “स्वयं केर” (अपन) नहि मनबाक चाही ।

‘हम’ आ ‘हमर’ केर भाव सँ उत्पन्न होयबला जीवात्मा केर भाव केँ तीन प्रकार सँ वर्गीकृत करबाक प्रथा छैक: गौणात्मा, मिथ्याात्मा, मुख्यात्मा । श्रेष्ठ (बड़-बुजुर्ग सब) एकटा एकटा श्लोक केर रूप मे रखलनि अछि जेकरा आदि शंकराचार्य सेहो अपन ब्रह्म सूत्र भाष्य मे एकटा उदाहरणक रूप मे उद्धृत कयने छथि:

गौणमिथ्यात्मनोऽसत्वेपुत्रदेहादिबाधनात् ।

सद्ब्रह्मात्माहमित्येवबोधेकार्यं कथं भवेत् ॥ (ब्रह्म सूत्र भाष्य १.१.४)

“हम, हमर बच्चा आ घनिष्ठ मित्र स्वयं हमरहि समान छथि; हुनकर सुख-दुःख सेहो हमरहि थिक ।” ई आसक्ति “गौणात्मा” केर लक्षण थिक । गौण केर अर्थ होइछ एकटा गुण । यद्यपि ई सर्वविदित अछि जे हम, बच्चा आर मित्र सब एक-दोसर सँ भिन्न छी, तैयो हुनका सभक संग एक हेबाक भावना प्रबल होइत अछि । शरीरक प्रति आसक्ति, जे अपन मित्र तथा सम्बन्धी सभक प्रति आसक्ति सँ अधिक निकट आ प्रबल होइत छैक, “मिथ्याात्मा” थिक । जखन व्यक्ति वास्तव मे ई अनुभव करैत अछि जे शुद्ध आत्मा पृथक भ’ गेल अछि आ “हम ब्रह्म मात्र केर एक रूप छी,” तँ ब्रह्म स्वयं आत्मा बनि जाइत छथि । यैह “मुख्यात्मा” छी । यदि पहिल दुइ (गौण व मिथ्या) हँटा देल जाय, तँ बच्चा सब, मित्र सब, शरीर व इंद्रिय सब सँ सम्बन्ध टुटि जायत । तखन ई ज्ञान जागृत होइत छैक जे “हम वास्तव मे ब्रह्म स्वरूप छी” । एहि श्लोक केर तात्पर्य ई छैक जे एहि अबस्था सँ आगाँ किछुओ नहि छैक ।

रामकृष्ण मठ केर वास्ते विवेकानंद द्वारा रचित आदर्श वाक्य “उठू, जागू” केवल कठोपनिषद सँ लेल गेल अछि । आइ प्रचलित कतेको रास आदर्श वाक्य सब उपनिषदहि सब सँ लेल गेल अछि । उदाहरणक लेल:

(१) ई अभिव्यक्ति जे आत्मा तक बुद्धिक माध्यम सँ नहि पहुँचल जा सकैछ

नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्‌ ॥

“ई ‘आत्मा’ प्रवचन द्वारा लभ्य नहि अछि, न मेधाशक्ति सँ, न बहुते शास्त्र सभक श्रवण सँ ‘ई’ लभ्य अछि। ई आत्मा जेकर वरण करैत अछि ओकरहि द्वारा ‘ई’ लभ्य अछि, ओकरहि प्रति ई ‘आत्मा’ अपन कलेवर केँ अनावृत करैत अछि ।

– कठोपनिषद १.२.२३;

(२) ओ मंत्र जे कि बतबैत अछि जे जीव (आत्मा) रथ केर स्वामी थिक, शरीर रथ थिक, बुद्धि सारथि थिक, मन लगाम थिक, इन्द्रिय सब घोड़ा थिक –

आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव च। बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ॥

अपन आत्मा केँ रथी, शरीर केँ रथ, बुद्धि केँ सारथि तथा मनहि केँ लगाम जनबाक चाही ।

– पैंगलोपनिषद् ४.३)

(३) ई तथ्य जे परमपुरुष हृदय केर खोह मे अँगूठाक आकार केर प्रकाश रूप मे निवास करैत छथि;

(४) दीप आराधना (कपूर सहितक दीया जरेबाक) समय जपल जायवला मंत्र: अर्थात्, भगवानक उपस्थिति मे, सूर्य, चन्द्रमा, तारा आ अग्नि सब अपन चमक बिसरि (हेरा लैत) अछि, जेकर अर्थ भेल जे, चूँकि ओ (भगवाने) अपन चमक केर स्रोत छथि, तेँ ई सब (प्रकाशित ब्रह्माण्डीय पिण्ड) ताहि (भगवान् – प्रकाश केर मूल स्रोत) पर प्रकाश नहि डालि सकैत अछि;

(५) चूँकि हमरा लोकनिक दुर्बल बुद्धि महाबुद्धि सँ उत्पन्न भेल अछि, ताहि लेल हम सब हुनका बौद्धिक रूप सँ नहि बुझि सकैत छी;

(६) ओ उलटा वृक्ष जेकर उल्लेख भगवान कृष्ण गीता मे कयलनि अछि – संसार या सांसारिक अस्तित्व केर अश्वत्थ वृक्ष;

(७) ई तथ्य जे यदि हृदय सँ उत्पन्न सबटा इच्छा सब नष्ट भ’ जाय, त मनुष्य एतहि आर तखनहिं अमर भ’ जाइत अछि तथा ब्रह्म केर आनन्दक आस्वादन करैत अछि ।

ई सबटा बात जे आइ-काल्हि अक्सर उद्धृत कयल जाइत अछि, से कठोपनिषद सँ अछि ।

प्रश्न, मुंडक तथा मांडूक्य

कठोपनिषद केर बाद आबयवला तीन गोट उपनिषद, प्रश्न, मुंडक तथा मांडूक्य, अथर्ववेद सँ सम्बन्धित अछि । प्रश्न केर अर्थ अछि प्रश्न पुछब आ जवाब ताकब । सृष्टिक शुरुआत केना भेलैक ? देवता के छथि ? जीवन शरीर सँ केना जुड़ैत अछि ? जाग्रत, सुषुप्ति आर स्वप्न केर अवस्था सभक सत्य कि अछि ? ओंकार केर उपासनाक कि लाभ छैक ? पुरुष आर जीव केर बीच कि सम्बन्ध अछि ? चूँकि ई एहि छह गोट प्रश्न सभक  उत्तर दैत अछि, ताहि सँ एहि उपनिषदक नाम प्रश्नोपनिषद अछि ।

मुंडक केर अर्थ होइछ केश मुडायल माथ – मुंडन (संस्कार) । मुण्डकोपनिषद् केर पालन संन्यासी जेकाँ परिपक्व मन आर आसक्ति सँ मुक्त स्वभाववला लोक केँ करबाक चाही । ई उपनिषद् अक्षर ब्रह्म केर चर्चा करैत अछि, जेकर अर्थ छैक ओ जे क्षय या विलय सँ मुक्त अछि । “अक्षर” केर अर्थ ध्वनि या अक्षर सेहो होइत छैक । हम सब पंचाक्षर (पाँच अक्षर) आर अष्टाक्षर (आठ अक्षर) केर बात करैत छी । प्रणव (ओंकार) अक्षर केर मूल अछि । लक्ष्य या उद्देश्य, जेकरा अक्षर ब्रह्म कहल जाइछ, ततय धरि पहुँचबाक लेल अक्षर या ‘ॐ’ अक्षर मुख्य भूमिका निभबैत अछि । ई उपनिषद् कहैत अछि जे आत्मा केर बाण केँ ओंकारक धनुष द्वारा ब्रह्म केर लक्ष्य धरि बिना डगमगेने छोड़ल जेबाक चाही जाहि सँ ओ (बाण तथा लक्ष्य) संयुक्त भ’ एक भ’ जाय ।

प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्मतल्लक्ष्यमुच्यते ।
अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत् तन्मयो भवेत् ॥ ४॥

‘ॐ’ धनुष थिक; आत्मा तीर थिक; ब्रह्म केँ चिह्न कहल गेल अछि । एकरा अविचलित मन द्वारा छोड़बाक अछि । तखन आत्मा ब्रह्म केर संग एक भ’ जाइत अछि, जेना तीर लक्ष्यक संग एक भ’ जाइछ ।

– मुंडकोपनिषद २.४

इहो बात एहि उपनिषद मे अछि जाहि सँ निम्नलिखित कल्पना प्रकट होइछः

जीवात्मा आर परमात्मा शरीर नामक पिपरक गाछ पर रहयवला दुइ गोट चिड़ैयाँ थिकथि । जीवात्मा पक्षी (कार्यक) फल खाइत अछि जखन कि परमात्मा पक्षी केवल साक्षी बनल रहैत छथि ।

वर्तमान मे अपन देशक आदर्श वाक्य (सत्यमेवजयते) – सत्य केर मात्र जीत होइत छैक – मुंडक उपनिषद केर एक मंत्र थिक ।

सत्यमेव जयते नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयानः ।
येनाक्रमन्त्यृषयो ह्याप्तकामा यत्र तत्‌ सत्यस्य परमं निधानम्‌ ॥

‘सत्य’ केर मात्र विजय होइत अछि असत्य केर नहि; ‘सत्य’ केर द्वारा मात्र देवलोकक यात्रा-पथ विस्तीर्ण भेल, जेकरा द्वारा आप्तकाम ऋषिगण ओतय आरोहण करैत छथि जेतय ‘सत्य’ केर परम धाम अछि ।

– मुंडकोपनिषद ३.६

एतय ओहि संन्यासी सभक बारे मे सेहो एकटा मंत्र छैक जे एहि जीवन मे जीवन-मुक्त छथि तथा शरीर सँ मुक्त भेला पर (मृत्युक बाद) सेहो मुक्तहि रहैत छथि । संन्यासी लोकनि केँ पूर्ण कुंभ (जल सँ भरा घैला) सँ सम्मानित करैत समय ई मंत्र उच्चारित कयल जाइछ । एहि उपनिषद मे कहल गेल छैक जाहि प्रकारे अनेकों नावधारी नदी सब समुद्र मे खसलाक बाद अपन अलग पहिचान (अस्तित्व-नाम) हेराकय समुद्र बनि जाइत अछि, ताहि प्रकारे ज्ञानी सेहो अपन नाम आर रूप हेराकय परम पुरुष मे एकाकार भ’ जाइत छथि ।

यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रेऽस्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय ।
तथा विद्वान् नामरूपाद्विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥

– मुंडकोपनिषद ३.८

ऐगला अछि माण्डूक्य उपनिषद । माण्डूक केर अर्थ अछि बेंग । एकरा बेंग उपनिषद कियैक कहल जाइत छैक ? एकर कारण ई प्रतीत होइत अछि जे बेंग केँ सब (प्रत्येक) सीढ़ी नहि चढ़य पड़ैछ । ओ पहिल सँ चारिम सीढ़ी धरि फाँगि सकैत अछि । ई उपनिषद जागृति, स्वप्न (सपना) आर सुषुप्ति (निद्रा) केर तीन अबस्था सब केँ पार कय केँ ‘तुरीय’ या चारिम अबस्था धरि पहुँचबाक मार्ग बतबैत अछि । एहि मे कहल गेल छैक जे ओंकारक आराधना सँ एक्कहि फाँग मे अन्तिम अबस्था धरि पहुँचल जा सकैत अछि । कि यैह लेल बेंग उपनिषद कहल जाइत छैक ?

किछु लोक कहैत छथि जे ई उपनिषद ओहि जनजाति सब सँ सम्बन्धित छल जे सब बेंग केँ प्रतीक (माण्डूक्य) केर रूप मे अपनौने रहथि । ईहो कहल जाइत अछि जे जाहि ऋषि केँ ई उपनिषदक रहस्योद्घाटन भेल छलन्हि, ओ बेंगहि रूप मे (स्वयं देव) ‘वरुण’ रहथि ।

ई सारा उपनिषद मे सबसँ छोट अछि । एहि मे केवल बारह टा मंत्र छैक । लेकिन, प्रसिद्धि आर प्रभावकारिताक कारण, एकर एक विशेष स्थान छैक । ई प्रणव केर चारू भाग केर उपयोग कयकेँ एहि सिद्धान्त केँ स्थापित करैत अछि जे जीवात्मा आर परमात्मा एक्के छथि । ई चारिम आ अन्तिम चरण केँ “शिवम अद्वैतम्” (सुन्दर आर बिना कोनो क्षण केर) रूप मे वर्णित करबाक लेल सेहो प्रसिद्ध अछि, जेतय अन्ततः सारा सृष्टि सिमटि जाइत अछि ।

नान्तःप्रज्ञं न बहिष्प्रज्ञं नोभयतःप्रज्ञं न प्रज्ञानघनं न प्रज्ञं नाप्रज्ञम्‌।
अदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणमचिन्त्यमव्यपदेश्यमेकात्मप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः ॥

ओ न अन्तःप्रज्ञ छथि न बहिष्प्रज्ञ छथि, न उभय-प्रज्ञ अर्थात् अन्तः एवं बहिष्प्रज्ञ एक्के संग (संयुक्त) छथि, न ओ प्रज्ञान-घन छथि, न प्रज्ञ (ज्ञाता) छथि, न अप्रज्ञ (अज्ञाता) छथि । ओ जे अदृष्ट छथि, अव्यवहार्य छथि, अग्राह्य छथि, अलक्षण छथि, अचिन्त्य छथि, अव्यपदेश्य अर्थात् अनिर्देश्य छथि, ‘आत्मा’ केर ऐकान्तिक अस्तित्वक बोधहि जेकर सार अछि, ‘जाहिमे’ समस्त प्रपञ्चात्मक जगत् केर विलय भ’ जाइत अछि, जे ‘पूर्ण शान्त’ छथि, जे ‘शिवम्’ छथि – मंगलकारी छथि, आर जे ‘अद्वैत’ छथि, ‘हुनकहि’ चतुर्थ (पाद) मानल जाइत छन्हि; ‘वैह’ छथि ‘आत्मा’, एकमात्र ‘वैह’ ‘विज्ञेय’ (जानय योग्य तत्त्व) छथि ।

– माण्डुक्योपनिषद् ५.७

आदि शंकर केर गुरुक गुरु जिनका ‘गौड़पादाचार्य’ कहल जाइत छन्हि, से “माण्डुक्य उपनिषद कारिका” मे एहि उपनिषदक विशद व्याख्या कयलनि अछि । आदि शंकराचार्य एहि उपनिषद कारिका पर एकटा भाष्य लिखलनि अछि ।

तैत्तरीय उपनिषद

कोनो आन उपनिषदक तुलना मे, एहि उपनिषदक व्यापक अध्ययन कयल जाइत अछि । अधिकांश अनुष्ठान (कर्मानुष्ठान) सब मे प्रयुक्त मंत्र एहि उपनिषद सँ लेल गेल अछि । शिक्षावल्ली, आनन्दवल्ली आर भृगुवल्ली एहि उपनिषदक तीन भाग थिक ।

शिक्षावल्ली शिक्षा प्रदान करबाक विविध पहलु सब सँ सम्बन्धित अछि । ई भाग ब्रह्मचर्य मे निहित संयम सब केँ नियंत्रण तथा ओकर महिमा, वेदक अध्ययनक क्रम, प्रणव केर उपासना आदिक शिक्षा दैत अछि । आवाहन्ति होम, जेकरा गुरु एहि आह्वानक संग करैत छथि जे शिष्य बिना कोनो संयम केँ आबय आर वेद ग्रहण करय, एहि उपनिषद सँ अछि ।

“सत्य बाजू”, “धर्मक पालन करू” (सत्यं वद, धर्मं चर) जेहेन उपदेश केवल एहि उपनिषद मे अबैत अछि । वेदक अध्ययन आर अपन धर्मक पालन कखनहुँ नहि छोड़बाक चाही । संसार मे यैह चिरस्थायी बनेने रखबाक लेल, लोक केँ विवाह करबाक चाही आर सन्तान उत्पन्न करबाक चाही जाहि सँ धर्मक मशाल आगू बढ़ायल जा सकय, या जेना कि उपनिषद मे कहल गेल अछि, निरन्तरताक सूत्र केँ तोड़ने बिना एना करबाक चाही । माता, पिता, गुरु और अतिथि लोकनि केँ देवताक समान मनबाक ​​चाही । (मातृ देवो भव, पितृ देवो भव, आचार्य देवो भव) – ई मंत्र केवल एतहि भेटैत अछि । एहि उपनिषद केर शिक्षा सब मे दान तथा कर्तव्य (धर्म) केर गुणक गुणगान कयल गेल अछि ।

एहि उपनिषदक ओ भाग जाहि मे ब्रह्मानंद मे परिणत होयबला आनन्द केर आरोही क्रम केर समावेश रहल आनन्दवल्ली छैक । अन्नमय कोष (भोजनक आवरण) ओ शरीर थिक जे पोषण पर पोसाइत अछि; प्राणमय कोष (जीवन) जे एकरा अन्दर सांस लैत अछि; मनोमय कोष (मन) जे विचार सभक निर्माण करैत अछि; आर, एकर अन्दर, विज्ञानमय कोष (ज्ञान), जे सही आ गलत मे अन्तर करैत अछि, ई चारि टा कोष अछि । आनन्दमय कोष एकर मूल मे छैक । उपनिषदक एहि भाग मे ई कहल गेल अछि जे आत्मा कोन तरहें अपन प्राकृतिक तत्व एवं आनन्दक अबस्था मे एतय निवास करैत अछि ।

प्रत्येक कोश केँ एकटा पक्षीक रूप मे ‘मानवीकृत’ कयल गेल अछि तथा शिक्षा सब रूपकात्मक रूप सँ पक्षीक माथ, बायाँ पाँखि, दायाँ पाँखि, शरीर तथा पूँछ आदिक वर्णन करैत अछि । बहुधा उद्धृत “यतो वाचो निवर्तन्ते” आर “जाहि व्यक्ति द्वारा ब्रह्म केर ओहि आनन्दमय अवस्था केँ प्राप्त कयल गेल अछि, जेतय पहुँचने बिना वाणी आ मन घुरि जाइत अछि, ओकरा कोनो बातक भय नहि छैक” जेहेन मंत्र एहि उपनिषद मे अबैत अछि ।

“यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह । आनंदं ब्रह्मणो विद्वान् न बिभेति कदाचन ॥”

भृगुवल्ली ओ थिक जे वरुण अपन पुत्र भृगु केँ सिखौने रहथि । यद्यपि सिखेनाय (उपदेश देनाय) जेहेन शब्दक प्रयोग कयल गेल अछि, एकर अर्थ ई नहि छैक जे गुरुए द्वारा सबटा पाठ केँ लिखबाओल गेल छल । गुरु, वरुण, अपन पुत्र केँ व्यक्तिगत रूप सँ गहन अन्वेषण (गहींर खोज) करबाक आ ओकर गहन परिणाम सब केँ प्रत्यक्ष अनुभव करबाक लेल प्रोत्साहित करैत छथि । एहि तरहें भृगु स्वयं तपस्या करैत छथि आ सर्वप्रथम अन्नमय कोष अर्थात् शरीर केँ परम सत्य मानैत छथि, मुदा अपन तपस्या केँ आगू निरन्तरता दैत ओ क्रमशः प्राणमय (जीवन), मनोमय (मन) तथा विज्ञानमय (ज्ञान) नामक प्रत्येक अवस्था सँ उपर उठैत छथि तथा आनन्दमय अबस्था – आनन्दमय – धरि पहुँचैत छथि, ओ अबस्था जेतय अनुभव द्वारा हुनका ई ज्ञात होइत छन्हि जे आनन्द टा परम सत्य थिक ।

एकर अर्थ ई नहि अछि जे उपनिषद सामान्य सांसारिक जीवन केँ तुच्छ मानैत अछि जे शरीर – अन्नमय – केर स्तरहि पर रुकि जाइत अछि । सांसारिक लक्ष्य सभक पाछाँ करिते लोक केँ सर्वोच्च सत्य केँ बुझबाक चाही ।

धार्मिक जीवन जिबिते, एहि जीवन केँ एकटा साधन (उपाय) केर रूप मे मानबाक ​​चाही – मानू उच्चतर अबस्था धरि पहुँचय केर एकटा साधन छी । ताहि हेतु आनन्दक अबस्था – आनन्दमय कोष – धरि पहुँचलाक बाद, उपनिषद ई उद्घोषणा करैत अछि जे “भोजन केँ तुच्छ नहि बुझी; भोजन केँ बर्बाद नहि करू; अधिक अन्न उपजाबी” इत्यादि । ग्रन्थ एहि प्रकारे समाप्त होइत अछि: “ज्ञानी सोचैत अछि जे वैह भोजन छी, ओ जे ओकरा खाइत अछि, ओ जे भोजन आ ओकर भक्षक केर बीच सम्बन्ध स्थापित कयलक अछि आ ओ एहि विचार सँ प्रसन्नतापूर्वक गबैत अछि जे ईश्वर आ ओ सेहो एक्के छी ।”

ऐतरेय उपनिषद

ऐगला उपनिषद ऐतरेय अछि, जे ऐतरेय आरण्यक केर अन्त मे अबैत अछि । एकरा ई नाम एहि लेल देल गेल छैक कियैक तँ एकर प्रयोग इतरेय नामक ऋषिक माध्यम सँ भेल छलैक । ई उपनिषद एहि बातक वर्णन करैत छैक जे जीव कोन प्रकारे पिता सँ माताक गर्भ मे प्रवेश करैछ, फेर संसार मे जन्म लैछ, पाप-पुण्य केर अनुसार विभिन्न लोक सब मे बेर-बेर जन्म लैछ आ कोन प्रकारे आत्माक स्वरूप केँ जनला मात्रे सँ जन्म आर जीवन सँ मुक्ति सम्भव छैक । एहि मे बतायल गेल छैक जे केना वामदेव नामक एक ऋषि अयलाह आर ओ सब देवाल केँ नांघिकय आकाश सँ ऊँच उड़ान भरयवला पतंग जेकाँ मुक्ति केर दिशा मे उड़ान भरलनि । एहि उपनिषद मे प्रज्ञान या आत्माक वास्तविक मानसिक अनुभव केर ऊँच शब्द मे वर्णन कयल गेल अछि । ई कहनाय सही नहि अछि जे ब्रह्म केर अनुभूति विचार केर एहेन प्रक्रिया सँ होइछ । “विचारे (प्रज्ञाने) ब्रह्म थिक” ऋग्वेद केर सबसँ महत्वपूर्ण सन्देश अछि ।

छांदोग्य उपनिषद

दस उपनिषद मे सँ अन्तिम दुइ, छांदोग्य और बृहदारण्यक, आकार मे बहुत पैघ अछि । ई दुनू मिलिकय शेष आठो उपनिषद सब सँ पैघ अछि ।

सामवेदक छांदोग्य ब्राह्मण मे जे लिखल अछि, से छांदोग्य उपनिषद थिक । ‘छांदोग्य’ केर अर्थ अछि साम गान करयवला ।

कहल जाइत अछि जे जाहि तरहें भगवद्गीता मे कठोपनिषदक व्यापक रूप सँ प्रयोग कयल गेल अछि, तहिना छांदोग्य उपनिषदक मंत्र व्यास केर ब्रह्म सूत्र लेल मुख्य प्रमाण थिक ।

छांदोग्य आ बृहदारण्यक मे कतेको ऋषि लोकनिक संयुक्त सन्देश समाहित अछि ।

आरम्भ मे, छांदोग्य ‘ओंकार’ केँ उद्गाता नाम देलक अछि आर एकर अध्ययन (उपासना) केर विस्तृत विवरण देलक अछि । अनेकों विद्या या अनुशासन सभक उल्लेख भेटैत अछि, जेना अक्षि विद्या – आकाश विद्या, मधु विद्या, सांडिल्य विद्या, प्रामा विद्या, पंचाग्नि विद्या, आदि । ई विभिन्न तरीका सँ परमात्मा तत्व केँ बुझय मे सहायता करैत अछि ।

शीर्ष पर दहार विद्या प्रकट होइत अछि । जीव (आत्मा) अपना भीतरक छोट टा आकाश मे ओहि असीम आकाशीय विस्तारक साक्षात्कार करैत अछि जे दहार विद्या मे परमात्मा छथि ।

एहि उपनिषद मे सत्यक उपदेश अनेक रोचक कथा सभक माध्यम सँ देल गेल अछि । छांदोग्य उपनिषद मे सत्यकामक कथा अबैत अछि, जे एकटा एहेन बालक छल जे अपन वंश केँ नहि जनैत छल, मुदा ओ एहि तथ्य केँ नुकौलक नहि । परिणामस्वरूप, गौतम ओकरा उत्तम ब्राह्मण कुल केर बुझलनि तथा ओकरा अपन शिष्य बना लेलनि । सत्यकाम केर पूर्व गुरु ओकर अनेकों परीक्षा सब लेने रहथि । एतय तक कि हुनकर (गुरुक) पत्नी सेहो सत्यकाम दिश सँ मध्यस्थता करैत छथि । जखन ई सब उपनिषद मे देखल जाइत अछि, तखन एना लगैत अचि मानू उपनिषद प्राचीन गुरुकुल जीवन केँ चलचित्र जेकाँ हमरा सभक सोझाँ प्रस्तुत कय दैत अछि । सत्यकामक ठीक विपरीत, ब्रह्मचारी श्वेतकेतु, जे ज्ञानक अभिमान सँ फूलैत नहि समाइत रहय, ओकरा पहिने ओकर पिता उदालक आरुणि विनम्र बनौलनि आ अन्त मे ओकरा जीव तथा ब्रह्म केर बीच अभेदक उपदेश देलनि, जे “तत् त्वम् असि” (ओ तोंही थिकेँ) केर उक्ति मे निहित अछि । यैह ओ बिन्दु थिक जेतय सामवेदक महावाक्य या सर्वोच्च सन्देश उच्च स्वर केँ छुबैत अछि । श्वेतकेतुक विपरीत, महर्षि नारद आत्माक सत्य केँ बुझबाक लेल व्यर्थ मे संघर्ष कय रहल छलथि, जखन कि ओ सबटा शास्त्र केँ त्रुटिरहित रूप सँ सिखि लेने छलाह । ओ ऋषि सनत्कुमार द्वारा एहि रहस्य केर शिक्षा लेने रहथि से एहि उपनिषद मे अछि । तैत्तरीय जेकाँ, जे अनामय कोष (शरीर) सँ शुरू भ’ कय विषय केँ आरो ऊँच उठबैत अछि, सनत्कुमार सेहो आहार शुद्धि सँ शुरू कय केँ मन/आत्माक शुद्धि धरि जाइत छथि, जेतय बन्धन टूटत आर तखन आत्मानन्दक प्राप्ति होयत ।

बृहदारण्यक

बृहदारण्यक उपनिषद सब उपनिषद में सबसँ पैघ अछि । ‘बृहदा’ केर अर्थ अछि पैघ । सामान्यतः एकटा उपनिषद आरण्यकक अन्त मे अबैत अछि । एकर अपवादक रूप मे, ईशावास्य उपनिषद शुक्ल यजुस् संहिते मे अबैत अछि । ओहि शुक्ल यजुस् मे, एकटा सम्पूर्ण आरण्यक केर रूप मे (बादवला भाग केर बदला सम्पूर्ण आरण्यक), बृहदारण्यक उपनिषद थिक ।

एकर दुइ गोट संस्करण अछि । एक माध्यंदिन शाखा मे अछि तथा दोसर काण्व शाखा मे । आदि शंकराचार्य काण्व शाखाए केर संस्करण पर भाष्य लिखलनि अछि ।

एहि मे छह गोट अध्याय अछि । पहिल दुइ केँ मधु कांड कहल जाइत छैक; ऐगला दुइ केँ याज्ञवल्क्य केर नाम पर मुनि कांड कहल जाइत छैक आ अन्तिम दुइ केँ खिल कांड कहल जाइत छैक ।

मधु केँ आनन्दक मधुर रसमय अबस्थाक रूप मे लेल जा सकैत अछि । यदि ई बुझि लेल जाय जे सब किछु परमात्माएक अभिव्यक्ति थिक, तँ जीवन केँ ई समूचा संसार मधुक समान मधुर लगतैक । जीव सेहो संसारक लेल मधुर होयत । मधु कांड मे एहि विषय पर चर्चा कयल गेल अछि ।

एहि उपनिषद मे आत्मा केँ नकारात्मक रूप सँ वर्णन “ई नह, ई नहि” केर रूप मे कयल गेल अछि – अर्थात एकरा ई या ओ नहि कहल जा सकैत अछि (४.४.२२) । ई हमरा सब केँ ज्ञात कोनो पदार्थक समान नहि अछि । एकरा ‘नेति नेति’ वाद या नकारात्मक तर्क कहल जाइत अछि । परन्तु संयोजन केर व्याकरणिक नियम मुताबिक, न + इति (ई नहि) मिलिकय ‘नेति’ बनि जाइत अछि जेकर अर्थ भेल ‘ओ जेकर वर्णन नहि कयल जा सकय । ‘नेति सिद्धान्त’ केर अनुसार, पहिने संसार, शरीर आर मन केर त्याग करय पड़त आर आत्मा केँ शब्द सब द्वारा वर्गीकरण या वर्णन सँ परे (उपर) अनुभव करय पड़त । एहि अनुभूतिक बाद, भाव या अनुभूति ई होयत जे ई दृश्य जगत आर सब प्राणी सेहो आनन्दरस या आनन्दक रस सँ बनल अछि ।

बृहदारण्यक केर आरम्भ “असतो मा सत् गमय” मंत्र सँ होइत अछि, जेकरा आइकाल्हि प्रार्थनाक रूप मे दोहरायल जाइत छैक । एकर अर्थ भेल: “हमरा नाशवान सँ अविनाशी दिश लय चलू” ।

पहिल सर्ग (काण्ड) एहि बातक वर्णन करैत अछि जे गार्ग्य नामक ब्राह्मण क्षत्रिय राजा अजात शत्रु सँ कोन तरहें शिक्षा प्राप्त कयलनि । एहि उपनिषद सँ ज्ञात होइत अछि जे अजात शत्रु आर जनक जेना राजा ब्रह्म ज्ञानी या सिद्ध आत्मा छल । एहि प्रकारे, गार्गी (एक महिला) केर सन्दर्भ सँ, जे जनक केर विद्वत्सभा मे ऋषि सभक संग समान स्तर पर चर्चा मे भाग लेने छलिह, हमरा सब केँ पता चलैत अछि जे स्त्री सब सेहो ब्रह्म वादिनी छलिह – जे ब्रह्म केर स्वरूप पर चर्चा करय मे सक्षम रहथि । एहि उपनिषद मे याज्ञवल्क्य केर दुइ गोट पत्नी वर्णित छथि, जाहिमे सँ एकटा कात्यायनी संसारक एक साधारण स्त्री रहथि आर दोसर मैत्रेयी ब्रह्मवादिनी (दार्शनिक) रहथि । याज्ञवल्क्य द्वारा मैत्रेयी केँ देल गेल उपदेश एहि उपनिषद मे मधुकाण्ड आर मुनिकाण्ड केर रूप मे दुइ बेर दोहरायल गेल अछि, लेकिन दुनू मे कनेक अन्तर अछि । ई एकटा उपाख्यान आ दर्शन केर एकटा सुन्दर मिश्रण अछि ।

याज्ञवल्क्य घर छोड़िकय संन्यासी बनबाक निश्चय करैत छथि तथा अपन संपत्ति दुनू पत्नी सभक बीच बाँटि दैत छथि । कात्यायनी संपत्ति केर अपन हिस्सा सँ सन्तुष्ट छथि । लेकिन मैत्रेयी पुछैत छथिन: “अहाँ संन्यास केवल एहि लेल लियय जा रहल छी कियैक तँ ई एहि सम्पूर्ण संसारक संपत्ति सँ बेसी सुख प्रदान करैत अछि । ओहि सुख केर स्वरूप कि अछि ? अहाँ हमरा ई कियैक नहि बताबैत छी ?” याज्ञवल्क्य उत्तर दैत अछि, “अहाँ हमरा सदैव प्रिय रहल छी । एहि प्रश्न सँ, अहाँ हमरा आरो प्रिय भ’ गेल छी,” आर एहि प्रकारे उपदेश देनाय शुरू करैत छथि ।

ओ ‘प्रिय’ (प्रेम) आर लगावक अवधारणा पर विस्तार सँ प्रकाश दैत छथि । “पत्नी केर पतिक प्रति जे प्रेम अछि, पति केर पत्नीक प्रति जे प्रेम अछि, ओहि प्रकारे बच्चा सभक प्रति जे प्रेम अछि, धन केर प्रति जे प्रेम अछि – ई सब प्रकारक प्रेम वस्तुतः पति, पत्नी, बच्चा या धन सँ उत्पन्न नहि होइछ, अपितु प्रेम कयला सँ आत्म-संतुष्टि होइत छैक । प्रेमक भावना मे व्यक्ति लिप्त होइत अछि, कियैक तँ एहि आत्मा केँ सुख भेटैत अछि । त कि एकर अर्थ ई नहि भेल जे आत्माक स्वरूप प्रेम, सुख अछि ? एकरा एकान्त मे सिखबाक लेल, एखन धरि जे सब नजदीक आ प्रिय रहल अछि, ओकरा त्यागिकय संन्यासी बनय पड़त । एकर स्वरूप जनलाक बाद, ई स्पष्ट भ’ जायत जे एकर अतिरिक्त आर किछुओ नहि अछि । सब समान रूप सँ प्रिय भ’ जायत । पहिने जखन कोनो वस्तुक प्रति आसक्ति रहय, त आन विविध वस्तु सभक प्रति अरुचि प्रकट होइत छल । यदि आब एहि सब केँ बिच्चहि मे छोड़ि देल जाय आ आत्मा सँ साक्षात्कार भ’ जाय, त भेद (ऊँच-नीच) केर भाव मेटा जायत । सब आत्माक अभिव्यक्ति प्रतीत होयत, आर कोनो वस्तु सब प्रति अरुचिक स्थान पर, सभक प्रति प्रेमक स्थान लय लेत ।” एहि प्रकारक शिक्षा देल गेल अछि ।

मुनि काण्ड बतबैत अछि जे संन्यासी बनय सँ पहिने याज्ञवल्क्य राजा जनकक सभा मे कहोला, उद्दालक आरुणि, गार्गी आदिक संग दार्शनिक चर्चा कएने रहथि तथा बाद मे ओ राजा जनक केँ सेहो ज्ञान प्रदान कएने रहथि । अन्तर्यामी (परमात्माक सूक्ष्म आंतरिक अस्तित्व) केर सिद्धान्तक प्रमाण, जे विशिष्ट अद्वैत दर्शन (रामानुज केर संशोधित अद्वैतवाद) केर प्रमुख विशेषता थिक, याज्ञवल्क्य द्वारा उद्दालक आरुणि केँ देल गेल उत्तर मे निहित अछि । एहि सिद्धान्तक सार ई अछि जे अद्वैतक विपरीत, जे सम्पूर्ण प्रत्यक्ष जगत केँ माया मानैत अछि, यदि जगत केँ शरीर मानल जाय, तँ परमात्मा ओहि मे प्राणक समान निवास करैत छथि । यद्यपि याज्ञवल्क्य किछु हद तक एकरा सीमित रूप सँ स्वीकार करैत छथि, अधिकतर पूर्ण अद्वैतहि केर बात करैत छथि । मैत्रेयी केँ देल गेल अपन उपदेश सभक समापन करैत समय, ओ पूर्णतः अद्वैतवादी छथि ।

“कोनो ‘वस्तु’ दृष्टि, श्रवण, स्वाद, गन्ध तथा विचारक अनुभूति केना उत्पन्न कय सकैत अछि, ओकरा देखल, सुनल, चाखल, सूंघल आर विचारल जा सकैत छैक आ सेहो कोन माध्यम सँ ?” – एहि तरहें ओ अविभाजित एकात्मक भाव केर बात करैत अछि । जनकहु केँ ओ अद्वैत केर प्रतिपादन करैत छथि ।

एहि उपनिषद केर अन्तिम दुइ गोट अध्याय विभिन्न स्थान सब पर छिटायल रहल अनेकों सन्देश सब केँ समेकित करैत (समेटैत) अछि आ यैह लेल ‘खिला काण्ड’ कहल जाइत अछि । (जँ कोनो वस्तु बिखरल छैक, तँ ओकरा ‘खिला’ कहल जाइत छैक । अखिल केर अर्थ अछि बिखरल अवस्था मे नहि, बल्कि एक साथ ।)

खिला काण्ड मे एकटा उपाख्यान एहि बात सँ सम्बन्धित अछि जे साधक सब केँ सापेक्ष गुणक आधार पर, एकेटा संदेश केर तीन अलग-अलग व्याख्या केना कयल जा सकैत छैक । देवता, मनुष्य आर असुर, प्रजापति सँ निर्देश मँगैत छथि । ओ अपन शिक्षाक रूप मे एकटा शब्द ‘द’ प्रदान करैत छथि । जाहि देवता सब मे आत्म-संयमक अभाव होइत छन्हि, ओ सब एकर अर्थ “दमयत” अर्थात् नियंत्रण या संयम मानैत छथि । मनुष्य, जेकर स्वभाव संपत्ति संचय करब होइछ, ‘द’ केँ दानक रूप मे लैत छथि । असुर, जिनकर स्वभाव क्रूरतापूर्ण छन्हि, ‘द’ केँ “दयात्वम्” अर्थात् दया या करुणाक सूचक मानैत छथि ।

बृहदारण्यक उपनिषद केर अन्त मे एकटा मंत्र अबैछ जे हमरा मोहितो करैत छल आ सान्त्वना सेहो दैत छल । ई मंत्र कि कहैत अछि ?

यदि कोनो रोगी ज्वर सँ पीड़ित रहय, त ओकरा लेल ओ रोग महान तप मानल जा सकैत अछि । यदि कियो रोग आर विपत्ति केँ एहि प्रकारे बुझि लियए, त ओ मृत्युक पश्चात स्वर्ग केँ प्राप्त होयत, एना एहि मंत्र मे कहल गेल छैक (ब्रह्मउपनिषद ५.११.१) ।

ई बात बुझय मे नहि अबैत अछि । एतय कि कहल जा रहल छैक या केहेन सान्त्वना देल जा रहल छैक ? हम बुझबैत छी ।

व्रत (स्व-निर्धारित तप) द्वारा शरीर केँ संस्कारित कयला सँ नहि केवल शरीरक प्रति अत्यधिक प्रेम सँ मुक्ति भेटैत छैक, बल्कि पूर्व पाप सभक प्रायश्चित सेहो होइत छैक । तप या कठोर तपस्या पूर्वजन्म सभक पाप केर प्रायश्चित छी । शरीर द्वारा पूर्व मे कयल गेल पाप सभक प्रायश्चित केवल शारीरिक कष्टहि टा सँ करय पड़ैत छैक ।

ताहि लेल पुराण सब मे उन्नत आत्मा सब द्वारा सेहो तप करबाक चर्चा भेटैत अछि ।

स्वयं देवी माँ अम्बिका परमेश्वर केर सलाह पर ध्यान नहि दय केँ दक्ष द्वारा कयल जा रहल यज्ञ मे भाग लेलिह । हुनका अपमानित होबय पड़लनि आ ओ अपन शरीर त्यागि देलिह । ओ पुनः हिमालय केर स्वामी हिमवानक पुत्रीक रूप मे प्रकट भेलिह । हुनका विश्वास रहनि जे जाबत धरि ओ अपन पतिक सलाहक अवहेलना करयवला अपन पूर्व पापक उचित प्रायश्चित नहि करती, ताबत धरि हुनका फेर सँ वैह पति नहि भेटि पओता । कालिदास “कुमार संभवम्” मे एकर सुन्दर आर मार्मिक वर्णन कयलनि अछि । शीतकाल मे हिमालयक चोटी सब कतेक ठंढा होइत हैत । ओ बर्फक सिल्ली सब बैसिकय या झील सभक ठंढा पानि मे ठाढ़ भ’ कय तपस्या करैत छलिह । ग्रीष्म ऋतु मे, तपैत रौद मे, ओ अपना चारूकात आइग प्रज्वलित करैत छलिह आर वैह उद्देश्य सँ बीच मे बैसैत छलिह । चूँकि चारू दिशक चारि आइग केर अतिरिक्त उपर जरैत सूर्य सेहो छल, ताहि लेल एकरा “पंचाग्नि तप” कहल जाइत छैक । अनेकों महापुरुष सब एहि प्रकारक तपस्या कयलनि अछि ।

हमरा सब मे नहि तँ हुनकर तपस्याक एक करोड़मो भाग करबाक इच्छाशक्ति अछि आ नहिये तेहेन क्षमता । फेर हमरा सभक पाप केना धुआयत ?

टाइफाइड, निमोनिया आर एहने आर ज्वर जेकर तापमान १०५, १०६ डिग्री फ़ारेनहाइट होइत छैक, शरीर केँ असहनीय गर्मी सँ तबाह कय दैत अछि । नीक अछि जे ईश्वर हमरा लेल ई ज्वर पठेलनि अछि कियैक तँ हम पंचाग्नि नहि कएने छी – यैह हमरा लेल सान्त्वना हेबाक चाही ।

तेँ कोनो बीमारी या चोट केँ तप बुझबाक चाही – ओ तप नहि जेकरा हम स्वेच्छा सँ कयलहुँ अछि, बल्कि ईश्वर द्वारा हमरा उपर थोपल गेल अछि ।

अभ्यास सँ ई मानसिकता कठोर होबय लागत । एहि प्रकारे हमरा सब मे रोग या बीमारी केँ धैर्यपूर्वक सहबाक क्षमता विकसित भ’ जायत । हमरा सब केँ अपन पैछला अधलाह कर्म सभक प्रभाव केँ नष्ट करबाक लेल स्वतः प्राप्त अवसर केँ अस्वीकार नहि करबाक चाही । हम सब “तितीक्षा” केर ओहि उच्च अबस्था केँ प्राप्त कय लेब जेतय कष्ट, कष्ट जेहेन प्रतीते नहि होयत ।

उपनिषद केर मंत्र यैह सब संक्षेप मे कहैत अछि । ई मंत्र ओहि समय ईश्वर द्वारा हमरा सब केँ देल गेल ओहि मलहम जेकाँ काज करैत अछि, जे हमरा सब केँ तपस्याक बदला मे विशेष रूप सँ तखन भेटैत अछि जखन हमरा सब केँ लगैत अछि जे “हमन बहुत बड़का पाप कयलहुँ अछि, लेकिन ओकर प्रायश्चित लेल कोनो व्रत या तप नहि कयर रहल छी, हम सब नहि केवल ओकरा करय मे असफल छी, बल्कि हमरा सब ओ करय मे सक्षमो नहि छी ।”

बृहदारण्यक केर अन्तिम अध्याय मे, जे दस उपनिषदहुक अन्त छी, मानू एहि बात पर ज़ोर देबाक लेल जे वेदान्त कर्मकांड केँ बिल्कुलो विरोधी नहि छी, पंचाग्नि विद्या आ सन्तान – नीक सन्तान – केर इच्छा राखयवला गृहस्थ सभक कर्तव्यक बात कयल गेल अछि ।

हरिः हरः!!

The Ten Upanishads

Adi Sankaracharya selected ten of the Upanishads, called Dasopanishads and wrote Bhaashya or commentary on them. He highlighted the non-dualist (Advaita) doctrine propounded in them. Ramanuja and Madva, who came later, also wrote Bhaashyas on these very ten Upanishads but each of them emphasised their respective doctrines, viz., Visishta-Advaita (qualified non-dualism) and Dvaita (Dualism).

The following sloka enumerates the ten upanishads:

Isa Kena Kathaa Prasna Munda Maandukya Taithari

Aitareyam cha Chaandogyam Brahadhaaranyakam Dasa

Adi Sankara has written his commentary also in the above order of texts.

Eesaavaasya Upanishad

Isa or Eesa is Eesaavaasya Upanishad. It appears at the end of Sukla Yajur Veda Samhita. It is so called because it begins with the words ‘Eesa Vaasyam’. Isaavaasya begins by saying that Iswara  or God pervades the whole world and we should reach the state of relising the ‘Paramaatma Tatva’, by offering the fruit of all actions to Him alone.

Eesaavaasyamidamsarvam Yatikincha Jagatyaam Jagat. Tenatyaktena Bhunjeethaa Magrudhahkasya Sviddhdanam.

This universe, made of living and non-living things, is permeated by God. Humans may use the resources as needed but may not hoard as if ‘this all belongs to me’.

Kenopanishad

‘Kena’ is Kenopanishad. It is also called Talavakaara Upanishad because it appears in the Talavakaara Braahmana of the Jaimini Saakha of Saama Veda. There is a saying “search for what is lost in Kena”. This Upanishad describes how Ambika Heerself, the Divine Mother, imparted divine wisdom to Indra, the King of Devas when the Devatas in their pride could not find the Paramaatma who is without a beginning or end, although they searched high and low. The Paraa Sakti (Ambika) discloses that all our powers are derived from the Mahaasakti or Supreme Power. Adi Sankara, instead of being content with giving word by word interpretation of this Upanishad, as in the case of some of the other Upanishads, has written a separate Bhaashya, sentence by sentence. In other words, this Upanishad has the distinction of earning two Bhaashyas from Adi Sankara. Keeping this Upanishad mainly in view, Adi Sankara says, in the devotional composition on the Divine Mother, the “Soundary Lahari” : “Please keep your feet also on my head, the sacred feet which you have kept on the head of Mother Veda.” Like Vedanta, the Upanishads are also known as Veda Siras or Sruti Siras, i.e., head of the Vedas or head of the Sruti. The Upanishads alone are the concluding potion or end of the Vedas and, at the same time, are the most important (like the head) of all the parts. To say that the feet of the Divine Mother rest on the head of Veda Maata or Mother Veda is tantamount to saying that they rest on the Upanishads.

It is only in the Kenopanishad that the Divine Mother appears in the form of Mother Wisdom. Fittingly with the name of Saama Gaana Priya, which is one of her attributes mentioned ub ‘Lalita Sahasranaama’, Her glory is epecially manifest in this Upanishad from Saama Veda.

If we say, we see an object, duality is established – the object which is seen and the subject who sees it. We are able to perceive our body as an object (objectively). It becomes an object when we say ‘my body is well or ill’. It follows that something calling itself “we” keeping itself as a separate entity as subject, sees an object. This (subject) which sees is the “Aatma”. This “subject” cannot at all be understood or perceived. If it is, then that becomes the real “subject” instead. The real Aatma “we” can never become the object but can only remain as the ‘subject’. Therefore, leaving aside objects such as body and such like this subject called ‘we’ can only exist separately by itself but cannot be made to know it. To know is to posit a separate object. In the case of Aatma this phenomenon is absurd and cannot be established.

If we are to know it, the knower should be different from the Aatma. What can there be in us that is different from the real self? What is there different from Aatma which can know? Nothing. Therefore, in the expressions ‘knowledge of self’, ‘knowing the self’, the act of knowing does not conform to the normal rule of one subject seeing an object.  The act of “experiencing the self by the self’ is referred to as knowing and knowledge. That is why the Kenopanishad says: “one who says he knows the Aatma, knows it not; one who stays at the level of not knowing it, knows it; one who sees it, sees it not; one who cannot see it, can see it.”

Kathopanishad

The Upanishad ‘Katha’ or Kathopanishad or Kathakopanishad appears in the Kathaka Saakha of the Krishna Yajur Veda. It contains the dialogue between the God of Death (Yama) and Nachiketas, a brahmachari boy dealing with the question of what happens to the soul after death. Although it begins like a story, it expounds a great truth. In the Bhagavad Gita, Lord Krishna repeats the very words of this particular Upanishad. For e.g. :

na jāyate mriyate vā vipaścinnāyaṁ kutaścinna babhūva kaścit |
ajo nityaḥ śāśvato’yaṁ purāṇo na hanyate hanyamāne śarīre || (K-II-18)

“That Wise One is not born, neither does he die; he came not from anywhere, neither is he anyone; he is unborn, he is everlasting, he is ancient and sempiternal, he is not slain in the slaying of the body.”

The grains of corn are stripped clean off the stalk in a sheaf. The thin skin is peeled off the coconut leaf to expose te single broom stick. Similarly, from the object which is the body, the Aatma which is the subject should stripped smoothly but firmly and the Aatma should exist by itself. Passion, anger, hate, fear, these belong to the mind and do not belong to the Aatma. Hunger, thirst and such other wants pertain to the body and not to the Aatma. We should, thus, learn to practise to identify all objects and substances which are other than the Aatma. If we constantly practise this way of thinking, the deep-rooted feeling that ‘we’ comprise only the body and mind will start fading and will eventually vanish. We can be the pure Aatma without getting involved with the many impurities which assail the body and mind. We should regard our body clothed in flesh as a sheath situated close to the Aatma. We should train the mind to view the body as an external object.

When we live in this world and when we feel here and now that we exist in the body, we should start the practice of regarding the body as “not I” – “not mine”. Then, it would not be necessary to think in terms of getting liberation after death. Moksha means liberation from all attachment. A liberated soul (Jeevanmukta) is thus one who in this world itself has lost the awareness of the body and finds happiness within himself subjectively (Aatmaaraam) without recourse to outside objects of enjoyment. The supreme purpose of the Vedas and Vedanta is to thus make a man into a liberated soul. Lord Krishna says this very thing in the Bhagavad Gita: “Before the life departs from the body (Praak Sareera Vimokshanat), when living in this world itself, (“ihaiva”), one who controls the forces of passion and anger and becomes steadfast in a state of Yoga (Unison with Paramaatma) enjoys eternal bliss.” That is, whilst living in this world itself, if a person realises the true nature of the Aatma, and has such an experience, it wound not matter even if the body perished, because he had regarded it as not himself or his even when alive. Thus, even before death claimed the body he had given up the body. The term body includes the mind as well. If it is not ours, then death does not matter, as it will not affect us.

Because he gets free from mortality (mrithyu) he becomes immortal (amara). The act of remaining in this state is referred in various mantras such as the Purusha Sookta, which appear in the Karma Kaanda. In the Upanishads, this theme is repeated again and again.

What causes misery to us is the body and through it the mind. The absence of misery and being always blissful is what is called ‘Heaven’ – Moksha – in all religions. All faiths, other than the Advaita doctrine, say that, to enjoy eternal bliss, one has to go to another world. Adi Sankara has proved that whilst living in this world itself by totally giving up bodily attachment and getting deeply rooted in Aatma, one can enjoy great bliss than what is available in the other worlds. In Brahma Sootra Bhaashya (1.1.4) he says: Tadetat asareeritvam mokshaakhyam”. What we commonly understand by Asareeri, is the voice from the skies (without a body). The word ‘Asareer’ only means being without a body. The loss of awareness that ‘I am the body’ is Asareeratvam – the state of being without a body. The Acharya has defined Moksha thus: If desires are gradually reduced, and eventually made extinct, attachment to the body will totally disappear. The soul within will then shine forth. There is no need to go to other worlds for this. This is what the Vedas and Vedanta refer to as ‘Ihaiva-Ihaiva’ – here itself.

The smriti that is Bhagavad Gita says that the two main enemies who stand in the way of our reaching this blissful state are desire and passion anger. The authority for this is in Chaandogya Upanishad which is a Sruti.

Madhavan/mart/yam Waaidgam Sareeramaatram Mruthyunaa Tadasyaamrutasyaa Sareeras/yat/mano~dhishthaanamaatto Wai saSareerah p/riyaap/riyaabhyaam navi saSareerasya satah p/riyaap/riyathorapahatirasyaSareeramvaava santam napriyapriye s/prushatah (Chaandogyopanishad – 8-12-1)

The expression are Priya and Apriya, meaning like and dislike. ‘Like’ is desire; dislike is passion. “Likes and dislikes do not touch a person without a body”, says Chaandogya. In other words, it says that, if you wish to get free from likes and dislikes, you should regard the body as not the “self”.

It is customary to classify the feelings of the Jeevaatma (soul) arising from the sense of ‘I’ and ‘mine’ into three ways: Gaunaatama, Mithyaatma, Mukhyaatma. The elders have put it in the form of a sloka which Adi Sankara has quoted as an example in his Brahma Sootra Bhaashya:

Gaunamithyaatmanoasatt/veputradehaadibaadhanaat

Sad/b/h/maatmaahamit/yevabodhekaaryam katham bhavet.  (Brahma Sootra Bhaashya 1.1.4)

“We, our children and close friends are the same as ourselves; their joys and sorrows are ours too.” This attachment is the characteristic of “Gaunaatma”. Gauna means and attribute. Although it is known that we and the children and friends are all different from one another, the feeling of being one with them strong. The attachment to the body which is closer and stronger than the attachment to one’s friends and relatives is “mithyaatma”. When one actually experiences that the pure Aatma has been isolated and “I am none else than a form of Brahman,” the Brahman itself becomes the Aatma. This is “Mukhyaatma”. If the first two, (gauna and mithya) are removed, the connection with children and friends, body and sense organs will snap. Then the knowledge dawns that “I am truly Brahma Swaroopa”. The purport of the sloka is that there is nothing further beyond this stage.

The motto “Arise, Awake” which Vivekananda devised for the Ramakrishna Mutt has been taken only from the Kathopanishad. Many of the mottos which are in use today are taken from the Upanishads. For example: (1) The expression that the Aatma cannot be reached through learning of intellect (nāyamātmā pravacanena labhyo na medhayā na bahunā śrutena | yamevaiṣa vṛṇute tena labhyastasyaiṣa ātmā vivṛṇute tanūṁ svām || Kathopanishad 1.2.23); (2) the mantra that states that the Jeeva (Aatma) is the owner of the chariot, the body is the chariot, intellect is the driver, the mind is the harness bit, the organs are the horses (ātmānaṃ rathinaṃ viddhi śarīraṃ rathameva ca। buddhiṃ tu sārathiṃ viddhi manaḥ pragrahameva ca ॥ Painglopanishad 4.3); (3) the fact that the Parama Purusha resides in the cave of the heart as light, the size of the thumb; (4) the mantra chanted during Deepa Aaradhana (burning camphor) : viz., in God’s presence, the sun, moon, starts and fire all lose their glow, meaning that, since He is the source of their brightness, they cannot throw light on him; (5) since our feeble intellect has emanated from the super intellect, we cannot intellectually grasp Him; (6) the topsy-turvy tree which Lord Krishna refers to in the Gita – the Aswatha tree of Samsaara or worldly existence; (7) the fact that, if all the desires springing from the heart are destroyed, man becomes immortal here and now and tastes the bliss of Brahman. All these which oft-quoted today are from Kathopanishad.

Prasna, Mundaka and Maandukya

The three Upanishads, Prasna, Mundaka and Maandukya, coming after Kathopanishad, belong to Atharva Veda. Prasna means a question. How did creation begin? Who are Devas? How does life get connected to the body? What is the truth about the states of awakening, sleep and dreaming? What is the benefit of worshipping Omkaara? What is the relationship between the Purusha and Jeeva? Since it answers these six questions, this Upanishad is named Prasnopanishad.

Mundaka means shaven-head – tonsure. Mundakopanishad is to be followed by persons like Sanyaasis, whith mature minds and a disposition free from attachment. This Upanishad talks of Akshara Brahman, which means that which is free from decay or dissolution. “Akshara” also means sound or syllable. We talk of Panchaakshara (five syllables) and Ashtaakshara (eight syllables). Pranava (Omkaara) is basic to the Aksharaas. To reach the target or aim, called Akshara Brahman, the Akshara or the syllable ‘Om’ plays the chief role. This Upanishad says that the arrow of the Aatma should shot from the bow of Omkaara at the target of Brahma without wavering so that they (arrow and target) are conjoined and become one.

pranavo dhanuḥ śāro hyātmā brahma tallakṣyamucyate. apramattena veddhavyam śaravat tanmayo bhavet (Mundakopanishad 2.4)

It is in the Upanishad that the following imagery appears; Jeevaatma and Paramaatma are the two birds living in the peepul tree called the body (Sareera). The Jeevaatma bird eats the fruit (of action) whilst the Paramaatma bird remains a mere witness (saakshi).

The motto of our country at present (Satyamevajayate) – Truth alone triumphs – is a mantra from the Mundaka Upanishad.

satyameva jayate nānṛtaṁ satyena panthā vitato devayānaḥ |
yenākramantyṛṣayo hyāptakāmā yatra tat satyasya paramaṁ nidhānam || (Mundakopanishad 3.6)

There is also a mantra here regarding those Sanyaasis who are Jeevan-Muktas (liberated souls) in this life and, when devoid of their bodies, (after death) stay liberated. When honouring sanyaasis with poorna kumbha (a pot full of water) this is one of the mantras chanted. This Upanishad says that, just as when various rivergs with different names fall into the sea, they lose their separate identities and become the Sea itself, so also the jnaanis (wise men) lose their names and forms and become one with the Parama Purusha.

yathā nadyaḥ syandamānāḥ samudre’
staṃ gacchanti nāmarūpe vihāya .
tathā vidvān nāmarūpādvimuktaḥ
parātparaṃ puruṣamupaiti divyam .. (Mundakopanishad 3.8)

Next is Maandukya Upanishad. Manduka means a frog. Why is it called the Frog Upanishad? One reason appears to be that the frog does not have to climb each stair. It can jump from the first to the fourth. This Upanishad shows the way to transcend the three stages of Jaargati (wakefulness), Swapna (dream) and Sushupti (sleep) and reach the Turiya or the fourth stage. It says it is possible to reach the final stage in one leap by means of worshipping Omkaara. Is that why it is called the Frog Upanishad?

Some say this Upanishad belonged to those tribes who adopted the frog as a symbol (Maandukya). It is also said that the Rishi to whom this Upanishad was a revelation was Varuna in the form of a frog.

This is the smallest of all Upanishads. There are only twelve mantras. But, for fame and efficacy, this has a special place. This establishes the doctrine, by using the four parts of Pranava, that Jeevaatma and Paramaatma are the same. It is also famous for describing as “Sivam Advaitam” (beautiful and without a second) the fourth and final stage to which finally all creation shrinks.

nāntaḥprajñaṁ na bahiṣprajñaṁ nobhayataḥprajñaṁ na prajñānaghanaṁ na prajñaṁ nāprajñam|
adṛṣṭamavyavahāryamagrāhyamalakṣaṇamacintyamavyapadeśyamekātmapratyayasāraṁ prapañcopaśamaṁ śāntaṁ śivamadvaitaṁ caturthaṁ manyante sa ātmā sa vijñeyaḥ ||

Adi Sankar’s Guru’s Guru called Gaudapaadaacharya has vividly explained this Upanishad in “Maandukya Upanishad Kaarika”. Adi Sankara has written a Bhaashya on this Upanishad Kaarika.

Taittareeya Upanishad

More than any other Upanishad, the Upanishad is widely studied. The mantras used in most of the ritual (Karmaanushtaana) are taken from this. Seekshaavalli, Aanadavalli and Bhriguvalli are the three parts of this Upanishad.

Seekshaavalli deals with the many aspect of imparting education. This part teaches the controls of restraints involved in celibacy (Brahmacharya) and its glory, the order in which Veda should be studied, the worship of Pranava, etc. The Aavahanti Homa, which the teacher performs with the invocation that the disciples should come without restraint and receive the Veda, is from this Upanishad.

Precepts such as “tell the truth”, “follow the dharma” (Satyam Vada, Dharmam Chara) appear only in this. The study of Vedas and following of one’s dharma should never be abandoned. To perpetuate these in the world, one should marry and beget children to pass on the torch of Dharma or as the Upanishad says without breaking the thread of continuity. Mother, father, teacher and guests should treated like divinities. (Maatru Devo Bhava, Pitru Devo Bhava, Aacharya Devo Bhava) – these mantras are found only here. The virtues of charity and duty are extolled in the teachings of this Upanishad.

That part of this Upanishad which contains the ascending order of bliss culminating in Brahmaananda is Aanadavalli. Annamaya Kosa (the sheath of food) is the body which thrives on nourishment; the Praanamaya Kosa (life) which breathes inside it; the Manomaya Kosa (mind) which creates thoughts; and, inside it, the Vigyaanamaya Kosa (knowledge), which distinguishes right and wrong, are the four kosas. Aanandamaya Kosa is at the core of these. It is explained (in this part of the Upanishad) how the Aatma resides here in its natural element and in a state of bliss.

Each Kosa has been ‘personified’ into a bird and the teachings allegorically describe the head, the left wing, the right wing, the body, and the tail of the bird etc. The oft-quoted “Yato Vaacho Nivartante” and mantras such a s “there is nothing to fear for one who has realised the blissful state of Brahman, without being able to reach which speech and mind return” appears in this Upanishad.

Bhriguvalli is what Varuna taught to his son, Bhrigu. Although the term taught (Upadesha) is used, it does not mean that the teacher dictated all the lessons. The teacher, Varuna, encourages his son to personally conduct deep enquiry and actually experience the deep results. It is thus Bhrigu himself does penance and first realises the Annamaya Kosha or that the body to be ultimate truth, but continuing his penance he progressively ascends by each stage viz. Pranamaya (life), Manomaya (mind) and Vigyannamaya (knowledge) and reaches the state of bliss – Aanandamaya – the stage where by experience he comes to know that bliss is the ultimate truth.

This does not mean that the Upanishad thinks low of the common worldly life which stops at the level of the body – Annamaya. One must understand the highest truth even whilst pursuing worldly objectives.

By leading a dharmic existence, this life should be treated as a means (upaaya) – a device, as it were, to reach higher stages. That is why after reaching the state of bliss – Aanandamaya Kosha – the Upanishad proclaims “do not regard food with contempt; do not waste food; grow more food” and so on. The text ends thus: “The Jnaani thinks that he alone is the food, that one who eats it, the one who created a connection between the food and its consumer and he sings in happiness in the thought that God and he are also the same.”

Aitareya Upanishad

The next is the Aitareya Upanishad, which appears at the end of the Aitareya Aaranyaka. It is so called because it came into use through a Rishi called Itareya. This Upanishad deals with how a Jeeva (soul) enters the mother’s womb from the father, then is born in the world, takes birth again and again in various worlds according to sin and merit (paapa and punya) and how liberation from birth and life is possible only through realising the nature of the Aatma. It talks of how a Rishi called Vaamadeva, came to and how he scaled all the walls and flew towards liberation like a kite flying high in the sky. Prajnaana or actual mental experience of the Aatma is spoken of in high terms in this Upanishad. It is not correct to say that Brahman is realised by such a process of thought. “The thought (Prajnaana) itself is the Brahman” is the most important message of Rig Veda.

Chaandogya Upanishad

The last two of the ten upanishads, viz. Chaandogya and Brahadhaarankaka are very big in size. These two together are bigger than all the rest of the eight put together.

What appear in the Chaandogya Braahmana of Saama Veda is Chaandogya Upanishad. ‘Chaandogya’ means one who sings the Saama Gaana.

It is said that just as Kathopanishad is largely used in the Bhagavad Gita, the Chaandogya Upanishad mantras constitute the chief authority (pramaana) for the Brahma Sutra of Vyasa.

Chaandogya and Brahadhaaranyaka contain the combined messages of many Rishis.

In the beginning, Chaandogya names ‘Omkaara’ as Udgata, and details its study (upaasana). Many vidyas or disciplines, e.g., Akshi Vidya – Aakaasa Vidya, Madhu Vidya, Saandilya Vidya, Praama Vidya, Panchaagni Vidya, etc. are mentioned. These help understand the Paramaatma Tatva in various ways.

At the apex appears the Dahara Vidya. The Jeeva (soul) realising in the small space (aakaasa) within himself the limitless spatial expanse which is the Paramaatma in Dahara Vidya.

In this Upanishad, the truth is taught through the medium of many interesting stories. In Chaandogya Upanishad appears the story of Satyakaama, a youngster who did not know his ancestry but did not hide the fact. As a result, Gautama took him to be of good Brahmin birth and accepted him as his disciple. The earlier teacher of Satyakaama subjects him to many tests. Even his (Guru’s) wife intercedes on behalf of Satyakaama. When all this is seen in the Upanishad, it looks as though the Upanishad brings the ancient Gurukula life into our vision like a motion picture. Just contrary to Satyakaama, the Brahmachari, Svetaketu, who was swelling with the pride of knowledge was first made to become humble by his father, Udaalaka Aaruni, and was, at the end, taught the non-difference (Abeda) between Jeeva (soul) and Brahma, contained in the expression “Tat Tvam Asi” (that thou art). This is the point at which the Mahaavaakya or the supreme message of Saama Veda touches the high note. Unlike Svetaketu, Maharishi Narada was struggling in vain to understand the truth of the Aatma, although he had learnt all the Saastras faultlessly. It is in this Upanishad that he taught the secret by Sage Sanatkumaara. As i Tatittareeya, which develops the theme higher and higher starting from the Anaamaya Kosa (body), Sanatkumaara also starts from purity of food (Aahaara Suddhi) and goes up to the purity of mind/soul, only at which stage the bonds will be snapped and Aatmaananda (bliss) will result.

Brahadaaranyaka

The Brahadaaranyaka Upanishad is the biggest of all Upanishads. ‘Brihada’ means big. Generally an Upanishad appears at the end of Aaranyaka. As an exception to this, the Isavaasya Upanishad comes in the Sukla Yajus Samhita itself. What appears in the same Sukla Yajus, as a whole Aaranyaka, (the entire Aaranyaka instead of the latter portion), is the Brahadaaranyaka Upanishad.

There are two versions of this. One is in the Maadhyandina Saakha and the other is in the Kaanva Saakha. Adi Sankara has written the Bhaashya on the version in Kaanvasaakha only.

This contains six chapters or Adyayas. The The first two are called Madhu Kaanda; the next two are called Muni Kaanda, after Yaajnavalkya’s name and the last two are called Khila Kaanda.

Madhu can be taken to refer to the sweet juicy stage of bliss. If it is understood that everything is the manifestation of the Paramaatma, the Jeevas will feel the whole world to be sweet like honey. The Jeevas will also be sweet to the world. This is the subject dealt with in Madhu Kaanda.

It is in this Upanishad that the Aatma is described negatively as “not this, not this” – meaning that it cannot be described as this or that (4.4.22). It is not like anything known to us. This is called the ‘Neti Neti’ vaada or negative argument. But the grammatical rule of conjunction, na + iti (not this) becomes ‘Neti’ which means ‘that which cannot be described’. According to the Neti doctrine, first the world, body and mind have to be rejected and the Aatma realised as transcending classification or description through words. After such realisation, the Bhaava or feeling will be that the phenomenal world and all creatures are also made of Aanandarasa or the juice of Aananda.

The Brahadaaranyaka starts with the mantra “Asato Ma Sat Gamaya’, which these days is repeated as a prayer. This means : “Lead me from the perishable to the imperishable”.

The first canto (Kaanda) deals with how the Brahmin called Gargya received instructions from the Kshatriya King, Ajaata Satru. It is known from this Upanishad that kings like Ajaata Satru and Janaka were Brahma jnaanis or realised souls. Likewise, we learn, from the reference to one Gargi (a lady) who had participated in the discussions on equal footing with the Rishis in Janaka’s Council of the learned (Vidwatsabha) that women were also Brahma Vadins – those able to discuss the nature of Brahman. This Upanishad describes how Yaajnavalkya had two wives, one of whom called Katyaayini was an ordinary woman of the world and the other, Maittreyi was a Brahmavaadin (Philosopher). The teachings of Yaajnavalkya to Maitreyi are repeated twice in this Upanishad as Madhu Kaanda and Munikaanda but with a small difference in each. This is a beautiful mixture of an anecdote and philosophy.

Yaajnyavalkya decides to leave the house and to become a Sanyaasi and divides his property between the two wives. Katyaayini is satisfied with here share of the property. But Maittreyi asks: “You are going to take Sannyas only because it provides more happiness than all this property. What is the nature of that happiness? Why don’t you tell me this?” Yaajnavalkya replies, “You have always been dear to me. By this question, you have become dearer to me,” and thus begins teaching.

He elaborates on the concept of ‘priya’ (love) and attachment. “The love which the wife has for the husband, the love of the husband for the wife, likewise, the love towards children, love for wealth – all these kinds of love do not arise objectively from the husband, wife children or riches but the act of loving brings satisfaction to oneself. One indulges in the feeling of love, because it brings happiness to the Aatma. Therefore, does it not mean that the nature of Aatma is love, happiness? In order to learn it in isolation, one has to leave all that has been near and dear so far and become a Sannyaasi. After learning its nature, it will become clear that nothing other than that exists. All will become equally dear. Earlier, when attachment existed towards some objects, dislike was also manifest towards other dissimilar objects. If now all these are left in the middle as it were and Aatma is realised, then the feeling of difference (high and low) will vanish. All will appear to be manifestations of the Aatma, and, instead of feeling dislike for some objects, hatred as such will yield place to love towards all.” Thus goes the teaching.

Muni Kaanda narrates how Yaajnavalkya, before becoming a Sannyaasi, had a philosophical discussion in King Janaka’s Council  with Kahola, Uddalaka Aaruni, Gargi and others and later, how he imparted knowledge to King Janaka too. The authority for the doctrine of Antaryaami (subtle internal existence of the Paramaatma) which is the chief feature of Visishtaadvaita Philosophy (modified non-dualism of Ramanuja) is contained in the reply Yaajnavalkya made to Uddaalaka Aaruni. The essence of this doctrine is, unlike Advaita, which regards the whole phenomenal world as Maaya or illusion, if the world is regarded as the body (sareera) then, Paramaatma resides within it like life. Although Yaajnavalkya at some stage accepts this to a limited extent, mostly the talks of complete Advaita only. When concluding his teachings to Maitreyi, he is wholly advaitic.

“How can the ‘thing’ create the sensation of sight, hearing, taste smell and thought, be seen, heard, tasted, smelt and thought of and through what medium”? – Thus he talks of the undivided unitary feeling. To Janaka also he expounds Advaita.

The two chapters that appear last in this Upanishad consolidate many messages lying scattered at various places and that is why it is called ‘Khila’ Kaanda. (If something is scattered, it is said to have become ‘Khila’. Akhila means not scattered at all but together.)

One of the anecdotes in Khila Kaanda deals with how, based on the relative quality of the aspirants (saadhaka), the same message can be interpreted in three different ways. The Devas, the humans and the asuras, solicit instructions from Prajaapati. He offers the single syllable; Da as his teaching. Devas who lack self-control take it to mean “Damayata” meaning control or restraint. The humans, whose nature is to accumulate property, take ‘da’ to represent ‘Daana’ giving away in charity. The asuras whose nature is cruelty, take ‘da’ to refer to “Dayatvam” as being kindness or having compassion.

A certain mantra appearing towards the end of Brahadhaaranyaka Upanishad used to fascinate me and act as a solace. What does this mantra say?

If a sick man suffers from fever, that can be taken as his big penance (Tapas). If one thus understands disease and calamity, he will reach heaven after death, says this mantra (Br. Up. 5.11.1).

This does not seem to make sense. What is the point that is made here or the consolation offered? I will explain.

Conditioning the body with Vrata (self-imposed austerity), not only helps one to shed the inordinate love for the body, but atones for earlier sins. Tapas or the practice of severe austerity acts as an atonement for sins of earlier births. Sins committed earlier by the body have to be paid for by bodily discomfort alone.

That is why the Puraanas (mythological texts) mention even evolved souls as having practised austerities or Tapas.

Ambika, the Divine Mother Herself, did not pay heed to the advice of Parameswara and came to the Yajna which Daksha was performing. She was humiliated and she gave up her body then and there. She manifested herself again as the daughter of Himavaan – Lord of Himalayas. She was convinced that, unless she atoned properly for her earlier sin of disregarding her husband’s advice, she would not be able to regain the same husband. Kalidasa has described this beautifully and touchingly in “Kumara Sambhavam”. How cold must be the Himalayan peaks during winter. She used to sit on ice slabs or stand in the freezing waters of the lakes and do her penance. In summer, in the scorching Sun, she used to kindle the fire on all the four sides around her, and sit in the middle for the same purpose. Since, in addition to the four fires around, the burning sun was above, this is called “Panchaagni (five fires) Tapas”. Many great mean have done similar penance.

We have neither the will nor the ability to perform a millionth part of their penance. Then how would our sins be washed off?

Typhoid, Pneumonia and such fevers with a temperature of 105, 106 degree-F ravage the body with intolerable heat. Thank goodness God has sent us the fever since we have not done the Panchaagni Tapas – This should be our solace.

Thus any ailment or injury should be regarded as Tapas – not Tapas which we have voluntarily undertaken but imposed on us by God.

By practice, this mentality will begin to harden. Thus we will develop the capacity to bear illness or sickness with fortitude. We should not reject the opportunity that has come to us of its own volition to liquidate the effect of our past deeds of evil. We will have obtained the lofty stage of “Titeeksha” where troubles appear to be no trouble at all.

All this, the mantra in the Upanishad says pithily. This mantra acts as a balm sent specially to us by God in lieu of penance when we feel “we have committed many big sins but are not doing any vrata or tapas to atone for them, we not only fail to perform them, but we are not capable of performing them.”

In the last chapter of the Brahadaaranyaka, which is also the end of the ten Upanishads, as though to stress that Vedanta is not at all opposed to Karma Kaanda, it talks of the Panchaagni Vidya and the duties of householder who desire children – good children.

Harih Harah!!

दस उपनिषद

आदि शंकराचार्य ने दस उपनिषदों का चयन किया, जिन्हें दसोपनिषद कहा जाता है और उन पर भाष्य लिखा । उन्होंने उनमें प्रतिपादित अद्वैतवादी (अद्वैत) सिद्धांत पर प्रकाश डाला । रामानुज और माधव, जो बाद में आए, ने भी इन्हीं दस उपनिषदों पर भाष्य लिखे लेकिन उनमें से प्रत्येक ने अपने संबंधित सिद्धांतों पर जोर दिया, जैसे विशिष्ट-अद्वैत (योग्य गैर-द्वैतवाद) और द्वैत (द्वैतवाद) ।

निम्नलिखित श्लोक में दस उपनिषदों का वर्णन है:

ईश–केन–कठ–प्रश्न–मुण्ड–माण्डूक्य–तित्तिरः ।
ऐतरेयं च छान्दोग्यं बृहदारण्यकं तथा ॥

आदि शंकराचार्य ने अपना भाष्य भी उपरोक्त ग्रंथों के क्रम में ही लिखा है ।

ईशावास्य उपनिषद

इश या ईशा ईशावास्य उपनिषद है । यह शुक्ल यजुर्वेद संहिता के अंत में आता है । इसे ऐसा इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसकी शुरुआत ‘ईशा वास्याम्’ शब्दों से होती है । ईशावास्य यह कहकर शुरू होता है कि ईश्वर या भगवान पूरी दुनिया में व्याप्त है और हमें सभी कार्यों का फल केवल उसे अर्पित करके, ‘परमात्मा तत्व’ का आनंद लेने की स्थिति तक पहुंचना चाहिए ।

ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् ।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम् ॥

जड़-चेतन प्राणी वाला यह समस्त सृष्टि परमात्मा से व्याप्त है । मनुष्य इसके पदार्थों का आवश्यकतानुसार भोग करें, परन्तु ‘यह सब मेरा नहीं है’ इस भाव से उसका संग्रह नहीं करें ।

केनोपनिषद

‘केन’ केनोपनिषद् है । इसे तलवकार उपनिषद भी कहा जाता है क्योंकि यह सामवेद के जैमिनी साखा के तलवकार ब्राह्मण में आता है । एक कहावत है “केन में जो खोया है उसे ढूंढो” । इस उपनिषद में वर्णन है कि कैसे स्वयं दिव्य माता अम्बिका ने देवों के राजा इंद्र को दिव्य ज्ञान प्रदान किया, जब देवता अपने अभिमान के कारण अनादि-अंतहीन परमात्मा को नहीं पा सके, यद्यपि उन्होंने ऊँची-नीची हर तरह से खोज की । परा शक्ति (अम्बिका) बताती है कि हमारी सभी शक्तियाँ महाशक्ति या परम शक्ति से उत्पन्न होती हैं । आदि शंकर ने, अन्य कुछ उपनिषदों की तरह, इस उपनिषद की शब्द-दर-शब्द व्याख्या करने से संतुष्ट होने के बजाय, एक अलग भाष्य, वाक्य-दर-वाक्य लिखा है । दूसरे शब्दों में, इस उपनिषद को आदि शंकर से दो भाष्य प्राप्त करने का गौरव प्राप्त है । इस उपनिषद को मुख्य रूप से ध्यान में रखते हुए, आदि शंकर, दिव्य माता पर भक्ति रचना, “सौन्दर्य लहरी” में कहते हैं: “कृपया अपने चरण मेरे सिर पर भी रखें, वे पवित्र चरण जो आपने वेद माता के सिर पर रखे हैं ।” वेदांत की तरह, उपनिषदों को वेदशीर्ष या श्रुतिशीर्ष भी कहा जाता है, अर्थात वेदों का शीर्ष या श्रुति का शीर्ष । उपनिषद ही वेदों का अंतिम भाग या अंत हैं और साथ ही, सभी भागों में सबसे महत्वपूर्ण (शीर्ष की तरह) हैं । यह कहना कि दिव्य माँ के चरण वेद माता या वेद माता के शीर्ष पर विराजमान हैं, यह कहने के समान है कि वे उपनिषदों पर विराजमान हैं ।

केवल केनोपनिषद में ही दिव्य माँ ज्ञानमाता के रूप में प्रकट होती हैं । सामगणप्रिया के नाम के अनुरूप, जो ‘ललिता सहस्रनाम’ में वर्णित उनकी विशेषताओं में से एक है, उनकी महिमा साम वेद के इस उपनिषद में विशेष रूप से प्रकट होती है ।

यदि हम कहते हैं, “हम एक वस्तु देखते हैं”, तो द्वैत स्थापित हो जाता है – वह वस्तु जो दिखाई देती है और वह कर्ता जो उसे देखता है । हम अपने शरीर को एक वस्तु के रूप में (वस्तुनिष्ठ रूप से) देख पाते हैं । जब हम कहते हैं, “मेरा शरीर स्वस्थ है या अस्वस्थ है”, तो यह एक वस्तु बन जाता है । इसका अर्थ यह है कि स्वयं को “हम” कहने वाला कोई व्यक्ति, स्वयं को एक पृथक इकाई के रूप में कर्ता मानकर, किसी वस्तु को देखता है । यह (कर्ता) जो देखता है, वह “आत्मा” है । इस “कर्ता” को न तो समझा जा सकता है और न ही बोधगम्य है । यदि ऐसा है, तो वह वास्तविक “कर्ता” बन जाता है । वास्तविक आत्मा “हम” कभी भी वस्तु नहीं बन सकती, बल्कि केवल ‘कर्ता’ ही रह सकती है । अतः, शरीर आदि वस्तुओं को छोड़कर, ‘हम’ नामक यह कर्ता केवल अपने आप में पृथक रूप से विद्यमान रह सकता है, परन्तु उसे जानने के लिए विवश नहीं किया जा सकता । जानना एक पृथक वस्तु की कल्पना करना है । आत्मा के मामले में यह घटना बेतुकी है और इसे स्थापित नहीं किया जा सकता ।

यदि हमें इसे जानना है, तो ज्ञाता को आत्मा से भिन्न होना चाहिए । हममें ऐसा क्या हो सकता है जो वास्तविक आत्मा से भिन्न हो ? आत्मा से अलग ऐसा क्या है जो जान सकता है ? कुछ भी नहीं । इसलिए, ‘आत्मा का ज्ञान’, ‘स्वयं को जानना’ जैसे अभिव्यक्तियों में, जानने की क्रिया किसी विषय को देखने वाले व्यक्ति के सामान्य नियम के अनुरूप नहीं है । ‘स्वयं द्वारा स्वयं का अनुभव करने’ की क्रिया को जानना और ज्ञान कहा जाता है । इसीलिए केनोपनिषद कहता है: “जो कहता है कि वह आत्मा को जानता है, वह उसे नहीं जानता; जो उसे न जानने के स्तर पर रहता है, वह उसे जानता है; जो उसे देखता है, वह उसे नहीं देखता; जो इसे नहीं देख सकता, वह इसे देख सकता है ।”

कठोपनिषद

उपनिषद ‘कथा’ या कठोपनिषद या कठकोपनिषद कृष्ण यजुर्वेद की कठक शाखा में आता है । इसमें मृत्यु के देवता (यम) और नचिकेता (एक ब्रह्मचारी बालक) के बीच संवाद है, जो इस प्रश्न पर विचार करता है कि मृत्यु के बाद आत्मा का क्या होता है । हालाँकि यह एक कहानी की तरह शुरू होता है, लेकिन यह एक महान सत्य की व्याख्या करता है । भगवद् गीता में, भगवान कृष्ण इसी उपनिषद के शब्दों को दोहराते हैं। उदाहरण के लिए:

न जायते म्रियते वा विपश्चिन्नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित्‌ ।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥ (K-II-18)

‘इस ‘प्रज्ञामय’ का न जन्म होता है न मरण; न यह कहीं से आया है, न यह कोई व्यक्ति-विशेष है; यह अज है, नित्य है, शाश्वत है, पुराण है, शरीर का हनन होने पर इसका हनन नहीं होता ।”

मक्के के दानों को डंठल से अलग करके एक ढेर बना दिया जाता है । नारियल के पत्ते से पतली त्वचा को छीलकर एक झाड़ू की छड़ी दिखाई देती है । इसी प्रकार, शरीर रूपी वस्तु से, विषय रूपी आत्मा को भी सहजता से किन्तु दृढ़तापूर्वक अलग कर देना चाहिए और आत्मा को स्वयं अस्तित्वमान रहना चाहिए । काम, क्रोध, घृणा, भय, ये मन के हैं, आत्मा के नहीं । भूख, प्यास और ऐसी ही अन्य इच्छाएँ शरीर से संबंधित हैं, आत्मा से नहीं । अतः, हमें उन सभी वस्तुओं और पदार्थों को पहचानने का अभ्यास करना चाहिए जो आत्मा से भिन्न हैं । यदि हम इस प्रकार की सोच का निरंतर अभ्यास करते रहें, तो यह गहरी जड़ जमाई हुई भावना कि ‘हम’ केवल शरीर और मन हैं, क्षीण होने लगेगी और अंततः लुप्त हो जाएगी । हम शरीर और मन पर आक्रमण करने वाली अनेक अशुद्धियों में उलझे बिना शुद्ध आत्मा बन सकते हैं । हमें अपने देहधारी शरीर को आत्मा के निकट स्थित एक आवरण मानना ​​चाहिए । हमें मन को शरीर को एक बाह्य वस्तु के रूप में देखने के लिए प्रशिक्षित करना चाहिए ।

जब हम इस संसार में रहते हैं और जब हमें यहीं और अभी यह अनुभव होता है कि हम शरीर में विद्यमान हैं, तो हमें शरीर को “मैं नहीं” – “मेरा नहीं” मानने का अभ्यास शुरू कर देना चाहिए । तब, मृत्यु के बाद मोक्ष प्राप्ति के बारे में सोचना आवश्यक नहीं होगा । मोक्ष का अर्थ है सभी आसक्तियों से मुक्ति । इस प्रकार एक मुक्त आत्मा (जीवनमुक्त) वह है जो इसी संसार में शरीर की चेतना खो देता है और बाह्य भोगों का सहारा लिए बिना, अपने भीतर आत्मगत रूप से (आत्माराम) सुख पाता है । वेदों और वेदांत का परम उद्देश्य मनुष्य को मुक्त आत्मा बनाना है । भगवान कृष्ण भगवद्गीता में यही कहते हैं: “शरीर से प्राण निकलने से पहले (प्राक् शरीर विमोक्षणात्), इसी संसार में रहते हुए (“इहैव”), जो काम और क्रोध की शक्तियों को नियंत्रित करता है और योग (परमात्मा से एकरूपता) की अवस्था में स्थिर हो जाता है, वह शाश्वत आनंद का आनंद लेता है ।” अर्थात्, यदि कोई व्यक्ति इसी संसार में रहते हुए आत्मा के वास्तविक स्वरूप को जान लेता है, और ऐसा अनुभव प्राप्त कर लेता है, तो शरीर के नष्ट हो जाने पर भी कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि उसने जीवित रहते हुए भी इसे अपना नहीं माना था । इस प्रकार, मृत्यु के शरीर धारण करने से पहले ही, वह शरीर त्याग दिया था । शरीर शब्द में मन भी शामिल है । यदि यह हमारा नहीं है, तो मृत्यु का कोई महत्व नहीं है, क्योंकि इसका हम पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा ।

क्योंकि वह नश्वरता (मृत्यु) से मुक्त हो जाता है, वह अमर हो जाता है । इस अवस्था में बने रहने की क्रिया का उल्लेख पुरुष सूक्त जैसे विभिन्न मंत्रों में किया गया है, जो कर्म काण्ड में आते हैं । उपनिषदों में, इस विषय को बार-बार दोहराया गया है ।

हमारे लिए दुःख का कारण शरीर और उसके माध्यम से मन है । दुखों का अभाव और सदैव आनंदित रहना ही सभी धर्मों में ‘स्वर्ग’ – मोक्ष – कहा गया है । अद्वैत सिद्धांत के अलावा, सभी धर्म कहते हैं कि शाश्वत आनंद का आनंद लेने के लिए, व्यक्ति को किसी अन्य लोक में जाना होगा । आदि शंकराचार्य ने सिद्ध किया है कि इस लोक में रहते हुए, शारीरिक आसक्ति का पूर्णतः त्याग करके और आत्मा में गहराई से स्थित होकर, व्यक्ति अन्य लोकों की तुलना में अधिक आनंद का अनुभव कर सकता है । ब्रह्म सूत्र भाष्य (1.1.4) में वे कहते हैं: तदेतत् अशरीरत्वं मोक्षाख्यं । हम आमतौर पर अशरीरी से जो समझते हैं, वह आकाशवाणी है (आकाश से आ रही आवाज होता है जो बिना शरीर का होता है) । ‘अशरीर’ शब्द का अर्थ केवल शरीर रहित होना है । ‘मैं शरीर हूँ’ इस बोध का लोप ही अशरीरत्वं है – शरीर रहित अवस्था है । आचार्य ने मोक्ष की परिभाषा इस प्रकार दी है: यदि इच्छाएँ धीरे-धीरे कम हो जाएँ और अंततः विलुप्त हो जाएँ, तो शरीर के प्रति आसक्ति पूरी तरह से गायब हो जाएगी । तब भीतर की आत्मा प्रकाशित हो जाएगी । इसके लिए अन्य लोकों में जाने की आवश्यकता नहीं है । वेद और वेदांत इसी को ‘इहैव-इहैव’ कहते हैं – यानि यहीं है – यहीं है ।

स्मृति अर्थात् भगवद्गीता कहती है कि इस आनंदमय अवस्था तक पहुँचने में बाधा डालने वाले दो मुख्य शत्रु हैं इच्छा और क्रोध । इसका प्रमाण छांदोग्य उपनिषद में है जो एक श्रुति है ।

मधवन्मर्त्यं  वाइद्गं शरीरमात्रं मृत्युना तदस्यामृतस्या शरीरस्यात्मनोऽधिष्ठानमात्तो वै सशरीरः प्रियाप्रियाभ्यां नवै सशरीरस्य सतः प्रियाप्रियथोरपहतिरस्यशरीरंवाव सन्तं नप्रियाप्रिये स्पृशतः (छान्दोग्योपनिषद् – 8-12-1)

अभिव्यक्ति प्रिया और अप्रिया है, जिसका अर्थ है पसंद और नापसंद । ‘पसंद’ इच्छा है; नापसंद जुनून है । छान्दोग्य कहते हैं, ”बिना शरीर वाले व्यक्ति को पसंद और नापसंद प्रभावित नहीं करतीं ।” दूसरे शब्दों में, यह कहता है कि, यदि आप पसंद और नापसंद से मुक्त होना चाहते हैं, तो आपको शरीर को “स्वयं” नहीं मानना ​​चाहिए ।

‘मैं’ और ‘मेरा’ के भाव से उत्पन्न होने वाले जीवात्मा के भावों को तीन प्रकार से वर्गीकृत करने की प्रथा है: गौणात्मा, मिथ्याात्मा, मुख्यात्मा । श्रेष्ठ (बड़े-बुजुर्गों ने) इसे एक श्लोक के रूप में रखे हैं जिसे आदि शंकराचार्य ने अपने ब्रह्म सूत्र भाष्य में एक उदाहरण के रूप में उद्धृत किया है:

गौणमिथ्यात्मनोऽसत्वेपुत्रदेहादिबाधनात् ।

सद्ब्रह्मात्माहमित्येवबोधेकार्यं कथं भवेत् ॥ (ब्रह्म सूत्र भाष्य 1.1.4)

“हम, हमारे बच्चे और घनिष्ठ मित्र स्वयं हमारे समान ही हैं; उनके सुख-दुःख भी हमारे ही हैं ।” यह आसक्ति “गौणात्मा” का लक्षण है । गौण का अर्थ एक गुण होता है । यद्यपि यह सर्वविदित है कि हम, बच्चे और मित्र सभी एक-दूसरे से भिन्न हैं, फिर भी उनके साथ एक होने की भावना प्रबल होती है । शरीर के प्रति आसक्ति, जो अपने मित्रों और संबंधियों के प्रति आसक्ति से अधिक निकट और प्रबल होती है, “मिथ्याात्मा” है । जब व्यक्ति वास्तव में यह अनुभव करता है कि शुद्ध आत्मा पृथक हो गई है और “मैं ब्रह्म का ही एक रूप हूँ,” तो ब्रह्म स्वयं आत्मा बन जाता है । यही “मुख्यात्मा” है । यदि पहले दो (गौण और मिथ्या) हटा दिए जाएँ, तो बच्चों, मित्रों, शरीर और इंद्रियों से संबंध टूट जाएगा । तब यह ज्ञान जागृत होता है कि “मैं वास्तव में ब्रह्म स्वरूप हूँ” । इस श्लोक का तात्पर्य यह है कि इस अवस्था से आगे कुछ भी नहीं है ।

रामकृष्ण मठ के लिए विवेकानंद द्वारा रचित आदर्श वाक्य “उठो, जागो” केवल कठोपनिषद से लिया गया है । आज प्रचलित कई आदर्श वाक्य उपनिषदों से लिए गए हैं । उदाहरण के लिए:

(१) यह अभिव्यक्ति कि आत्मा तक बुद्धि के माध्यम से नहीं पहुँचा जा सकता

नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्‌ ॥

“यह ‘आत्मा’ प्रवचन द्वारा लभ्य नहीं है, न मेधाशक्ति से, न बहुत शास्त्रों के श्रवण से ‘यह’ लभ्य है। यह आत्मा जिसका वरण करता है उसी के द्वारा ‘यह’ लभ्य है, उसी के प्रति यह ‘आत्मा’ अपने कलेवर को अनावृत करता है।

– कठोपनिषद १.२.२३;

(२) वह मंत्र जो बताता है कि जीव (आत्मा) रथ का स्वामी है, शरीर रथ है, बुद्धि सारथि है, मन लगाम है, इन्द्रियाँ घोड़े हैं –

आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव च। बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ॥

अपनी आत्मा को रथी, शरीर को रथ, बुद्धि को सारथि तथा मन को ही लगाम जानना चाहिए ॥

– पैंगलोपनिषद् ४.३)

(३) यह तथ्य कि परमपुरुष हृदय की गुफा में अँगूठे के आकार के प्रकाश के रूप में निवास करते हैं;

(४) दीप आराधना (कपूर जलाने) के दौरान जपा जाने वाला मंत्र: अर्थात, भगवान की उपस्थिति में, सूर्य, चंद्रमा, तारे और अग्नि सभी अपनी चमक खो देते हैं, जिसका अर्थ है कि, चूँकि वे (भगवान ही) अपनी चमक के स्रोत हैं, अतः ये सभी (प्रकाशित ब्रह्माण्डी पिण्ड) उन (भगवान् – प्रकाश के मूल स्रोत) पर प्रकाश नहीं डाल सकते;

(५) चूँकि हमारी दुर्बल बुद्धि महाबुद्धि से उत्पन्न हुई है, इसलिए हम उन्हें बौद्धिक रूप से नहीं समझ सकते;

(६) वह उलटा वृक्ष जिसका उल्लेख भगवान कृष्ण ने गीता में किया है – संसार या सांसारिक अस्तित्व का अश्वत्थ वृक्ष;

(७) यह तथ्य कि यदि हृदय से उत्पन्न सभी इच्छाएँ नष्ट हो जाएँ, तो मनुष्य यहीं और अभी अमर हो जाता है और ब्रह्म के आनंद का आस्वादन करता है । ये सभी बातें जो आजकल अक्सर उद्धृत की जाती हैं, कठोपनिषद से हैं ।

प्रश्न, मुंडक और मांडूक्य

कठोपनिषद के बाद आने वाले तीन उपनिषद, प्रश्न, मुंडक और मांडूक्य, अथर्ववेद से संबंधित हैं । प्रश्न का अर्थ है प्रश्न । सृष्टि की शुरुआत कैसे हुई ? देवता कौन हैं ? जीवन शरीर से कैसे जुड़ता है ? जाग्रत, सुषुप्ति और स्वप्न की अवस्थाओं का सत्य क्या है ? ओंकार की उपासना का क्या लाभ है ? पुरुष और जीव के बीच क्या संबंध है ? चूँकि यह इन छह प्रश्नों का उत्तर देता है, इसलिए इस उपनिषद का नाम प्रश्नोपनिषद है ।

मुंडक का अर्थ है मुंडा हुआ सिर – मुंडन । मुण्डकोपनिषद् का पालन संन्यासियों जैसे परिपक्व मन और आसक्ति से मुक्त स्वभाव वाले व्यक्तियों को करना चाहिए । यह उपनिषद् अक्षर ब्रह्म की चर्चा करता है, जिसका अर्थ है वह जो क्षय या विलयन से मुक्त हो । “अक्षर” का अर्थ ध्वनि या अक्षर भी होता है । हम पंचाक्षर (पाँच अक्षर) और अष्टाक्षर (आठ अक्षर) की बात करते हैं । प्रणव (ओंकार) अक्षर का मूल है । लक्ष्य या उद्देश्य, जिसे अक्षर ब्रह्म कहा जाता है, तक पहुँचने के लिए अक्षर या ‘ॐ’ अक्षर मुख्य भूमिका निभाता है । यह उपनिषद् कहता है कि आत्मा के बाण को ओंकार के धनुष से ब्रह्म के लक्ष्य पर बिना डगमगाए छोड़ा जाना चाहिए ताकि वे (बाण और लक्ष्य) संयुक्त होकर एक हो जाएँ ।

प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्मतल्लक्ष्यमुच्यते ।
अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत् तन्मयो भवेत् ॥ ४॥

ओम धनुष है; आत्मा तीर है; ब्रह्म को चिह्न कहा गया है । इसे अविचलित मन द्वारा छोड़ना है । तब आत्मा ब्रह्म के साथ एक हो जाती है, जैसे तीर लक्ष्य के साथ एक हो जाता है ।

– मुंडकोपनिषद २.४

यह बात भी इसी उपनिषद में है जिससे निम्नलिखित कल्पना प्रकट होती है; जीवात्मा और परमात्मा शरीर नामक पीपल के पेड़ पर रहने वाले दो पक्षी हैं । जीवात्मा पक्षी (कार्य का) फल खाता है जबकि परमात्मा पक्षी केवल साक्षी (साक्षी) बना रहता है ।

वर्तमान में हमारे देश का आदर्श वाक्य (सत्यमेवजयते) – सत्य की ही जीत होती है – मुंडक उपनिषद का एक मंत्र है ।

सत्यमेव जयते नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयानः ।
येनाक्रमन्त्यृषयो ह्याप्तकामा यत्र तत्‌ सत्यस्य परमं निधानम्‌ ॥

‘सत्य’ की ही विजय होती है असत्य की नहीं; ‘सत्य’ के द्वारा ही देवों का यात्रा-पथ विस्तीर्ण हुआ, जिसके द्वारा आप्तकाम ऋषिगण वहां आरोहण करते हैं जहाँ ‘सत्य’ का परम धाम है ।

– मुंडकोपनिषद ३.६

यहाँ उन संन्यासियों के बारे में भी एक मंत्र है जो इस जीवन में जीवन-मुक्त हैं और शरीर से मुक्त होने पर (मृत्यु के बाद) भी मुक्त ही रहते हैं । संन्यासियों को पूर्ण कुंभ (जल से भरा घड़ा) से सम्मानित करते समय यह मंत्र उच्चारित किया जाता है । इस उपनिषद में कहा गया है कि जिस प्रकार विभिन्न नामों वाली नदियाँ समुद्र में गिरने पर अपनी अलग पहचान खोकर स्वयं समुद्र बन जाती हैं, उसी प्रकार ज्ञानी भी अपने नाम और रूप खोकर परम पुरुष में एकाकार हो जाते हैं ।

यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रेऽस्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय ।
तथा विद्वान् नामरूपाद्विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥

– मुंडकोपनिषद ३.८

अगला है माण्डूक्य उपनिषद । माण्डूक का अर्थ है मेंढक । इसे मेंढक उपनिषद क्यों कहा जाता है ? एक कारण यह प्रतीत होता है कि मेंढक को हर सीढ़ी नहीं चढ़नी पड़ती । वह पहली से चौथी सीढ़ी तक छलांग लगा सकता है । यह उपनिषद जागृति, स्वप्न (स्वप्न) और सुषुप्ति (निद्रा) की तीन अवस्थाओं को पार करके ‘तुरीय’ या चौथी अवस्था तक पहुँचने का मार्ग बताता है । इसमें कहा गया है कि ओंकार की आराधना से एक ही छलांग में अंतिम अवस्था तक पहुँचा जा सकता है । क्या इसीलिए इसे मेंढक उपनिषद कहा जाता है ?

कुछ लोग कहते हैं कि यह उपनिषद उन जनजातियों से संबंधित था जिन्होंने मेंढक को प्रतीक (माण्डूक्य) के रूप में अपनाया था । यह भी कहा जाता है कि जिस ऋषि को यह उपनिषद एक रहस्योद्घाटन था, वे मेंढक के रूप में (स्वयं देव) ‘वरुण’ थे ।

यह सभी उपनिषदों में सबसे छोटा है । इसमें केवल बारह मंत्र हैं । लेकिन, प्रसिद्धि और प्रभावकारिता के कारण, इसका एक विशेष स्थान है । यह प्रणव के चार भागों का उपयोग करके इस सिद्धांत को स्थापित करता है कि जीवात्मा और परमात्मा एक ही हैं । यह चौथे और अंतिम चरण को “शिवम अद्वैतम्” (सुंदर और बिना किसी क्षण के) रूप में वर्णित करने के लिए भी प्रसिद्ध है, जहां अंततः सारी सृष्टि सिमट जाती है ।

नान्तःप्रज्ञं न बहिष्प्रज्ञं नोभयतःप्रज्ञं न प्रज्ञानघनं न प्रज्ञं नाप्रज्ञम्‌।
अदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणमचिन्त्यमव्यपदेश्यमेकात्मप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः ॥

वह न अन्तःप्रज्ञ है न बहिष्प्रज्ञ है, न उभय-प्रज्ञ अर्थात् अन्तः एवं बहिष्प्रज्ञ एक साथ है, न वह प्रज्ञान-घन है, न प्रज्ञ (ज्ञाता) है, न अप्रज्ञ (अज्ञाता) । वह जो अदृष्ट है, अव्यवहार्य है, अग्राह्य है, अलक्षण है, अचिन्त्य है, अव्यपदेश्य अर्थात् अनिर्देश्य है, ‘आत्मा’ के ऐकान्तिक अस्तित्व का बोध ही जिसका सार है, ‘जिसमें’ समस्त प्रपञ्चात्मक जगत् का विलय हो जाता है, जो ‘पूर्ण शान्त’ है, जो ‘शिवम्’ है-मंगलकारी है, और जो ‘अद्वैत’ है, ‘उसे’ ही चतुर्थ (पाद) माना जाता है; ‘वही’ है ‘आत्मा’, एकमात्र ‘वही’ ‘विज्ञेय’ (जानने योग्य तत्त्व) है ।

– माण्डुक्योपनिषद् ५.७

आदि शंकर के गुरु के गुरु जिन्हें गौड़पादाचार्य कहा जाता है, ने “माण्डुक्य उपनिषद कारिका” में इस उपनिषद की विशद व्याख्या की है । आदि शंकराचार्य ने इस उपनिषद कारिका पर एक भाष्य लिखा है ।

तैत्तरीय उपनिषद

किसी भी अन्य उपनिषद की तुलना में, इस उपनिषद का व्यापक अध्ययन किया जाता है । अधिकांश अनुष्ठानों (कर्मानुष्ठान) में प्रयुक्त मंत्र इसी उपनिषद से लिए गए हैं । शिक्षावल्ली, आनंदवल्ली और भृगुवल्ली इस उपनिषद के तीन भाग हैं ।

शिक्षावल्ली शिक्षा प्रदान करने के विविध पहलुओं से संबंधित है । यह भाग ब्रह्मचर्य में निहित संयमों के नियंत्रण और उसकी महिमा, वेदों के अध्ययन का क्रम, प्रणव की उपासना आदि की शिक्षा देता है । आवाहन्ति होम, जिसे गुरु इस आह्वान के साथ करते हैं कि शिष्य बिना किसी संयम के आएँ और वेद ग्रहण करें, इसी उपनिषद से है ।

“सत्य बोलो”, “धर्म का पालन करो” (सत्यं वद, धर्मं चर) जैसे उपदेश केवल इसी उपनिषद में आते हैं । वेदों का अध्ययन और अपने धर्म का पालन कभी नहीं छोड़ना चाहिए । संसार में इन्हें चिरस्थायी बनाए रखने के लिए, व्यक्ति को विवाह करना चाहिए और संतान उत्पन्न करनी चाहिए ताकि धर्म की मशाल आगे बढ़ाई जा सके, या जैसा कि उपनिषद में कहा गया है, निरंतरता के सूत्र को तोड़े बिना ऐसा करना चाहिये । माता, पिता, गुरु और अतिथियों को देवताओं के समान मानना ​​चाहिए । (मातृ देवो भव, पितृ देवो भव, आचार्य देवो भव) – ये मंत्र केवल यहीं मिलते हैं । इस उपनिषद की शिक्षाओं में दान और कर्तव्य (धर्म) के गुणों का गुणगान किया गया है ।

इस उपनिषद का वह भाग जिसमें ब्रह्मानंद में परिणत होने वाले आनंद के आरोही क्रम का समावेश है, आनंदवल्ली है । अन्नमय कोष (भोजन का आवरण) वह शरीर है जो पोषण पर पलता है; प्राणमय कोष (जीवन) जो इसके अंदर सांस लेता है; मनोमय कोष (मन) जो विचारों का निर्माण करता है; और, इसके अंदर, विज्ञानमय कोष (ज्ञान), जो सही और गलत में अंतर करता है, ये चार कोष हैं । आनंदमय कोष इनके मूल में है । उपनिषद के इस भाग में यह बताया गया है कि आत्मा किस प्रकार अपने प्राकृतिक तत्व और आनंद की अवस्था में यहाँ निवास करती है ।

प्रत्येक कोश को एक पक्षी के रूप में ‘मानवीकृत’ किया गया है और शिक्षाएँ रूपकात्मक रूप से पक्षी के सिर, बाएँ पंख, दाएँ पंख, शरीर और पूँछ आदि का वर्णन करती हैं । बहुधा उद्धृत “यतो वाचो निवर्तन्ते” और “जिस व्यक्ति ने ब्रह्म की उस आनंदमय अवस्था को प्राप्त कर लिया है, जहाँ पहुँचे बिना वाणी और मन लौट जाते हैं, उसे किसी बात का भय नहीं है” जैसे मंत्र इसी उपनिषद में आते हैं ।

“यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह । आनंदं ब्रह्मणो विद्वान् न बिभेति कदाचन ॥”

भृगुवल्ली वह है जो वरुण ने अपने पुत्र भृगु को सिखाया था । यद्यपि सिखाने (उपदेश) जैसा शब्द का प्रयोग किया गया है, इसका अर्थ यह नहीं है कि गुरु ने ही सभी पाठों को स्वयं ही लिखवाया था । गुरु, वरुण, अपने पुत्र को व्यक्तिगत रूप से गहन अन्वेषण करने और उसके गहन परिणामों का प्रत्यक्ष अनुभव करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं । इस प्रकार भृगु स्वयं तपस्या करते हैं और सर्वप्रथम अन्नमय कोष अर्थात् शरीर को परम सत्य मानते हैं, परन्तु अपनी तपस्या जारी रखते हुए वे क्रमशः प्राणमय (जीवन), मनोमय (मन) और विज्ञानमय (ज्ञान) नामक प्रत्येक अवस्था से ऊपर उठते हैं और आनंदमय अवस्था – आनंदमय – तक पहुँचते हैं, वह अवस्था जहाँ अनुभव द्वारा उन्हें यह ज्ञात होता है कि आनंद ही परम सत्य है ।

इसका अर्थ यह नहीं है कि उपनिषद सामान्य सांसारिक जीवन को तुच्छ समझते हैं जो शरीर – अन्नमय – के स्तर पर ही रुक जाता है । सांसारिक लक्ष्यों का पीछा करते हुए भी व्यक्ति को सर्वोच्च सत्य को समझना चाहिए ।

धार्मिक जीवन जीते हुए, इस जीवन को एक साधन (उपाय) के रूप में मानना ​​चाहिए – मानो उच्चतर अवस्थाओं तक पहुँचने का एक साधन है । इसीलिए आनंद की अवस्था – आनंदमय कोष – तक पहुँचने के बाद, उपनिषद यह उद्घोषणा करता है कि “भोजन को तुच्छ न समझें; भोजन को बर्बाद न करें; अधिक अन्न उगाएँ” इत्यादि । ग्रन्थ इस प्रकार समाप्त होता है: “ज्ञानी सोचता है कि वह ही भोजन है, वह जो उसे खाता है, वह जिसने भोजन और उसके भक्षक के बीच संबंध स्थापित किया है और वह इस विचार से प्रसन्नतापूर्वक गाता है कि ईश्वर और वह भी एक ही हैं ।”

ऐतरेय उपनिषद

अगला उपनिषद ऐतरेय है, जो ऐतरेय आरण्यक के अंत में आता है । इसे यह नाम इसलिए दिया गया है क्योंकि इसका प्रयोग इतरेय नामक ऋषि के माध्यम से हुआ था । यह उपनिषद इस बात का वर्णन करता है कि जीव किस प्रकार पिता से माता के गर्भ में प्रवेश करता है, फिर संसार में जन्म लेता है, पाप-पुण्य के अनुसार विभिन्न लोकों में बार-बार जन्म लेता है और किस प्रकार आत्मा के स्वरूप को जानने मात्र से ही जन्म और जीवन से मुक्ति संभव है । इसमें बताया गया है कि कैसे वामदेव नामक एक ऋषि आए और उन्होंने सभी दीवारों को लांघकर आकाश में ऊँची उड़ान भरने वाले पतंग की तरह मुक्ति की ओर उड़ान भरी । इस उपनिषद में प्रज्ञान या आत्मा के वास्तविक मानसिक अनुभव का ऊँचे शब्दों में वर्णन किया गया है । यह कहना सही नहीं है कि ब्रह्म की अनुभूति विचार की ऐसी प्रक्रिया से होती है । “विचार (प्रज्ञान) ही ब्रह्म है” ऋग्वेद का सबसे महत्वपूर्ण संदेश है ।

छांदोग्य उपनिषद

दस उपनिषदों में से अंतिम दो, छांदोग्य और ब्रह्दारण्यक, आकार में बहुत बड़े हैं । ये दोनों मिलकर शेष आठ उपनिषदों से भी बड़े हैं ।

सामवेद के छांदोग्य ब्राह्मण में जो लिखा है, वह छांदोग्य उपनिषद है । ‘छांदोग्य’ का अर्थ है साम गान करने वाला ।

कहा जाता है कि जिस प्रकार भगवद्गीता में कठोपनिषद का व्यापक रूप से प्रयोग किया गया है, उसी प्रकार छांदोग्य उपनिषद के मंत्र व्यास के ब्रह्म सूत्र के लिए मुख्य प्रमाण हैं ।

छांदोग्य और ब्रह्दारण्यक में कई ऋषियों के संयुक्त संदेश समाहित हैं ।

आरंभ में, छांदोग्य ने ‘ओंकार’ को उद्गाता नाम दिया है और इसके अध्ययन (उपासना) का विस्तृत विवरण दिया है । अनेक विद्याओं या अनुशासनों का उल्लेख मिलता है, जैसे अक्षि विद्या – आकाश विद्या, मधु विद्या, सांडिल्य विद्या, प्रामा विद्या, पंचाग्नि विद्या, आदि । ये विभिन्न तरीकों से परमात्मा तत्व को समझने में सहायता करती हैं ।

शीर्ष पर दहार विद्या प्रकट होती है । जीव (आत्मा) अपने भीतर के छोटे से आकाश में उस असीम आकाशीय विस्तार का साक्षात्कार करता है जो दहार विद्या में परमात्मा है ।

इस उपनिषद में सत्य का उपदेश अनेक रोचक कथाओं के माध्यम से दिया गया है । छांदोग्य उपनिषद में सत्यकाम की कथा आती है, जो एक ऐसा बालक था जो अपने वंश को नहीं जानता था, परन्तु उसने इस तथ्य को छिपाया नहीं । परिणामस्वरूप, गौतम ने उसे उत्तम ब्राह्मण कुल का समझा और उसे अपना शिष्य बना लिया । सत्यकाम के पूर्व गुरु ने उसकी अनेक परीक्षाएँ लीं । यहाँ तक कि उसकी (गुरु की) पत्नी भी सत्यकाम की ओर से मध्यस्थता करती है । जब यह सब उपनिषद में देखा जाता है, तो ऐसा लगता है मानो उपनिषद प्राचीन गुरुकुल जीवन को चलचित्र की तरह हमारे सामने प्रस्तुत कर देता है । सत्यकाम के ठीक विपरीत, ब्रह्मचारी श्वेतकेतु, जो ज्ञान के अभिमान से फूले नहीं समा रहे थे, को पहले उनके पिता उदालक आरुणि ने विनम्र बनाया और अंत में उन्हें जीव और ब्रह्म के बीच अभेद का उपदेश दिया, जो “तत् त्वम् असि” (वह तुम हो) की उक्ति में निहित है । यही वह बिंदु है जहाँ सामवेद का महावाक्य या सर्वोच्च संदेश उच्च स्वर को छूता है । श्वेतकेतु के विपरीत, महर्षि नारद आत्मा के सत्य को समझने के लिए व्यर्थ में संघर्ष कर रहे थे, हालाँकि उन्होंने सभी शास्त्रों को त्रुटिरहित रूप से सीख लिया था । इसी उपनिषद में है कि उन्होंने ऋषि सनत्कुमार से इस रहस्य की शिक्षा ग्रहण की थी । तैत्तरीय की तरह, जो अनामय कोष (शरीर) से शुरू होकर विषय को और भी ऊँचा उठाता है, सनत्कुमार भी आहार शुद्धि से शुरू होकर मन/आत्मा की शुद्धि तक जाते हैं, जहाँ बंधन टूटेगा और आत्मानंद की प्राप्ति होगी ।

बृहदारण्यक

बृहदारण्यक उपनिषद सभी उपनिषदों में सबसे बड़ा है । ‘बृहदा’ का अर्थ है बड़ा । सामान्यतः एक उपनिषद आरण्यक के अंत में आता है । इसके अपवाद के रूप में, ईशावास्य उपनिषद शुक्ल यजुस् संहिता में ही आता है । उसी शुक्ल यजुस् में, एक संपूर्ण आरण्यक के रूप में (बाद वाले भाग के बजाय संपूर्ण आरण्यक), ब्रह्दारण्यक उपनिषद है ।

इसके दो संस्करण हैं । एक माध्यंदिन शाखा में है और दूसरी काण्व शाखा में । आदि शंकराचार्य ने काण्व शाखा के संस्करण पर ही भाष्य लिखे हैं ।

इसमें छह अध्याय हैं। पहले दो को मधु कांड कहा जाता है; अगले दो को याज्ञवल्क्य के नाम पर मुनि कांड कहा जाता है और अंतिम दो को खिल कांड कहा जाता है ।

मधु को आनंद की मधुर रसमय अवस्था के रूप में लिया जा सकता है । यदि यह समझ लिया जाए कि सब कुछ परमात्मा की अभिव्यक्ति है, तो जीवों को यह सारा संसार मधु के समान मधुर लगेगा । जीव भी संसार के लिए मधुर होंगे । मधु कांड में इसी विषय पर चर्चा की गई है ।

इसी उपनिषद में आत्मा का नकारात्मक रूप से वर्णन “यह नहीं, यह नहीं” के रूप में किया गया है – अर्थात इसे यह या वह नहीं कहा जा सकता (4.4.22) । यह हमारे ज्ञात किसी भी पदार्थ के समान नहीं है । इसे ‘नेति नेति’ वाद या नकारात्मक तर्क कहा जाता है । परंतु संयोजन के व्याकरणिक नियम के अनुसार, न + इति (यह नहीं) मिलकर ‘नेति’ बन जाता है जिसका अर्थ है ‘वह जिसका वर्णन न किया जा सके । ‘नेति सिद्धांत’ के अनुसार, पहले संसार, शरीर और मन का त्याग करना होगा और आत्मा को शब्दों द्वारा वर्गीकरण या वर्णन से परे अनुभव करना होगा । इस अनुभूति के बाद, भाव या अनुभूति यह होगी कि यह दृश्य जगत और सभी प्राणी भी आनंदरस या आनंद के रस से बने हैं ।

बृहदारण्यक का आरंभ “असतो मा सत् गमय” मंत्र से होता है, जिसे आजकल प्रार्थना के रूप में दोहराया जाता है । इसका अर्थ है: “मुझे नाशवान से अविनाशी की ओर ले चलो” ।

पहला सर्ग (काण्ड) इस बात का वर्णन करता है कि गार्ग्य नामक ब्राह्मण ने क्षत्रिय राजा अजात शत्रु से किस प्रकार शिक्षा प्राप्त की । इस उपनिषद से ज्ञात होता है कि अजात शत्रु और जनक जैसे राजा ब्रह्मज्ञानी या सिद्ध आत्मा थे । इसी प्रकार, गार्गी (एक महिला) के संदर्भ से, जिन्होंने जनक की विद्वत्सभा में ऋषियों के साथ समान स्तर पर चर्चा में भाग लिया था, हमें पता चलता है कि स्त्रियाँ भी ब्रह्मवादिनी थीं – जो ब्रह्म के स्वरूप पर चर्चा करने में सक्षम थीं । इस उपनिषद में याज्ञवल्क्य की दो पत्नियाँ वर्णित हैं, जिनमें से एक कात्यायनी संसार की एक साधारण स्त्री थीं और दूसरी मैत्रेयी ब्रह्मवादिनी (दार्शनिक) थीं । याज्ञवल्क्य द्वारा मैत्रेयी को दिए गए उपदेश इस उपनिषद में मधुकाण्ड और मुनिकाण्ड के रूप में दो बार दोहराए गए हैं, लेकिन दोनों में थोड़ा सा अंतर है । यह एक उपाख्यान और दर्शन का एक सुंदर मिश्रण है ।

याज्ञवल्क्य घर छोड़कर संन्यासी बनने का निश्चय करते हैं और अपनी संपत्ति दोनों पत्नियों के बीच बाँट देते हैं । कात्यायनी संपत्ति के अपने हिस्से से संतुष्ट हैं । लेकिन मैत्रेयी पूछती हैं: “आप संन्यास केवल इसलिए लेने जा रहे हैं क्योंकि यह इस सारी संपत्ति से अधिक सुख प्रदान करता है । उस सुख का स्वरूप क्या है ? आप मुझे यह क्यों नहीं बताते ?” याज्ञवल्क्य उत्तर देते हैं, “आप मुझे सदैव प्रिय रही हैं । इस प्रश्न से, आप मुझे और भी प्रिय हो गई हैं,” और इस प्रकार उपदेश देना शुरू करते हैं ।

वह ‘प्रिय’ (प्रेम) और लगाव की अवधारणा पर विस्तार से प्रकाश डालते हैं । “पत्नी का पति के प्रति जो प्रेम है, पति का पत्नी के प्रति जो प्रेम है, उसी प्रकार बच्चों के प्रति जो प्रेम है, धन के प्रति जो प्रेम है – ये सभी प्रकार के प्रेम वस्तुतः पति, पत्नी, बच्चों या धन से उत्पन्न नहीं होते, अपितु प्रेम करने से आत्म-संतुष्टि होती है । प्रेम की भावना में व्यक्ति लिप्त होता है, क्योंकि इससे आत्मा को सुख मिलता है । तो क्या इसका अर्थ यह नहीं है कि आत्मा का स्वरूप प्रेम, सुख है ? इसे एकांत में सीखने के लिए, अब तक जो भी निकट और प्रिय रहा है, उसे त्यागकर संन्यासी बनना होगा । इसका स्वरूप जानने के बाद, यह स्पष्ट हो जाएगा कि इसके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है । सभी समान रूप से प्रिय हो जाएँगे । पहले जब कुछ वस्तुओं के प्रति आसक्ति थी, तो अन्य भिन्न वस्तुओं के प्रति अरुचि भी प्रकट होती थी । यदि अब इन सबको बीच में ही छोड़ दिया जाए और आत्मा का साक्षात्कार हो जाए, तो भेद (ऊँच-नीच) का भाव मिट जाएगा । सभी आत्मा की अभिव्यक्तियाँ प्रतीत होंगी, और कुछ वस्तुओं के प्रति अरुचि के स्थान पर, सभी के प्रति प्रेम का स्थान ले लेगा ।” इस प्रकार शिक्षा दी गई है ।

मुनि काण्ड बताते हैं कि संन्यासी बनने से पहले याज्ञवल्क्य ने राजा जनक की सभा में कहोला, उद्दालक आरुणि, गार्गी आदि के साथ दार्शनिक चर्चा की थी और बाद में उन्होंने राजा जनक को भी ज्ञान प्रदान किया था । अन्तर्यामी (परमात्मा का सूक्ष्म आंतरिक अस्तित्व) के सिद्धांत का प्रमाण, जो विशिष्टाद्वैत दर्शन (रामानुज के संशोधित अद्वैतवाद) की प्रमुख विशेषता है, याज्ञवल्क्य द्वारा उद्दालक आरुणि को दिए गए उत्तर में निहित है । इस सिद्धांत का सार यह है कि अद्वैत के विपरीत, जो संपूर्ण प्रत्यक्ष जगत को माया मानता है, यदि जगत को शरीर माना जाए, तो परमात्मा उसमें प्राण के समान निवास करते हैं । यद्यपि याज्ञवल्क्य कुछ हद तक इसे सीमित रूप से स्वीकार करते हैं, अधिकतर पूर्ण अद्वैत की ही बात करते हैं । मैत्रेयी को दिए गए अपने उपदेशों का समापन करते समय, वे पूर्णतः अद्वैतवादी हैं ।

“कोई ‘वस्तु’ दृष्टि, श्रवण, स्वाद, गंध और विचार की अनुभूति कैसे उत्पन्न कर सकती है, उसे देखा, सुना, चखा, सूंघा और विचारा जा सकता है और वह भी किस माध्यम से ?” – इस प्रकार वे अविभाजित एकात्मक भाव की बात करते हैं । जनक को भी वे अद्वैत का प्रतिपादन करते हैं ।

इस उपनिषद के अंतिम दो अध्याय विभिन्न स्थानों पर बिखरे हुए अनेक संदेशों को समेकित करते हैं और इसीलिए इसे ‘खिला’ काण्ड कहा जाता है । (यदि कोई वस्तु बिखरी हुई हो, तो उसे ‘खिला’ कहा जाता है । अखिल का अर्थ है बिखरा हुआ नहीं, बल्कि एक साथ ।)

खिला काण्ड में एक उपाख्यान इस बात से संबंधित है कि साधकों के सापेक्ष गुण के आधार पर, एक ही संदेश की तीन अलग-अलग व्याख्या कैसे की जा सकती है । देवता, मनुष्य और असुर, प्रजापति से निर्देश मांगते हैं । वे अपनी शिक्षा के रूप में एक शब्द ‘द’ प्रदान करते हैं । जिन देवताओं में आत्म-संयम का अभाव होता है, वे इसका अर्थ “दमयत” अर्थात् नियंत्रण या संयम मानते हैं । मनुष्य, जिनका स्वभाव संपत्ति संचय करना है, ‘द’ को दान के रूप में लेते हैं । असुर, जिनका स्वभाव क्रूरतापूर्ण है, ‘द’ को “दयात्वम्” अर्थात् दया या करुणा का सूचक मानते हैं ।

बृहदारण्यक उपनिषद के अंत में एक मंत्र आता है जो मुझको मोहित करता था और सांत्वना देता था । यह मंत्र क्या कहता है ?

यदि कोई रोगी ज्वर से पीड़ित हो, तो उसे उसका महान तप माना जा सकता है । यदि कोई रोग और विपत्ति को इस प्रकार समझ ले, तो वह मृत्यु के पश्चात स्वर्ग को प्राप्त होगा, ऐसा इस मंत्र में कहा गया है (ब्रह्मउपनिषद ५.११.१) ।

यह बात समझ में नहीं आती । यहाँ क्या कहा जा रहा है या क्या सांत्वना दी जा रही है ? मैं समझाता हूँ ।

व्रत (स्व-निर्धारित तप) द्वारा शरीर को संस्कारित करने से न केवल शरीर के प्रति अत्यधिक प्रेम से मुक्ति मिलती है, बल्कि पूर्व पापों का प्रायश्चित भी होता है । तप या कठोर तपस्या पूर्वजन्मों के पापों का प्रायश्चित है । शरीर द्वारा पूर्व में किए गए पापों का प्रायश्चित केवल शारीरिक कष्ट से ही करना पड़ता है ।

इसीलिए पुराणों में उन्नत आत्माओं द्वारा भी तप करने का उल्लेख मिलता है ।

स्वयं देवी माँ अम्बिका ने परमेश्वर की सलाह पर ध्यान न देकर दक्ष द्वारा किए जा रहे यज्ञ में भाग लिया । उन्हें अपमानित होना पड़ा और उन्होंने वहीं अपना शरीर त्याग दिया । वे पुनः हिमालय के स्वामी हिमवान की पुत्री के रूप में प्रकट हुईं । उन्हें विश्वास था कि जब तक वे अपने पति की सलाह की अवहेलना करने के अपने पूर्व पाप का उचित प्रायश्चित नहीं करेंगी, तब तक उन्हें पुनः वही पति नहीं मिल पाएगा । कालिदास ने “कुमार संभवम्” में इसका सुंदर और मार्मिक वर्णन किया है । शीतकाल में हिमालय की चोटियाँ कितनी ठंडी होती होंगी । वे बर्फ की सिल्लियों पर बैठकर या झीलों के ठंडे पानी में खड़ी होकर तपस्या करती थीं । ग्रीष्म ऋतु में, तपती धूप में, वह खुद के चारों ओर अग्नि प्रज्वलित करती थीं और उसी उद्देश्य से बीच में बैठती थीं । चूँकि चारों ओर की चार अग्नियों के अतिरिक्त, ऊपर जलता हुआ सूर्य भी था, इसलिए इसे “पंचाग्नि तप” कहा जाता है । अनेक महापुरुषों ने इसी प्रकार की तपस्या की है ।

हममें न तो उनकी तपस्या का एक करोड़वाँ भाग करने की इच्छाशक्ति है और न ही क्षमता । फिर हमारे पाप कैसे धुलेंगे ?

टाइफाइड, निमोनिया और ऐसे ही अन्य ज्वर जिनका तापमान 105, 106 डिग्री फ़ारेनहाइट होता है, शरीर को असहनीय गर्मी से तबाह कर देते हैं । शुक्र है कि ईश्वर ने हमें यह ज्वर भेजा है क्योंकि हमने पंचाग्नि तप नहीं किया है – यही हमारी सांत्वना होनी चाहिए ।

इसलिए किसी भी बीमारी या चोट को तप समझना चाहिए – वह तप नहीं जिसे हमने स्वेच्छा से किया हो, बल्कि ईश्वर द्वारा हम पर थोपा गया हो ।

अभ्यास से यह मानसिकता कठोर होने लगेगी । इस प्रकार हममें रोग या बीमारी को धैर्यपूर्वक सहने की क्षमता विकसित हो जाएगी । हमें अपने पिछले बुरे कर्मों के प्रभाव को नष्ट करने के लिए स्वतः प्राप्त अवसर को अस्वीकार नहीं करना चाहिए । हम “तितीक्षा” की उस उच्च अवस्था को प्राप्त कर लेंगे जहाँ कष्ट, कष्ट जैसे प्रतीत ही नहीं होते ।

उपनिषद का मंत्र यही सब संक्षेप में कहता है । यह मंत्र उस समय ईश्वर द्वारा हमें दिए गए उस मरहम की तरह काम करता है, जो हमें तपस्या के बदले में विशेष रूप से तब मिलता है जब हमें लगता है कि “हमने बहुत बड़े पाप किए हैं, लेकिन उनके प्रायश्चित के लिए कोई व्रत या तप नहीं कर रहे हैं, हम न केवल उन्हें करने में असफल हैं, बल्कि हम उन्हें करने में सक्षम भी नहीं हैं ।”

बृहदारण्यक के अंतिम अध्याय में, जो दस उपनिषदों का भी अंत है, मानो इस बात पर ज़ोर देने के लिए कि वेदांत कर्मकांड का बिल्कुल भी विरोधी नहीं है, पंचाग्नि विद्या और संतान – अच्छी संतान – की इच्छा रखने वाले गृहस्थों के कर्तव्यों की बात की गई है ।

हरिः हरः!!

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