कि वेद आ वेदान्त मे टकराव अछि ?
वेदक कर्मकांड या कर्म सम्बन्धित रीति वला भाग मे जे किछु करबाक सलाह देल गेल अछि, तेकरा उपनिषद जे कि ज्ञानकांड केर निर्माण करैछ, से त्याग करय के प्रयत्न लेल कहैत अछि । कर्मकांड मे, वेद मनुष्य केँ देवता सभक पूजा करबाक आदेश दैत अछि आर एहेन पूजा-अर्चनाक विधि-विधान (प्रक्रियात्मक विवरण) सेहो निर्धारित करैत अछि । दोसर दिश, उपनिषद मे, वैह वेद यज्ञ करयवला केँ गाय – बुद्धिहीन व्यक्ति – केर रूप मे अपमानित करैत अछि ।
वेदक आरंभ मे जे प्रकट होइत अछि, वैह अन्त मे अस्वीकार कय देल जाइछ । ई वास्तव मे अजीब लगैत अछि ।
एक पक्ष पूर्णतः कर्म छी, दोसर पूर्णतः ज्ञान (ज्ञान-बुद्धि) आर पूरापूरी अलग । एतबा टा नहि, सामान्य प्रयोग मे, ‘वेद’ शब्दक अर्थ कर्मकांड आर ‘वेदांत’ या उपनिषदक अर्थ ज्ञानकांड भ’ गेल अछि ।
भगवान कृष्ण भगवद्गीता मे केवल वेदान्तक उपदेश देलनि अछि । आमतौर पर कहल जाइत अछि जे गौतम बुद्ध आर महावीर वेदक कर्म काण्ड केर निन्दा करयवला अग्रणी छलथि । ई सत्य नहि अछि । भगवान कृष्ण हिनका दुनू सँ बहुत पहिनहिं एना एकय चुकल छथि । ओ अर्जुन सँ कहैत छथि, “वेद तीन गुण, सत्व-रज-तमस, सँ सम्बन्धित अछि । अहाँ केँ एकटा एहेन अबस्था तक पहुँचय पड़त जे तीन गुण सँ परे हो ।”
त्रैगुण्य विषयवेद निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन
ओ आगू कहैत छथि, “जे लोक वेद केर वचन केँ सीमित आ शाब्दिक अर्थ मे पालन करैत अछि, ओ स्वर्ग मे निवास करबाक इच्छा (काम) सँ प्रेरित होइत अछि, जे भोग प्रदान करैछ । (११-४४)” ई (वैदिक कर्म) ओहि स्थिर मनःस्थितिक दिश नहि लय जायत जे पारलौकिक ध्यान (समाधि) द्वारा उत्पन्न होइत छैक ।
वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीतिवादिन (११-४२)
कामात्मानः स्वर्गपर जन्मकर्मफलप्रदम् (११-४३)
व्यवसायात्/मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते (११-४४)
किछु लोक कहि सकैत अछि जे एतय विरोधाभास छैक । हम पहिनहिं देखि चुकल छी जे वेद टा समस्त धर्म (धार्मिक कर्म) केर मूल थिक । यदि ध्यानपूर्वक जाँच कयल जाय, त यैह पता चलत जे एतय कोनो वास्तविक विरोधाभास नहि छैक । जाहि स्तर पर हम सामान्य सांसारिक जीवन जिबैत छी, ओहि स्तर पर उपनिषद सभक दर्शन केर पालन करब आ ओकरा व्यवहार मे लायब हमरा सब लेल सम्भव नहि होयत, अर्थात् आत्माक निरपेक्षताक स्थिति केँ बुझबाक लेल, हमरा सब केँ तीनू गुण द्वारा लगायल गेल बन्हन सब केँ तोड़य पड़त तथा अविचल एकाग्रताक संग आत्माक ध्यान करय पड़त । वेद सब मे वर्णित कर्म हमरा सब केँ (क्रमिक रूप सँ) चरणबद्ध ढंग मे ओहि अबस्था धरि लय जेबाक लेल तैयार (डिज़ाइन) कयल गेल अछि । जाबत धरि हम सब संसार केँ ‘सत्य’ मनैत छी, हमरा सब केँ देवता सभक पूजा करबाक चाही जाहि सँ हम सब सुख आ सुविधा पूर्वक रहि सकी । चूँकि हम सब संसार केँ सत्य मनैत छी, तेँ हम सब एहि मे कल्याण सेहो अनैत छी । हम सब इहो मानैत छी जे देवलोक या देवता सभक लोक सेहो एहि संसार जेकाँ सत्य अछि आर देवता लोकनिक प्रसन्न कयकेँ हम सब बदला मे अनेक लाभ भेटैत छैक । एहि संसार जेकाँ, हम सब देवलोक मे सेहो जीवनक आनन्द उठेबाक आशा करैत छी । लेकिन, अगर हम एतहि रुकि जाइत छी, त एकर अर्थ होयत जे हम सब अपन मुख्य लक्ष्य सँ विमुख भ’ गेल छी । सत्य ई छैक जे हमरा सभक उद्देश्य सदा-सदा लेल ईश्वरक संग एकाकार भ’ गेनाय अछि । एकरा बिसरिकय वैदिक कर्म सब सँ भेटयवला अन्य भौतिक लाभ सब सँ सन्तुष्ट होयब मूर्खता होयत ।
सांसारिक अस्तित्व केर स्तर पर, हम सब ईमानदारी सँ ई स्वीकार नहि कय सकैत छी जे संसार ‘मिथ्या’ अछि । वेद कहैत अछि, ‘यदि अहाँ एना सोचैत छी त ई ठीक अछि’, आर तदनुसार वेद एहेन कर्म सब करबाक निर्देश दैत अछि जेकरा कयला सँ सार्वभौमिक कल्याण होयत । वेद हमरा सब केँ पूजा लेल विभिन्न देवता सेहो देलक अछि, कियैक तँ हमरा सभक वर्तमान मनःस्थिति मे हम सब परमात्मा केँ निराकार अवस्था मे नहि बुझि सकैत छी या अद्वैतक बोध नहि सकैत छी (अभेद बारे नहि बुझि सकैत छी) । लेकिन, कर्म करैत समय आ देवता सभक पूजा करैत समय, हमरा सब केँ ई स्पष्ट रूप सँ बुझबाक चाही जे वेद एकर विधान एहि लेल कयलक अछि जाहि सँ कि हमरा सभक मोनक शुद्धता, स्पष्टता आर उद्देश्यक एकनिष्ठता प्राप्त कय सकय आर ओहि अबस्था तक पहुँचि सकय जेतय, जेना हम सब जनैत छी, संसार वास्तविक नहि रहि जाइत छैक तथा सब कर्म समाप्त भ’ जाइत छैक, संगहि ई भावना जे ‘हम’ परमात्मा सँ अलग छी, सेहो समाप्त भ’ जाइत छैक आर हम सब परमात्मा मे विलीन भ’ जाइत छी, एकाकार भ’ जाइत छी ।
यदि हम सब देवता लोकनि द्वारा प्रदान कयल गेल कल्याणक बदला मे यज्ञ करैत छी त ई एकटा सांसारिक कार्य होयत । देवलोक (देवताक लोक) मे सेहो, आत्मसाक्षात्कारी आत्माक अनुभव समान कोनो आनन्द नहि छैक ।
एकर अलावे, संचित पुण्य या नीक कर्म सभक श्रेय समाप्त होइतहि देवलोक मे निवास समाप्त भ’ जाइत छैक फेर व्यक्ति केँ जन्म-मरण केर चक्र मे वापस लौटय पड़त तथा कर्म केर आवश्यकता अनुसार पुनः जन्म लियय पड़त । यद्यपि, आत्माक वर्तमान विकास केर स्थिति केँ ध्यान मे रखिते आ ओकरा धीरे-धीरे उच्चतर प्रयास सभक लेल तैयार करबाक वास्ते, वेद सब द्वारा कर्म आर उपासनाक विधान कयल गेल अछि, तैयो हमरा सब केँ एहि सँ आगू देखबाक आ आगू बढ़बाक प्रयास करबाक निर्देश देल गेल अछि ।
यद्यपि कर्म आर उपासना (कर्मानुष्ठानम्) केर सम्बन्ध मे वेदक आदेश सभक पालन नहि कयनाय उचित नहि अछि, ई कहनाय जे एकरा कहियो नहि छोड़बाक चाही, सेहो गलत अछि । आइ-काल्हि यज्ञ या पारम्परिक तरीका सँ वेदक अध्ययन जेहेन कर्म सब छोड़िकय सीधा उपनिषद सभक अध्ययन दिश जेबाक प्रवृत्ति अछि । परिणामस्वरूप, बहुते रास लोक उपनिषदक विषयवस्तु सँ परिचित भ’ रहल छथि आर बौद्धिक स्तर पर ओहि विषयपर विस्तृत चर्चा सेहो कय पाबि रहल छथि । हालाँकि, एहि सँ एहेन कोनो व्यक्ति उत्पन्न नहि भेल जेकर मन शान्त होइ, जे वासना सब सँ मुक्त हो, या जे व्यवहार मे आत्माक सत्य केँ अनुभव कएने हो । एना कियैक अछि ? एकर कारण ई छैक जे यज्ञ आ उपासना सम्बन्धी वैदिक आदेश सभक पालनक प्रारम्भिक तैयारीक उपेक्षा कयल गेल अछि तथा मन व शरीर केँ अनुशासित नहि कयल गेल अछि । एहि लेल, वेदक अध्ययन आ कर्मकांड नहि करब आ सीधे उपनिषद सभक सत्य केँ आत्मसात करबाक प्रयास करब ओतबहि गल अछि जतेक कि मात्र कर्मकांड करब, ओकर शाब्दिक अर्थ लेब आ उपनिषद सभक बात केँ बुझबाक लेल आगू नहि बढ़ब ।
जखन भगवान कृष्ण जीवित रहथि तथा शिक्षा दय रहल छलथि, तखन अधिकांश लोक केवल वैदिक कर्म करबाक अबस्था टा मे रहय । यैह ओ लोक रहय जिनका कृष्ण दण्डित कयलनि । वेद केर हुनकर निन्दा, जे प्रतीत (आभास) भ’ सकैत अछि, वास्तव मे ओहि लोक सब लेल छल जे वेदक तात्पर्य केँ पूरा नीक सँ बुझि नहि सकल छलथि आ कर्मक स्तर मात्र पर रुकि गेल छलथि । एहि लेल, ई कहनाय गलत अछि जे ओ कर्म केर अभ्यासक निन्दा कएने छलाह । हुनकर अवतार केवल वेद आ वेदक मार्ग पर चलयवलाक रक्षा आ संरक्षण लेल भेल छल । भगवान कृष्ण केवल वैह लोक सब केँ फटकार लगौलनि जे कर्म पथ पर चललाह आ ओतहि रुकि गेलाह । ई हुनकर समयक लेल उपयुक्त छल । यदि ओ आब भगवद्गीताक उपदेश दितथि, तँ ओ निश्चित रूप सँ ओहू लोक सब केँ फटकारितथि जे वैदिक कर्म सब तथा वेदक अध्ययनक उपेक्षा करैत अछि आ सीधे उपनिषद सब दिश जेबाक प्रयास करैत अछि । वास्तव मे, ओ पहिनेक तुलना मे आर बेसी कठोर भाषाक प्रयोग सेहो कय सकैत छथि, कियैक तँ आधुनिक अभ्यास पहिनेक तुलना मे बड बेसी गलती दिशा मे लय जाइत अछि ।
ई सब हम ई दर्शाबाय लेल कहलहुँ अछि जे वेद आ वेदान्त मे कोनो विरोध नहि अछि । वेद (कर्मकाण्ड) केर एकमात्र उद्देश्य वेदान्त लेल व्यक्ति केँ तैयार करब अछि । यदि वैदिक आदेश सभक पालन कयल जाय आर ई स्पष्ट बोध हो जे ई त्रिगुण सँ दूर जेबाक ओहि अवस्था तक पहुँचय के तैयारी छी जेतय संसार पाछू छूटि जाइत अछि आर उपासना तथा उपासनाक विषय अलग-अलग नहि देखाय दैत अछि, तखन व्यक्ति स्वतः ज्ञानकाण्ड एवं ज्ञानमार्ग दिश अग्रसर भ’ जाइत अछि । हालाँकि, एकटा आरो समस्या उत्पन्न होइत छैक । यदि हम सब संसार केँ मिथ्या मानिकय एकरा त्यागिकय ज्ञानी बनि जाय, त प्रश्न उठैत अछि जे संसारक कल्याण के करत । यद्यपि ज्ञानी केँ संसार मिथ्या लागि सकैत छैक, परन्तु हमरा सब जेकाँ सामान्य लोक केँ ई निश्चित रूप सँ वास्तविक प्रतीत होइत अछि । चूँकि संसारक कल्याण हमरा सभक लेल महत्वपूर्ण अछि, तेँ हेतु यदि ज्ञानी यज्ञ नहि करत, त ओ संसार मे समृद्धि केना आनि सकैत अछि ? एकर उत्तर ई अछि जे यदि हम सब ओहि उच्च अवस्था पर विचार करी जेतय तक एकटा प्रबुद्ध व्यक्ति पहुँचि चुकल अछि, त ओकरा लेल कल्याण एवं समृद्धि अनबाक लेल यज्ञ आर अन्य अनुष्ठान करब आवश्यक नहि छैक । चाहे ओ संसार केँ पूरापूरी अस्तित्वहीन मानय या ओ एकरा ईश्वरक “लीला” मानय, ईश्वर केर कृपा हमेशा वैह माध्यम सँ प्रकट होइत छैक । ज्ञानीक चारू दिश भीड़ कियैक जुटि जाइत छैक ? भले ही ओ भीड़ सँ दूर भागैत हो, लोक ओकर (ज्ञानी केर) चरण मे कियैक खसैत छैक ? ओकर आशीर्वाद आर कृपा पेबाक लेल, कियैक तँ, ओकरहि माध्यम सँ, ईश्वर केर कृपा प्रवाहित होइत छैक तथा, ओकरहि उपस्थिति मे, लोक सब केँ सांत्वना भेटैत छैक ।
एकटा प्रबुद्ध व्यक्ति, जे एहि महान सत्य केँ जानि लेलक अछि कि ओ ईश्वरक संग एक अछि, ओहि छोटछिन देवताओ सँ बेसी कल्याण करय मे सक्षम होइत अछि जिनकर प्रसन्नता लेल विभिन्न अनुष्ठान कयल जाइत अछि । चूँकि ओ यज्ञ नहि करैछ, तेँ ई नहि कहल जा सकैत छैक जे ओ विश्व कल्याण मे योगदान नहि दैछ ।
किछ लोक, विशेष कय अन्य धर्म सभक लोक, वेदान्तिक विचार तथा वैदिक कर्म सभक बीच एकटा द्वैत देखैत छथि आ कहैत छथि जे “हिन्दू व्यक्तिगत मोक्ष केँ बेसी महत्वपूर्ण मानैत अछि आर व्यापक विश्व या लोकहित केर बारे मे नहि सोचैछ तथा ओकर ध्यान (योग) तथा समाधि (पारलौकिक अवस्था) सबटा व्यक्तिगत मोक्ष पर केन्द्रित रहैत छैक ।” इहो कहल जाइत छैक जे ईसाई धर्म, इस्लाम तथा बौद्ध धर्मक विपरीत, हिन्दू धर्म प्रेम, भाईचारा आदिक प्रत्यक्ष उपदेश दय केँ सामाजिक चेतनाक विकास नहि करैछ । हालाँकि, ठीक सँ बुझल जाय तँ हिन्दू धर्म केँ वैदिक आ वेदान्तिक मे विभाजित करब सही नहि छैक । वैह व्यक्ति जे अपना जीवनक पूर्वार्ध मे वेदक अध्ययन आर यज्ञ कय केँ समाजक कल्याण मे योगदान दैत अछि, से आगाँ चलिकय वेदान्तिक अन्वेषण द्वारा सत्यक अन्वेषी बनैत अछि आर आत्मसाक्षात्कार प्राप्त करैत अछि । वेद कर्म सब द्वारा व्यवस्थित शुद्धिक प्रक्रिया द्वारा, ओ एकटा एहेन अबस्था प्राप्त करैत अछि जेतय ओ वेदान्तक मार्ग केर खोज तथा ओहिपर चलि सकैत अछि जे “मुक्ति” दिश लय जाइत छैक । वेदान्त मे लीन भ’ कय ज्ञानी बनलाक बादो, ओ अपन आत्मज्ञानी उपस्थिति सँ वैदिक कर्म कएनहिये बिना सांसारिक कल्याण मे योगदान दय मे सक्षम रहैत अछि । यदि कोनो धर्मक अनुयायी अपन धर्मक आदेश सभक पालन कय केँ आत्मज्ञानी नहि बनैछ आ शिखर (अन्तिम गन्तव्य) धरि नहि पहुँचैछ, त ओकर धर्मक कोनो उपयोग नहि छैक । कर्म आर उपासना ओकरा आत्मज्ञानक अवस्था धरि पहुँचबाक साधन थिक । विभिन्न पृष्ठभूमि आर मनःस्थिति सब (वर्णाश्रम) मे जन्मल व्यक्ति सभक लेल निर्धारित अनेक अनुशासन तथा विशिष्ट कर्म करबाक निर्देश, ई सबटा मानसिक उत्कर्षक अवस्था धरि लय जेबाक लेल बनायल गेल छैक, जेतय अन्ततः कोनो अन्तर बुझाय नहि पड़तैक ।
तेँ, सब सँ पहिने कर्म अबैत छैक, अर्थात वेदक निर्देशानुसार कार्य सभक निष्पादन । लेकिन ई पूर्ण बोधक संग कयल जेबाक चाही जे ई मात्र ओहि चरण धरि पहुँचबाक लेल छैक जेतय कर्म लुप्त भ’ जाइत छैक तथा आत्म-अनुभव या बोध (आत्मानुभूति) प्रकट होइत छैक । तहिना, भौतिक लाभ प्राप्त करबाक लेल शुरुआत मे देवताक पूजा निश्चित रूप सँ आवश्यक अछि । लेकिन ई बुझबाक चाही जे ई एहि बोध (अनुभूति) दिश पहुँचबाक पहिल डेग थिकैक कि जाहि देवताक पूजा कयल जाइछ से तथा जे उपासक (उपासना करैछ से) अनिवार्य रूप सँ भिन्न नहि अछि । शुरुआत मे, अन्तर सब केँ देखल जेबाक चाही । यदि सांसारिक व्यवसाय (उद्यम) सब संतोषजनक ढंग सँ करबाक अछि, त हमरा सब एहि मे शामिल कार्य सब केँ विभिन्न श्रेणी सब मे विभाजित करय पड़त । प्रत्येक व्यक्ति केँ एहि विधि सब केँ अपनेबाक चाही आ एहेन कर्तव्य सभक पालन करबाक चाही जे अन्तिम उद्देश्य केँ प्राप्त करबाक लेल विभिन्न प्रकारक कार्य सब केँ आगू बढ़ाबय मे मदति करय । कर्म करैत समय ई ध्यान मे रखबाक चाही जे वेदक अध्ययन आ वैदिक कर्म सभक निष्पादन ओहि महान अनुभव दिश लय जाइछ जेतय वेदक कोनो आवश्यकता नहि रहैछ । बिना फूल के फल नहि भ’ सकैत अछि । फूल बहुत सुन्दर देखा सकैत अछि । लेकिन जाबत धरि विकास करैत फूल लुप्त नहि भ’ जाइछ, ताबत धरि हमरा सब केँ फल नहि प्राप्त भ’ सकैत अछि । जे लोक बिना कोनो वैदिक कर्म कएने सीधे वेदान्त दिश चलि जाइत छथि, से स्वाभाविक मार्ग नहि अपनाबैत छथि । एहि प्रकारे, जे लोक वेदान्तिक ज्ञानक आकांक्षा कएने बिना कर्महि टा पर रुकि जाइत छथि, ओहो ओतबे गलती कय रहल छथि, कियैक तँ ओ विकास धरि नहि पहुँचि पबैत छथि । एतय परिप्रेक्ष्य केर बोध हेबाक चाही ।
जखन वेद केँ ‘श्रुति’ कहल जाइत छैक, त ई शब्द नहि केवल संहिता केँ, बल्कि ब्राह्मण आ आरण्यक केँ सेहो सन्दर्भित करैत अछि । भागवद् गीता ‘श्रुति’ नहि थिक आ वेदक हिस्सा नहि थिक । एकरा स्मृतिक श्रेणी मे मानल जाइत छैक । स्मृति, जे गीता छी, कहैत अछि जे वैदिक कर्म आ उपासना ताबत धरि कोनो काजक नहि अछि, जाबत धरि कि ओ अन्तो-अन्त धरि ज्ञान या आत्मज्ञान दिश नहि लय जाय । पुराण सेहो, जे श्रुतिक बाद दोसर स्थान पर महत्वपूर्ण अछि, कतहु-कतहु कहैत अछि जे वैदिक कर्मक स्तर पर रुकि गेनाय अदूरदर्शिता छैक । शैव पुराण मे वर्णन अछि जे केना दारुक वन मे ऋषि सब कर्मक मार्ग टा केँ अन्तिम लक्ष्य मानलनि आ यज्ञ करय मे अभिमान कयलनि आ केना भगवान शिव हुनका लोकनिक अभिमान केँ नष्ट कयलनि । श्रीमद्भागवत मे सेहो विद्वान ब्राह्मण सब तथा हुनकर पत्नी सब सँ सम्बन्धित एकटा एहने घटनाक वर्णन अछि । एहि मे कहल गेल छैक जे, यद्यपि ओ सब खुब नीक सँ पारंगत नहि छलिह, तैयो पत्नी सब केँ ई एहसास (अनुभव) भेलनि जे भगवान महाविष्णु स्वयं बालकृष्ण (बालक रूप मे कृष्ण) रूप मे प्रकट भेल छलथि । हुनका लोकनिक पति, जे कर्म मे डूबल रहथि, हुनका सब केँ ई एहसास नहि भेलनि आ बाद मे हुनका सब केँ एहि बातक पछतावा सेहो भेलनि ।
ई तर्क देल जा सकैछ जे श्रुति मे कर्म आर ज्ञान कांड दुनू शामिल अछि और चूँकि अधिकांशतः उपनिषद टा ज्ञान कांड केर हिस्सा थिक, जे ज्ञानक मार्ग केर प्रशंसा करैत अछि । ओ स्वाभाविक रूप सँ कर्म केर खंडन करैत अछि । लेकिन कर्म कांड स्वयं एहि दृष्टिकोणक निन्दा करैछ जे कर्महि टा सर्वोपरि अछि आर यैह टा लक्ष्य अछि । तैत्तरीय कातक प्रश्न मे एकटा जीवंत उदाहरण एहि प्रकारे देल गेल छैक: “जे व्यक्ति ईश्वरक उपस्थितिक अनुभव कएने बिना केवल यज्ञ टा करैत अछि, ओ केवल अग्नि मे लकड़ी डालिकय धुआँ टा उत्पन्न करैत अछि । ओ मूर्ख अछि । ओकरा कहियो आत्मसाक्षात्कार नहि होयत ।” (तैत्तरीय कातकम् – प्रथम प्रश्न – अंतिम अनुवाकम् – चतुर्थ मंत्र) । यदि अग्नि प्रज्वलित हो, तँ चावल पकेबाक लेल ओहि पर बर्तन रखबाक चाही । जे व्यक्ति केवल यज्ञ करैत अछि, ओ चूल्हा मे अग्नि तँ जरबैत अछि, मुदा ओहि पर बर्तन नहि रखैत अछि । (एतय प्रयुक्त शब्द “पक्वम” अछि – संस्कृत मे – जेकर अर्थ छैक नीक जेकाँ पकेनाय । एकर सन्दर्भ चावल केर कठोर दाना केँ आगि मे पकाकय नरम आर खेबा योग्य बनाबय सँ छैक ।)
यदि वैदिक कर्म सभक फल ईश्वर केँ समर्पित कय देल जाइन्ह (ईश्वरार्पणम्), त ई हमरा सब केँ संसार सँ बन्हबाक बदले, सांसारिक बन्धनक गाँठ केँ खोलबाक काज करत ।
यदि कर्म फल केर अपेक्षा कएने बिना (निष्काम्य) आर केवल ईश्वरक महिमागान लेल कयल जाय, तँ ई मानसिक शुद्धता प्रदान करैछ आर हमरा सब केँ तीनू गुण सभक पहुँच सँ काफी दूर एक अलग स्थान दिश लय जाइत अछि ।
यज्ञ शब्द एकरहि प्रतीक थिक । अंग्रेजी मे एकरा ‘सैक्रिफाइस’ कहैत छैक । “यागा” केर अर्थ अछि ‘त्यागा’, त्याग कयनाय । “न मम” – “हमरा लेल नहि” – कहिकय अग्नि मे आहुति देनाय, जे निःस्वार्थताक भावना केँ दर्शाबैत अछि, यज्ञ केर सार अछि । अग्नि मे जे डालल जाइछ, ओकरा पुनः प्राप्त नहि कयल जा सकैत अछि । क्षणहि भरि मे ओकर रूप बदलि जाइत छैक । एहि प्रकारे ‘हम’ आ ‘हमर’ केर भावना सेहो भस्म भ’ जेबाक चाही । जखन यज्ञक उद्देश्य उच्च फल देनाय होइत छैक, तखन ई दयनीय अछि जे अनेकों लोक क्षणिक आ तुच्छ लाब सब टा केँ लक्ष्य बना लैत अछि ।
एहि प्रकारे ई देखल जा सकैत अछि जे कर्म काण्ड आर ज्ञान काण्ड मे कोनो विरोधाभास नहि छैक । कर्म काण्ड स्वयं अपन सीमा सब केँ स्वीकार करैत अछि आर ज्ञान काण्ड केँ उच्च मानैत अछि । ई एक-दोसरक पूरक थिक । “पुरुष सूक्तम्” आर “त्रयम्बक मंत्र” वेद केर संहिता भाग मे अछि, उपनिषद मे नहि । एहि प्रकारे उपनिषदहु सब मे “नचिकेताग्नि” जेहेन गोटेक कर्म सभक वर्णन अछि । वैदिक कर्म सभक पालन मे निहित सिद्धांत सभक प्रमाण तैत्तरीय उपनिषद मे भेटैछ ।
भगवद्गीता, जे एक स्मृति छी, मे वर्णित एहि कथनक प्रमाण जे ज्ञान प्राप्तिक लेल अपन कर्मफल सब केँ ईश्वरक प्रति त्याग करब आवश्यक अछि, श्रुतिक अंग उपनिषद सब मे भेटैत अछि । दस उपनिषद मे सँ सबसँ पहिल उपनिषद “ईशावास्य” मे एकर घोषणा आरम्भे मे कयल गेल छैक ।
कुर्वन्नेह कर्माणि जिजीविषेच्छतः समा: एवत्वयिनान्यथेतोऽस्ति नकर्मलिप्यतेनरे (ईसा २)
“सौ वर्ष धरि वैदिक कर्म करू, मुदा ई विचार कय केँ करू जे ई सबटा ईश्वर केँ अर्पण अछि (व्यक्तिगत लाभ लेल नहि) । तखन अहाँ कर्मक फल सँ बन्हायब नहि ।”, उपनिषद कहैत अछि । यैह लेल, उपनिषद केँ अकर्म केर सिद्धान्त, कर्म सँ भिन्न मननाय गलत अछि ।
कर्म केँ साध्य नहि मनबाक चाही । ओहि अबस्था पर नहि रुकबाक चाही जेतय देवता लोकनिक पूजा कय केँ मानसिक शुद्धता आ ओकर परिणामस्वरूप सार्वभौमिक कल्याण सुनिश्चित भ’ जाइत अछि । ज्ञानक उदय हेबाक चाही, जाहि सँ एकटा एहेन अबस्था प्राप्त हो जखन ई भावना उत्पन्न हुए जे परमात्माक अलावे कोनो आत्मा नहि अछि, आर परम आत्माक अलावे संसार जेहेन कोनो चीज नहि अछि । यदि ई अबस्था प्राप्त भ’ जाइत अछि त वेदहु सभक आत्मसाक्षात्कार प्राप्त आत्माक वास्ते कोनो महत्व नहि रहि जायत । वेद कि थिक ? ई ईश्वर केर नियम थिक । एकरा सब लोक केँ कड़ाई सँ पालन करबाक चाही, जेना नागरिक सब देशक कानून केँ पालन करैत अछि, मानैत अछि । लेकिन, यदि कोनो व्यक्ति ज्ञान प्राप्त कय लैत अछि आ पूर्णतः परम सत्य (परमात्मा सत्यम्) मे लीन भ’ जाइत अछि, तँ ओकरा एहि नियम सभक अनुसार कर्म करबाक कोनो आवश्यकता नहि छैक ।
एकटा ज्ञानी लेल जे परमात्माक एक भेलापर, परमात्मा सँ उत्पन्न अनेकों देवता सेहो भिन्न या पृथक प्रतीत नहि होइत छथि । जखन ओ अनन्त मे विलीन भ’ जाइत अछि आ ओकर अंग बनि जाइत अछि, तखन देवता सेहो ओहि मे समाहित भ’ जाइत छथि । देवता सभक पूजा करैत समय सेहो, यद्यपि ओकरा एहि बातक अनुभव नहि भेल छलैक, ओकरा ई सोचबाक चाहैत छल जे ‘हम जाहि देवताक पूजा करैत छी, जे हमरा सँ भिन्न छथि, सेहो आत्मा सँ पृथक नहि छथि ।’
यद्यपि, दैनिक जीवन मे, हमरा लोकनि विभिन्न कर्तव्य सभक पालन भेदक भावना सँ करैत छी, तैयो ई भावना बनल रहबाक चाही जे सबटा भेद समाप्त भ’ जायत आ अन्ततः सब मूल सत्य मे विलीन भ’ जायत । दोसर दिश, जे देवता लोकनिक पूजा स्वयं सँ पूर्णतः भिन्न मानिकय करैत अछि, ओ वास्तविकता केँ नहि बुझैत अछि ।
यद्यपि देवता मानवजाति सँ अधिक विकसित छथि, तैयो ओ सब पूर्ण आनंद केर अबस्था केँ प्राप्त नहि कयलनि अछि । हुनकर सुख ओहि प्राणीक सुखक एकटा छोटो टा अंश नहि अछि जे मनुष्य रूप मे जन्म लय केँ ज्ञानीक अबस्था धरि पहुँचैत अछि । तैत्तरीय उपनिषद (२.५) आर बृहदारण्यक उपनिषद (२.३.३३) मे अपन लोक, पितृलोक आर फेर देवलोकक सुख केर वर्णन कयल गेल अछि आ देवता सब मे, इन्द्र, फेर बृहस्पति आर फेर प्रजापति द्वारा भोगल गेल सुख केर मात्रा कँ प्रत्येक स्तर पर क्रमशः १०० गुना अधिक बढ़ैत गेनाय व्यक्त कयल गेल अछि, जे एकटा गुणन सारणी जेकाँ अछि ।* ज्ञानी केर सुख सबसँ अन्त मे अबैछ आर एकरा ब्रह्मानन्द कहल जाइत छैक – जेकर भोग ब्रह्मा करैत छथि ।
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*नोट: वर्णित आनन्दक विभिन्न स्तर छैक: (१) मनुष्यानन्द या तर्क एवं आनंद लेबाक क्षमतावला एक स्वस्थ युवाक सुख । एकर बाद मनुष्य गंधर्व, देव गंधर्व, चिरलोकालोक पितृ, आजानजा देव, कर्म देव, देव, इन्द्र, बृहस्पति, प्रजापति आ ब्रह्माक आनन्द अबैत अछि, जाहि मे सँ प्रत्येक अपन पूर्ववर्तीक आनन्द सँ १०० गुना अधिक आनन्द दैत अछि । तखन पूर्ण मानवीय सुख केर एक इकाई केर तुलना मे परम आनन्द केर बोध केकरो भेट सकैत छैक । प्रत्येक चरण मे उपनिषद कहैत अछि जे आनन्दक आनन्द ज्ञानी मात्र लय सकैत अछि । ब्रह्मानन्द ओहि सिद्ध पुरुष टा केँ भेटि सकैत छैक जेकरा कोनो इच्छा नहि बचल हो ।
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यैह लेल, देवता सभक अपन सीमा सब होइत छन्हि । एकर अलावे, ओ सब ज्ञान प्राप्त करबाक प्रयास नहि करैत छथि जे सबटा अभाव (कमी) केर पूर्ति करैछ । हुनका लोकनिक अपेक्षा मात्र ओतहि धरि सीमित रहैछ जे मनुष्य हुनका सब केँ यज्ञ आ अन्यान्य पूजा-अर्चनाक माध्यम सँ प्रदान कय सकैत अछि । एहि तरहें, कतेको पौराणिक कथा सभक अनुसार, ओ सब ओहि पुरुषक पक्ष नहि लैत छथि जे ज्ञानी बनबाक प्रयत्न करैत अछि । बृहदारण्यक उपनिषद स्पष्ट रूप सँ यैह कहैत अछि । “देवता मनुष्य सभक अपन आत्माक साक्षात्कार करनाय पसिन नहि करैत छथि” (१.४.१०) । एकर कि कारण छैक ? यदि ओ अपन आत्मा सँ साक्षात्कार कय लैत अछि, त ओ कर्म आ यज्ञ नहि करत, जे देवता सब लेल कल्याणकारी अछि (से नहि करत) ।
यदि ज्ञानी ओ छथि जिनका देवता नापसन्द करैत छथि, त एकर मतलब ई भेल जे ओ सब ओहि लोक सब केँ पसन्द करैत छथि जे ज्ञानी नहि अछि । एकर मतलव भेल ओ लोक जे सच्चा ज्ञानक अबस्था प्राप्त नहि करैछ । ताहि लेल व्याकरण या व्याकरण ग्रंथ सब मे मूर्खक लेल देवानांप्रियः – देवता लोकनिक प्रिय – वाक्यांश गढ़ल गेल अछि । ई वाक्यांश उपनिषद सँ लेल गेल अछि ।
वेदान्त हमरा सब केँ पूर्णताक ओहि अबस्था धरि पहुँचबाक शिक्षा दैत अछि जेतय कर्म आ देवता लोकनिक पूजा दुनूक त्याग भ’ जाइत अछि आ सब किछु मानू ‘आत्म’ भ’ जाइत अछि । हमरा सब केँ ई देखबाक चाही जे कम से कम एहि उपनिषद सभक संरक्षण आर अध्ययन तँ कयल जाइत अछि ।
ऋषिगण हमरा सब केँ असीम वेदक केवल एकटा अंश टा प्रदान कय सकलाह आ चूँकि कलियुग मे मनुष्य सभक बौद्धिक क्षमता पूर्ववर्ती युगक तुलना मे क्षीण छैक, तेँ लेल वेद केँ ११८० शाखा मे विभाजित कयल गेल छैक – प्रत्येक शाखा विद्वान लोकनिक एकटा समूह द्वारा विशेषज्ञता वास्ते कयल गेल छैक । समयक संग एकटा शाखाक अध्ययन सेहो कठिन भ’ गेल अछि आ एहि पीढ़ीक लोक केँ, वैदिक अध्ययनक पूर्ण उपेक्षाक स्थिति मे पहुँचेबाक श्रेय या अपयश शायद भेटत । एकरा एतहि छोड़ि दिय ।
हम ई कहय चाहैत रही जे प्रत्येक शाखा मे एकटा उपनिषद अछि । लेकिन वेद शाखा सब सँ सम्बन्धित किछु उपनिषद एहनो अछि जेकर मूल शाखाक संहिता, ब्राह्मण ग्रंथ आदिक अध्ययन नहि कयल जा रहल अछि । नहि केवल ओकर अध्ययन टा नहि कयल जा रहल अछि, बल्कि कतेको ग्रंथ अध्ययनक लेल उपलब्धो नहि अछि । तखनहुँ, ओकर उपनिषद युगो-युगो सँ अक्षुण्ण रूप सँ चलैत आबि रहल अछि । उदाहरण लेल, ऋग्वेद मे, “सांगायण शाखा” नामक संहिता भागक प्रयोग नहि भेटैछ । हम सब ई हरा चुकल छी । लेकिन एहि शाखाक अंत मे आबयवला उपनिषद, जेकरा “कौशीतकी” उपनिषद कहल जाइत छैक, से आइयो जीवित अछि । ऋग्वेदहि सँ “बाष्काल मंत्रोपनिषद” उपलब्ध अछि । लेकिन ऋग्वेदक संहिता, ब्राह्मण या साष्काल शाखा, जाहि सँ ई उपनिषद सम्बन्धित अछि, तेकर बारे मे किछुओ बात ज्ञात नहि अछि । कठोपनिषद कृष्ण यजुर्वेद केर कठ शाखा सँ सम्बन्धित अछि ।
हम कहलहुँ जे उपनिषद आरण्यकक अन्तिम भाग थिक । हालाँकि कठोपनिषद काफी प्रसिद्ध अछि आर दस महत्वपूर्ण उपनिषद मे सँ एक अछि, तैयो एकर सम्बन्धित आरण्यक हमरा सब लग उपलब्ध नहि अछि । हालाँकि पश्चिमी भारत में अथर्ववेदक अध्ययन बामोश्किले भ’ पबैछ, दक्षिण मे अथर्ववेदक शाखा सभक आब अध्ययन नहि कयल जाइछ । प्रचलित दस महत्वपूर्ण उपनिष सब मे सँ तीन टा उपनिषद, अर्थात् प्रश्न, मुण्डक और माण्डुक्य, अथर्ववेद सँ सम्बन्धित अछि आर सौभाग्य सँ ई एखनहुँ अध्ययन वास्ते उपलब्ध अछि आर लुप्त नहि भेल हँ ।
संक्षेप मे, यद्यपि शाखा या ओकर ओ भाग जे कर्म सभक निष्पादन लेल महत्वपूर्ण अछि, से लुप्त भ’ गेल, तैयो वेदक किछु शाखा मे निहित आवश्यक दर्शन केँ अनदेखा नहि कयल गेल अछि । एहि प्रकारे, ज्ञानवर्धक उपनिषद सभक विशेष रूप सँ पोषण आर संरक्षण कयल गेल अछि । ई एक प्रकारक सांत्वना (सन्तोषक अबस्था) थिक ।
हरिः हरः!!
Do Veda and Vedanta Clash ?
What is recommended for performance in the Karma Kaanda or ritualistic portion of the Vedas, is sought to be given up by the Upanishads which form the Jnana Kaanda. In the Karma Kaanda, the Veda ordains men to worship the Devatas or deities and also lays down procedural details for such worship. On the other hand, in the Upanishads, the same Veda denigrates the performer of sacrifices as a cow – as a witless person.
What appears at the beginning of the Veda is negated by it at the end. This appears strange indeed.
One side is all action, the other all Jnana (knowledge-wisdom) and totally different. So much so, in common usage, the term ‘Vedas’ have come to mean the Karma Kaanda and ‘Vedanta’ or the Upanishad as the Jnana Kaanda.
Lord Krishna has preached only Vedanta in the Bhagvad Gita. It is commonly said that Gautama Buddha and Mahavira were the pioneers in condemning the Karma Kaanda of the Vedas. This is not true. Lord Krishna has already do so, long before these two. He says to Arjuna “Veda pertains to the three gunas, Satva-Rajas-Tamas. You must reach a stage which transcends the three gunas.”
Traigunya Vishayaveda Nistraigunyo Bhavaarjuna
He says further, “Those who follow the words in the Veda in a limited and literal sense are motivated by the desire (Kaama) to dwell in Swarga (Heaven) which offers enjoyments. (11-44)” They (Vedic Karmas) will not lead to a steadfast state of mind which transcendental meditation (Samadhi) creates.
Vedavaadarataah Paartha Naanyadasteetivaadina (11-42)
Kaamaatmanah Swargaparaa Janmakarmaphalapradaam (11-43)
Vyavasaayaat/mikaa Buddhih Samaadhau Na Vidheeyate (11-44)
Some may say there is a contradiction here. Earlier, we have seen that the Vedas are at the root of all Dharma (righteous action). If carefully examined, it will be found that there is no real contradiction here. At the level at which we lead the normal worldly life, it will not be possible for us to comply with and put in practice the philosophy of the Upanishads, i.e. in order to understand the state of absolutism of the Atma, one has to break the shackles imposed by the three gunas and meditate on the self with unwavering concentration. The Karmas prescribed in the Vedas are designed to lead us by stages to that state. So long as we think that the world is ‘Real’, we have to worship the Devatas so that we may live well and in comfort. Since we think the world is real, we also bring well-being to it. We also think that the Devaloka or the world of Devatas is also real like this world and, by pleasing the Devatas, we get many benefits in return. As in this world, we also hope to enjoy life in Devaloka. But, if we stop here, it would mean that we have become oblivious to the main goal. The truth is that our aim is to become one with God for ever and ever. It would be folly to forget this and rest content with other material rewards which the performance of Vedic Karmas may bring.
At the level of worldly existence, we cannot honestly accept that the world is ‘unreal’. The Vedas say, ‘it is all right if you think so’, and has accordingly given karmas which when performed will bring about Universal welfare. They have given us various Devatas for worship because, in our present state of mind, we cannot conceive of Paramaatma in a formless state or have the realisation of non-duality. (Abedha). But, whilst performing the karmas and worshipping the Devatas, we must clearly understand that the Vedas have prescribed these so that we can get purity and clarity of mind and singleness of purpose to reach a stage at which the world as we know ceases to be real and all action will cease and the feeling that ‘we’ exist separately from the Paramaatma will vanish and we merge and feel one with Him.
It will be in the nature of a mundane business if we performed Yajnas as payment made in return for well-being granted by the Devatas. Even in Devaloka (in the world of the gods) there is no bliss equal to what the realised Atman experiences.
Furthermore, stay in Devaloka will come to an end as soon as the accumulated ‘punya’ or credit for good deeds is exhausted and then one has to revert to the cycle of births and deaths and be born again according to the requirement of the Karma. Though, in order to make allowances for the present state of development of the Atma and to gradually prepare it for higher efforts, karmas and worship have been prescribed by the Vedas, it behaves us to look beyond and make efforts to progress further.
While it is not proper if one does not follow the injunctions of the Vedas regarding karma and worship (karmanushtaanam), to say that one should never give them up is also wrong. There is now-a-days a tendency to bypass the karmas such as Yajnas or study of the Vedas in the traditional way (adhyayana) but to go straight to the study of the Upanishads. As a result, many people are becoming familiar with the contents of the Upanishads and are even able to discuss them at length at an intellectual level. However, this has not produced anyone who has peace of mind, is free from passions, or has in practice realised the Truth about the Self or Atman. Why is this so? The reason is that the preliminary preparation in the shape of complying with the Vedic injunctions regarding Yajnas and worship has been ignored and the mind and body have not been disciplined. Hence, to omit to study the Vedas and perform the Karma and straightaway try to imbibe the truth in the Upanishads is as wrong as performing only the rituals, taking their meaning literally and not proceeding further to understand what the Upanishads say.
During the days when Lord Krishna lived and taught, a large majority were only at the stage of performing Vedic Karma. It is they whom He chastised. What may appear as His censure of the Vedas was, in reality, directed at those who did not fully comprehend the purport of the Vedas but stopped at the level of Karma. It is, therefore, incorrect to say that He condemned the practice of karma. His incarnations were only to save and preserve the Vedas and those who adhered to the path of the Vedas. Lord Krishna took to task only those who followed the Karma path and stopped there. This was appropriate for His times. If He were to preach Bhagavad Git now, He would surely rebuke those who ignore Vedic Karmas and study of the Vedas and try to go direct to the Upanishads. In fact, He may even use a stronger language than He did earlier, because the modern practice leads to a bigger mistake than the earlier one.
All this I have said to show that there is no conflict between Veda and Vedanta. Veda (Karma Kaanda) exists for the sole purpose of preparing one for Vedanta. If the Vedic injunctions are complied with and there is a clear awareness that it is a preparation for reaching the stage of transcending the three gunas at which the world is left behind and worship as also the object of worship do not appear separately, then one is automatically led to the Jnaana Kaanda and the path of knowledge. However another problem arises. If we were to become enlightened beings (Jnaani) by forsaking the world as illusory, the question arises as to who will look after the welfare of the world. Although the world may seem illusory to the enlightened it definitely appears real to common people like us. Since the welfare of the world is of importance to us, if the enlightened ones do not perform yajnas, how can they bring prosperity to the world? The answer is that, if we consider the exalted state which an enlightened one has reached, it is not necessary for him to do yajnas and other rituals to bring about welfare and prosperity. Whether he considers the world as totally non-existing or he considers it as the “sport” (Leela) of God, the grace of God always exudes through him. Why do crowds gather round the Jnaani? Even if he runs away from the multitude, why do people fall at his (Jnaani’s) feet? To seek his blessings and grace, because, through him, flows the grace of God and, in his presence, people get solace.
The enlightened person, who has realised the great truth that he is one with Divinity is able to do more good than even the minor gods to propitiate whom various rituals are performed. Because he does not perform Yajnas, it cannot be said that he does not contribute to the welfare of the world.
Some people, especially those belonging to other religions, see a dichotomy between the Vedantic thought and the Vedic karmas and say that “the Hindus consider that individual salvation is more important and give no thought to the world at large or the commonweal and their meditation (Yoga) and Samaadhi (transcendental stage) are all centred around individual salvation.” It is also said that, unlike Christianity, Islam and Buddhism, Hinduism does not develop social consciousness by preaching love, brotherhood, etc., directly. However, properly understood, it is not correct to separate Hindu religion into Vedic and Vedantic. The same person who in the earlier part of his life contributed to the good of society by studying Vedas and performing Yajnas, becomes a seeker after truth by Vedantic enquiry and attains self-realisation later on. By the process of systematic purification through Veda Karmas, he attains a state where he can seek and tread the path of Vedanta which leads to “Mukti”. Even after immersing himself in Vedanta and becoming a jnaani, he is able to contribute to worldly welfare without performing Vedic Karmas by his very enlightened presence. If a man belonging to any religion does not become enlightened and reach the summit by practising its injunctions, then there is no use of that religion. Karmas and worship are means to reach that state of enlightenment. The many different disciplines laid down for persons born with different background and states of mind (Varnaashrama) and injunctions as to who could perform specified karmas, are all designed to lead to a state of mental exaltation, where finally no difference will be felt.
Therefore, first comes karma, that is, the performance of actions as Veda directs. But this should be done with the full realisation that this is only for reaching the stage where karmas disappear and self-experience or realisation (Atmanubhooti) manifests. Similarly, Devata worship is certainly necessary in the beginning to get material benefits. But it should be understood that this is to get material benefits. But it should be understood that this is only the first step towards the realisation that the Devata that is worshipped and the worshipper are not essentially different. In the beginning, the differences must be observed. If mundane business has to be done satisfactorily, we have to divide the work involved into various categories. Each one should adopt these methods and perform such duties as would help the furtherance of the various categories of work for realising the final objective. While doing the Karmas it should be kept in mind that the study of Vedas and performance of Vedic karmas lead to the great experience where there is no need for Vedas. There can be no fruit without flowers. The flowers may look very beautiful. But unless the flower disappears by development, we cannot have the fruit. Persons who go straight to Vedanta without performing any Vedic Karmas, do not take the natural course. Similarly, those who stop at karmas without aspiring for Vedantic wisdom are equally not doing the right thing as they do not reach for development. There should be a sense of perspective here.
When the Vedas are referred to as ‘Sruti’, the term refers not only to Samhitas but also to Braahmanas and Aaranyakas. The Bhagavad Gita is not ‘Sruti’ and is not part of the Vedas. It is regarded as beonging to the category of Smrti. The Smarti, which is Gita, says that the Vedic karmas and worship are of no use, unless they lead ultimately to jnaana or enlightenment. The Puraanas also which are next in importance to the Srutis at some places say that stopping at the stage of Vedic Karma is short-sightedness. The Saivite Puraanas describe how the Rishis in the Daaruka forest thought that the path of Karma was the ultimate goal to be reached and were taking pride in the performance of yajnas and how Lord Siva destroyed their pride. The Srimad Bhagavata also narrates a similar incident pertaining to the learned brahmins and their wives. It says that, though not well-versed, the wives realised that Lord Mahavishnu Himself had come before them as Balakrishna – the child Krishna. Their husbands who were steeped in Karma did not have that realisation and regretted it later.
It may be argued that Sruti contains both Karma and Jnaana Kaandas and since it is mostly the Upanishads which form part of the Jnaana Kaanda which extol the path of jnaana. They naturally deprecate karma. But the Karma Kaanda itself condemns the view that Karma is all-important and it is the goal. A telling example is given in the Taittareeya Kaataka Prasna thus: “One who merely performs Yajnas without feeling the presence of God, is merely feeding the fire with firewood and raises only smoke. He is a fool. He will never realise the self.” (Taittareeya Kaatakam – 1st Prasna – Last Anuvakam – 4th Manntra). If the fire is kindled, then the cooking pot should be placed on it for cooking rice. The person who merely performs Yajnas lights the fire in the oven but does not keep the cooking pot on it. (The word used here is “Pakvam” – in Sanskrit – which means cooking well. The reference is to the hard grain of rice getting cooked in fire to become soft and edible.)
If the results of Vedic karmas are surrendered to God (Isvaraarpanam), it will begin to unite the knot (of worldly bondage), instead of binding us to the world.
If Karmas are performed without expectation of results (Nishkaamya) and solely for the glorification of God, it gives mental purity and leads to a place beyond the reach of the three gunas.
The term “Yajna” signifies this alone. In English, it is called ‘Sacrifice’. “Yaaga” means ‘Tyaaga”, giving up – renouncing. The offering of oblation in fire saying “Na mama” – “not for me” – which shows the spirit of Selflessness is the essence of the Yajna. What is thrown in the fire cannot be reclaimed. Within a second, its form has changed. Likewise the feeling of ‘I’ and ‘Mine’ should be reduced to ashes. When the performance of Yajna is meant to give lofty results, it is pathetic that transient and trivia gains are set as the goal by many.
Thus it would be seen that there is no contradiction between the Karma Kaanda and Jnaana Kaanda. Karma Kaanda itself accepts its limitations and holds Jnaana Kaanda high. There are complementary. “Purusha Sooktam” and “Trayambaka Mantra” which the Samhita portion of the Veda and not in the Upanishad potion. Similarly Upanishads also describe some Karmas like “Nachiketaagni”. Many of the mantras used in the performance of Vedic karmas are found in the Taittareeya Upanishad.
The authority for the statement appearing in Bhagavad Gita, which is a Smriti, that, for obtaining wisdom (Jnaana), one has to sacrifice the karmaphala to God is to be found in the Upanishads which are part of Sruti. The foremost of the ten Upanishads, “Isaavaasya”, proclaim this at the beginning itself.
Kurvanneha Karmani Jijeevishechchhatah Samah Evatvayinaanyathetoasti Nakarmalipyatenare (Isa 2)
“Perform the Vedic Karmas for a hundred years but do it with the thought that it is all meant as offering to God (not for personal gain). They you will not be bound by the results of Karma,” says the Upanishad. Therefore, to regard the Upanishad as a gospel of inaction, something at variance with Karma, is erroneous.
Karma should not be regarded as the end. One should not stop at the stage where mental purity and ensuing universal well-being are ensured by worshipping the Devatas. Wisdom should dawn, whereby a stage is reached when the feeling arises that there is no self other than the Paramaatma, and that there is no such thing as the world apart from the supreme self. If this stage is reached, even Vedas will cease to have any significance for the realised soul. What is Veda? It is the law of God. This should be strictly followed by all persons, as citizens follow the law of the land. But, if a person attains wisdom and is wholly submerged in the Highest Truth (Paramaatma Satyam), there is no need for him to perform karmas in accordance with these laws.
For a Jnaani who becomes one with the Paramaatma, even the many Devatas who have originated from the Paramaatma do not appear as different or separate. When he merges with the Infinite and becomes part of it, the Devatas also are contained within him. Even at the stage when he was worshipping the Devatas, although he did not experience it, he should have thought that ‘the Devata whom I worship is different from me, even this is not separate from the Atma’.
Although, in everyday life, we perform various duties with a sense of differentiation, the feeling should persist that all the differences will shrink and ultimately all will merge in the Basic Truth. On the other hand, one who worships the Devatas as wholly different from himself, does not understand the reality.
Although more evolved than mankind the devatas also have not realised the state of complete bliss. Their happiness is not even a small fraction of the happiness of a being who is born as man but reaches the stage of a Jnaani. The Taittareeya Upanishad (2.5) and the Brihadaaranyaka Upanishad (2.3.33) have described the bliss of the world of ours, that of Pithru Loka and then that of the Devaloka and, amongst Devatas, the quantum of happiness enjoyed by Indra, then Brahaspathi and then Prajaapati are all expressed as progressively increasing 100 times more at each level, which reads like a multiplication table.* The bliss of the Jnaani comes last and is called Brahmananda – that enjoyed by Brahma.
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*Note: The various gradations of bliss as described are (1) Manushyanaamaananda or the happiness of a healthy young man with reasoning and capacity to enjoy. Next the bliss of a Manushya Gandharva, Deva Gandharva, Chiralokaloka Pitru, Aajaanaja Deva, Karma Deva, Deva, Indra, Brahaspati, Prajapati and Brahma, each succeeding one a 100 times the bliss of the immediately preceding one. One can then have an idea of the Supreme Bliss as compared to one unit of full human happiness. At each stage the Upanishad says that the bliss can be enjoyed by a jnaani. The Brahmaananda is also attainable by the realised one who has no desires.
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Therefore, Devatas have their own limitations. Further, they do not strive to attain the Jnaana which makes up all shortages. Their expectations are confined to what humans can offer them through yajnas and other forms of worship. Thus according to many puranic stories they do not favour men who try to become jnaanis. Brahadhaaranyaka Upanishad says so unequivocally. “The Devas do not like men to realise their self (Aatma)” (1.4.10). What is the reason? If he realises his self, then, he will not perform karmas and yajnas, which bring good to the devas.
If the jnaanis are those whom the Devatas do not like, it follows that they like those who are not jnaanis. This means that one who has not attained the state of true knowledge. That is why Vyakarana or Grammar texts have coined the phrase Devaanaampriyah – one dear to the Devas – as referring to a fool. This phrase derives its authority from the Upanishad.
Vedanta teaches us how to reach the state of fullness where karmas and worship of Devatas are both abandoned and everything becomes ‘self’, as it were. It behaves us to see that at least these Upanishads are preserved and studied.
The Rishis could only capture for us a portion of the limitless Vedas and since, in Kaliyuga, the intellectual capacity of men is feeble as compared to those of the earlier Yugas, even these have been divided into 1180 saakhas (branches) – each saakha being meant for specialisation by one group of scholars. With the lapse of time even the study of one Saakha has become difficult of achievement and, to us of this generation, will perhaps go the credit or discredit of bringing Vedic studies to a state of total neglect. Let this rest here.
What I wished to convey was that, in each saakha, there is an Upanishad. But there are Upanishads belonging to the Veda Saakhas where the Samhitas, Brahmanas, etc., of the parent saakha are not being studied. Not only are they not being studied but many of the texts are not even available for study. Nevertheless, their Upanishads have come through the ages unscathed. For example, in Rig Veda, the Samhita portion of what is called the “Sangaayana Saakha” is not found in use. We have lost it. But the Upanishad coming at the end of this Saakha called “Kausheetaki” Upanishad is very much alive. “Baashkala Mantropanishad” from Rig Veda itself is available. But nothing is known of the Samhita or Braahmana or the Saashkala Saakha of Rig Veda, to which this Upanishad belongs, Kathopanishad belongs to the Katha Saakha of the Krishna Yajur Veda.
I said that the Upanishad is the concluding portion of the Aaranyaka. But although the Kathopanishad is quite famous and is one of the ten important Upanishads, its relevant Aaranyaka is not available to us. Though the study of Atharva Veda is barely kept alive in Western India, in the South, Saakhas of Atharva Veda are no longer studied. The three Upanishads, namely, Prasna, Mundaka and Maandukya, out the ten important Upanishads in use, belong to the Atharva Veda and fortunately these are still available for study and have not been lost.
In short, although the saakha or that portion of it which is important for performance of karmas has been allowed to languish, the eesential philosophy contained in some of the Veda saakha has not been lost sight of. Thus, the Upanishads which are conductive to Jnaana have been especially nurtured and preserved. This is some consolation.
Harih Harah!!
क्या वेद और वेदांत में टकराव है ?
वेदों के कर्मकांड या कर्म सम्बन्धित रीति वाला भाग में जो कुछ करने का सलाह दी गई है, उसे उपनिषद जो ज्ञानकांड का निर्माण करता है, इसके द्वारा त्यागने के लिये कहा गया है । कर्मकांड में, वेद मनुष्यों को देवताओं की पूजा करने का आदेश देता है और ऐसी पूजा के लिए प्रक्रियात्मक विवरण भी निर्धारित करता है । दूसरी ओर, उपनिषदों में, वही वेद यज्ञ करने वाले को गाय – बुद्धिहीन व्यक्ति – के रूप में अपमानित करता है ।
वेद के आरंभ में जो प्रकट होता है, उसे अंत में अस्वीकार कर दिया जाता है । यह वास्तव में अजीब लगता है ।
एक पक्ष पूर्णतः कर्म है, दूसरा पूर्णतः ज्ञान (ज्ञान-बुद्धि) और पूरी तरह से भिन्न । इतना ही नहीं, सामान्य प्रयोग में, ‘वेद’ शब्द का अर्थ कर्मकांड और ‘वेदांत’ या उपनिषद का अर्थ ज्ञानकांड हो गया है ।
भगवान कृष्ण ने भगवद्गीता में केवल वेदान्त का उपदेश दिया है । आमतौर पर कहा जाता है कि गौतम बुद्ध और महावीर वेदों के कर्म काण्ड की निंदा करने वाले अग्रणी थे । यह सत्य नहीं है । भगवान कृष्ण इन दोनों से बहुत पहले ही ऐसा कर चुके हैं । वे अर्जुन से कहते हैं, “वेद तीन गुणों, सत्व-रज-तमस, से संबंधित है । तुम्हें एक ऐसी अवस्था तक पहुँचना होगा जो तीनों गुणों से परे हो ।”
त्रैगुण्य विषयवेद निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन
वे आगे कहते हैं, “जो लोग वेद के वचनों का सीमित और शाब्दिक अर्थ में पालन करते हैं, वे स्वर्ग (स्वर्ग) में निवास करने की इच्छा (काम) से प्रेरित होते हैं, जो भोग प्रदान करता है । (११-४४)” ये (वैदिक कर्म) उस स्थिर मनःस्थिति की ओर नहीं ले जाएँगे जो पारलौकिक ध्यान (समाधि) द्वारा उत्पन्न होती है ।
वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीतिवादिन (११-४२)
कामात्मानः स्वर्गपर जन्मकर्मफलप्रदम् (११-४३)
व्यवसायात्/मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते (११-४४)
कुछ लोग कह सकते हैं कि यहाँ विरोधाभास है । हम पहले देख चुके हैं कि वेद ही समस्त धर्म (धार्मिक कर्म) का मूल हैं । यदि ध्यानपूर्वक जाँच की जाए, तो पाया जाएगा कि यहाँ कोई वास्तविक विरोधाभास नहीं है । जिस स्तर पर हम सामान्य सांसारिक जीवन जीते हैं, उस स्तर पर उपनिषदों के दर्शन का पालन करना और उसे व्यवहार में लाना हमारे लिए संभव नहीं होगा, अर्थात् आत्मा की निरपेक्षता की स्थिति को समझने के लिए, हमें तीनों गुणों द्वारा लगाए गए बंधनों को तोड़ना होगा और अविचल एकाग्रता के साथ आत्मा का ध्यान करना होगा । वेदों में वर्णित कर्म हमें (क्रमिक रूप से) चरणों में उस अवस्था तक ले जाने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं । जब तक हम संसार को ‘सत्य’ मानते हैं, हमें देवताओं की पूजा करनी चाहिए ताकि हम सुख और सुविधा पूर्वक रह सकें । चूँकि हम संसार को सत्य मानते हैं, इसलिए हम उसमें कल्याण भी लाते हैं । हम यह भी मानते हैं कि देवलोक या देवताओं का लोक भी इसी संसार की तरह सत्य है और देवताओं को प्रसन्न करके हमें बदले में अनेक लाभ मिलते हैं । इस संसार की तरह, हम देवलोक में भी जीवन का आनंद लेने की आशा करते हैं । लेकिन, अगर हम यहीं रुक जाते हैं, तो इसका अर्थ होगा कि हम अपने मुख्य लक्ष्य से विमुख हो गए हैं । सत्य यह है कि हमारा उद्देश्य सदा-सदा के लिए ईश्वर के साथ एकाकार हो जाना है । इसे भूलकर वैदिक कर्मों से मिलने वाले अन्य भौतिक लाभों से संतुष्ट रहना मूर्खता होगी ।
सांसारिक अस्तित्व के स्तर पर, हम ईमानदारी से यह स्वीकार नहीं कर सकते कि संसार ‘मिथ्या’ है । वेद कहते हैं, ‘यदि आप ऐसा सोचते हैं तो यह ठीक है’, और तदनुसार उन्होंने ऐसे कर्म बताए हैं जिनके करने से सार्वभौमिक कल्याण होगा । उन्होंने हमें पूजा के लिए विभिन्न देवता दिए हैं क्योंकि हमारी वर्तमान मनःस्थिति में, हम परमात्मा को निराकार अवस्था में नहीं समझ सकते या अद्वैत का बोध नहीं कर सकते (अभेद) । लेकिन, कर्म करते समय और देवताओं की पूजा करते समय, हमें यह स्पष्ट रूप से समझना चाहिए कि वेदों ने इनका विधान इसलिए किया है ताकि हम मन की शुद्धता, स्पष्टता और उद्देश्य की एकनिष्ठता प्राप्त कर सकें और उस अवस्था तक पहुँच सकें जहाँ जैसा कि हम जानते हैं, संसार वास्तविक नहीं रह जाता और सभी कर्म समाप्त हो जाते हैं और यह भावना कि ‘हम’ परमात्मा से अलग हैं, समाप्त हो जाती है और हम परमात्मा में विलीन हो जाते हैं और एकाकार हो जाते हैं ।
यदि हम देवताओं द्वारा प्रदान की गई भलाई के बदले में यज्ञ करते हैं तो यह एक सांसारिक कार्य होगा । देवलोक (देवताओं के लोक) में भी, आत्मसाक्षात्कारी आत्मा के अनुभव के समान कोई आनंद नहीं है ।
इसके अलावा, संचित पुण्य या अच्छे कर्मों का श्रेय समाप्त होते ही देवलोक में निवास समाप्त हो जाएगा और फिर व्यक्ति को जन्म-मरण के चक्र में वापस लौटना होगा और कर्म की आवश्यकता के अनुसार पुनः जन्म लेना होगा । यद्यपि, आत्मा के वर्तमान विकास की स्थिति को ध्यान में रखते हुए और उसे धीरे-धीरे उच्चतर प्रयासों के लिए तैयार करने हेतु, वेदों द्वारा कर्म और उपासना का विधान किया गया है, फिर भी हमें इससे आगे देखने और आगे बढ़ने का प्रयास करने का निर्देश दिया गया है ।
यद्यपि कर्म और उपासना (कर्मानुष्ठानम्) के संबंध में वेदों के आदेशों का पालन न करना उचित नहीं है, यह कहना कि इन्हें कभी नहीं छोड़ना चाहिए, भी गलत है । आजकल यज्ञ या पारंपरिक तरीके (अध्ययन) से वेदों के अध्ययन जैसे कर्मों को छोड़कर सीधे उपनिषदों के अध्ययन की ओर जाने की प्रवृत्ति है । परिणामस्वरूप, बहुत से लोग उपनिषदों की विषयवस्तु से परिचित हो रहे हैं और बौद्धिक स्तर पर उन पर विस्तृत चर्चा भी कर पा रहे हैं । हालाँकि, इससे ऐसा कोई भी व्यक्ति उत्पन्न नहीं हुआ है जिसका मन शांत हो, जो वासनाओं से मुक्त हो, या जिसने व्यवहार में आत्मा के सत्य को अनुभव किया हो । ऐसा क्यों है ? इसका कारण यह है कि यज्ञ और उपासना संबंधी वैदिक आदेशों के पालन की प्रारंभिक तैयारी की उपेक्षा की गई है और मन और शरीर को अनुशासित नहीं किया गया है । इसलिए, वेदों का अध्ययन और कर्मकांड न करना और सीधे उपनिषदों के सत्य को आत्मसात करने का प्रयास करना उतना ही गलत है जितना कि केवल कर्मकांड करना, उनका शाब्दिक अर्थ लेना और उपनिषदों की बातों को समझने के लिए आगे न बढ़ना ।
जब भगवान कृष्ण जीवित थे और शिक्षा दे रहे थे, तब अधिकांश लोग केवल वैदिक कर्म करने की अवस्था में ही थे । यही वे लोग थे जिन्हें उन्होंने दंडित किया । वेदों की उनकी निंदा, जो प्रतीत हो सकती है, वास्तव में उन लोगों के लिए थी जो वेदों के तात्पर्य को पूरी तरह से नहीं समझ पाए थे और कर्म के स्तर पर ही रुक गए थे । इसलिए, यह कहना गलत है कि उन्होंने कर्म के अभ्यास की निंदा की थी । उनके अवतार केवल वेदों और वेदों के मार्ग पर चलने वालों की रक्षा और संरक्षण के लिए थे । भगवान कृष्ण ने केवल उन लोगों को फटकार लगाई जो कर्म पथ पर चले और वहीं रुक गए । यह उनके समय के लिए उपयुक्त था । यदि वे अब भगवद्गीता का उपदेश देते, तो वे निश्चित रूप से उन लोगों को फटकारते जो वैदिक कर्मों और वेदों के अध्ययन की उपेक्षा करते हैं और सीधे उपनिषदों की ओर जाने का प्रयास करते हैं । वास्तव में, वे पहले की तुलना में अधिक कठोर भाषा का प्रयोग भी कर सकते हैं, क्योंकि आधुनिक अभ्यास पहले की तुलना में अधिक बड़ी गलती की ओर ले जाता है ।
यह सब मैंने यह दर्शाने के लिए कहा है कि वेद और वेदान्त में कोई विरोध नहीं है । वेद (कर्मकाण्ड) का एकमात्र उद्देश्य वेदान्त के लिए व्यक्ति को तैयार करना है । यदि वैदिक आदेशों का पालन किया जाए और यह स्पष्ट बोध हो कि यह त्रिगुणों से परे जाने की उस अवस्था तक पहुँचने की तैयारी है जहाँ संसार पीछे छूट जाता है और उपासना तथा उपासना का विषय अलग-अलग नहीं दिखाई देते, तो व्यक्ति स्वतः ही ज्ञानकाण्ड और ज्ञानमार्ग की ओर अग्रसर हो जाता है । हालाँकि, एक और समस्या उत्पन्न होती है । यदि हम संसार को मिथ्या मानकर त्यागकर ज्ञानी बन जाएँ, तो प्रश्न उठता है कि संसार का कल्याण कौन करेगा । यद्यपि ज्ञानी को संसार मिथ्या लग सकता है, परन्तु हम जैसे सामान्य लोगों को यह निश्चित रूप से वास्तविक प्रतीत होता है । चूँकि संसार का कल्याण हमारे लिए महत्वपूर्ण है, इसलिए यदि ज्ञानी यज्ञ नहीं करेंगे, तो वे संसार में समृद्धि कैसे ला सकते हैं ? इसका उत्तर यह है कि, यदि हम उस उच्च अवस्था पर विचार करें जिस तक एक प्रबुद्ध व्यक्ति पहुँच चुका है, तो उसके लिए कल्याण और समृद्धि लाने के लिए यज्ञ और अन्य अनुष्ठान करना आवश्यक नहीं है । चाहे वह संसार को पूरी तरह से अस्तित्वहीन माने या वह इसे ईश्वर की “लीला” माने, ईश्वर की कृपा हमेशा उसके माध्यम से प्रकट होती है । ज्ञानी के चारों ओर भीड़ क्यों इकट्ठा होती है ? भले ही वह भीड़ से दूर भागता हो, लोग उसके (ज्ञानी के) चरणों में क्यों गिरते हैं ? उसका आशीर्वाद और कृपा पाने के लिए, क्योंकि, उसके माध्यम से, ईश्वर की कृपा प्रवाहित होती है और, उसकी उपस्थिति में, लोगों को सांत्वना मिलती है ।
एक प्रबुद्ध व्यक्ति, जिसने इस महान सत्य को जान लिया है कि वह ईश्वर के साथ एक है, उन छोटे देवताओं से भी अधिक कल्याण करने में सक्षम होता है जिनकी प्रसन्नता के लिए विभिन्न अनुष्ठान किए जाते हैं । चूँकि वह यज्ञ नहीं करता, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि वह विश्व कल्याण में योगदान नहीं देता ।
कुछ लोग, विशेषकर अन्य धर्मों के लोग, वेदान्तिक विचार और वैदिक कर्मों के बीच एक द्वैत देखते हैं और कहते हैं कि “हिंदू व्यक्तिगत मोक्ष को अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं और व्यापक विश्व या लोकहित के बारे में नहीं सोचते और उनका ध्यान (योग) और समाधि (पारलौकिक अवस्था) सभी व्यक्तिगत मोक्ष पर केंद्रित होते हैं ।” यह भी कहा जाता है कि ईसाई धर्म, इस्लाम और बौद्ध धर्म के विपरीत, हिंदू धर्म प्रेम, भाईचारे आदि का प्रत्यक्ष उपदेश देकर सामाजिक चेतना का विकास नहीं करता । हालाँकि, ठीक से समझा जाए तो, हिंदू धर्म को वैदिक और वेदान्तिक में विभाजित करना सही नहीं है । वही व्यक्ति जो अपने जीवन के पूर्वार्ध में वेदों का अध्ययन और यज्ञ करके समाज के कल्याण में योगदान देता है, आगे चलकर वेदांतिक अन्वेषण द्वारा सत्य का अन्वेषी बनता है और आत्मसाक्षात्कार प्राप्त करता है । वेद कर्मों द्वारा व्यवस्थित शुद्धि की प्रक्रिया द्वारा, वह एक ऐसी अवस्था प्राप्त करता है जहाँ वह वेदान्त के मार्ग की खोज और उस पर चल सकता है जो “मुक्ति” की ओर ले जाता है । वेदान्त में लीन होकर ज्ञानी बनने के बाद भी, वह अपनी आत्मज्ञानी उपस्थिति से वैदिक कर्म किए बिना ही सांसारिक कल्याण में योगदान देने में सक्षम होता है । यदि किसी भी धर्म का अनुयायी उसके आदेशों का पालन करके आत्मज्ञानी नहीं बनता और शिखर तक नहीं पहुँचता, तो उस धर्म का कोई उपयोग नहीं है । कर्म और उपासना उस आत्मज्ञान की अवस्था तक पहुँचने के साधन हैं । विभिन्न पृष्ठभूमि और मनःस्थितियों (वर्णाश्रम) में जन्मे व्यक्तियों के लिए निर्धारित अनेक अनुशासन और विशिष्ट कर्म करने के निर्देश, ये सभी मानसिक उत्कर्ष की अवस्था तक ले जाने के लिए बनाए गए हैं, जहाँ अंततः कोई अंतर महसूस नहीं होगा ।
इसलिए, सबसे पहले कर्म आता है, अर्थात वेद के निर्देशानुसार कार्यों का निष्पादन । लेकिन यह पूर्ण बोध के साथ किया जाना चाहिए कि यह केवल उस चरण तक पहुँचने के लिए है जहाँ कर्म लुप्त हो जाते हैं और आत्म-अनुभव या बोध (आत्मानुभूति) प्रकट होता है । इसी प्रकार, भौतिक लाभ प्राप्त करने के लिए शुरुआत में देवता की पूजा निश्चित रूप से आवश्यक है । लेकिन यह समझना चाहिए कि यह इस बोध की ओर पहला कदम है कि जिस देवता की पूजा की जाती है और उपासक अनिवार्य रूप से भिन्न नहीं हैं । शुरुआत में, अंतरों को देखा जाना चाहिए । यदि सांसारिक व्यवसाय को संतोषजनक ढंग से करना है, तो हमें इसमें शामिल कार्यों को विभिन्न श्रेणियों में विभाजित करना होगा । प्रत्येक व्यक्ति को इन विधियों को अपनाना चाहिए और ऐसे कर्तव्यों का पालन करना चाहिए जो अंतिम उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए विभिन्न प्रकार के कार्यों को आगे बढ़ाने में मदद करें । कर्म करते समय यह ध्यान में रखना चाहिए कि वेदों का अध्ययन और वैदिक कर्मों का निष्पादन उस महान अनुभव की ओर ले जाता है जहाँ वेदों की कोई आवश्यकता नहीं होती । वगैर फूल का फल नहीं हो सकता । फूल बहुत अच्छी दिख सकती है । लेकिन जब तक विकास द्वारा फूल लुप्त नहीं हो जाता, तब तक हमें फल नहीं मिल सकता । जो लोग बिना कोई वैदिक कर्म किए सीधे वेदांत की ओर चले जाते हैं, वे स्वाभाविक मार्ग नहीं अपनाते । इसी प्रकार, जो लोग वेदांतिक ज्ञान की आकांक्षा किए बिना कर्मों पर ही रुक जाते हैं, वे भी उतना ही गलत कर रहे हैं क्योंकि वे विकास तक नहीं पहुँच पाते । यहाँ परिप्रेक्ष्य का बोध होना चाहिए ।
जब वेदों को ‘श्रुति’ कहा जाता है, तो यह शब्द न केवल संहिताओं को, बल्कि ब्राह्मणों और आरण्यकों को भी संदर्भित करता है । भगवद् गीता ‘श्रुति’ नहीं है और वेदों का हिस्सा नहीं है । इसे स्मृति की श्रेणी में माना जाता है । स्मृति, जो गीता है, कहती है कि वैदिक कर्म और उपासना तब तक किसी काम की नहीं हैं, जब तक कि वे अंततः ज्ञान या आत्मज्ञान की ओर न ले जाएँ । पुराण भी, जो श्रुतियों के बाद दूसरे स्थान पर महत्वपूर्ण हैं, कहीं-कहीं कहते हैं कि वैदिक कर्म के स्तर पर रुक जाना अदूरदर्शिता है । शैव पुराणों में वर्णन है कि कैसे दारुक वन में ऋषियों ने कर्म के मार्ग को ही अंतिम लक्ष्य माना और यज्ञ करने में अभिमान किया और कैसे भगवान शिव ने उनके अभिमान को नष्ट किया । श्रीमद्भागवत में भी विद्वान ब्राह्मणों और उनकी पत्नियों से संबंधित एक ऐसी ही घटना का वर्णन है । इसमें कहा गया है कि, यद्यपि वे पूरी तरह से पारंगत नहीं थीं, फिर भी पत्नियों को यह एहसास हुआ कि भगवान महाविष्णु स्वयं बालकृष्ण – बालक रूपी कृष्ण के रूप में उनके सामने प्रकट हुए थे । उनके पति, जो कर्म में डूबे हुए थे, उन्हें यह एहसास नहीं हुआ और बाद में उन्हें इसका पछतावा हुआ ।
यह तर्क दिया जा सकता है कि श्रुति में कर्म और ज्ञान कांड दोनों शामिल हैं और चूँकि अधिकांशतः उपनिषद ही ज्ञान कांड का हिस्सा हैं, जो ज्ञान के मार्ग की प्रशंसा करते हैं । वे स्वाभाविक रूप से कर्म का खंडन करते हैं । लेकिन कर्म कांड स्वयं इस दृष्टिकोण की निंदा करता है कि कर्म ही सर्वोपरि है और यही लक्ष्य है । तैत्तरीय कातक प्रश्न में एक जीवंत उदाहरण इस प्रकार दिया गया है: “जो व्यक्ति ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव किए बिना केवल यज्ञ करता है, वह केवल अग्नि में लकड़ियाँ डालकर धुआँ ही उत्पन्न करता है । वह मूर्ख है । उसे कभी आत्मसाक्षात्कार नहीं होगा ।” (तैत्तरीय कातकम् – प्रथम प्रश्न – अंतिम अनुवाकम् – चतुर्थ मंत्र) । यदि अग्नि प्रज्वलित हो, तो चावल पकाने के लिए उस पर बर्तन रखना चाहिए । जो व्यक्ति केवल यज्ञ करता है, वह चूल्हे में अग्नि तो जलाता है, परन्तु उस पर बर्तन नहीं रखता । (यहां प्रयुक्त शब्द “पक्वम” है – संस्कृत में – जिसका अर्थ है अच्छी तरह पकाना । इसका संदर्भ चावल के कठोर दाने को आग में पकाकर नरम और खाने योग्य बनाने से है ।)
यदि वैदिक कर्मों के फल ईश्वर को समर्पित कर दिए जाएँ (ईश्वरार्पणम्), तो यह हमें संसार से बाँधने के बजाय, सांसारिक बंधन की गाँठ को खोलने का काम करेगा ।
यदि कर्म फल की अपेक्षा के बिना (निष्काम्य) और केवल ईश्वर की महिमागान के लिए किए जाएँ, तो यह मानसिक शुद्धता प्रदान करता है और हमें तीनों गुणों की पहुँच से परे एक स्थान की ओर ले जाता है ।
यज्ञ शब्द इसी का प्रतीक है । अंग्रेजी में इसे ‘सैक्रिफाइस’ कहते हैं । “यागा” का अर्थ है ‘त्यागा’, त्याग करना । “न मम” – “मेरे लिए नहीं” – कहकर अग्नि में आहुति देना, जो निःस्वार्थता की भावना को दर्शाता है, यज्ञ का सार है । अग्नि में जो डाला जाता है, उसे पुनः प्राप्त नहीं किया जा सकता । क्षण भर में उसका रूप बदल जाता है । इसी प्रकार ‘मैं’ और ‘मेरा’ की भावना भी भस्म हो जानी चाहिए । जब यज्ञ का उद्देश्य उच्च फल देना होता है, तो यह दयनीय है कि अनेक लोग क्षणिक और तुच्छ लाभों को ही लक्ष्य बना लेते हैं ।
इस प्रकार यह देखा जा सकता है कि कर्म काण्ड और ज्ञान काण्ड में कोई विरोधाभास नहीं है । कर्म काण्ड स्वयं अपनी सीमाओं को स्वीकार करता है और ज्ञान काण्ड को उच्च मानता है । ये पूरक हैं । “पुरुष सूक्तम्” और “त्रयम्बक मंत्र” वेद के संहिता भाग में हैं, उपनिषदों में नहीं । इसी प्रकार उपनिषदों में भी “नचिकेताग्नि” जैसे कुछ कर्मों का वर्णन है । वैदिक कर्मों के पालन में निहित सिद्धांतों का प्रमाण तैत्तरीय उपनिषद में मिलता है ।
भगवद्गीता, जो एक स्मृति है, में वर्णित इस कथन का प्रमाण कि ज्ञान प्राप्ति के लिए अपने कर्मफलों को ईश्वर के प्रति त्याग करना आवश्यक है, श्रुति के अंग उपनिषदों में मिलता है । दस उपनिषदों में से सर्वप्रथम उपनिषद “ईशावास्य” में इसकी घोषणा आरंभ में ही की गई है ।
कुर्वन्नेह कर्माणि जिजीविषेच्छतः समा: एवत्वयिनान्यथेतोऽस्ति नकर्मलिप्यतेनरे (ईसा २)
“सौ वर्षों तक वैदिक कर्म करो, परन्तु यह विचार करके करो कि यह सब ईश्वर को अर्पण है (व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं) । तब तुम कर्म के फल से बंधोगे नहीं ।”, उपनिषद कहता है । इसलिए, उपनिषद को अकर्म का सिद्धांत, कर्म से भिन्न मानना गलत है ।
कर्म को साध्य नहीं मानना चाहिए । उस अवस्था पर नहीं रुकना चाहिए जहाँ देवताओं की पूजा करके मानसिक शुद्धता और उसके परिणामस्वरूप सार्वभौमिक कल्याण सुनिश्चित हो जाता है । ज्ञान का उदय होना चाहिए, जिससे एक ऐसी अवस्था प्राप्त हो जब यह भावना उत्पन्न हो कि परमात्मा के अलावा कोई आत्मा नहीं है, और परम आत्मा के अलावा संसार जैसी कोई चीज़ नहीं है । यदि यह अवस्था प्राप्त हो जाती है, तो वेदों का भी आत्मसाक्षात्कार प्राप्त आत्मा के लिए कोई महत्व नहीं रह जाएगा । वेद क्या है ? यह ईश्वर का नियम है । इसका सभी व्यक्तियों को कड़ाई से पालन करना चाहिए, जैसे नागरिक देश के कानून का पालन करते हैं । लेकिन, यदि कोई व्यक्ति ज्ञान प्राप्त कर लेता है और पूर्णतः परम सत्य (परमात्मा सत्यम्) में लीन हो जाता है, तो उसे इन नियमों के अनुसार कर्म करने की कोई आवश्यकता नहीं है ।
एक ज्ञानी के लिए जो परमात्मा के साथ एक होने पर, परमात्मा से उत्पन्न अनेक देवता भी भिन्न या पृथक प्रतीत नहीं होते । जब वह अनंत में विलीन हो जाता है और उसका अंग बन जाता है, तो देवता भी उसमें समाहित हो जाते हैं । देवताओं की पूजा करते समय भी, यद्यपि उसे इसका अनुभव नहीं हुआ था, उसे यह सोचना चाहिए था कि ‘मैं जिस देवता की पूजा करता हूँ, वह मुझसे भिन्न हैं, यह भी आत्मा से पृथक नहीं है ।’
यद्यपि, दैनिक जीवन में, हम विभिन्न कर्तव्यों का पालन भेद की भावना से करते हैं, फिर भी यह भावना बनी रहनी चाहिए कि सभी भेद समाप्त हो जाएँगे और अंततः सभी मूल सत्य में विलीन हो जाएँगे । दूसरी ओर, जो देवताओं की पूजा स्वयं से पूर्णतः भिन्न मानकर करता है, वह वास्तविकता को नहीं समझता ।
यद्यपि देवता मानवजाति से अधिक विकसित हैं, फिर भी उन्होंने पूर्ण आनंद की अवस्था को प्राप्त नहीं किया है । उनका सुख उस प्राणी के सुख का एक छोटा सा अंश भी नहीं है जो मनुष्य रूप में जन्म लेकर ज्ञानी की अवस्था तक पहुँचता है । तैत्तरीय उपनिषद (२.५) और बृहदारण्यक उपनिषद (२.३.३३) में हमारे लोक, पितृलोक और फिर देवलोक के सुख का वर्णन किया गया है और देवताओं में, इंद्र, फिर बृहस्पति और फिर प्रजापति द्वारा भोगी गई सुख की मात्रा को प्रत्येक स्तर पर क्रमशः १०० गुना अधिक बढ़ते हुए व्यक्त किया गया है, जो एक गुणन सारणी की तरह है ।* ज्ञानी का सुख सबसे अंत में आता है और इसे ब्रह्मानंद कहा जाता है – जिसका भोग ब्रह्मा करते हैं ।
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*नोट: वर्णित आनंद के विभिन्न स्तर हैं: (१) मनुष्यानन्द या तर्क और आनंद लेने की क्षमता वाले एक स्वस्थ युवा का सुख । इसके बाद मनुष्य गंधर्व, देव गंधर्व, चिरलोकालोक पितृ, आजानजा देव, कर्म देव, देव, इंद्र, बृहस्पति, प्रजापति और ब्रह्मा का आनंद आता है, जिनमें से प्रत्येक अपने पूर्ववर्ती आनंद से १०० गुना अधिक आनंद देता है । तब पूर्ण मानवीय सुख की एक इकाई की तुलना में परम आनंद का बोध किसी को मिल सकता है । प्रत्येक चरण में उपनिषद कहता है कि आनंद का आनंद ज्ञानी ही ले सकता है । ब्रह्मानंद उस सिद्ध पुरुष को भी प्राप्त हो सकता है जिसकी कोई इच्छा नहीं है ।
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इसलिए, देवताओं की अपनी सीमाएँ होती हैं । इसके अलावा, वे ज्ञान प्राप्त करने का प्रयास नहीं करते जो सभी अभावों की पूर्ति करता है । उनकी अपेक्षाएँ केवल उसी तक सीमित होती हैं जो मनुष्य उन्हें यज्ञों और अन्य पूजा-अर्चना के माध्यम से प्रदान कर सकते हैं । इस प्रकार, कई पौराणिक कथाओं के अनुसार, वे उन पुरुषों का पक्ष नहीं लेते जो ज्ञानी बनने का प्रयास करते हैं । बृहदारण्यक उपनिषद स्पष्ट रूप से ऐसा कहता है । “देवता मनुष्यों को अपनी आत्मा का साक्षात्कार करना पसंद नहीं करते” (१.४.१०) । इसका क्या कारण है ? यदि वह अपनी आत्मा का साक्षात्कार कर लेता है, तो वह कर्म और यज्ञ नहीं करेगा, जो देवताओं के लिए कल्याणकारी हैं ।
यदि ज्ञानी वे हैं जिन्हें देवता नापसंद करते हैं, तो इसका अर्थ है कि वे उन लोगों को भी पसंद करते हैं जो ज्ञानी नहीं हैं । इसका अर्थ है वह व्यक्ति जिसने सच्चे ज्ञान की अवस्था प्राप्त नहीं की है । इसीलिए व्याकरण या व्याकरण ग्रंथों में मूर्ख के लिए देवानांप्रियः – देवताओं का प्रिय – वाक्यांश गढ़ा गया है । यह वाक्यांश उपनिषद से लिया गया है ।
वेदांत हमें पूर्णता की उस अवस्था तक पहुँचने की शिक्षा देता है जहाँ कर्म और देवताओं की पूजा दोनों का त्याग हो जाता है और सब कुछ मानो ‘आत्म’ हो जाता है । हमें यह देखना चाहिए कि कम से कम इन उपनिषदों का संरक्षण और अध्ययन तो किया जाता है ।
ऋषिगण हमें असीम वेदों का केवल एक अंश ही प्रदान कर सके और चूँकि कलियुग में मनुष्यों की बौद्धिक क्षमता पूर्ववर्ती युगों की तुलना में क्षीण है, इसलिए इन्हें भी ११८० शाखाओं में विभाजित किया गया है – प्रत्येक शाखा विद्वानों के एक समूह द्वारा विशेषज्ञता के लिए है । समय के साथ एक शाखा का अध्ययन भी कठिन हो गया है और इस पीढ़ी के हम लोगों को, वैदिक अध्ययन को पूर्ण उपेक्षा की स्थिति में पहुँचाने का श्रेय या अपयश शायद मिलेगा । इसे यहीं छोड़ दें ।
मैं यह बताना चाहता था कि प्रत्येक शाखा में एक उपनिषद है । लेकिन वेद शाखाओं से संबंधित कुछ उपनिषद ऐसे भी हैं जहाँ मूल शाखा की संहिताओं, ब्राह्मण ग्रंथों आदि का अध्ययन नहीं किया जा रहा है । न केवल उनका अध्ययन नहीं किया जा रहा है, बल्कि कई ग्रंथ अध्ययन के लिए उपलब्ध भी नहीं हैं । फिर भी, उनके उपनिषद युगों-युगों से अक्षुण्ण रूप से चले आ रहे हैं । उदाहरण के लिए, ऋग्वेद में, “सांगायण शाखा” नामक संहिता भाग का प्रयोग नहीं मिलता । हम इसे खो चुके हैं । लेकिन इस शाखा के अंत में आने वाला उपनिषद, जिसे “कौशीतकी” उपनिषद कहा जाता है, आज भी जीवित है । ऋग्वेद से ही “बाष्काल मंत्रोपनिषद” उपलब्ध है । लेकिन ऋग्वेद की संहिता, ब्राह्मण या साष्काल शाखा, जिससे यह उपनिषद संबंधित है, के बारे में कुछ भी ज्ञात नहीं है । कठोपनिषद कृष्ण यजुर्वेद की कठ शाखा से संबंधित है ।
मैंने कहा कि उपनिषद आरण्यक का अंतिम भाग है । हालाँकि कठोपनिषद काफी प्रसिद्ध है और दस महत्वपूर्ण उपनिषदों में से एक है, फिर भी इसका संबंधित आरण्यक हमें उपलब्ध नहीं है । हालाँकि पश्चिमी भारत में अथर्ववेद का अध्ययन बमुश्किल ही हो पाता है, दक्षिण में अथर्ववेद की शाखाओं का अब अध्ययन नहीं किया जाता । प्रचलित दस महत्वपूर्ण उपनिषदों में से तीन उपनिषद, अर्थात् प्रश्न, मुण्डक और माण्डुक्य, अथर्ववेद से संबंधित हैं और सौभाग्य से ये अभी भी अध्ययन के लिए उपलब्ध हैं और लुप्त नहीं हुए हैं ।
संक्षेप में, यद्यपि शाखा या उसका वह भाग जो कर्मों के निष्पादन के लिए महत्वपूर्ण है, लुप्त हो गया है, फिर भी वेद की कुछ शाखाओं में निहित आवश्यक दर्शन को अनदेखा नहीं किया गया है । इस प्रकार, ज्ञानवर्धक उपनिषदों का विशेष रूप से पोषण और संरक्षण किया गया है । यह एक प्रकार की सांत्वना है ।
हरिः हरः!!

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Aajuk ehi Swadhai k prasang m ved aa Vedant m takrav aichh? ohi par aichh. Jahi to m lateko tarah san eh bujhyal gel aichh ved ki chhiyai aa okar ki mahatwa. Sange Vedant ki chhiyai aa okar ant k lel kona ki kaal gel chhai.
वेदक आरंभ मे जे प्रकट होइत अछि, वैह अन्त मे अस्वीकार कय देल जाइछ । ई वास्तव मे अजीब लगैत अछि ।
एक पक्ष पूर्णतः कर्म छी, दोसर पूर्णतः ज्ञान (ज्ञान-बुद्धि) आर पूरापूरी अलग । एतबा टा नहि, सामान्य प्रयोग मे, ‘वेद’ शब्दक अर्थ कर्मकांड आर ‘वेदांत’ या उपनिषदक अर्थ ज्ञानकांड भ’ गेल अछि ।
भगवान कृष्ण भगवद्गीता मे केवल वेदान्तक उपदेश देलनि अछि ।
त्रैगुण्य विषयवेद निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन
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