वेदक उद्देश्य आ तात्पर्य
एकटा आरो प्रश्न अछि । जखन वेद अनेकों विषय सबपर विस्तृत रूप सँ चर्चा करैत अछि, तखन हम सब केना कहि सकैत छी जे वेदक मुख्य सन्देश उपनिषद सब मे वर्णित आत्म-साक्षात्कार अछि ?
वेद अग्निहोत्र, सोमयज्ञ, सत्रयज्ञ आ इष्टि (समाजक लेल कल्याणकारी कार्य सभक प्रावधान, जेना, आश्रय सभक निर्माण, इनार खुनायब आदि) केर प्रशंसा करैत अछि । एकरा वेदक उद्देश्य कियैक नहि मानल जा सकैछ ? वेद मे विवाह समारोह, अन्तिम संस्कार, श्राद्ध आदिक संचालन, एकटा नीक सरकार केना चलायल जेबाक चाही, एकटा विद्वानक सभा मे केहेन आचरण करबाक चाही आदि जेहेन कतेको आर विषय सभक उल्लेख अछि । एहि मे सँ कोन सबसँ बेसी महत्वपूर्ण मानल जेबाक चाही ?
यज्ञ आर पूजा-पाठक तरीकाक अलावा, वेद मे ध्यान आ प्रार्थना (उपासना), ध्यान या एकान्त मे ध्यान करब आदिक कतेको विधि सभक सेहो उल्लेख अछि । इहो कहल गेल अछि जे आत्मा शरीर मे केना प्रवेश करैछ, अन्ततः शरीरक कि होइछ, आत्मा फेर दोसर शरीर मे केना प्रवेश करैछ, आदि ।
एकर अलावे, वेद मे शारीरिक स्वास्थ्य सुनिश्चित करबाक लेल अनेकों तरहक चिकित्सा पद्धति सभक तथा शत्रु सब केँ शान्त करबाक आ ओकरा द्वारा कयल जायवला हानि-नोक्सानी केँ दूर करबाक लेल शान्तिक उपाय सभक सेहो वर्णन कयल गेल अछि । एहि सब पर विचार कयला उपरान्त प्रश्न उठैत अछि जे वेदक उद्देश्य या लक्ष्य कि छैक ?
उपनिषद कहैत अछि, “सब वेद मिलिकय एक्के टा सत्ताक बात करैत अछि।” (कठो. २.१५) । ओ सत्ता कि थिकैक ? वैदिक सर्वमान्यता छैक जे सत्ता ओ थिक जेकरा प्रतीकात्मक रूप सँ ‘ॐ’ ध्वनि द्वारा दर्शायल जाइछ ।
गोटेक पाश्चात्य विद्वान लोकनिक मत छन्हि जे प्राचीन भारतीय सूर्य, चन्द्रमा आ प्राकृतिक घटना सब केँ देखिकय आश्चर्यचकित भ’ गेल करथि आ चूँकि ताहि समय विज्ञानक ओतेक विकास नहि भेल छलैक, ताहि द्वारे प्रत्येक विचारक सब प्राकृतिक घटना सब केँ अपन मूल्यांकन मुताबिक अपन-अपन दृष्टिकोण व्यक्त कयलनि । हुनका लोकनिक मानब छलन्हि जे सब लोक एकरा स्तोत्र द्वारा नहि गाबि सकैत छल, मात्र किछुए लोक एना कय सकैत छल आ एहि कथन सब या गीत सब केँ एकत्रित कय केँ ‘मंत्र’ केर नाम देल गेल, जे संकलन कयला उपरान्त “वेद” बनि गेल ।
एहि तरहें, यद्यपि उपनिषद सब मे ई स्वीकार कयल गेल छैक जे सबटा वेद केवल एक्के टा सत्ताक बात करैत अछि, तैयो एना प्रतीत होइत अछि जे एहि मे विविध वस्तु सभक उल्लेख छैक, मात्र एक्के टाक नहि ।
रामायणक सम्बन्ध मे एकटा श्लोक छैक:
वेद वेद्ये परे पुंसि जाते दशरथात्मजे । वेद: प्राचेतसादासीत्साक्षात् रामायणात्मना ॥
वेद वेद्ये ओ छथि जिनका वेद द्वारा जानल जाइत छन्हि । ओ के छथि ? ओ परम सत्ता, जिनका वेद सभक माध्यम सँ जानल जेबाक छल, से एहि संसार मे जन्म लेलनि । जखन ओ दशरथक पुत्र रामक रूप मे अयलाह त वाल्मीकि केर पुत्र रामायणक रूप लय लेलनि ।
उपरोक्त श्लोकक यैह अर्थ छैक । एतहु, परम पुरुष – ॐकार नामक परम सत्य टा वेदक सामान्य लक्ष्य अछि । भगवद्गीता मे भगवान कृष्ण कहैत छथि: “वेदैश्च सर्वैः अहमेव वेद्यः” – समस्त वेदक माध्यम सँ मात्र हमरहि टा जानल जेबाक अछि ।
एहि सब पर विचार कयलापर ई स्पष्ट अछि जे यद्यपि वेद सब मे अनेकों विषय सभक वर्णन अछि, तथापि सब वेद एक्के टा केन्द्रीय विषय, यानि परम सत्ता, टा पर एक स्वर सँ बजैत अछि ।
तखन हम सब सोचि सकैत छी जे वेद सभक वैह एकटा केँ वर्णन करबाक लेल अनेकों वस्तु आर सत्ता सभक बात कियैक करय पड़ैत छैक ?
केवल अनेक सत्ताक माध्यम टा सँ ओहि एक सत्ता केँ जानल जा सकैत अछि । योग (शरीर आर मन पर नियंत्रण), ध्यान (मनक एकाग्रता लेल अभ्यास), तप (तपस्याक अभ्यास), यज्ञ (बलिदान – त्याग), कर्मानुष्ठान (निर्दिष्ट कर्तव्य सभक पालन – विवाह व अन्य संस्कार), राज्यक कार्य, सामाजिक जीवन – ई सबटा अन्ततः एक गोट केन्द्रीय सत्ता दिश अभिसरित होइत अछि जे वेदक वास्तविक सार अछि । आर सब वस्तु परिवर्तनशील, परिणतशील अछि, जे समय बितबाक संग किम्वदन्ति सब बनि जाइछ । संसार हमरा सब केँ विभिन्न रूप मे देखाय दैछ, नहि कि एकात्मक वस्तुक रूप मे । वेद विभिन्न विषय सब पर विचार करैछ जाहि सँ हमरा सब केँ एहि सब मे सँ कोनो एक केर माध्यम सँ एकटा केन्द्रीय व्यक्ति (परमात्मा) धरि पहुँचा (लय जा) सकय ।
यदि हमरा सब केँ ओहि एक अनन्त सत्ता केँ जनबाक अछि जिनका दिश वेद संकेत करैत अछि, तँ हमरा सब केँ किछु मानसिक अनुशासन सभक अभ्यास करबाक चाही ताकि ओहि सत्ताक विचार हमर मन मे अबैत रहय । यज्ञ कयनाय, तपस्या कयनाय, दान देनाय, मन्दिर सभक जीर्णोद्धार कयनाय, जल आपूर्तिक वास्ते इनार-पोखरि खुनेनाय, समाज सेवा, विवाह संस्कार आर एहने कर्तव्य सब मानसिक शुद्धता (चित्त शुद्धि) तथा अस्थिर मन केँ स्थिर करबाक (चित्त वृत्ति निरोध) केर लेल अछि ।
विभिन्न कर्तव्य व कृत्य केर उद्देश्य एकटा अनुशासित मार्ग केर माध्यम सँ ईश्वर केर प्राप्ति मे सहायता करब छैक ।
वेद शब्द केर अर्थ अछि – जननाय । उपनिषद आत्मा केँ ओहि आत्माक रूप मे परिभाषित करैत अछि जेकरा जानि लेला सँ सब चीज ज्ञात भ’ जायत । वेदक लक्ष्य वैह आत्मा केँ ज्ञात करेनाय अछि । चाहे ओ कर्म हुए जे शुरू मे अबैत अछि, या ज्ञान जे अन्त मे अबैछ, अर्थात शुरुआत या आरम्भ मे तथा निष्कर्ष या अन्त मे, केंद्रीय विषय ईश्वर – ब्रह्म आत्मा टा छथि, जिनकर अन्ततः अर्थ एक्के टा अछि ।
कर्म अनेकों प्रकार मे विभाजित अछि, आर ज्ञान एकात्मक रूप सँ विद्यमान अछि, मुदा दुनूक केन्द्रीय विषय एक्के थिकैक । इन्द्रिय सभक रचना एहि तरहें कयल गेल छैक जे ओ सब आत्मा केँ नहि देखि सकैत अछि, बल्कि केवल वस्तु केँ देखि सकैत अछि तथा बाह्य रूप सँ देखि सकैत अछि ।
जखन कोनो व्यक्ति अपन ध्यान केँ हाथ मे राखल वस्तु सँ हंटाकय कोनो बाहरी वस्तु दिश जाय दैछ, त कहल जाइछ जे ओ कतहु आर देखि रहल अछि । आत्मे टा वास्तविक पदार्थ थिक । ओकरा नहि देखिकय, बल्कि बाहर दिश देखनाय, जेतय देखबाक चाही, ओतय सँ कतहु आर देखय जेकाँ अछि । मन बाहर नहि देखबाक सलाह उपर ध्यान नहि देत । तेँ, बाह्य-दिशा वला कार्य करैते, व्यक्ति केँ भीतर देखबाक क्षमता विकसित करबाक चाही । इन्द्रिय सब तथा मन केँ अपना इच्छानुसार खिंचय देबाक बदला, व्यक्ति केँ निर्धारित वैदिक अनुष्ठान सभक अधिकाधिक पालन करबाक चाही । एहि सँ मात्र भीतर देखबाक क्षमता विकसित होयत । आन बाह्य वस्तु सब केँ चिन्हनाय, ओकर विश्लेषण कयनाय तथा ओकर मूल्यांकन कयलाक बादे टा, ओ बुद्धि जे सब किछु ग्रहण करय मे सक्षम अछि, ओ “ओहि” धरि पहुँचि सकैत अछि जेकरा जनलाक बाद सब वस्तु सब ज्ञात भ’ जायत । एहि उद्देश्य सँ वेद सब मे अनेकों अनुशासन, व्रत, कर्म, कला आ सामाजिक कर्तव्य सभक चर्चा कयल गेल अछि । निरन्तर कर्म करैत रहला सँ भौतिक शरीर प्रति आसक्ति उत्तरोत्तर क्षीण होइत जेबाक चाही । मन आ बुद्धि केँ मानू ज्ञान, सत्य केर गहन जाँच तथा आत्म-अनुशासन केर अभ्यास सँ विलय भ’ जेबाक चाही । अशुद्ध कर्म सब सँ शरीरक प्रति आसक्ति बढ़ैत अछि । ई मोनक चंचलताक कारण बनैत अछि । दोसर दिश, वैदिक कर्म सभक पालन आ वैदिक आदेश सभक पालन, जे कि मंत्र सबपर आधारित अछि आर जेकर उद्देश्य सर्वकल्याण छैक, शरीर आ मोनक गतिविधि सभक गति मे एकटा निश्चित शिथिलता आनैत अछि । अन्ततः, ई परिपक्वता आ पूर्णता दिश लय जाइत अछि जाहि सँ व्यक्ति भीतर दिश देखि पबैत अछि । एना देखलाक बाद, व्यक्ति केँ एतहि परम आनन्द मोक्ष आनन्द केर प्राप्ति होइत छैक । मोक्षक अर्थ अछि “मुक्ति केर अबस्था” – सांसारिक बंधन सब सँ ‘मुक्ति’ । यदि शरीर आ मन अहंकारक भावना सँ मुक्त भ’ सकय, त ई संसार सँ मुक्ति केर सेहो संकेत छी ।
वेदक उद्देश्य एहि लोक मे रहिते मोक्ष प्राप्त करेनाय छैक । यैह एकर महिमा छैक । यदि आन धर्म सब जेकाँ, हमरो लोकनि मृत्युक बाद कोनो आन लोक मे मोक्ष प्राप्त होइतय, तँ एहि लोक मे रहिते हम सब ओकर स्वरूपक कल्पनो नहि कय सकितहुँ । जे सब मोक्ष प्राप्त कयलनि अछि, ओ सब हमरा सब केँ अपन अनुभव बतेबाक वास्ते वापस नहि अओताह । परिणामस्वरूप, सन्देह आ अविश्वास उत्पन्न भ’ सकैत अछि । लेकिन, यदि एहि लोक मे रहिते लोक सबटा इच्छा तथा अभाव केर त्याग कय दियए आर आत्म-विश्लेषण मे लागि जाय, त मोक्ष एतहि प्राप्त भ’ जायत । वेदक एहि कथन सँ ई स्पष्ट अछि जे ओ अकाट्य सत्यक बात करैत अछि ।
अन्य मार्ग केवल अस्थायी राहत प्रदान करैछ, जेना कुनैन केर एक खोराक मलेरियाक तीव्र बुखार मे तापमान केँ कम कय सकैछ । यदि बुखार केँ दोबारा नहि एनाय सुनिश्चित करबाक अछि, त मूल कारणक पता लगाकय ओकरा नष्ट करय पड़त । वैदिक आस्था “जीव” (अस्तित्व) केर मूल धरि जाइत अछि, ठीक ओहि स्थान धरि जेतय ओ परमात्मा सँ अलग भ’ कय पृथकता (भेद) केर भावना केँ नष्ट करैत अछि आर एहि प्रकारे अस्थायी उपचारक बजाय स्थायी मुक्ति प्रदान करैत अछि ।
वेदक कर्मकाण्ड मे देल गेल आदेश सेहो अस्थायी उपचारक स्वरूप केर अछि । लेकिन फेर “अशांति” मे बदतर ढंग सँ संघर्ष कय रहल व्यक्ति केँ एक्कहि झटका मे, मानू, आत्माराम मे परिवर्तित कयनाय सम्भव नहि छैक, अर्थात, जे अपना भीतर सुख पबैछ आ जे शान्तिक स्थिति मे रहि सकैत अछि । ताहि सँ एहेन कर्म सभक विधान कयल गेल अचि जे अस्थायी लाभ प्रदान करैछ, लेकिन एहि प्रक्रिया मे ओ मोनक पवित्रता विकसित करैछ जे स्थायी मानसिक शान्तिक लिए मूलभूत शर्त छी । यद्यपि यज्ञ (बलिदान), व्रत (आत्म-संयम) आर पूर्त (सार्वजनिक सेवा) केर बहुते विस्तार सँ विधान कयल गेल अछि, तैयो ई एहि सबमे सँ केकरहु साध्य या लक्ष्य नहि मानैत अछि । ई (कर्म) शरीरक प्रति आसक्ति केँ कम करबाक लेल बनायल गेल अछि । मन केँ एहि सब दिश मोड़ला सँ एकाग्रता विकसित होइत अछि आ मन अशुद्धि सब सँ शुद्ध होइत अछि । एहि तरहें, यद्यपि वेद मे विभिन्न विषय सब पर विस्तार सँ चर्चा कयल गेल अछि, तैयो ओकर उद्देश्य दार्शनिक अन्वेषण केर दिश लय गेनाय छैक, जेना कि वेदान्त मे निहित अछि ।
जखन हम सब कोनो समाचार पत्र मे केकरो लेख या भाषण देखैत छी, त स्वाभाविक रूप सँ हम सब जानय चाहैत छी जे ओहि मे कि कहल गेल छैक । भाषण या लेख लम्बा रहैत छैक आ ओकरा शुरू सँ अन्त धरि पढ़बाक समय नहि होइत अछि, तेँ हम सब शुरू मे कनिक पढ़ैत छी आ फेर तुरन्ते अन्तिम अनुच्छेद पर पहुँचि जाइत छी । एहि सँ हमरा सब केँ विषयवस्तुक अन्दाज भ’ गेल करैछ । आरम्भ आ अन्तक अवलोकने टा सम्पूर्ण विषयवस्तु केँ चतुराइ सँ अनुमान लगेबाक लेल पर्याप्त होइछ । तहिना, वेदक आरम्भ आर अन्त मे एक्के टा ईश्वर तत्वक वर्णन अछि आ वैह वेद सभक केन्द्रीय विषय थिक, जेना कि हम पहिनहिं उल्लेख कयने छी ।
सरकार कतेको रास कानून बनबैत अछि । लेकिन, अक्सर, कानून सभक पाछाँक वास्तविक उद्देश्यक बारे मे सन्देह आर मतभेद रहैत छैक । फेर एहि नियम सभक मूल अधिनियमक आशय केर अनुसार, मूल अधिनियम केर आशय केर नियम सभक अनुसार, व्याख्या केर नियम सभक अनुसार, एकरा आर बेसी स्पष्ट कयल जाइत छैक । तहिना, शाश्वत नियम, अर्थात् वेद सभक व्याख्या करबाक लेल, मीमांसा शास्त्र व्याख्या केर नियम केर रूप मे कार्य करैत अछि, अर्थात् आशय केँ स्पष्ट करैत अछि । मीमांसा चौदह विद्या मे सँ एक थिक आर एकर बारे मे अहाँ लोकनि केँ बाद मे आरो बतायब । एहिठाम हम एकर एकटा पहलू धरि मात्र सीमित रहय चाहैत छी ।
मीमांसा मे छह विधिक उल्लेख अछि जेकर माध्यम सँ वैदिक मंत्रक तात्पर्य ज्ञात कयल जा सकैछ । ई छह थिक: उपक्रम-उपसंहार, अभ्यास, अपूर्वता, फल, अर्थवाद तथा उपपत्ति । वेदक अलावा, एहि छह विधिक उपयोग कोनो लेख या भाषणक सटीक दायरा केँ निर्धारित करबाक लेल कयल जा सकैछ ।
उपक्रम आरम्भ थिक । उपसंहारक अर्थ अछि निष्कर्ष । पहिल विधि आरम्भ आर अन्तक जाँच करब अछि – यैह उपक्रम आ उपसंहार विधि थिक । यदि दुनू एक्के गोट विषयक बात करैछ, त ई मानल जा सकैछ जे वैह विषयवस्तु थिक । ‘अभ्यास’ केर अर्थ अछि कोनो निश्चित बात केँ बेर-बेर कहनाय । उदाहरणक लेल, शारीरिक व्यायाम, पुल-अप्स बेर-बेर कयल जाइछ, आर ओ ‘देहाभ्यास’ केर निर्माण करैछ ।
कोनो लेख या भाषण मे, यदि कोनो विषय केँ बेर-बेर उल्लेख कयल जाइछ, तँ ई स्पष्ट अछि जे ओ ‘सार’ थिक जेकरा पर जोर दय लेल दोहरायल जा रहल अछि ।
अपूर्वताक अर्थ अछि ओ जेकर पहिने उल्लेख नहि कयल गेल अछि । तखन ओ एहि बातक संकेत होयत जे ‘सार’ कि होयत ।
“फल” परिणाम थिक, “यदि एना कयल जाए तँ एकटा निश्चित परिणाम प्राप्त होयत”, ई कहबाक एकटा आरो तरीका छैक । “एना करू आ एना-एना परिणाम प्राप्त होयत ।” अर्थात्, उद्देश्य हमरा लोकनिक एक विशेष परिणाम धरि पहुँचनाय अछि । एहि विधि केँ ‘फल’ कहैत छैक ।
अर्थवाद पद्धति मे कतेको बात सब पर विचार कयल जाइछ आर ओकर आधार पर एकटा कहानी सुनायल जाइछ आर परिणामस्वरूप, कोनो विशेष बिन्दु सामने अबैत अछि । हमरा सब केँ ई मानि लेबाक चाही जे सामने आयल बिन्दुए विषय केर मूल थिक ।
उपपत्ति नामक पद्धति मे, एकटा विषय केर कल्पना कयल जाइछ आर फेर ओकर उत्पत्ति, उद्देश्य, उपयुक्तता आदिक व्याख्या कयल जाइछ जाहि सँ ई स्पष्ट भ’ सकय जे विषयवस्तु यैह थिक ।
वेदक आदि आ अन्त केर अध्ययन करयवला एक व्यक्तिक अनुसार – “वेदक मुख्य अभिप्राय अग्नि उपासना अछि । उपक्रम मे, अर्थात् आरम्भ मे, ई ‘अग्नि मीलाय’ सँ प्रारम्भ होइत अछि । अन्त मे, अर्थात् उपसंहार अबस्था मे, एकर अन्त सेहो अग्नियहि सँ होइत अछि । आदि आ अन्त दुनू अग्निये थिक ।” अतः वेदक सर्वोच्च सन्देश अग्नि थिक ।
यद्यपि एहि मे किछु सच्चाई सेहो अछि, मुदा अक्षरशः सत्य नहि मानल जा सकैत अछि । अग्नि आत्माक जागरण, ज्ञानक प्रकाश केर प्रतीक अछि । आत्म चैतन्य, आत्माक जागरण, ई बोध थिक जे ज्ञाता, ज्ञेय व ज्ञान सब एक्के थिक । वास्तव मे यैह वेदक सार थिक ।
किन्तु, वास्तव मे, अग्नि पूजा वेदक लक्ष्य नहि थिक । वेदक महानता एहि बात मे निहित अछि जे ओ कोनो एकटा देवताक पूजा केँ दोसर देवता सँ अधिक महत्व नहि दैछ । वेद (बृहदारण्यक १४.८) कहैत अछि, “जे आत्मा अनेक देवता सभक रूप धारण करैत अछि, ओकर भक्तिपूर्वक पूजा कयल जेबाक चाही ।” “केवल आत्मा मात्र केँ देखल जेबाक चाही; केवल ओकरे टा सुनल जेबाक चाही; “केवल आत्मा मात्रक ध्यान (मनन) करबाक चाही,” याज्ञवल्क्य मैत्रेयी केँ यैह शिक्षा देलनि आर एहि माध्यम सँ वेद हमरा सब केँ अपन लक्ष्य बतबैत अछि ।
यदि कोनो वस्तु केँ ‘लक्ष्य’ कहल जाय त ई कल्पना निम्नलिखित चित्र प्रस्तुत करैत अछि: “हम एक्के स्थान पर छी; एतय सँ हमरा सब केँ अनिवार्य रूप सँ दोसर छोर पर स्थित स्थान जाय पड़त ।”
लक्ष्य केँ दूर सँ प्रकट होयबाली “कोनो चीज़” केर रूप मे इंगित कयल गेल अछि । “इत:” अर्थात “ई” ओ अबस्था थिक जाहि मे हम सब एखन छी । एहि सँ हमरा सब केँ ओहि “तत:” दिश जेबाक अछि ।
लेकिन कि वास्तव मे ओ “लक्ष्य” सेहो “एतय” नहि अछि ? बिल्कुल अछि । जखन ई बोध भ’ जाइत अछि जे सब किछु ब्रह्म थिकथि, तँ ‘ओ’ आर ‘ई’ दुनू ब्रह्म भ’ जाइत छथि । एतय धरि कि कोनो अलग ‘ई’ या ‘ओ’ अछिये नहि । जेकरा हम एखन ‘ई’ कहैत छी, वैह अन्त मे ‘ओ’ बनि जाइत अछि, जेकर अर्थ अछि ‘शाश्वत ओ’ ।
‘तत:’ अर्थात ‘ओ’ जेकाँ, परमात्मा केँ सेहो ‘तत:’ अर्थात ‘ओ’ कहल जाइत छन्हि । जखन हम सब कोनो कर्मक अन्त मे ‘ॐ तत् सत्’ कहैत छी, त एकर अर्थ भेल: “जे ‘तत्’ छथि, वैह सत्य छथि” । ‘सत्’ केर अर्थ सत्य थिक ।
अपने सब ‘पुरुषत्वम्’, ‘महत्वम्’ आदि कतेको शब्दक अन्त मे ‘त्वम्’ प्रत्यय सेहो जोड़ैत छी । एतय ‘त्वम्’ केर अर्थ वर्णित वस्तुक गुण केर स्वरूप अछि । ‘महत्’ केर गुण महत्वम् अछि । पुरुषक स्वरूप पुरुषत्वम् अछि । ठीक छैक, जँ एना होइत छैक, तँ हम सब यात्राक अन्त केँ “शाश्वत अन्त” केर रूप मे “तत्व” केना कहितहुँ (अर्थात्) ‘तत्’ केर स्वरूपक अर्थ केना लगबितहुँ ? ‘तत्त्व विचार’, ‘तत्त्व उपदेश’ – ई सबटाक अर्थ ‘तत्’ केर स्वरूप केर जाँच या विश्लेषण करब अछि आर वैह ‘तत्’ केर स्वरूपक उपदेश देनाय अछि ।
प्रश्न उठैत छैक जे जखन वेद दूरस्थ परम सत्ता केँ ‘तत्’ – ‘ओ’ – कहिकय वर्णित करैत अछि, त एहि सँ हमरा सब केँ कि लाभ अछि ? जे व्यक्ति दूर अछि, से बहुत निकट सेहो अछि । वेद कहैत अछि, ‘दूरत दूरे अंतिकेच’ । एकर अर्थ भेल जे जखन हम सब बुझि नहि पबैत छी, त ओ दूर रहैत छथि; लेकिन जखन बुझय मे आबि जाइत अछि, तखन वैह (ओ) हमरा सभक अत्यन्त लग (निकट) मे रहैत छथि – हमरा सभक भीतर मे रहैत छथि ।
एकर उदाहरण एकटा कहानी मे भेटैत अछि । एकटा लड़की विवाह योग्य आयुक छल आर ओकर माता-पिता ओकरा लेल वर चुनि लेने छलथि , जे कि प्राचीन रीति-रिवाज मुताबिक विवाह योग्य सम्बन्धी लोकनिक पाँति मे सँ प्रथम स्थान पर भेल करैत छल । मुदा लड़कीक दृढ़ निश्चय रहैक जे ओकर विवाह सब सँ नीक लोक (श्रेष्ठ व्यक्ति) सँ मात्र होयत । तेँ माता-पिता ओकरा अकेला छोड़ि देलनि ।
लड़की कहलक जे राजा सबसँ श्रेष्ठ होइत छथि आर ओ राजाक अलावे कोनो आर सँ विवाह नहि करत । एहि द्वारे ओ राजाक पाछाँ-पाछाँ चलैत रहल ।
एक दिन राजा पालकी मे सवार भ’ कय जा रहल छलथि आ रस्ता मे हुनका एक गोट संन्यासी भेटलनि । राजा नीचाँ उतरलाह, ओहि संन्यासी केँ प्रणाम कयलनि आ फेर अपन रस्ता पर चलि पड़लाह ।
लड़की देखि रहल छलः ‘हम केहेन मूर्ख छी जे ई सोचैत छी कि राजा मनुष्य मे श्रेष्ठ छथि । संन्यासी राजा सँ सेहो ऊँच (उपर) लगैत छथि । हमरा कोनो तरहें ओहि संन्यासी सँ विवाह करय पड़त ।’ एना सोचिकय, लड़की संन्यासीक पाछाँ-पाछाँ चलि गेल ।
एक दिन, जखन ओ संन्यासीक पाछाँ कय रहल छल, तँ ओ हुनका एकटा बरगदक गाछक नीचाँ भगवान गणेशक मूर्ति केँ प्रणाम करैत देखलक । तखन ओ अपन विचार बदैल लेलक आ भगवान गणेशे सँ विवाह करबाक निश्चय कय लेलक कियैक तँ ओकरा लगलैक जे ओ ओहि संन्यासियहु सँ श्रेष्ठ छथि जे गणेश केँ प्रणाम करैत छथि । आब, ओहि साधुक अनुसरण करबाक बजाय, ओ गणेशहि केर मूर्ति समीप (किछु दूरपर) बैसि गेलिह ।
जेतय मूर्ति रहय, ओतय बहुत कम लोक अबैत छल । ओ कोनो मन्दिर नहि, बल्कि एकटा गाछक निचला हिस्सा छल । तेँ, ओतय सँ गुज़रि रहल एकटा गलीक कुत्ता मूर्ति पर अपन मूत्राशय खाली कय देलक । तखन लड़की सोचलक जे कुत्ता मूर्ति सँ ऊँच (उपर) होयत आ तेँ आब ओहि कुत्ताक पाछाँ दौड़य लगलिह ।
ओतय सँ गुज़रि रहल एकटा छोट बच्चा कुत्ता पर पत्थर फेंकलक । ओ (कुत्ता) दर्द सँ कराहि उठल आर बड़ा गति सँ भागल । ई देखि रहल एकटा युवक ओहि लड़का केँ ओहि मूक प्राणी प्रति निर्दयी होयबाक लेल डाँट लगेलक, जे (कुत्ता) ओकरा कोनो नुकसान नहि पहुँचेने छल । अन्ततः लड़की सोचलक कि ओ (युवक) जे कुत्ता केँ पिटयवला लड़का केँ डँटलक-बुझेलक वैह सबसँ नीक (सर्वश्रेष्ठ) हेबाक चाही । तेँ, ओ ओहि युवक सँ विवाह करबाक निश्चय कय लेलक । अन्ततः, ई पता चललैक जे ओ युवक वैह छल जेकरा ओकर माता-पिता चुनने रहथि । एहि तरहें, ई पता चलल जे जाहि व्यक्ति केँ ओ दूर बुझि रहल छल, से वास्तव मे बहुत निकट रहैक । कहानी एहि प्रकारक अछि ।
“अहाँ ईश्वरक खोज मे पूरा देश मे एना भटकि रहल छी मानू ओ बहुत दूर छथि । जाबत धरि हुनका जानल नहि जाइछ, ओ निश्चिते रूप सँ दूरे रहता । समस्त खोज हुनका प्रकट नहि कय पाओत । ओ अहाँक बहुत लगहि मे रहैत छथि । दूरहु सँ दूर, लेकिन लगहु सँ लग ।” श्रुति एना कहैत अछि ।
क्षितिज पर पृथ्वी आर आकाश मिलैत प्रतीत होइत अछि आर मानि लियह जे ओहि बिन्दु पर एकटा ताड़क गाछ देखाय दैत अछि । जेतय हम ठाढ़ छी, ओतय सँ एना प्रतीत होयत जे यदि हम ओहि स्थान (ताड़क गाछ लग) पहुँचि जाय त हम पृथ्वी केँ आकाश सँ मिलैत पाबि सकैत छी । लेकिन वास्तव मे ओहि स्थान पर पहुँचला उपरान्त, क्षितिज आर दूर होइत प्रतीत होयत । जेना-जेना हम ओहि दिश बढ़ैत छी, ओहो हमरा सँ दूर होइत रहैत अछि । कि हम ताड़क गाछ जेहेन पहचान बिन्दु सब केँ दृष्टि मे राखिकय कहियो ओतय धरि पहुँचि सकैत छी ? त फेर ओ कतय छथि ? ओ ओतहि छथि जेतय हम-अहाँ ठाढ़ छी । जाहि ईश्वर केँ ‘ओ’ कहल गेल अछि, जेकर अर्थ भेल जे ओ बड दूर मे छथि, से अपन लगहि मे छथि – अपना भीतर मे छथि । ‘तुँ वैह थिकेँ’, वेद अपना सब केँ एकर अनुभव करबैत अछि । (तत् त्वं असि) – ‘तूँ वैह थिकेँ’ – यैह वेदक सर्वोच्च सन्देश थिक । एतय तत्त्वम् केर अर्थ ‘तत्’ होयबाक गुण नहि थिक । त्वम् शब्द केर प्रत्यय या सर्वनाम केर रूप मे दुइ रूप मे लेल जा सकैछ – एकटा गुणक बोध करबैत अछि आर दोसर सर्वनाम ‘तूँ’ केर । ‘तत् त्वं असि’ केर अर्थ अछि ‘तत् – ओ’, ‘त्वं – तूँ’, ‘असि – थिकेँ’ ।
‘तत्’ आ ‘त्वम्’ दुइ शब्द केँ मिलाकय ‘तत्त्वम्’ शब्दक प्रयोग मे आयल अछि । सामान्य बोलचाल मे, परमात्माक स्वरूपक वर्णन करयवला शब्द सब प्रयोग कय जे कोनो निष्कर्ष जे सर्वमान्य होइछ, तेकरा ‘तत्त्वम्’ कहल जाइछ । एहि प्रकारे, ‘तत्त्वम्’ केर प्रयोग कोनो अन्तर्निहित सिद्धान्त केँ सन्दर्भित करबाक लेल कयल जाइछ ।
जेकरा अपने ‘हम’ बुझैत छी, तेकर ज्ञाने ईश्वर सँ साक्षात्कार छी । यदि एहि बोधक प्रकाश नहि होइतय, तँ अहाँ ईश्वर नामक कोनो वस्तुक कल्पनो नहि कय सकितहुँ । “‘ज्ञान हमरा सँ उत्पन्न होइत अछि, विचार हमरे सँ उत्पन्न होइत अछि ।’ विचार सँ उत्पन्न ई ज्ञान तथा ओ ‘तत्’ जिनका अहाँ बहुत दूर बुझैत छी, एक्के अछि,” वेद एकर सार एहि तरहें प्रस्तुत करैत अछि ।
जेकरा हम सब ‘इत्’, ‘तत्’, ‘इदम्’ कहैत छी, ई बिना कोनो मूल वा जैड़ केर नहि अछि । कोनो वस्तु जेकरा ‘तत्’ केर रूप मे चिन्हल जा सकय, बिना मूल केर प्रकट नहि भ’ सकैत अछि । बीज बिना कोनो वृक्ष नहि भ’ सकैछ । संसार केर सब वस्तु जेकरा ‘तत्’ कहल गेल छैक, जेना पर्वत, समुद्र, आकाश, पृथ्वी, पशु, मनुष्य, क्रोध, भय, प्रेम, इन्द्रिय, शक्ति – सबटाक कोनो न कोनो मूल छैक । देखल जेनाय, सुनल जेनाय, सूंघल जेनाय, विचार कयल जेनाय, गर्मी या जाड़क रूप मे महसूस कयल जेनाय – ई सब मन द्वारा अनुभव कयल जाइत अछि आर सम्बन्धित इन्द्रिय सब द्वारा अनुभव कयल जाइत अछि । एहि सब केँ ‘इत्’ कहल जाइत छैक । एखन धरिक सबटा वैज्ञानिक खोज सब, आरो जे होय लेल बाकी अछि, (अर्थात), जे ‘ज्ञात’ अछि, ओ सब ‘इदम्’ थिक । एहि सभक कोनो न कोनो मूल छैक । जँ कोनो मूल नहि रहितैक, त कोनो ‘इदम्’ सेहो नहि भ’ सकितैक । आर उत्पत्तिक बिना किछुओ अस्तित्व मे नहि रहि सकैछ । एकर पाछाँ हमेशा कोनो एकटा मूल या बीज सिद्धान्त रहैछ ।
मानव शरीर एकटा “बीज” सँ उत्पन्न भेल अछि । वृक्षक उत्पत्ति सेहो एकटा बीजहि सँ भेलैक अछि । तेँ, एहि भौतिक जगत केर सेहो कोनो न कोनो मूल अवश्य हेतैक । आर संसार मे जेहो कोनो शक्ति या बल व्याप्त अछि, ओ सब कोनो न कोनो मूलहि सँ उत्पन्न होइत अछि ।
यदि कोनो तेतरि (इमली) केर बिया (बीज) केँ, जे कि टटके-टटकी अंकुरित भेल हो, चीरल जाय, तँ ओकर दुइ भाग मे एकटा छोटा सन तेतरिक गाछ लागल (समायल) देखाय दैछ । एहि मे एकटा विशाल वृक्ष बनबाक शक्ति रहैत छैक । सब बिया मे एहेन शक्ति रहैत छैक, लेकिन तेतरिक बिया मे ई शक्ति देखल जा सकैत अछि ।
मंत्र मे, “बीज अक्षर” – बीज-शब्द कहल जाइत छैक । जाहि प्रकारे एकटा छोट सन बिया मे एकटा विशाल वृक्ष समायल रहैछ, ओहि प्रकार सँ ई अक्षर (वा शब्द) असीम शक्ति सँ युक्त होइत अछि । यदि एहि अक्षर सब केँ एकाग्रचित्त भ’ कय कतेको लाखों बेर दोहरायल जाय, त हम सब एहि मे निहित महान शक्ति केँ आत्मसात आ अनुभव कय सकैत छी ।
संसार मे जे कोनो शक्ति, जे कोनो बुद्धि या क्षमता निहित अछि, एहि सभक अपन मूल या बीज मे, जे कि ईश्वर छथि, अवश्ये टा ओहि मे विद्यमान भेनाय आवश्यक छैक । बीज बिना एकर जन्म नहि भ’ सकैत अछि ।
वेद मे ई उद्घोषणा कयल गेल अछि जे सृष्टि मे जाहि सब वस्तु केँ ‘इत्’ कहल गेल अछि, ओ बिना मूल, बीज वा कारण केँ प्रकट नहि भेल अछि । एहि ‘कारण’ मे जे शक्ति छैक, वैह संसार मे व्याप्त अछि । ओ कारण कतय अछि ? ई वैह अछि जे भीतर स्थित अछि, जेकरा ‘इत्’ कहल जाइत छैक, लेकिन ओ आत्माक रूप मे बाहर सँ देखाइत अछि ।
हम एकटा विशाल ऐना (दर्पण) मे अपन प्रतिबिम्ब देखैत छी । यदि हमरा चारू दिश चारि टा ऐना समकोण पर राखल जाय, तँ हम अनगिनत प्रतिबिम्ब देखि सकैत छी । जे कियो एहि हज़ारों प्रतिबिम्ब सब केँ देखैत छथि आर ओकर कारण ओ केवल एक व्यक्ति थिक । एहि तरहें, ओ वस्तु (शक्ति, कारण) जे लाखों सृजित प्राणी सभक भीतर मे अछि आर जे सृजित वस्तु केँ ‘इत्’ केर रूप मे बाहर सँ देखैत अछि, ओ कियो आर नहि, बल्कि ईश्वर छथि ।
जे चीज़ देखाइत अछि ओ देखल गेल चीजक मूल या कारण टा थिक । समस्त जगत सभक कारण ‘ज्ञान’ थिक । ई ज्ञान कतय अछि ? ई हमरा सभक भीतर मे अछि । ओ जे अविभाज्य अछि, से हमरा सभक भीतर विभाजित प्रतीत होइत अछि । बिजलीक बल्ब कतेको प्रकारक होइत अछि, छोट, पैघ, नीला, हरा आदि । ओ कतेको आकार केर सेहो होइत अछि । लेकिन प्रत्येक केर अन्दर जे धारा रहैत छैक, ओ एक्के टा विद्युत धारा होइत छैक । वैह विद्युत बल जे सर्वत्र व्याप्त अछि, बल्ब केर भीतर सेहो विद्यमान अछि आर ओकरा चमकाबैत अछि । यैह पंखा केँ सेहो घुमबैत अछि । एहि सब क्रियाक कारण एक्के बल थिक । ओ सार्वभौमिक विद्युत थिक जे मिश्रित आर अविभाज्य अछि, लेकिन जखन एकरा (अलग-अलग) तार सँ गुजारल जाइछ, त यैह मानू अलग भ’ जाइत अछि । जखन प्रकृति मे बिजली चमकैत अछि, जखन पानि कोनो चट्टान पर खसैत अछि, त ई बल अपने आप अस्तित्व मे अबैत अछि ।
अतः ओहि महान् ‘तत्त्वम्’ या सत्य केँ अपना भीतर प्रकाशित करू । कर्म-अनुष्ठान सँ, अर्थात् यज्ञ आर देवपूजा आदि नियत कर्म सभक पालन सँ लयकय ‘महावाक्य’ (वेदान्तक महान् सन्देश) केर तात्पर्य पर गहन ध्यान करय तक, ई सबटा अभ्यास एहि लेल अछि – गृहस्थ सभक आचार-विचार, राज-नियम, कला, चिकित्सा, भूविज्ञान एवं अन्य विद्या सब, ई सबटा आत्म-साक्षात्कार दिश लय जायवला चरण थिक । ‘तत्’ (ओ) आर ‘त्वम्’ (तूँ/अहाँ) केर मिलन आरम्भ मे बिजलीक चमक समान क्षणहि भरि लेल अनुभव कयल जाइछ । केनोपनिषद् (४.४) मे एहि अबस्थाक उल्लेख अछि जे ब्रह्म केर चेतना बिजलीक भीतर बिजली समान होयत, आर केवल क्षण केर एक अंश मात्र लेल अनुभव कयल जायत । तस्यैष आदेशो यदेतद्विद्युतोव्यद्युतदा । यदि अभ्यास निरन्तर कयल जाय, त जाहि प्रकार सँ निरन्तर विद्युत उत्पन्न करयवला झरना अछि, ताहि प्रकारे मनुष्य चेतना ताहि स्तर पर स्थिर रहि सकैछ । यैह मोक्ष थिक – जीवित रहिते मुक्ति । मृत्युक पश्चात् – ओ चेतना परम सत्ताक संग मिलि जाइछ या विलीन भ’ जाइछ । जीते जी मोक्ष आ मृत्युक बाद मोक्ष केर ई भेद दोसरहु सब केँ महसूस होइत छैक, लेकिन ज्ञानी दुनू केँ एक्के मानैत अछि ।
एहि प्रकारे, सब वेदक परम उद्देश्य हमरा सब केँ अपन अनुभव सँ ई बोध करायब छैक जे सब किछु ब्रह्म छथि आर एहि प्रकारे हमरा सब केँ आनन्दक स्थिति दिश लय गेनाय छैक ।
विश्वक विभिन्न भाग मे कि भ’ रहल अछि, से हम सब समाचार पत्र सभक माध्यम सँ जनैत छी । समाचार विभिन्न स्थानक संवाददाता लोकनिक, समाचार एजेंसी सभक, डाक, टेलीग्राफ आ टेलीप्रिंटर सन्देश सभक माध्यम सँ प्राप्त होइत अछि । हालाँकि, कतेको एहनो बात सब अछि जे आधुनिक उपकरण सब तथा यंत्र या एतय तक जे सामान्य मानव बुद्धिक पहुँच मे नहि आबि सकैछ । यदि हमरा सब केँ इहो सब जनबाक अछि त कोनो आन तरहक समाचार पत्र हेबाक चाही ।
जे समाचार आधुनिक मीडियाक माध्यम सँ प्रसारित नहि कयल जा सकैछ आ जे टेलीग्राफ या टेलीप्रिंटर सर्किट सँ असम्बद्ध कोनो स्थान सँ सम्बन्धित अछि, से वेद मंत्र सभक माध्यम सँ प्रदान कयल जाइछ । अलौकिक शक्ति सब सँ सम्पन्न ऋषि लोकनि एहि माध्यम सँ हमरा सब केँ अपन सामान्य बुद्धिक समझ सँ दूरक समाचार सम्प्रेषित कयलनि अछि ।
यद्यपि वेद मे बहुते रास महत्वपूर्ण बात सब अछि, तैयो किछु एहेन बात सब अछि जेकरा छोड़ल या नजरन्दाज कयल जा सकैछ ।
जखन हम नजरन्दाज कहैत छी, त हमर मतलब ई नहि भेल जे ओ बात सब महत्वहीन अछि या वेद मे किछु एहेन बात सब अछि जेकरा गलत कहल जा सकैत छैक ।
हमरा लोकनिक पूर्वज लोकनि ई स्पष्ट कयलनि अछि जे जखन वेद हमरा सब केँ कोनो महत्वपूर्ण बात बुझबय चाहैछ, त हमरा सब केँ ओहि महत्वपूर्ण बातक लेल तैयार करबाक या कोनो बात केँ नीक सँ स्पष्ट करबाक लेल आरो कतेको बात सब कहल जाइत अछि । मुख्य बात केँ बुझेबाक लेल ओहो बात सब बुझनाय जरूरी अछि आ बाकी आन जानकारी सब केँ सेहो बुझनाय जरूरी अछि । हालाँकि किछु विषय आरम्भिक या मध्य स्तर पर प्रासंगिक होइछ, लेकिन जेना-जेना लोक आत्माक जागरण केर उच्च अबस्था सब धरि पहुँचैत अछि, ओकरा (ताहि विषय सब केँ) धीरे-धीरे छोड़य पड़ैत छैक । वेदा एना कहैत अछि । एहि प्रकारे, जे बात हमरा एक स्तर पर स्वीकार्य अछि, से दोसर स्तर पर स्वीकार्य नहि अछि ।
वेद मे किछु महान सत्य या “परम तात्पर्य” सेहो अछि, जेकरा पूर्णतः स्वीकार करय पड़त । बाकी, जेकरा कम मूल्य या महत्व पर स्वीकार कयल जा सकैत अछि आर जेकरा छोड़लो जा सकैत अछि, तेकरा ‘अर्थवाद’ आर ‘अनुवाद’ कहल जाइत छैक ।
वेद हमरा सब केँ कोनो सत्य या नियम केँ सुलझेबाक आ समझेबाक लेल उपाख्यान व कथा-पिहानी सभक सहारा लैत अछि । एहेन मामिला सब मे, सत्य या नियम केँ पूर्णतः ग्रहण करय पड़त आ उपाख्यान सब केँ ‘अर्थवाद’ मानिकय अनदेखा करय पड़त । दोसर शब्द मे, अर्थवाद केँ शाब्दिक रूप सँ नहि, बल्कि उदाहरणात्मक रूप मे लेल जेबाक चाही ।
अनुवाद कि थिक ? हमरा सब केँ कोनो अज्ञात वस्तुक बोध करेबाक लेल, वेद कोनो ज्ञात वस्तु सँ आरम्भ करैत अछि तथा ओकर विस्तार करैत रहैत अछि । अज्ञात उद्देश्य धरि पहुँचय सँ पहिने, ई ज्ञात केर पुनरावृत्तिक (बेर-बेर दोहरेबाक) सहारा लय सकैत अछि । अर्थात्, ओ ओहि वस्तु सभक उदाहरणक सहारा लेत जे ज्ञेय (पहिने सँ बुझल) अछि, जे हमरा सभक अनुभव मे अछि आर जेकरा वेदक प्रमाण सँ सिखबाक (बुझबाक) आवश्यकता नहि अछि । जे आन प्रमाण सब द्वारा स्थापित नहि कयल जा सकैछ आ जेकर वेद घोषणा करैत अछि, वैह विधि थिक, वैह महत्वपूर्ण सन्देश थिक ।
दोसर शब्द मे, यदि कोनो वस्तु अन्य सामान्यतः ज्ञात तथ्य सभक माध्यम सँ जानल जा सकैत अछि, त ओकरा केवल वेदक प्रमाण पर निर्भर नहि मानल जा सकैत छैक, भले ई वेद ओकरा दोहराबय । वेद अज्ञात केँ ज्ञात करेबाक लेल अछि । यदि वेद इहो कहैत अछि जे कि ज्ञात अछि ओ अज्ञात सेहो अछि, त एकर अर्थ होयत जे एकर मुख्य लक्ष्य (तात्पर्य) अज्ञाते टा अछि । हमरा लोकनिक समझ केँ आसान बनेबाक लेल मात्र ई ओहि सँ शुरू करैत अछि जे कि हमरा सब केँ पहिने सँ बुझल (ज्ञात) अछि । यदि यैह अन्तिम सन्देश होइतय, त अज्ञातक उल्लेख करबाक कोनो अर्थ नहि होइतय । दोसर दिश, यदि वेद केवल अज्ञात वस्तु सब पर मात्र विस्तार सँ चर्चा करैत, त ई कहनाय उपहास होयत जे “हम जे ज्ञात अछि तेकरे ग्रहण करैत छी आर जे नहि अछि तेकरा अस्वीकार करैत छी।”
आउ आब हम सब देखी जे हमरा सब लेल ‘ज्ञात’ वस्तु कि अचि आ हमरा सब लेल ‘अज्ञात’ वस्तु कि अछि ।
सांसारिक वस्तु सभक विषय मे दुइ गोट दृष्टिकोण अछि । हमरा सब केँ ज्ञात सबटा वस्तु एक्के छी या भिन्न, ई सन्देह हमरा लोकनि केँ घेरने रहैत अछि आ एहि तरहें वस्तु सब केँ दुइ गोट श्रेणी मे व्यापक वर्गीकरण होइत छैक । भौतिक भौतिक अनुभूतिक आधार पर हम सब ई निर्णय लैत छी जे विभिन्न वस्तु सब वास्तव मे भिन्न अछि । पृथक मानिकय मात्र एहि संसारक काज चलि सकैत अछि । हमरा लोकनि केँ जल आ तेल मे भेद करय पड़त । यदि हम सब दीपक जरबैत छी त तेलक प्रयोग करय पड़त; जल कोनो काजक नहि होयत । यदि वैह दीपक किछु बेसिये जरिकर घर मे आगि लगा दियए, त आइग मिझेबाक लेल जलक प्रयोग करहे टा पड़त । यदि तेल आइग मे देल जायत, त आरो बेसी आइग लागि जायत । एहि तरहें, चाहि कोनो काज हो, जाबत धरि भेद नहि कयल जायत, ज्ञान केँ बनाकय नहि राखल जायत आर ओकर उचित उपयोग नहि कयल जायत, ताबत धरि काज नीक ढंग सँ नहि कयल जा सकत ।
एहि प्रकारक भेद ‘द्वैत’ थिक । यैह द्वैत वेद सब मे निहित सब कर्म आ उपासना सभक आधार छी । अतः ई स्पष्ट अछि जे एहेन गतिविधि सब मे वेद अपन प्रभाव मे द्वैतवादी अछि । एक अद्वैतवादी केँ एहि पर विवाद करबाक आवश्यकता नहि अछि । द्वैतवाद प्रत्यक्ष जगतक लेल पूर्णतः सत्य अछि । लेकिन आउ देखैत छी जे कि वेद ओतहि रुकि जाइत अछि जेतय हम सब द्वैतवाद देखैत छी । यदि एहेन अछि, त हम सब ई निष्कर्ष निकालि सकैत छी जे द्वैतवादे वेद सभक लक्ष्य अछि । लेकिन वेद संहिता सब मे किछु स्थान पर आ अन्तिम निष्कर्षात्मक भाग मे, अर्थात् उपनिषद सब मे, अद्वैतवादक विस्तृत चर्चा करैत अछि ।
अपना सभक धार्मिक ग्रन्थ सब मे, दुइ तरहक दृष्टिकोण अछि, अर्थात् “पूर्व पक्ष” आ “सिद्धान्त” । पूर्व पक्ष मे ओहि लोकक विचार शामिल अछि जे कोनो व्यक्तिक दृष्टिकोण सँ भिन्न मत रखैत अछि । पूर्व पक्ष प्रस्तुत भेलाक बाद, ओहि विचार सब केँ खंडन कयल जाइत अछि । दोसर शब्द मे, विचार ई अछि जे पहिने स्वेच्छा सँ विपरीत दृष्टिकोण प्रस्तुत कयल जाय आर फेर ओकरा अप्रमाणिक सिद्ध कयल जाय आर एहि प्रकारे वास्तविक सिद्धान्त केँ स्थापना कयल जाय ।
पश्चिमी विद्वान सेहो अपना सभक दर्शनशास्त्र पर ग्रन्थ सब जेकरा “दर्शन” कहल जाइत छैक तेकर प्रशंसा करैत छथि – जे विपक्षक दृष्टिकोण सब पर नहिये झाँपबाक काज कयल जाइछ न ओकरा नुकायले जाइछ, बल्कि ओकरा पूर्ण रूप सँ प्रस्तुत करैत अछि आर फेर ओहि मे सँ प्रत्येक केर उत्तर दैत अछि ।
वेदक “ज्ञानकाण्ड”, जाहि मे उपनिषद शामिल अछि आर जे मुख्यतः अद्वैत सँ सम्बन्धित अछि, बाद मे या दोसर भागक रूप मे अबैछ, जखन कि “कर्मकाण्ड”, जे द्वैत केर चर्चा करैछ, पहिने अबैत अछि आ पहिल भाग बनैत अछि ।
अतः, यदि वेद पहिने द्वैतक स्थापना करैछ, जे हमरा सब केँ अपन दैनिक अनुभव सँ पहिनहिं सँ ज्ञात अछि, आर बाद मे अद्वैतक बात करैछ, जे हमरा सब केँ ज्ञात नहि अछि, त ई स्पष्ट रूप सँ देखबैछ जे अद्वैतहि टा ओ सिद्धान्त थिक जेकर स्थापना वेद करय चाहैत अछि । वास्तव मे, एकर अर्थ अछि जे यैह एकर अन्तिम लक्ष्य थिकैक ।
ई तर्क देल जा सकैछ जे द्वैत केर ओहि तरहक निन्दा नहि कयल गेल अछि जेहेन पूर्व पक्ष केर हेबाक चाहैत छल । हम अहाँ केँ बतबैत छी कियैक । द्वैतक आधार पर कयल गेल कर्म आ उपासना ओहि ‘अनुभव’ केर प्रतिकूल नहि अछि जेकर अद्वैत प्रचार करैछ । एकर विपरीत, ओ साध्य प्राप्तिक साधनक रूप मे सहायक अछि । एहेन नहि छैक जे जाहि विरोधी केँ सामान्यतः शत्रु मानल जाइछ, ओकरा पूर्व पक्ष मे एहि लेल राखल गेल छैक जाहि सँ कि बाद मे ओकरा परास्त कयल जा सकय । द्वैत सिद्धान्त विपरीत दृष्टिकोण केर रूप मे प्रस्तुत नहि कयल गेल अछि आ नहिये बाद मे कतहु एकर निन्दा कयल गेल अछि ।
जेना फूल पहिने प्रकट होइछ आ फेर फल केँ यथावत छोड़िकय खसि पड़ैछ, तहिना हमरा सब केँ पहिने द्वैत मे रहय पड़त आ बाद मे ओकरा छोड़िकय अद्वैत दिश आबय पड़त । फूल आ फल निश्चित रूप सँ शत्रु नहि थिक । कियो फूल केर निन्दा नहि करैछ कियैक तँ फलहि टा परम अबस्था थिक ।
अद्वैत दर्शन केँ अन्य दर्शन सब केँ निन्दा करबाक आवश्यकता महसूस नहि होइतैक जँ ओ स्वयं केँ अपन उचित स्थान धरि सीमित रखितय आ अपन सिद्धान्त सब केँ ओकर उचित स्तर पर प्रस्तुत करितय । केवल तखनहिं जखन ओ सब एहि सीमाक उल्लंघन करैत अछि, त ओकर विरोध करबाक जरूरत पड़ैत छैक । एहि भावना सँ आदि शंकर तथा अन्य अद्वैत दार्शनिक सब प्रतिद्वंद्वी दर्शन सब केँ देखलनि अछि । सौभाग्य सँ, वैज्ञानिक विकास आध्यात्मिक सिद्धान्त सभक लेल कोनो खतरा पैदा नहि कयने अछि । वास्तव मे, आधुनिक विज्ञान अद्वैत विचारक आर नजदीक पहुँचि रहल अछि, जेकरा पहिने वेद सभक प्रमाणक बिना आत्मसात कयनाय सम्भव नहि छल । प्रारम्भ मे, विज्ञानक मानब रहैक जे पृथ्वी पर सब पदार्थ एक-दोसर सँ भिन्न अछि । फेर ई मानल गेलैक जे केवल ७२ ‘तत्व’ अछि जे असंख्य वस्तु सब केँ प्रस्तुत कयलक । कहल गेलैक जे यैह ७२ तत्व सभक परस्पर क्रिया टा सब भेदक कारण छी । फेर, जखन परमाणु विज्ञानक विकास भेलैक, त ई प्रतिपादित भेल जे सबटा ७२ तत्वक मूल एक्के अछि, अर्थात् ऊर्जा जेकरा हम सब ‘शक्ति’ कहैत छी ।
जे सब लोक दार्शनिक अन्वेषण मे उन्नत छथि आर जे सब सत्यक साक्षात्कार कय लेलनि अछि, ओ सब मानैत छथि जे ऊर्जा या शक्ति टा समस्त ज्ञान या चेतना छी जेकर दायरा मे जड़ (भौतिक) वस्तु सब नहि, बल्कि “जीवात्मा” या आत्मा सम्मिलित अछि जे ज्ञान केर प्रतीक थिक ।
चाहे एकरा एकल ऊर्जा कही या एक चैतन्य या “सार्वभौमिक चेतना”, ई इन्द्रिय सभक पहुँच सँ परे (बाहर) अछि, चाहे भौतिक विज्ञानी केर हो या दार्शनिक केर । वस्तु सभक बहुलताक रूप मे एकर अभिव्यक्ति हमरा सब केँ द्वैत केर रूप मे पहिनहि सँ ज्ञात अछि । यदि द्वैत परम सत्य होइतय, त वेद सभक अध्ययन करबाक आवश्यकते नहि होइतय । एकरा नेत्र या बुद्धि केर अनुभूतिक सीमाक भीतर केर वस्तु सब पर विचार करबाक कोनो जरुरते नहि छैक । हमरा सब केँ वेदक सन्देश केँ तखनहि सर्वोच्च मनबाक चाही जखन ओ अन्त मे ओहि बात सब केँ स्थापित करय जेकरा जननाय जरूरी छैक, आर जे पहिनहि सँ विभिन्न चरण मे बुझल (ज्ञात) अछि । सत्य यैह अछि जे जीवात्मा ब्रह्मांडीय आत्मा (परमात्मा) मे विलीन भ’ जाइत अछि आ अद्वैत ‘ब्रह्म’ बनि जाइत अछि ।
हरिः हरः!!
Purpose And Purport of The Vedas
There is another question. When the Vedas deal extensively with many subjects, how can we say that the main message of Vedas is the realisation of the self as stated in the Upanishads?
The Vedas praise Agni-hotra, Soma Yaga, Satra Yaga and Ishtis (provision of welfare-works beneficial to the community, e.g., construction of shelters, digging of wells, etc.). Why can’t these be regarded as the aim of the Vedas? There are many other matters mentioned in the Vedas such as conduct of marriage ceremonies, funeral rites, Sraadhas, etc., how a good government should be run, how one should conduct oneself in a learned assembly etc. Of these, which should be regarded as most important?
Apart from yajnas and methods of worship, the Vedas also mention many methods of meditation and prayer (Upaasana), of Dhyaana or meditating in solitude, etc. Mention is also made how the Aatma enters the body, what happens eventually to the body, how the Aatma enters another body again, etc.
Further, the Vedas also deal with various kinds of medical treatment to ensure bodily health, and Shantis or methods to pacify enemies and to avert the harm contemplated by them. When one looks at all of these the question arises as to what is the purpose or objective of the Veda?
The Upanishad says, “all the Vedas together talk of a single Being”. (Kato 2.15). What is that Being? Vedic consensus is that the Being is that which is represented symbolically by the sound ‘AUM’.
Some western scholars are of the view that ancient Indians were struck with wonder by the sun and moon and natural phenomena and since these were the days when science had not advanced much, each thinker expressed his view according to his appreciation of the natural phenomena, that not all were able to sing them by hymns and only some could and that these sayings or songs were gathered and labelled as mantras, which became “Vedas” on compilation.
Thus, although the Upanishads avow that all the Vedas talk of only one being, it appears that diverse objects are referred to and not merely one.
There is a sloka (stanza in verse) regarding Ramayana:
VVeda Vedyey Parey Pumsi Jathay Dasarathatmajey
Vedahprachedaasaadaaseet Sakshat Raamaayanaatmana
Veda Vedyey is one who has to be known by the Vedas. Who is he? The Supreme Being, who had to be known through the Vedas took birth in this world. When he came in the form of Rama, Dasaratha’s son, the Vedas took the form of Raamaayana – the child of Valmeeki.
This is the meaning of the above sloka. Even here, the Supreme Being – the Parama Purusha or the absolute truth called Omkaara is the common goal of the Vedas. Lord Krishna in Bhagavad Gita says: “Vedaischa sarvail ahameva vedyah’ – Only I am to be known through all the Vedas.
When all these are considered, it is clear that, although many subjects are dealt with in the Vedas,, all the Vedas talk with one voice on a central subject, viz., the one Supreme Being.
Then we might wonder why the Vedas have to talk of many things and beings to describe One?
It is only through the agency of the many beings, can that one Being be known. Yoga (body and mind control), Dhyaana (meditation), Tapas (practice of austerities), Yajna (sacrifice), Karmaanushthaana (observance of specified duties – marriage and other rites), affairs of state, social life – all these ultimately converge towards a Central Being which is the real essence of the Vedas. All other things are changeable, mutable, which become legends as time passes. The world appears to us in various ways and not as a unitary object. The Vedas deal with various themes so as to lead us through any one of these to a central figure.
If we are to know the one Infinite Being which the Vedas point to, we should practise certain mental disciplines so that the thought of that Being keeps coming to us. The performance of sacrifices, doing penance, giving in charity, renovating temples, digging wells for supply of water, social service, marriage rites and such duties are meant to lead to mental purity (Chitta Suddhi) and steadying the wavering mind (Chitta Vrutti Nirodha).
The objective of the various duties and acts enjoined is to help realise God through a disciplined path.
The word Veda means – to know. The Upanishad defines Aatma as that by knowing which all things will have become known. The goal of the Vedas is to make known that Atatma. Whether it is the Karma which comes in the beginning, or knowledge (jnaana) which comes at the end, i.e. at the start or the beginning and at the conclusion or the end, the central theme is Iswara – Brahman Aatma all of which ultimately mean the same.
Karma is divided into different types, and jnaana exists unitarily but the central subject matter in both is the same. The sense organs have been created in such a way that they cannot see the Aatma but can only see thing and reach outwardly.
When a person allows his attention to drift from the thing in hand to something outside, he is said to be looking elsewhere. Aatma alone is the real matter in hand. Not seeing it, but looking outward is looking elsewhere than where one should. The mind will not heed the advice not to see outside. Therefore, whilst doing things which point outward, one should develop the ability to see inward. Instead of letting the sense organs and mind drag one where they will, one should perform the prescribed Vedic rituals more and more. This alone will develop the capacity to see inwardly. Only after learning, analysing and weighing other outward things, the intellect which is capable of grasping everything can reach “That” by knowing which all things will have become known. Only for this purpose, the Vedas talk of so many disciplines, observances, karmas, arts and social duties. The attachment to the physical body should become progressively weak by the continued performance of karmas. The mind and intellect should get dissolved, as it were, by cognition, searching examination of truths and practice of self-discipline. Attachment to the body increases by impure acts. These lead to the unsteadiness of the mind. On the other hand, the performance of Vedic karmas and observance of Vedic injunctions, which are based on mantras and which are designed to bring universal well-being, bring about a certain relaxation in the tempo of the activities of the body and mind. In the end, it leads to maturity and ripeness to be able to see inwards. After so seeing, a person gets supreme bliss Moksha Aananda, here itself. Moksha means “the state of being released” – ‘freedom’ from the worldly involvements. If the body and the mind can release themselves from the sense of ego, it also spells release from Samsaara.
The aim of the Vedas is to help one obtain Moksha whilst living in this world itself. That is its glory. If, as in other faiths, we were to get Moksha only in another world after death, one can not conceive of its nature whilst living in this world. Those who obtained it will not come back to tell us their experience. As a result, doubt and disbelief may arise. But, whilst in this world one were to abnegate all desire and wants, and engage in self-analysis, Moksha will be achieved here itself. From such an avowal by the Vedas, it is clear that it talks of the irrefutable truth.
Other paths mere ensure temporary solace just as a dose of quinine may bring down the temperature in high malarial fever. If the non-recurrence of fever is to be ensured, the root cause should be found and destroyed. The Vedic faith goes to the very origin of the “Jeeva” (existence), to the very spot where it branches off from the Pramaatma and destroys the sense of separatism (Bheda) thus providing permanent release instead of a temporary cure.
The injunctions in the Karma Kaanda of the Vedas are also in the nature of temporary cures. But then it is not possible to convert one struggling desperately in “unrest” (Asaanthi), with a single stroke, as it were, into an Aatmaaraama, i.e., one who finds happiness within and one who can remain in a state of tranquility. That is why the karmas which bring temporary benefits have been prescribed but, in the process they help develop purity of mind which is the basic prerequisite for lasting mental peace. Although Yajna (sacrifices), Vrata (self-imposed restraints) and Poorta (public services) are prescribed with great elaboration, it does not regard any of these as the end or goal. These (karmas) have been designed to reduce the attachment to the body. By diverting the mind towards them, concentration is developed and the mind is cleansed of impurities. Thus, although various subjects are dealt with at great length by the Vedas, their aim is to lead to philosophical enquiry, as contained in Vedanta.
When we see an article or speech delivered by someone in a newspaper, we naturally wish to know what is stated. The speech or article is long and there is no time to go through it from beginning to end. So we just read a little from the beginning and then quickly go to the last paragraph. This gives us an idea of the contents. The perusal of the beginning and end is sufficient to shrewdly guess at the entire contents. Likewise, all the beginning of the Vedas and at their end, the same Iswara Tatva is dealt with and that alone is the central subject matter of the Vedas, as I mentioned earlier.
The Government enacts many laws. But, quite often, there is doubt and difference of opinion as to the exact intention behind the laws. Then these laws are explained or elucidated according to the intention of the original enactment according to the rules of the intention of the original enactment according to the rules of interpretation. In the same manner, to interpret the Eternal Law, viz., the Vedas, the Meemaamsa Saastra serves as the Rule of Interpretation, to clarify the intention, so to speak. Meemaamsa forms one of the fourteen disciplines (Vidyas) and I will tell you more about it later. Here I wish to confine myself to one aspect of it.
The Meemaamsa talks of six ways through which the purport of a Vedic Mantra can be ascertained. These six are: Upakrama, Upasamhaara. Abhyaasa, Apoorvata, Phala, Arthavaada, and Upapatti. Apart from the Vedas, these six can be applied to determine the exact scope of an article or speech.
Upakrama is the beginning. Upasamhaara means the conclusion. The first method is to examine the beginning and the ending – this is the Upakrama and Upasamhaara method. If both talk of the same subject, then it can be taken that that is the subject matter. ‘Abhyaasa’ is to say a certain thing again and again repeadly. For e.g., the physical exercises, pull-ups are done again and again, and they constitute ‘Dehaabyaasa’.
In an article or speech, if a theme is mentioned repeatedly, then it is clear that that is the gist which is being repeated for emphasis.
Apoorvata means what has not been mentioned earlier. Then that would be an indication of what would constitute the gist.
“Phala” is the consequence or result, “If so done then a certain result would follow”, this is another way of saying. “Do this and such and such result will follow.” That is, the objective is to lead us to a particular result. This method is called ‘phala’.
In the Arthavaada method many things are dealt with and a story is narrated based on these and, as a result, some particular point is brought out. We should take it that the point brought out is the core of the matter. In the method called upapatti, a subject is postulated and then its origin, purpose, appropriateness, etc., are explained in order to make it clear that that is the point at issue.
According to a person who had scanned the beginning and end of the Vedas – “The main purport of the Vedas is fire worship or Agni Upaasana. In the “upakrama’, i.e. the beginning, it starts with ‘Agni Meelay’. At the end, i.e. at the Upasamhaara stage, it also ends with Agni. The beginning and end are both Agni. Therefore, the supreme message of the Vedas is Agni”.
Though there is also some truth in this, this cannot be taken to be literally true. Agni stands for the awakening of the Soul, the light of knowledge. Aatma Chaitanya, the soul’s awakening, is the realisation that the knower, the thing known and knowledge are all the same. This is indeed the gist of the Vedas.
But, really speaking, fire worship is not the goal of the Vedas. The greatness of the Vedas lies in their not highlighting the importance of the worship of any Devata in preference to another. “The Aatma which takes the form of several Devatas should be worshipped with devotion,” says the Veda (Brahadhaaranyaka 14.8). “The Aatma alone is to be seen; it alone should be heard; Aatma alone should be meditated upon (Manana),” thus runs Yaajnavalkya’s teaching to Maitreyi and, thought it, the Veda makes its goal known to us.
If a thing has to be called ‘the goal’ then the imagery raises the following picture: “We are in one place; from here we must necessarily go to the place at the other end.”
The goal is pointed out as “something” appearing at a distance. “Itah” meaning “this” is the state where we are in now. From this, we have to go to that, “Tatah”.
But in truth is not that “goal”, “here” too? Of course, it is. When the realisation comes, that everything is Brahman, both ‘that’ and ‘this’ become Brahman. There is not even a separate ‘this’ or ‘that’. What we now say as ‘this’ becomes ‘that’ at the end, meaning the ‘Eternal It’.
Like ‘Tatah’ meaning ‘that’, the Paramaatma is also called Tatah meaning ‘That’. When we say, ‘Om Tat Sat’ at the end of any karma, it means: “That which is ‘tat’ is alone the truth”. ‘Sat’ means truth.
We also add the suffix ‘tvam’ at the end of many words like ‘Purushatvam’, ‘Mahatvam’, etc. Here ‘Tvam’ means the nature of quality of the thing mentioned. The quality of ‘Mahat’ (big) is Mahatvam. The nature of the Purusha is Purushatvam. All right, if that were so, how is it that we call the end of the journey the “Eternal End” as “Tatva” (i.e.) to mean the nature of ‘tat’? ‘Tatva Vichara’, ‘Tatva Upadesa’ – all these mean to examine or analyse the nature of ‘Tat’ and to teach the nature of the same ‘Tat’.
The question arises as to what use is it to us when the Veda describes the distant Supreme Being as ‘Tat’ – That. The person who is far distant is also very near. ‘Doorat Dooray Antikecha’, says the Veda. This means that, when not understood, it is far away; but when understood, it is near us – inside.
There is a story illustrating this. There was a girl of marriageable age and her parents had selected the groom, who in accordance with ancient customs, was first in the line of marriageable relatives. But the girl was determined only to marry a person who was the best among all. So the parents left her alone.
The girl said that the king is higher than everyone else and she will marry none other than the King. And so she kept following the King.
The King was riding in a palanquin one day and met a Sannyaasi on the way. The king got down, made his obeisance to the holy man and then continued on his way.
The girl was watching: ‘What a fool I am to think that the King is the highest among men. The Sannyaasi seems to be higher than the King. I must somehow marry the holy man.’ So thinking, the girl followed the Sannyaasi.
One day, when following the Sannyaasi, she saw him paying his respects to an idol of Lord Ganesh under a banyan tree. She then changed her opinion and decided to marry Lord Ganesh as she found him higher than the Sannyaasi who paid homage to Him. Instead of following the holy man, she sat close to Ganesh.
There were not many who visited the place where the idol was. It was not a temple but merely the foot of a tree. Therefore, a street dog that was passing by emptied its bladder on the idol. The girl then thought that the dog must be higher than the idol and started running after the dog.
An urchin passing by threw a stone at the dog. It howled in pain and ran faster. A young man who was watching this chastised the boy for being unkind to the dumb creature who had done him no harm. The girl ultimately thought that the one who thrashed the boy who beat the dog should be the best. So, she decided to marry that youth. It turned out, at last, that the youth was the one who had been chosen by her parents. Thus, it turned out that the person whom she thought was far away was in fact very close. Thus runs the story.
“You are wandering all over the country in search of God as though he is far away. So long as he is not known, he will certainly be at a distance. All the quest will not reveal him. He stays very close to you. Far away from the far distant but nearer than the nearest.” Thus says the Sruti.
The earth and the sky seem to meet at the horizon and let us suppose that a palm tree is sighted at that point. From where we stand, it would seem that if we reached that spot we can find the earth meeting the sky. But on actually reaching that spot, the horizon would appear to have receded farther. As we travel towards it, it would also travel away from us. Can we ever reach it by keeping identification points such as a palm tree in view? Therefore where is it? It is where you are standing. The God who is referred to as ‘that’ implying that he exists far away, is near you – in you. ‘You are That’ the Veda makes you feel it. (Tat Tvam Asi) – ‘You Are That’ – is the supreme message of the Vedas. Here Tatvam does not mean the quality of being ‘Tat”. The word twm can be taken in two ways as a suffix or a pronoun – one indicates quality and the other means the pronoun ‘you’. ‘Tat Tvam Asi’ means ‘Tat – That’, ‘Tvam – You’, ‘Asi – Are’.
The two words ‘Tat’ and ‘Tvam’ together have come to be used as ‘tatvam’. In common parlance, by making use of the word which describes the nature of Paramaatma, any conclusion which has general acceptability is referred to as ‘tatvam’. Thus, ‘tatvam’ is used to refer to any underlying principle.
The knowledge of that which you think is ‘I’, is realisation of God. If this light of understanding were not present, you cannot even think of a thing called God. “Knowledge springs from me, thought arises in me.” This knowledge born of thought and the ‘Tat’ which you think is at a great distance are one and the same” is how the Veda sums it up.
What we refer to as ‘it’, ‘tat’, ‘Idam’, is not without an origin or root. Nothing that can be identified as ‘it’ can appear without an origin. There can be no tree without a seed. All the things in the world referred to as ‘it’, viz., mountains, sea, sky, earth, cattle, man, anger, fear, love, sense organs, power – all have an origin. Being seen, heard, smelt, thought of, felt as heat or cold – these are felt by the mind and experienced by the respective organs. All these are called ‘it’. All the scientific discoveries made so far, those yet to be made, (i.e.), those that are ‘known’ are all ‘Idam’. All these have something as their origin. If there were no origin, there can be no ‘Idam’. And nothing can exist without an origin. There is always a root or seed principle behind it.
The human body come out of a “seed”. The tree owes its origin to a seed. Therefore, the phenomenal world must have an origin. And whatever power or force is immanent in the world, all that must spring from an origin.
If the seed of a tamarind tree that has just sprouted is split open, one can see a miniature tamarind tree clasped in the two halves. This has the power in itself to grow into a big tree. All seeds have such power but, in the tamarind seed, this can be seen.
In mantras, there are what are called “Beeja Aksharas’ – seed-words. Just as a huge tree is contained in a small seed, these Aksharas (or words) are packed with limitless power. If these Aksharas are repeated several hundred thousand times with single-minded concentration, we can absorb and feel the great power which it contains.
Whatever power is latent in the world, whatever intelligence or ability, all these must be present in their ‘origin’ or seed which is God. Without the seed, they cannot be born.
What the Vedas proclaim is that all things in creation referred to as ‘it’ did not appear without a root or seed or cause. The sakti or force which is in the cause pervades the world. Where is that cause? It is what lies within, what is referred to as ‘it’ but it looks outside as Aatma.
We see our reflection in a huge mirror. If four mirrors are placed around us at right angles to each other, we can see countless images. One who sees the thousand images and is their cause is just one person. Likewise, the thing that is inside the millions of created beings and which looks outside at the created thing as ‘it’ is none else but God.
The thing that sees is the origin or cause of the thing that is seen. The cause of all the worlds is ‘knowledge’ or ‘jnana’. Where is this knowledge? It is inside us. That which is an indivisible whole, appears as divided within us. There are many types of electric bulbs, small, big, blue, green, etc. They also come in many shapes. But the current that is inside each is the same electric current. The same electrical force which is prevalent all over is present inside the bulb and makes it glow. It also makes the fan to whirl. The cause of all these activities is the same force. That is universal electricity which is composite and indivisible but, when led through the wire, it gets separated, as it were. When lightning appears in nature, when water falls over a precipice, this force comes into being by itself.
Therefore, make the great ‘Tatvam’ or the truth flash through you. Beginning with Karma-Anusthaana, i.e. performance of prescribed duties, e.g., yajna and worship deities, etc., and ending with deep meditation on the purport of the ‘Mahaa Vaakya’ (the great message of the Vedanta), all these practices are for this rules of conduct for householders, laws of Government, art, medicine, geology and other disciplines, are the steps that lead to self-realisation (Aatma-Sakshaatkaara). The convergence of ‘tat’ (that) and ‘tvam’ (you) will in the beginning be felt for a second like the flash of lightning. It is this stage which is referred to in Kenopanishad (4.4) that the consciousness of Brahman will be like a lightning inside a lightning, and felt only for a fraction of a second. Tasyaisha Aadesho Yadetadvidyutovyadyutadaa – If the practices are continued, then, like a waterfall producing electricity continuously, one can stay at that level of consciousness. This is Moksha – liberation whilst alive. After death, that consciousness mingles or merges with the Supreme Being. Even this distinction between liberation whilst living and liberation after death is felt by others but the jnaani regards both as the same.
Thus, the supreme purport of all the Vedas is to make us realise by our own experience that all is Brahman and thus lead us to a state of bliss.
We learn of what is happening in various parts of the world through the newspapers. The news is obtained through reporters in different places, news agencies, through post, telegraphic and teleprinter messages. However, there are many items which cannot be brought within the ken of modern equipment and instruments or even of ordinary human intellect. There must be another type of newspapers if we should known these items.
The news that cannot be transmitted through modern media and which pertain to a place unconnected by telegraphic or teleprinter circuits is provided through the Veda mantras. Rishis gifted with super-natural powers have communicated to us, through this agency, news beyond the grasp of our ordinary intellect.
Although the Vedas contain a lot of important items there are some items that can be skipped or ignored.
When I say ignored, I do not mean that those items are unimportant or that the Vedas contain something that canbe classified as wrong.
Our elders have clarified that when the Vedas wish to make us understand an important point, many items are given to us so as to prepare us for the important item or to illustrate a point. The point has to be grasped and the other information is to be understood only to grasp the main point. Although certain subjects are relevant at the beginning or middle levels, they have to be abandoned in stages as one reaches the higher states of the awakening of the soul. The Vedas say so. Thus, what is acceptable to me at one stage is not so at another stage.
The Vedas also contain certain great truths or “Paramataatparya”, which have to be accepted in toto. The rest which can be accepted at lesser value or importance and may even be left out are called ‘Artha Vaada’ and ‘Anu Vaada’.
The Vedas resort to the use of anecdotes and stories to edify and make us grasp a truth or law. In such cases, the truth or law has to be taken in full and the anecdotes ignored as ‘Artha Vaada’. In other words, Arthavaada is not to be taken literally but as illustrative.
What is Anuvaada? In order to make us understand something not known, the Vedas start off with a thing known and keep on elaborating it. Before reaching the objective which is unknown, it may resort to a repetition of the known. That is, it will resort to illustrations from things which are knowable and which are within our experience and which need not be learnt from the authority of the Vedas. What cannot be established by other authorities (Pramaana) and which the Vedas proclaim, that is the law (Vidhi), that is the important message.
In other words, if a thing can be known through the medium of other commonly known facts it cannot be regarded as solely subsisting on the authority of the Vedas although the Vedas may repeat it. Vedas are meant to make the unknown known. If it states what is known as also what unknown, then it would mean that its main goal (Taatparya) is the unknown. It is only to make our understanding easier that it starts with what is already known to us. If this were the ultimate message, there would be no point in mentioning the unknown. On the other hand, if the Vedas went on elaborating on things unknown only, it would be a mockery to say “I take what is known and reject what is not.”
Let us now examine what is thing ‘known’ to us and what is that ‘unknown’ to us.
In the case of worldly objects, there are two views. Whether all the objects that are known to us are the same or they are different is the doubt that assails us and thus there is a broad classification of objects into two categories. Based on physical perception, we decide that the various objects are indeed different. Only if regarded as separate, can the business of this world be carried on. We have to distinguish between water and oil. If we wish to light the lamp oil has to be used; water will be of no use. If the same lamp burns high and sets fire to the house, then water has necessarily to be used to put out the fire. If the oil is poured on the fire, a bigger fire will result. Thus, whatever be the job in hand, unless differentiated, knowledge is maintained and proper use is made of the same, a job cannot be done well.
This kind of differentiation is ‘Duality’ or ‘Dvaita’. This Dvaita is at the foundation of all the karmas and Upaasanas (actions and worships) contained in the Vedas. Therefore, it is clear that in such activities Vedas are dualistic in their impact. An Advaitin (non-dualist) need not dispute this. Dualism is very much true of the phenomenal world. But let us examine if the Vedas stop at where we see dualism. If it did, then we can conclude that dualism is the goal of the Vedas. But the Vedas talk of Advaita (non-dualism) at some places in the Samhitas and extensively in the concluding part, namely the Upanishads.
In our religious texts, there are two points of view, viz., “Poorva Paksha” and “Siddhaanta”. The Poorva Paksha contains the views of those who hold a different opinion from what one holds (i.e.) an opposite point of view. After the Poorva Paksha is presented, then the refutation of those views follows. In other words the idea is to voluntarily present the opposite point of view first and then prove that to be untenable and thus establish the real doctrine.
Western scholars also admire our treatises on philosophy called “Darshana” – which neither glosses over nor conceals the point of view of the opposition but presents them in full and then answers every one of them.
The “Jnaanakaanda’ of the Vedas which contains the Upanishads and which mainly deal with Advaita, appears as a later or second part whilst the ‘Karma Kaanda’ which talks of Dvaita appears earlier and forms the first part.
Therefore, if the Vedas first postulate Dvaita which is already known to us in our daily experience and later talk of Advaita which is not known to us, it clearly shows that Advaita is the doctrine which the Vedas seek to establish. In fact, it means that it is its ultimate goal.
It may be argued that Dvaita has not been condemned as Poorva Paksha should normally have been. I will tell you why. The karma and worship performed on the basis of Dvaita are not inimical to the ‘experience’ which advaita propagates. On the contrary, they are helpful as means to an end. It is not as though the opposition who is generally regarded as an enemy has been placed in the Poorva Paksha so that he can be vanquished later. The Dvaita doctrine has not been presented as an opposite viewpoint nor has it been condemned anywhere later.
Just as the flower appears first and then it drops off leaving the fruit in position, first we have to be in Dvaita and later leave it, and come over to Advaita. The flower and the fruit are certainly not enemies. Nobody condemns the flower because the fruit is the ultimate state.
Advaita philosophy would have felt no need to condemn other philosophies if the latter had confined themselves to their proper places and presented their doctrines at their appropriate level. It is only when they transgress this limit that they need to be opposed. It is in this spirit that Adi Sankara and other Advaita philosophers have viewed rival philosophies. Fortunately, scientific development has not posed any threat to metaphysical doctrines. In fact, modern science is approaching nearer and nearer to the Advaita thought which earlier it was not possible absorb except through the authority of the Vedas. To begin with, science was of the view that all substances on earth were different from each other. Then it was postulated that there were only 72 ‘elements’ which presented the myriad objects. The interaction of the 72 was said to cause all the differences. Then, when atomic science developed, it postulated that the origin of all these 72 elements is the same, viz., energy which we call as ‘Sakti’.
Those who are advanced in philosophical enquiry and have realised the Truth, consider that Energy or Sakti is all knowledge or consciousness within whose ambit is included not the inanimate objects but the “Jeevaatma” or soul which stands as the symbol of cognisance.
Whether called a single energy or Eka Chaitanya or “Universal Consciousness”, it is beyond the reach of the sense organs, whether of the physicist or the philosopher. Its manifestation as plurality of objects is known to us already as Dvaita. If Dvaita were the absolute truth, there is need at all to consult the Vedas. There is no need for it to dwell on objects within the range of perception of the eye or the intellect. We must take the message of the Vedas as supreme only if it establishes at the end what has to be known, beginning from things already known in stages. The truth is that the individual soul (Jeevaatma) merges with the cosmic soul (Paramaatma) and becomes the Advaitic ‘Brahman’.
Harih Harah!!
वेदों का उद्देश्य और तात्पर्य
एक और प्रश्न है । जब वेद अनेक विषयों पर विस्तृत रूप से चर्चा करते हैं, तो हम कैसे कह सकते हैं कि वेदों का मुख्य संदेश उपनिषदों में वर्णित आत्म-साक्षात्कार है ?
वेद अग्निहोत्र, सोमयज्ञ, सत्रयज्ञ और इष्टियों (समाज के लिए कल्याणकारी कार्यों का प्रावधान, जैसे, आश्रयों का निर्माण, कुएँ खोदना आदि) की प्रशंसा करते हैं । इन्हें वेदों का उद्देश्य क्यों नहीं माना जा सकता ? वेदों में विवाह समारोह, अंतिम संस्कार, श्राद्ध आदि का संचालन, एक अच्छी सरकार कैसे चलाई जानी चाहिए, एक विद्वान सभा में कैसा आचरण करना चाहिए आदि जैसे कई अन्य विषयों का उल्लेख है । इनमें से किसे सबसे महत्वपूर्ण माना जाना चाहिए ?
यज्ञों और पूजा-पाठ के तरीकों के अलावा, वेदों में ध्यान और प्रार्थना (उपासना), ध्यान या एकांत में ध्यान करने आदि की कई विधियों का भी उल्लेख है । यह भी बताया गया है कि आत्मा शरीर में कैसे प्रवेश करती है, अंततः शरीर का क्या होता है, आत्मा पुनः दूसरे शरीर में कैसे प्रवेश करती है, आदि ।
इसके अलावा, वेदों में शारीरिक स्वास्थ्य सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न प्रकार की चिकित्सा पद्धतियों और शत्रुओं को शांत करने तथा उनके द्वारा किए जाने वाले नुकसान को टालने के लिए शांति या उपायों का भी वर्णन है । इन सभी पर विचार करने पर प्रश्न उठता है कि वेद का उद्देश्य या लक्ष्य क्या है ?
उपनिषद कहते हैं, “सभी वेद मिलकर एक ही सत्ता की बात करते हैं।” (कठो. 2.15)। वह सत्ता क्या है ? वैदिक सर्वमान्यता है कि सत्ता वह है जिसे प्रतीकात्मक रूप से ‘ॐ’ ध्वनि द्वारा दर्शाया जाता है ।
कुछ पाश्चात्य विद्वानों का मत है कि प्राचीन भारतीय सूर्य, चंद्रमा और प्राकृतिक घटनाओं को देखकर आश्चर्यचकित हो जाते थे और चूँकि उस समय विज्ञान का उतना विकास नहीं हुआ था, इसलिए प्रत्येक विचारक ने प्राकृतिक घटनाओं के अपने मूल्यांकन के अनुसार अपना दृष्टिकोण व्यक्त किया । उनका मानना था कि सभी लोग इन्हें स्तोत्रों द्वारा नहीं गा सकते थे, केवल कुछ ही ऐसा कर सकते थे और इन कथनों या गीतों को एकत्रित करके मंत्रों का नाम दिया गया, जो संकलन के बाद “वेद” बन गए ।
इस प्रकार, यद्यपि उपनिषदों में यह स्वीकार किया गया है कि सभी वेद केवल एक ही सत्ता की बात करते हैं, फिर भी ऐसा प्रतीत होता है कि इनमें विविध वस्तुओं का उल्लेख है, केवल एक का नहीं ।
रामायण के संबंध में एक श्लोक है:
वेद वेद्ये परे पुंसि जाते दशरथात्मजे । वेद: प्राचेतसादासीत्साक्षात् रामायणात्मना ॥
वेद वेद्ये वह है जिसे वेदों द्वारा जाना जाता है । वह कौन है ? वह परम सत्ता, जिसे वेदों के माध्यम से जाना जाना था, इस संसार में जन्म लिये । जब वे दशरथ के पुत्र राम के रूप में आये तो वेदों ने वाल्मीकि का पुत्र रामायण का रूप ले लिया ।
उपरोक्त श्लोक का यही अर्थ है । यहाँ भी, परम पुरुष – ॐकार नामक परम सत्य ही वेदों का सामान्य लक्ष्य है । भगवद्गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं: “वेदैश्च सर्वैल अहमेव वेद्यः” – सभी वेदों के माध्यम से केवल मुझे ही जाना जाना है ।
इन सब पर विचार करने पर यह स्पष्ट है कि यद्यपि वेदों में अनेक विषयों का वर्णन है, फिर भी सभी वेद एक ही केंद्रीय विषय, अर्थात् एक परम सत्ता, पर एक स्वर से बोलते हैं ।
तब हम सोच सकते हैं कि वेदों को एक का वर्णन करने के लिए अनेक वस्तुओं और सत्ताओं की बात क्यों करनी पड़ती है ?
केवल अनेक सत्ताओं के माध्यम से ही उस एक सत्ता को जाना जा सकता है । योग (शरीर और मन पर नियंत्रण), ध्यान (ध्यान), तप (तपस्या का अभ्यास), यज्ञ (बलिदान), कर्मानुष्ठान (निर्दिष्ट कर्तव्यों का पालन – विवाह और अन्य संस्कार), राज्य के कार्य, सामाजिक जीवन – ये सभी अंततः एक केंद्रीय सत्ता की ओर अभिसरित होते हैं जो वेदों का वास्तविक सार है । अन्य सभी वस्तुएँ परिवर्तनशील, परिणतशील हैं, जो समय बीतने के साथ किंवदंतियाँ बन जाती हैं । संसार हमें विभिन्न रूपों में दिखाई देता है, न कि एक एकात्मक वस्तु के रूप में । वेद विभिन्न विषयों पर विचार करते हैं ताकि हमें इनमें से किसी एक के माध्यम से एक केंद्रीय व्यक्ति तक ले जा सकें ।
यदि हमें उस एक अनंत सत्ता को जानना है जिसकी ओर वेद संकेत करते हैं, तो हमें कुछ मानसिक अनुशासनों का अभ्यास करना चाहिए ताकि उस सत्ता का विचार हमारे मन में आता रहे । यज्ञ करना, तपस्या करना, दान देना, मंदिरों का जीर्णोद्धार करना, जल आपूर्ति के लिए कुएँ खोदना, समाज सेवा, विवाह संस्कार और ऐसे ही कर्तव्य मानसिक शुद्धता (चित्त शुद्धि) और अस्थिर मन को स्थिर करने (चित्त वृत्ति निरोध) के लिए हैं ।
विभिन्न कर्तव्यों और कृत्यों का उद्देश्य एक अनुशासित मार्ग के माध्यम से ईश्वर की प्राप्ति में सहायता करना है ।
वेद शब्द का अर्थ है – जानना । उपनिषद आत्मा को उस आत्मा के रूप में परिभाषित करते हैं जिसे जानने से सभी चीजें ज्ञात हो जाएँगी । वेदों का लक्ष्य उस आत्मा को ज्ञात कराना है । चाहे वह कर्म हो जो आरंभ में आता है, या ज्ञान जो अंत में आता है, अर्थात शुरुआत में या आरंभ में और निष्कर्ष या अंत में, केंद्रीय विषय ईश्वर – ब्रह्म आत्मा है, जिसका अंततः अर्थ एक ही है ।
कर्म विभिन्न प्रकारों में विभाजित है, और ज्ञान एकात्मक रूप से विद्यमान है, परंतु दोनों का केंद्रीय विषय एक ही है । इंद्रियों की रचना इस प्रकार की गई है कि वे आत्मा को नहीं देख सकतीं, बल्कि केवल वस्तु को देख सकती हैं और बाह्य रूप से देख सकती हैं ।
जब कोई व्यक्ति अपने ध्यान को हाथ में मौजूद वस्तु से हटकर किसी बाहरी वस्तु की ओर जाने देता है, तो कहा जाता है कि वह कहीं और देख रहा है । आत्मा ही वास्तविक पदार्थ है । उसे न देखकर, बल्कि बाहर की ओर देखना, जहाँ देखना चाहिए, वहाँ से कहीं और देखने जैसा है । मन बाहर न देखने की सलाह पर ध्यान नहीं देगा । इसलिए, बाह्य-दिशा वाले कार्य करते हुए, व्यक्ति को भीतर देखने की क्षमता विकसित करनी चाहिए । इंद्रियों और मन को अपनी इच्छानुसार खींचने देने के बजाय, व्यक्ति को निर्धारित वैदिक अनुष्ठानों का अधिकाधिक पालन करना चाहिए । इससे ही भीतर देखने की क्षमता विकसित होगी । अन्य बाह्य वस्तुओं को सीखने, उनका विश्लेषण करने और उनका मूल्यांकन करने के बाद ही, वह बुद्धि जो सब कुछ ग्रहण करने में सक्षम है, उस “उस” तक पहुँच सकती है जिसे जानकर सभी वस्तुएँ ज्ञात हो जाएँगी । इसी उद्देश्य से वेदों में अनेक अनुशासनों, व्रतों, कर्मों, कलाओं और सामाजिक कर्तव्यों की चर्चा की गई है । निरंतर कर्म करते रहने से भौतिक शरीर के प्रति आसक्ति उत्तरोत्तर क्षीण होती जानी चाहिए । मन और बुद्धि का मानो ज्ञान, सत्यों की गहन जाँच और आत्म-अनुशासन के अभ्यास से विलय हो जाना चाहिए । अशुद्ध कर्मों से शरीर के प्रति आसक्ति बढ़ती है । ये मन की चंचलता का कारण बनते हैं । दूसरी ओर, वैदिक कर्मों का पालन और वैदिक आदेशों का पालन, जो मंत्रों पर आधारित हैं और जिनका उद्देश्य सर्वकल्याण है, शरीर और मन की गतिविधियों की गति में एक निश्चित शिथिलता लाते हैं । अंततः, यह परिपक्वता और पूर्णता की ओर ले जाता है जिससे व्यक्ति भीतर की ओर देख पाता है । ऐसा देखने के बाद, व्यक्ति को यहीं परम आनंद मोक्ष आनंद की प्राप्ति होती है । मोक्ष का अर्थ है “मुक्ति की अवस्था” – सांसारिक बंधनों से ‘मुक्ति’ । यदि शरीर और मन अहंकार की भावना से मुक्त हो सकें, तो यह संसार से मुक्ति का भी संकेत है ।
वेदों का उद्देश्य इसी लोक में रहते हुए मोक्ष प्राप्त कराना है । यही इसकी महिमा है । यदि अन्य धर्मों की तरह, हमें भी मृत्यु के बाद किसी अन्य लोक में मोक्ष प्राप्त होता, तो इस लोक में रहते हुए हम उसके स्वरूप की कल्पना नहीं कर सकते । जिन्होंने मोक्ष प्राप्त किया है, वे हमें अपना अनुभव बताने के लिए वापस नहीं आएंगे । परिणामस्वरूप, संदेह और अविश्वास उत्पन्न हो सकता है । लेकिन, यदि इस लोक में रहते हुए व्यक्ति सभी इच्छाओं और अभावों का त्याग कर दे और आत्म-विश्लेषण में लग जाए, तो मोक्ष यहीं प्राप्त हो जाएगा । वेदों के इस कथन से यह स्पष्ट है कि वे अकाट्य सत्य की बात करते हैं ।
अन्य मार्ग केवल अस्थायी राहत प्रदान करते हैं, जैसे कुनैन की एक खुराक मलेरिया के तीव्र बुखार में तापमान को कम कर सकती है । यदि बुखार का दोबारा न आना सुनिश्चित करना है, तो मूल कारण का पता लगाकर उसे नष्ट करना होगा । वैदिक आस्था “जीव” (अस्तित्व) के मूल तक जाती है, ठीक उसी स्थान तक जहाँ वह परमात्मा से अलग होकर पृथकता (भेद) की भावना को नष्ट करती है और इस प्रकार अस्थायी उपचार के बजाय स्थायी मुक्ति प्रदान करती है ।
वेदों के कर्मकाण्ड में दिए गए आदेश भी अस्थायी उपचारों के स्वरूप के हैं । लेकिन फिर “अशांति” में बुरी तरह संघर्ष कर रहे व्यक्ति को एक ही झटके में, मानो, आत्माराम में परिवर्तित करना संभव नहीं है, अर्थात, जो अपने भीतर सुख पाता है और जो शांति की स्थिति में रह सकता है । इसीलिए ऐसे कर्मों का विधान किया गया है जो अस्थायी लाभ प्रदान करते हैं, लेकिन इस प्रक्रिया में वे मन की पवित्रता विकसित करने में सहायता करते हैं जो स्थायी मानसिक शांति के लिए मूलभूत शर्त है । यद्यपि यज्ञ (बलिदान), व्रत (आत्म-संयम) और पूर्त (सार्वजनिक सेवा) का बहुत विस्तार से विधान किया गया है, फिर भी यह इनमें से किसी को भी साध्य या लक्ष्य नहीं मानता । ये (कर्म) शरीर के प्रति आसक्ति को कम करने के लिए बनाए गए हैं । मन को इनकी ओर मोड़ने से एकाग्रता विकसित होती है और मन अशुद्धियों से शुद्ध होता है । इस प्रकार, यद्यपि वेदों में विभिन्न विषयों पर विस्तार से चर्चा की गई है, फिर भी उनका उद्देश्य दार्शनिक अन्वेषण की ओर ले जाना है, जैसा कि वेदांत में निहित है ।
जब हम किसी समाचार पत्र में किसी का लेख या भाषण देखते हैं, तो स्वाभाविक रूप से हम जानना चाहते हैं कि उसमें क्या कहा गया है । भाषण या लेख लंबा होता है और उसे शुरू से अंत तक पढ़ने का समय नहीं होता है । इसलिए हम शुरू से थोड़ा पढ़ते हैं और फिर जल्दी से अंतिम अनुच्छेद पर पहुँच जाते हैं । इससे हमें विषयवस्तु का अंदाजा हो जाता है । आरंभ और अंत का अवलोकन ही संपूर्ण विषयवस्तु का चतुराई से अनुमान लगाने के लिए पर्याप्त है । इसी प्रकार, वेदों के आरंभ और अंत में एक ही ईश्वर तत्व का वर्णन है और वही वेदों का केंद्रीय विषय है, जैसा कि मैंने पहले उल्लेख किया है ।
सरकार कई कानून बनाती है । लेकिन, अक्सर, कानूनों के पीछे के वास्तविक उद्देश्य के बारे में संदेह और मतभेद होता है । फिर इन नियमों को मूल अधिनियम के आशय के अनुसार, मूल अधिनियम के आशय के नियमों के अनुसार, व्याख्या के नियमों के अनुसार, स्पष्ट किया जाता है । इसी प्रकार, शाश्वत नियम, अर्थात् वेदों की व्याख्या करने के लिए, मीमांसा शास्त्र व्याख्या के नियम के रूप में कार्य करता है, अर्थात् आशय को स्पष्ट करता है । मीमांसा चौदह विद्याओं में से एक है और मैं इसके बारे में आपको बाद में और बताऊँगा । यहाँ मैं इसके एक पहलू तक ही सीमित रहना चाहता हूँ ।
मीमांसा में छह विधियों का उल्लेख है जिनके माध्यम से वैदिक मंत्र का तात्पर्य ज्ञात किया जा सकता है । ये छह हैं: उपक्रम-उपसंहार, अभ्यास, अपूर्व, फल, अर्थवाद और उपपत्ति । वेदों के अलावा, इन छह विधियों का उपयोग किसी लेख या भाषण के सटीक दायरे को निर्धारित करने के लिए किया जा सकता है ।
उपक्रम आरंभ है । उपसंहार का अर्थ है निष्कर्ष । पहली विधि आरंभ और अंत की जाँच करना है – यही उपक्रम और उपसंहार विधि है । यदि दोनों एक ही विषय की बात करते हैं, तो यह माना जा सकता है कि वही विषयवस्तु है । ‘अभ्यास’ का अर्थ है किसी निश्चित बात को बार-बार कहना । उदाहरण के लिए, शारीरिक व्यायाम, पुल-अप्स बार-बार किए जाते हैं, और वे ‘देहाभ्यास’ का निर्माण करते हैं ।
किसी लेख या भाषण में, यदि किसी विषय का बार-बार उल्लेख किया जाता है, तो यह स्पष्ट है कि वह सार है जिसे ज़ोर देने के लिए दोहराया जा रहा है ।
अपूर्वता का अर्थ है वह जिसका पहले उल्लेख नहीं किया गया है । तब वह इस बात का संकेत होगा कि सार क्या होगा ।
“फल” परिणाम है, “यदि ऐसा किया जाए तो एक निश्चित परिणाम प्राप्त होगा”, यह कहने का एक और तरीका है । “ऐसा करो और ऐसा-ऐसा परिणाम प्राप्त होगा ।” अर्थात्, उद्देश्य हमें एक विशेष परिणाम तक पहुँचाना है । इस विधि को ‘फल’ कहते हैं ।
अर्थवाद पद्धति में कई बातों पर विचार किया जाता है और उनके आधार पर एक कहानी सुनाई जाती है और परिणामस्वरूप, कोई विशेष बिंदु सामने आता है । हमें यह मान लेना चाहिए कि सामने आया बिंदु ही विषय का मूल है । उपपत्ति नामक पद्धति में, एक विषय की कल्पना की जाती है और फिर उसकी उत्पत्ति, उद्देश्य, उपयुक्तता आदि की व्याख्या की जाती है ताकि यह स्पष्ट हो सके कि विषयवस्तु यही है ।
वेदों के आदि और अंत का अध्ययन करने वाले एक व्यक्ति के अनुसार – “वेदों का मुख्य अभिप्राय अग्नि उपासना है । उपाक्रम में, अर्थात् आरंभ में, यह अग्नि मीलाय से प्रारंभ होता है । अंत में, अर्थात् उपसंहार अवस्था में, इसका अंत भी अग्नि से होता है । आदि और अंत दोनों अग्नि ही हैं ।” अतः वेदों का सर्वोच्च संदेश अग्नि है ।
यद्यपि इसमें कुछ सत्य भी है, इसे अक्षरशः सत्य नहीं माना जा सकता । अग्नि आत्मा के जागरण, ज्ञान के प्रकाश का प्रतीक है । आत्म चैतन्य, आत्मा का जागरण, यह बोध है कि ज्ञाता, ज्ञेय और ज्ञान सभी एक ही हैं । वास्तव में यही वेदों का सार है ।
किन्तु, वास्तव में, अग्नि पूजा वेदों का लक्ष्य नहीं है । वेदों की महानता इस बात में निहित है कि वे किसी एक देवता की पूजा को दूसरे देवता से अधिक महत्व नहीं देते । वेद (बृहदारण्यक १४.८) कहता है, “जो आत्मा अनेक देवताओं का रूप धारण करती है, उसकी भक्तिपूर्वक पूजा की जानी चाहिए ।” “केवल आत्मा को ही देखा जाना चाहिए; केवल उसे ही सुना जाना चाहिए; “केवल आत्मा का ही ध्यान (मनन) करना चाहिए,” याज्ञवल्क्य ने मैत्रेयी को यही शिक्षा दी और इसी के माध्यम से वेद हमें अपना लक्ष्य बताता है ।
यदि किसी वस्तु को ‘लक्ष्य’ कहा जाए तो यह कल्पना निम्नलिखित चित्र प्रस्तुत करती है: “हम एक ही स्थान पर हैं; यहाँ से हमें अनिवार्य रूप से दूसरे छोर पर स्थित स्थान पर जाना होगा ।”
लक्ष्य को दूर से प्रकट होने वाली “किसी चीज़” के रूप में इंगित किया गया है । “इत:” अर्थात “यह” वह अवस्था है जिसमें हम अभी हैं । इससे हमें उस “तत:” की ओर जाना है ।
लेकिन क्या वास्तव में वह “लक्ष्य” भी “यहाँ” नहीं है ? बिल्कुल है । जब यह बोध हो जाता है कि सब कुछ ब्रह्म है, तो ‘वह’ और ‘यह’ दोनों ही ब्रह्म हो जाते हैं । यहाँ तक कि कोई अलग ‘यह’ या ‘वह’ भी नहीं है । जिसे हम अभी ‘यह’ कहते हैं, वह अंत में ‘वह’ बन जाता है, जिसका अर्थ है ‘शाश्वत वह’ ।
‘तत:’ अर्थात ‘वह’ की तरह, परमात्मा को भी ‘तत:’ अर्थात ‘वह’ कहा जाता है । जब हम किसी कर्म के अंत में ‘ॐ तत् सत्’ कहते हैं, तो इसका अर्थ है: “जो ‘तत्’ है, वही सत्य है” । ‘सत्’ का अर्थ सत्य है ।
हम ‘पुरुषत्वम्’, ‘महत्वम्’ आदि कई शब्दों के अंत में ‘त्वम्’ प्रत्यय भी जोड़ते हैं । यहाँ ‘त्वम्’ का अर्थ वर्णित वस्तु के गुण का स्वरूप है । ‘महत्’ का गुण महत्वम् है । पुरुष का स्वरूप पुरुषत्वम् है । ठीक है, यदि ऐसा होता, तो हम यात्रा के अंत को “शाश्वत अंत” के रूप में “तत्व” कैसे कहते (अर्थात्) ‘तत्’ के स्वरूप का अर्थ कैसे लगाते ? ‘तत्त्व विचार’, ‘तत्त्व उपदेश’ – इन सभी का अर्थ ‘तत्’ के स्वरूप की जाँच या विश्लेषण करना है और उसी ‘तत्’ के स्वरूप का उपदेश देना है ।
प्रश्न उठता है कि जब वेद दूरस्थ परम सत्ता को ‘तत्’ – ‘वह’ – कहकर वर्णित करता है, तो इससे हमें क्या लाभ है ? जो व्यक्ति दूर है, वह बहुत निकट भी है । वेद कहता है, ‘दूरत दूरे अंतिकेच’ । इसका अर्थ है कि जब हम समझ नहीं पाते, तो वह दूर होता है; लेकिन जब समझ में आ जाता है, तो वह हमारे निकट होता है – हमारे भीतर होता है ।
इसका उदाहरण एक कहानी में मिलता है । एक लड़की विवाह योग्य आयु की थी और उसके माता-पिता ने उसके लिए वर चुन लिया था, जो कि प्राचीन रीति-रिवाजों के अनुसार विवाह योग्य रिश्तेदारों की पंक्ति में से प्रथम स्थान पर होता था । लेकिन लड़की का दृढ़ निश्चय था कि उसका विवाह सबों में श्रेष्ठ व्यक्ति से ही होगा । इसलिए माता-पिता ने उसे अकेला छोड़ दिया ।
लड़की ने कहा कि राजा सबसे श्रेष्ठ है और वह राजा के अलावा किसी और से विवाह नहीं करेगी । इसलिए वह राजा के पीछे-पीछे चलती रही ।
एक दिन राजा पालकी में सवार होकर जा रहे थे और रास्ते में उन्हें एक संन्यासी मिला । राजा नीचे उतरे, उस संन्यासी को प्रणाम किया और फिर अपने रास्ते पर चल पड़े ।
लड़की देख रही थी: ‘मैं कितनी मूर्ख हूँ जो यह सोचती हूँ कि राजा मनुष्यों में श्रेष्ठ है । संन्यासी राजा से भी ऊँचा लगता है । मुझे किसी तरह उस संन्यासी से विवाह करना ही होगा ।’ ऐसा सोचकर, लड़की संन्यासी के पीछे-पीछे चली गई ।
एक दिन, जब वह संन्यासी का पीछा कर रही थी, तो उसने उसे एक बरगद के पेड़ के नीचे भगवान गणेश की मूर्ति को प्रणाम करते देखा । तब उसने अपना विचार बदल दिया और भगवान गणेश से विवाह करने का निश्चय कर लिया क्योंकि उसे लगा कि वह उस संन्यासी से भी श्रेष्ठ है जो गणेश को प्रणाम करता है । उस साधु का अनुसरण करने के बजाय, वह गणेश के पास बैठ गई ।
जहाँ मूर्ति थी, वहाँ बहुत कम लोग आते थे । वह कोई मंदिर नहीं, बल्कि एक पेड़ का निचला हिस्सा था । इसलिए, वहाँ से गुज़र रहे एक गली के कुत्ते ने मूर्ति पर अपना मूत्राशय खाली कर दिया । तब लड़की ने सोचा कि कुत्ता मूर्ति से ऊँचा होगा और कुत्ते के पीछे दौड़ने लगी ।
वहाँ से गुज़र रहे एक छोटे बच्चे ने कुत्ते पर पत्थर फेंका । वह दर्द से चिल्लाया और तेज़ी से भागा । यह देख रहे एक युवक ने उस लड़के को उस मूक प्राणी के प्रति निर्दयी होने के लिए डाँटा, जिसने उसे कोई नुकसान नहीं पहुँचाया था । अंततः लड़की ने सोचा कि वो जिसने कुत्ते को पीटने वाले लड़के को डाँटा-समझाया वही सबसे अच्छा (सर्वश्रेष्ठ) होना चाहिए । इसलिए, उसने उस युवक से विवाह करने का निश्चय कर लिया । अंततः, यह पता चला कि वह युवक वही था जिसे उसके माता-पिता ने चुना था । इस प्रकार, यह पता चला कि जिस व्यक्ति को वह दूर समझ रही थी, वह वास्तव में बहुत निकट था । कहानी इस प्रकार है ।
“तुम ईश्वर की खोज में पूरे देश में ऐसे भटक रहे हो मानो वह बहुत दूर हों । जब तक उन्हें जाना नहीं जाता, वह निश्चित रूप से दूर ही रहेंगे । सारी खोज उन्हें प्रकट नहीं कर पाएगी । वह आपके बहुत निकट रहते हैं । दूर से भी दूर, लेकिन निकटतम से भी निकट ।” श्रुति ऐसा कहती है ।
क्षितिज पर पृथ्वी और आकाश मिलते हुए प्रतीत होते हैं और मान लीजिए कि उस बिंदु पर एक ताड़ का पेड़ दिखाई देता है । जहाँ हम खड़े हैं, वहाँ से ऐसा प्रतीत होगा कि यदि हम उस स्थान पर पहुँच जाएँ तो हम पृथ्वी को आकाश से मिलते हुए पा सकते हैं । लेकिन वास्तव में उस स्थान पर पहुँचने पर, क्षितिज और दूर होता हुआ प्रतीत होगा । जैसे-जैसे हम उसकी ओर बढ़ते हैं, वह भी हमसे दूर होता जाता है । क्या हम ताड़ के पेड़ जैसे पहचान बिंदुओं को दृष्टि में रखकर कभी उस तक पहुँच सकते हैं ? तो वह कहाँ है ? वह वहीं है जहाँ आप खड़े हैं । जिस ईश्वर को ‘वह’ कहा गया है, जिसका अर्थ है कि वह बहुत दूर है, वह आपके निकट है – आपके भीतर है । ‘तुम वही हो’, वेद आपको इसका अनुभव कराता है । (तत् त्वं असि) – ‘तुम वही हो’ – यही वेदों का सर्वोच्च संदेश है । यहाँ तत्त्वम् का अर्थ ‘तत्’ होने का गुण नहीं है । त्वम् शब्द को प्रत्यय या सर्वनाम के रूप में दो रूपों में लिया जा सकता है – एक गुण का बोध कराता है और दूसरा सर्वनाम ‘तुम’ का । ‘तत् त्वं असि’ का अर्थ है ‘तत् – वह’, ‘त्वं – तुम’, ‘असि – हो’ ।
‘तत्’ और ‘त्वम्’ दो शब्दों को मिलाकर ‘तत्त्वम्’ शब्द का प्रयोग किया जाने लगा है । सामान्य बोलचाल में, परमात्मा के स्वरूप का वर्णन करने वाले शब्द का प्रयोग करके, कोई भी निष्कर्ष जो सर्वमान्य हो, उसे ‘तत्त्वम्’ कहा जाता है । इस प्रकार, ‘तत्त्वम्’ का प्रयोग किसी भी अंतर्निहित सिद्धांत को संदर्भित करने के लिए किया जाता है ।
जिसे आप ‘मैं’ समझते हैं, उसका ज्ञान ही ईश्वर का साक्षात्कार है । यदि यह बोध का प्रकाश न होता, तो आप ईश्वर नामक किसी वस्तु की कल्पना भी नहीं कर सकते । “‘ज्ञान मुझसे उत्पन्न होता है, विचार मुझमें उत्पन्न होता है ।’ विचार से उत्पन्न यह ज्ञान और वह ‘तत्’ जिसे आप बहुत दूर समझते हैं, एक ही हैं,” वेद इसका सार इस प्रकार प्रस्तुत करता है ।
जिसे हम ‘इत्’, ‘तत्’, ‘इदम्’ कहते हैं, यह बिना कोई मूल या जड़ का नहीं है । कोई भी वस्तु जिसे ‘तत्’ के रूप में पहचाना जा सके, बिना मूल के प्रकट नहीं हो सकती । बीज के बिना कोई वृक्ष नहीं हो सकता । संसार की सभी वस्तुएँ जिन्हें ‘तत्’ कहा गया है, जैसे पर्वत, समुद्र, आकाश, पृथ्वी, पशु, मनुष्य, क्रोध, भय, प्रेम, इन्द्रियाँ, शक्ति – सभी का कोई न कोई मूल है । देखा जाना, सुना जाना, सूंघा जाना, विचार किया जाना, गर्मी या सर्दी के रूप में महसूस किया जाना – ये सब मन द्वारा अनुभव किए जाते हैं और संबंधित इंद्रियों द्वारा अनुभव किए जाते हैं । इन सभी को ‘इत्’ कहा जाता है । अब तक की गई सभी वैज्ञानिक खोजें, जो और भी अभी होनी हैं, (अर्थात), जो ‘ज्ञात’ हैं, वे सभी ‘इदम्’ हैं । इन सभी का कोई न कोई मूल है । यदि कोई मूल नहीं होता, तो कोई ‘इदम्’ भी नहीं हो सकता । और उत्पत्ति के बिना कुछ भी अस्तित्व में नहीं रह सकता । हमेशा एक इसके पीछे मूल या बीज सिद्धांत है ।
मानव शरीर एक “बीज” से उत्पन्न हुआ है । वृक्ष की उत्पत्ति भी एक बीज से हुई है । इसलिए, इस भौतिक जगत का भी कोई न कोई मूल अवश्य होगा । और संसार में जो भी शक्ति या बल व्याप्त है, वह सब किसी न किसी मूल से ही उत्पन्न होता है ।
यदि किसी इमली के बीज को, जो अभी-अभी अंकुरित हुआ है, चीरा जाए, तो उसके दो भागों में एक छोटा सा इमली का वृक्ष लगा (समाया) हुआ दिखाई देता है । इसीमें एक विशाल वृक्ष बनने की शक्ति होती है । सभी बीजों में ऐसी शक्ति होती है, लेकिन इमली के बीज में यह शक्ति देखी जा सकती है ।
मंत्रों में, “बीज अक्षर” – बीज-शब्द कहे जाते हैं । जिस प्रकार एक छोटे से बीज में एक विशाल वृक्ष समाया होता है, उसी प्रकार ये अक्षर (या शब्द) असीम शक्ति से युक्त होते हैं । यदि इन अक्षरों को एकाग्रचित्त होकर कई लाख बार दोहराया जाए, तो हम इनमें निहित महान शक्ति को आत्मसात और अनुभव कर सकते हैं ।
संसार में जो भी शक्ति, जो भी बुद्धि या क्षमता निहित है, इन सभी का अपने मूल या बीज में, जो कि ईश्वर हैं, अवश्य ही उसीमें विद्यमान होना आवश्यक है । बीज के बिना इनका जन्म नहीं हो सकता ।
वेदों में यह उद्घोषणा की गई है कि सृष्टि में जिन सभी वस्तुओं को ‘इत्’ कहा गया है, वे बिना मूल, बीज या कारण के प्रकट नहीं हुईं । इस ‘कारण’ में जो शक्ति है, वही संसार में व्याप्त है । वह कारण कहाँ है ? यह वही है जो भीतर स्थित है, जिसे ‘इत्’ कहा जाता है, लेकिन वह आत्मा के रूप में बाहर में दिखती है ।
हम एक विशाल दर्पण में अपना प्रतिबिंब देखते हैं । यदि हमारे चारों ओर चार दर्पण समकोण पर रखे जाएँ, तो हम अनगिनत प्रतिबिम्ब देख सकते हैं । जो कोई इन हज़ारों प्रतिबिम्बों को देखता है और उसका कारण वह केवल एक व्यक्ति है । इसी प्रकार, वह वस्तु (शक्ति, कारण) जो लाखों सृजित प्राणियों के भीतर में है और जो सृजित वस्तु को ‘इत्’ के रूप में बाहर से देखती है, वह कोई और नहीं, बल्कि ईश्वर है ।
जो चीज़ दिखती है वह देखी गई चीज़ का मूल या कारण है । समस्त जगतों का कारण ‘ज्ञान’ है । यह ज्ञान कहाँ है ? यह हमारे भीतर में है । वह जो अविभाज्य है, वह हमारे भीतर विभाजित प्रतीत होता है । बिजली के बल्ब कई प्रकार के होते हैं, छोटे, बड़े, नीले, हरे आदि । वे कई आकार के भी होते हैं । लेकिन प्रत्येक के अंदर जो धारा होती है, वह एक ही विद्युत धारा होती है । वही विद्युत बल जो सर्वत्र व्याप्त है, बल्ब के भीतर भी विद्यमान है और उसे चमकाता है । यह पंखे को भी घुमाता है । इन सभी क्रियाओं का कारण एक ही बल है । वह सार्वभौमिक विद्युत है जो मिश्रित और अविभाज्य है, लेकिन जब इसे तार से गुजारा जाता है, तो यह मानो अलग हो जाती है । जब प्रकृति में बिजली चमकती है, जब पानी किसी चट्टान पर गिरता है, तो यह बल अपने आप अस्तित्व में आता है ।
अतः उस महान् ‘तत्त्वम्’ या सत्य को अपने भीतर प्रकाशित करें । कर्म-अनुष्ठान से, अर्थात् यज्ञ और देवपूजा आदि नियत कर्मों के पालन से लेकर ‘महावाक्य’ (वेदान्त का महान् संदेश) के तात्पर्य पर गहन ध्यान तक, ये सभी अभ्यास इसी हेतु हैं – गृहस्थों के आचार-विचार, राज-नियम, कला, चिकित्सा, भूविज्ञान और अन्य विद्याएँ, ये आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाने वाले चरण हैं । ‘तत्’ (वह) और ‘त्वम्’ (तुम/आप) का मिलन आरंभ में बिजली की चमक के समान क्षण भर के लिए अनुभव किया जाएगा । केनोपनिषद् (४.४) में इसी अवस्था का उल्लेख है कि ब्रह्म की चेतना बिजली के भीतर बिजली के समान होगी, और केवल क्षण के एक अंश के लिए ही अनुभव की जाएगी । तस्यैष आदेशो यदेतद्विद्युतोव्यद्युतदा । यदि अभ्यास निरन्तर किया जाए, तो जिस प्रकार निरन्तर विद्युत उत्पन्न करने वाला झरना है, उसी प्रकार मनुष्य चेतना के उस स्तर पर स्थित रह सकता है । यही मोक्ष है – जीवित रहते हुए मुक्ति । मृत्यु के पश्चात् – वह चेतना परम सत्ता के साथ मिल जाती है या विलीन हो जाती है । जीते जी मोक्ष और मृत्यु के बाद मोक्ष का यह भेद दूसरों को भी महसूस होता है, लेकिन ज्ञानी दोनों को एक ही मानता है ।
इस प्रकार, सभी वेदों का परम उद्देश्य हमें अपने अनुभव से यह बोध कराना है कि सब कुछ ब्रह्म है और इस प्रकार हमें आनंद की स्थिति की ओर ले जाना है ।
विश्व के विभिन्न भागों में क्या हो रहा है, यह हम समाचार पत्रों के माध्यम से जानते हैं । समाचार विभिन्न स्थानों के संवाददाताओं, समाचार एजेंसियों, डाक, टेलीग्राफ और टेलीप्रिंटर संदेशों के माध्यम से प्राप्त होते हैं । हालाँकि, कई ऐसी बातें हैं जो आधुनिक उपकरणों और यंत्रों या यहाँ तक कि सामान्य मानव बुद्धि की पहुँच में नहीं आ सकतीं । यदि हमें इन बातों को जानना है तो किसी अन्य प्रकार के समाचार पत्र होने चाहिए ।
जो समाचार आधुनिक मीडिया के माध्यम से प्रसारित नहीं किए जा सकते और जो टेलीग्राफ या टेलीप्रिंटर सर्किट से असंबद्ध किसी स्थान से संबंधित हैं, वे वेद मंत्रों के माध्यम से प्रदान किए जाते हैं । अलौकिक शक्तियों से संपन्न ऋषियों ने इस माध्यम से हमें हमारी सामान्य बुद्धि की समझ से परे समाचार संप्रेषित किए हैं ।
यद्यपि वेदों में बहुत सी महत्वपूर्ण बातें हैं, फिर भी कुछ ऐसी बातें हैं जिन्हें छोड़ा या अनदेखा किया जा सकता है ।
जब मैं अनदेखा कहता हूँ, तो मेरा मतलब यह नहीं है कि वे बातें महत्वहीन हैं या वेदों में कुछ ऐसा है जिसे गलत कहा जा सकता है ।
हमारे पूर्वजों ने स्पष्ट किया है कि जब वेद हमें कोई महत्वपूर्ण बात समझाना चाहता है, तो हमें उस महत्वपूर्ण बात के लिए तैयार करने या किसी बात को स्पष्ट करने के लिए और भी कई बातें दी जाती हैं । मुख्य बात को समझने के लिए उस बात को समझना ज़रूरी है और बाकी अन्य जानकारी को भी समझना ज़रूरी है । हालाँकि कुछ विषय आरंभिक या मध्य स्तरों पर प्रासंगिक होते हैं, लेकिन जैसे-जैसे व्यक्ति आत्मा के जागरण की उच्च अवस्थाओं तक पहुँचता है, उन्हें (उन विषयों को) धीरे-धीरे छोड़ना पड़ता है । वेद ऐसा कहते हैं । इस प्रकार, जो बात मुझे एक स्तर पर स्वीकार्य है, वह दूसरे स्तर पर स्वीकार्य नहीं है ।
वेदों में कुछ महान सत्य या “परम तात्पर्य” भी हैं, जिन्हें पूर्णतः स्वीकार करना होगा । बाकी, जिन्हें कम मूल्य या महत्व पर स्वीकार किया जा सकता है और जिन्हें छोड़ा भी जा सकता है, उन्हें ‘अर्थवाद’ और ‘अनुवाद’ कहा जाता है ।
वेद हमें किसी सत्य या नियम को सुलझाने और समझाने के लिए उपाख्यानों और कहानियों का सहारा लेते हैं । ऐसे मामलों में, सत्य या नियम को पूर्णतः ग्रहण करना होगा और उपाख्यानों को ‘अर्थवाद’ मानकर अनदेखा करना होगा । दूसरे शब्दों में, अर्थवाद को शाब्दिक रूप से नहीं, बल्कि उदाहरणात्मक रूप में लिया जाना चाहिए ।
अनुवाद क्या है ? हमें किसी अज्ञात वस्तु का बोध कराने के लिए, वेद किसी ज्ञात वस्तु से आरंभ करते हैं और उसका विस्तार करते रहते हैं । अज्ञात उद्देश्य तक पहुँचने से पहले, यह ज्ञात की पुनरावृत्ति का सहारा ले सकते हैं । अर्थात्, वे उन वस्तुओं के उदाहरणों का सहारा लेंगे जो ज्ञेय हैं, जो हमारे अनुभव में हैं और जिन्हें वेदों के प्रमाण से सीखने की आवश्यकता नहीं है । जो अन्य प्रमाणों द्वारा स्थापित नहीं किया जा सकता और जिसकी वेद घोषणा करते हैं, वही विधि है, वही महत्वपूर्ण संदेश है ।
दूसरे शब्दों में, यदि कोई वस्तु अन्य सामान्यतः ज्ञात तथ्यों के माध्यम से जानी जा सकती है, तो उसे केवल वेदों के प्रमाण पर निर्भर नहीं माना जा सकता, भले ही वेद उसे दोहराएँ । वेद अज्ञात को ज्ञात कराने के लिए हैं । यदि वेद यह भी कहते हैं कि जो ज्ञात है वह अज्ञात भी है, तो इसका अर्थ होगा कि इसका मुख्य लक्ष्य (तात्पर्य) अज्ञात ही है । हमारी समझ को आसान बनाने के लिए ही यह उसी से शुरू होता है जो हमें पहले से ज्ञात है । यदि यही अंतिम संदेश होता, तो अज्ञात का उल्लेख करने का कोई अर्थ नहीं होता । दूसरी ओर, यदि वेद केवल अज्ञात वस्तुओं पर ही विस्तार से चर्चा करते, तो यह कहना उपहास होगा कि “मैं जो ज्ञात है उसे ग्रहण करता हूँ और जो नहीं है उसे अस्वीकार करता हूँ।”
आइए अब हम देखें कि हमारे लिए ‘ज्ञात’ वस्तु क्या है और हमारे लिए ‘अज्ञात’ वस्तु क्या है ।
सांसारिक वस्तुओं के विषय में दो दृष्टिकोण हैं । हमें ज्ञात सभी वस्तुएँ एक ही हैं या भिन्न, यह संदेह हमें घेरे रहता है और इस प्रकार वस्तुओं का दो श्रेणियों में व्यापक वर्गीकरण होता है । भौतिक अनुभूति के आधार पर हम यह निर्णय लेते हैं कि विभिन्न वस्तुएँ वास्तव में भिन्न हैं । पृथक मानकर ही इस संसार का कार्य चल सकता है । हमें जल और तेल में भेद करना होगा । यदि हमें दीपक जलाना है तो तेल का प्रयोग करना होगा; जल किसी काम का नहीं । यदि वही दीपक अधिक जलकर घर में आग लगा दे, तो आग बुझाने के लिए जल का प्रयोग करना ही पड़ेगा । यदि तेल आग में डाला जाए, तो और भी बड़ी आग लग जाएगी । इस प्रकार, चाहे कोई भी कार्य हो, जब तक भेद न किया जाए, ज्ञान को बनाए न रखा जाए और उसका उचित उपयोग न किया जाए, तब तक कार्य अच्छी तरह से नहीं किया जा सकता ।
इस प्रकार का भेद ‘द्वैत’ है। यह द्वैत वेदों में निहित सभी कर्मों और उपासनाओं का आधार है । अतः यह स्पष्ट है कि ऐसी गतिविधियों में वेद अपने प्रभाव में द्वैतवादी हैं । एक अद्वैतवादी को इस पर विवाद करने की आवश्यकता नहीं है । द्वैतवाद प्रत्यक्ष जगत के लिए पूर्णतः सत्य है । लेकिन आइए देखें कि क्या वेद वहीं रुक जाते हैं जहाँ हम द्वैतवाद देखते हैं । यदि ऐसा है, तो हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि द्वैतवाद ही वेदों का लक्ष्य है । लेकिन वेद संहिताओं में कुछ स्थानों पर और अन्तिम निष्कर्षात्मक भागों में, अर्थात् उपनिषदों में, अद्वैतवाद की विस्तृत चर्चा करते हैं ।
हमारे धार्मिक ग्रंथों में, दो दृष्टिकोण हैं, अर्थात् “पूर्व पक्ष” और “सिद्धांत” । पूर्व पक्ष में उन लोगों के विचार शामिल हैं जो किसी व्यक्ति के दृष्टिकोण से भिन्न मत रखते हैं । पूर्व पक्ष प्रस्तुत होने के बाद, उन विचारों का खंडन किया जाता है । दूसरे शब्दों में, विचार यह है कि पहले स्वेच्छा से विपरीत दृष्टिकोण प्रस्तुत किया जाए और फिर उसे अप्रमाणिक सिद्ध किया जाए और इस प्रकार वास्तविक सिद्धांत की स्थापना की जाए ।
पश्चिमी विद्वान भी हमारे दर्शनशास्त्र पर ग्रन्थों का जिन्हें “दर्शन” कहा जाता है इसकी प्रशंसा करते हैं – जो विपक्ष के दृष्टिकोणों पर न ही पर्दा डालते हैं और न ही उसे छिपाते हैं, बल्कि उन्हें पूर्ण रूप से प्रस्तुत करते हैं और फिर उनमें से प्रत्येक का उत्तर देते हैं ।
वेदों का “ज्ञानकाण्ड”, जिसमें उपनिषद शामिल हैं और जो मुख्यतः अद्वैत से संबंधित है, बाद में या दूसरे भाग के रूप में आता है, जबकि “कर्मकाण्ड”, जो द्वैत की चर्चा करता है, पहले आता है और पहला भाग बनाता है ।
अतः, यदि वेद पहले द्वैत की स्थापना करते हैं, जो हमें अपने दैनिक अनुभव से पहले से ही ज्ञात है, और बाद में अद्वैत की बात करते हैं, जो हमें ज्ञात नहीं है, तो यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि अद्वैत ही वह सिद्धांत है जिसकी स्थापना वेद करना चाहते हैं । वास्तव में, इसका अर्थ है कि यही इसका अंतिम लक्ष्य है ।
यह तर्क दिया जा सकता है कि द्वैत की उस तरह निंदा नहीं की गई है जैसी पूर्व पक्ष की होनी चाहिए थी । मैं आपको बताता हूँ कि क्यों । द्वैत के आधार पर किए गए कर्म और उपासना उस ‘अनुभव’ के प्रतिकूल नहीं हैं जिसका अद्वैत प्रचार करता है । इसके विपरीत, वे साध्य प्राप्ति के साधन के रूप में सहायक हैं । ऐसा नहीं है कि जिस विरोधी को सामान्यतः शत्रु माना जाता है, उसे पूर्व पक्ष में इसलिए रखा गया है ताकि बाद में उसे परास्त किया जा सके । द्वैत सिद्धांत विपरीत दृष्टिकोण के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया है और न ही बाद में कहीं इसकी निंदा की गई है ।
जैसे फूल पहले प्रकट होता है और फिर फल को यथावत छोड़कर गिर जाता है, वैसे ही हमें पहले द्वैत में रहना होगा और बाद में उसे छोड़कर अद्वैत की ओर आना होगा । फूल और फल निश्चित रूप से शत्रु नहीं हैं । कोई भी फूल की निंदा नहीं करता क्योंकि फल ही परम अवस्था है ।
अद्वैत दर्शन को अन्य दर्शनों की निंदा करने की आवश्यकता महसूस नहीं होती यदि वे स्वयं को अपने उचित स्थानों तक सीमित रखते और अपने सिद्धांतों को उनके उचित स्तर पर प्रस्तुत करते । केवल तभी जब वे इस सीमा का उल्लंघन करते हैं, उनका विरोध करने की आवश्यकता होती है । इसी भावना से आदि शंकर और अन्य अद्वैत दार्शनिकों ने प्रतिद्वंद्वी दर्शनों को देखा है । सौभाग्य से, वैज्ञानिक विकास ने आध्यात्मिक सिद्धांतों के लिए कोई खतरा पैदा नहीं किया है । वास्तव में, आधुनिक विज्ञान अद्वैत विचार के और निकट पहुँच रहा है, जिसे पहले वेदों के प्रमाण के बिना आत्मसात करना संभव नहीं था । प्रारंभ में, विज्ञान का मानना था कि पृथ्वी पर सभी पदार्थ एक-दूसरे से भिन्न हैं । फिर यह माना गया कि केवल ७२ ‘तत्व’ हैं जो असंख्य वस्तुओं को प्रस्तुत किया । कहा गया कि इन ७२ तत्वों की परस्पर क्रिया ही सभी भेदों का कारण है । फिर, जब परमाणु विज्ञान का विकास हुआ, तो यह प्रतिपादित हुआ कि इन सभी ७२ तत्वों का मूल एक ही है, अर्थात् ऊर्जा जिसे हम ‘शक्ति’ कहते हैं ।
जो लोग दार्शनिक अन्वेषण में उन्नत हैं और जिन्होंने सत्य का साक्षात्कार कर लिया है, वे मानते हैं कि ऊर्जा या शक्ति ही समस्त ज्ञान या चेतना है जिसके दायरे में जड़ वस्तुएँ नहीं, बल्कि “जीवात्मा” या आत्मा सम्मिलित है जो ज्ञान का प्रतीक है ।
चाहे इसे एकल ऊर्जा कहें या एक चैतन्य या “सार्वभौमिक चेतना”, यह इंद्रियों की पहुँच से परे है, चाहे भौतिक विज्ञानी की हो या दार्शनिक की । वस्तुओं की बहुलता के रूप में इसकी अभिव्यक्ति हमें द्वैत के रूप में पहले से ही ज्ञात है । यदि द्वैत परम सत्य होता, तो वेदों का अध्ययन करने की आवश्यकता ही नहीं होती । इसे नेत्र या बुद्धि की अनुभूति की सीमा के भीतर की वस्तुओं पर विचार करने की कोई आवश्यकता नहीं है । हमें वेदों के संदेश को तभी सर्वोच्च मानना चाहिए जब वह अंत में उन बातों को स्थापित करे जिन्हें जानना आवश्यक है, और जो पहले से ही चरणों में ज्ञात हैं । सत्य यह है कि जीवात्मा (जीवात्मा) ब्रह्मांडीय आत्मा (परमात्मा) में विलीन हो जाती है और अद्वैत ‘ब्रह्म’ बन जाती है ।
हरिः हरः!!

3 Comments
Ja dhair kono chij k bare m purna gyan nai hoit chhai t o asajhaj lagait chhai je ohi byakti k badd bhari lagait chhai. Jahan bujho m aabi jait chhai t badd haluk lago lagait chhai. Ohi kram m bahuto tarhak samasya san jujho parait chhai je swabhik chhai. Ohi k lel okra sabke tyaj k apan lakshya k prati damarpit bhav san nirantarta bhv san lagal rahbak porait chhai.
Paidh mon harshit bho jait aichh Bhaiya.
“वेदैश्च सर्वैः अहमेव वेद्यः” – समस्त वेदक माध्यम सँ मात्र हमरहि टा जानल जेबाक अछि ।
बहुत नीक लागल।
अनेकों प्रकार क ज्ञान एकठाम समटल लेख संभवतः प्रथम बेर पढलउ।
एहि प्रकारक लेख सनातन धर्मानुरागी के अपन धर्म-कर्म के प्रति दृढ़ आस्था और दिशा प्रदान करबा में नवीन अध्याय जोड़बा में पूर्णतः सक्षम होयत।
लेखक महोदय के कोटिश साधुवाद।
आदरणीय बच्चन भैया केँ सादर प्रणाम – सचमुच मानवोपयोगी पुस्तक लिखने छथि श्री चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वती आ तेँ एकर मैथिली-हिन्दी अनुवाद हम निरन्तर पोस्ट कय रहल छी । एकर अनेकों प्रभाग अछि, कृपया सब लेख समुचित समय खर्च कय केँ पढ़ब भैया । हरिः हरः!!
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