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वेद शाखा

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वेदक शाखा 

वेद ‘अनन्त’ अछि – अन्तहीन । वेदान्त केर अर्थ अछि वेदक अन्त । ‘अनन्त वेद केर अन्त’ केर कि अर्थ भेल ?

एकरा ‘वेदान्त’ एहि लेल कहल जाइत छैक जे एहि मे विभिन्न आध्यात्मिक सत्य सभक निष्कर्ष निहित छैक, अर्थात् आत्मसाक्षात्कार, जे वेद सभक तात्पर्य छैक । दोसर शब्द मे, ई वेदक खोज केर अन्त थिक । ई वेदक अन्त मे (बाद मे) सेहो अभरैत अछि ।

ब्राह्मण केर रूप मे जन्म लेनिहार प्रत्येक व्यक्ति केँ बिना कोनो कारण पुछने (जनने-बुझने), अनिवार्य रूप सँ आर कर्तव्यक रूप मे, वेद सभक शाखा सब मे सँ कोनो एकटा एक वेद शाखा केँ सिखबाक, अध्ययन करबाक तथा अभ्यास करबाक रहैत छन्हि । एकटा शाखा मे पहिने संहिता, फेर ब्राह्मण, फेर आरण्यक होइत छैक, जेकर अन्त मे उपनिषद प्रकट होइत अछि । एहि तरहें वेद शाखाक निष्कर्ष उपनिषद होइछ ।

अनन्त वेद सब केँ एतेक रास विभाग या शाखा सब मे विभाजित करबाक कारण कि अछि ? व्यक्ति केँ सब विषय सभक शिक्षा देल जेबाक चाही जाहि सँ ओकर आध्यात्मिक प्रगति सम्भव भ’ सकैक । सबसँ पहिने वेदक अध्ययन आ पाठ, फेर यज्ञ आ अन्य अनुष्ठान एवं ओहि सँ सम्बन्धित मंत्र सब जे ओकरा अध्यन आ पालन (व्यवहार मे अभ्यासपूर्वक) करय पड़ैत छैक । एकर बाद यज्ञ सभक उद्देश्य बारे जिज्ञासा (जाँच) आ अन्त मे, परमात्मा तत्वक जिज्ञासा-खोज (जाँच) तथा तेकर वास्तविक अनुभव केँ बुझबाक सीमा मे आनय पड़ैत छैक । ई सबटा बात वेदक अध्येता केँ देल गेनाय आवश्यक छैक ।

जे देल जाइत छैक से व्यक्ति केँ आत्मसाक्षात्कार प्राप्त करय मे सक्षम बनेबाक लेल पर्याप्त हेबाक चाही । असंख्य वेद शाखा सब मे निपुणता प्राप्त कयनाय एकटा असम्भव कार्य छैक । एकटा कथा छैक जे केना भारद्वाज जेहेन ऋषि हजारों वर्ष केर अध्ययनक बादो वैदिक पर्वत सँ मात्र एक मुट्ठी माइट टा प्राप्त कय सकल छलथि । तेँ, कोनो व्यक्ति केँ अपन मोनक अशुद्धि सब केँ दूर कयनाय तथा परमात्मा मे एकाकार होयबाक योग्य बनेबाक लेल आवश्यक सर्वोत्तम सामग्री केँ अनन्त वेद सब सँ वर्गीकृत आ संकलित कय केँ ‘शाखा’ रूप मे देल गेल अछि ।

शाखा मे ब्राह्मण केर जन्म सँ लयकय मृत्यु धरिक कर्तव्य सभक विस्तृत वर्णन अछि । सबसँ पहिने, शाखा केँ सिखबाक अछि आर ओकर पाठ (अध्ययन) कयनाय होइत अछि, अर्थात् संहिताक मंत्र सब केँ कंठस्थ कयनाय होइत अछि । फेर, ब्राह्मण ग्रन्थ सब मे वर्णित एहि मंत्र सभक सहायता सँ निर्धारित यज्ञ कयनाय होइत अछि । फेर, बाह्य कर्म आर आन्तरिक अनुभवक बीच जे खाली (खधारि) अछि, तेकरा भरबाक लेल आरण्यक केँ मनन करबाक होइत अछि । फेर, उपनिषदक विषयवस्तु, जे केवल आन्तरिक सत्य सँ सम्बन्धित अछि, तेकरा आत्मसात कयनाय होइत अछि आर अन्त मे, मोक्ष केर अबस्था प्राप्त कयनाय होइत अछि, जेतय ‘अन्दर’ आर ‘बाहर’ केर भेद समाप्त भ’ जाइत अछि ।

यैह प्रत्येक शाखाक योजना आर उद्देश्य अछि ।

एकटा विकसित आत्माक लेल सत्यक साक्षात्कार करबाक लेल एक्के टा मंत्र पर्याप्त अछि ।

लेकिन एक सामान्य आत्मा केँ ओहि अबस्था धरि पहुँचेबाक लेल अनेक कर्म, व्रत, जप व ध्यानक सहारा लियय पड़ैछ । एहि प्रकारें, प्रत्येक शाखा मे मंत्र, कर्म आर दार्शनिक निर्देश सभक ओ परिमाण समाहित अछि जे एकटा सामान्य व्यक्ति केँ मोक्ष प्राप्त करय मे सक्षम बनबैत अछि ।

जे ब्राह्मण नहि अछि, ओकर की ?

कि ब्राह्मणक अलावे आन लोक लेल सेहो विकास (वैदिक ज्ञान) प्राप्त कयनाय आवश्यक नहि अछि ? वैदिक कर्म तथा अनुष्ठान कयनाय हुनका सब लेल नहि अछि, बल्कि हुनका जे कोनो काज (जातीय कर्म) कयनाय रहैत छन्हि, वैह हुनका मानसिक उत्थान आ आत्म-साक्षात्कार दिश लय जाइत अछि । व्यक्ति चाहे कोनो जातिक हो, अपन निर्धारित कर्तव्य सभक उत्साहपूर्वक पालन आर कर्मफल केँ ईश्वर केँ समर्पित कयनाय ओकरा लक्ष्य धरि पहुँचाबैत अछि । भगवान कृष्ण भगवद्गीता मे ई बहुत स्पष्ट रूप सँ बतौलनि अछि:

“स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दन्ति मानवाः” – १८.४६

किछु लोकक कर्तव्य युद्ध कयनाय आ रक्षा कयनाय होइछ । किछु लोक व्यापारी छथि । किछु लोक गायक रक्षा करनिहार ग्वाला छथि । किछु लोक श्रमिक छथि यानि श्रम शक्ति प्रदान करयवला छथि । प्रत्येक व्यक्ति, अपन चुनल क्षेत्र मे एहि कर्तव्यक पालन कय केँ, ईश्वर केँ प्राप्त कय सकैत अछि ।

जखन कि आर लोक एहेन कर्तव्य व व्यवसाय करैत छथि जे एहि संसार मे बेहतर जीवन जिबय लेल अनुकूल अछि, ब्राह्मणक कर्तव्य कि छन्हि ? एहि सांसारिक जीवन केर सबसँ महत्वपूर्ण पहलू ईश्वर केर कृपा प्राप्त करब छैक । समाजक हितक लेल एहेन कृपा प्राप्त कयनाय ब्राह्मण सभक कर्तव्य छन्हि । देवता लोकनि, जे ईश्वरक सेवक (कार्यकारी पदाधिकारी) सब छथि, तिनकर कृपा सब वर्गक लोकक लेल प्राप्त कयनाय सेहो ब्राह्मणहि केर कर्तव्य छन्हि ।

ओ (ब्राह्मण) जे मंत्र पढ़ैत छथि आर जे वैदिक कर्म करैत छथि, ओ समस्त लोकक कल्याण वास्ते अछि, केवल हुनकहि टा लेल नहि ।

चूँकि हुनकर कर्तव्य ओहेन लोक सभक संग अछि जिनकर शक्ति सांसारिक स्तर सँ परे (बहुत दूर) छन्हि, ताहि द्वारे हुनका सब केँ मंत्र सिखय पड़तनि आ किछु नियंत्रण व अनुशासन सभक माध्यम सँ मंत्र शक्ति प्राप्त करय पड़तनि, एकर हुनका आर लोकक तुलना मे बेसी मात्रा मे अभ्यास करय पड़तनि । दोसरक लेल, एकर ओतेक कठोरता सँ आवश्यकता नहि छैक जतेक ब्राह्मणक लेल । यदि ई बुझल जाय जे हुनकर कर्तव्य सभक कल्याण लेल प्रार्थना कयनाय आर कार्य कयनाय छन्हि, त ई गलत धारणा नहि बढ़ायत जे गोटेक अनुशासन विशेष रूप सँ ब्राह्मण सब लेल निर्धारित अछि ।

उपरोक्त केर अतिरिक्त, एकटा ब्राह्मण केँ कला, विज्ञान आ दोसरक कार्य-पद्धति सब मे सेहो निपुणता प्राप्त करय पड़तनि, जाहि सँ कि ओ ओहि लोक सब केँ ओकर कर्तव्य सभक बारे मे शिक्षित कय सकथि । केवल शिक्षण टा हुनकर कार्य छन्हि । अन्य शिल्प सभक सम्बन्ध मे, हुनका केवल ओकर अध्ययन करबाक चाही जाहि सँ कि ओ ओहि लोक सब केँ सिखा सकथि, लेकिन ओहि शिल्प सब मे सँ केकरहु अभ्यास नहि करबाक चाही जे हुनका लेल निर्धारित नहि अछि ।

दोसरक जीवन आर सम्पत्तिक रक्षा, व्यापार, कृषि आ शिल्प जेहेन व्यवसाय सब केँ वास्तव मे अपनेबाक बदला, हुनका प्रत्येक व्यवसायक विधि सब आर ओकर अभ्यासक लेल सबसँ उपयुक्त जीवनशैली केँ सिखेबाक प्रयास करबाक चाही तथा एकर माध्यम सँ हुनका दोसरक चरित्र, मन व बुद्धि केँ ढालबाक चाहियनि । एहि तरहें, ब्राह्मणक उत्तरदायित्व बहुत कठिन अछि । जाबत धरि एहि कार्य केँ करयवला व्यक्ति केर मोनक पवित्रता आर दृष्टिकोण केर परिपक्वता नहि होयत, ताबत धरि ओकर प्रयास फलदायी नहि भ’ सकैत अछि । केवल तखनहि जखन ओकर मन आ बुद्धि अत्यधिक विकसित हो, ओ दोसरक उत्थान कय सकैत अछि । संगहि, हुनका मे एकटा एहेन कमी छन्हि जे दोसर मे नहि अछि । यदि ओ सोचैत छथि जे चूँकि ओ अपन कर्तव्य सभक पालनक वास्ते अपन बुद्धिक उपयोग करैत छथि, तेँ ओ दोसर सँ श्रेष्ठ छथि, त ई एकटा बड पैघ बाधा हेतनि । एहि कारण सब सँ, ब्राह्मण केँ अपन दृष्टिकोण केँ पूर्णतया शुद्ध राखय पड़तनि । यद्यपि हुनकर अहंकार बढ़बाक औचित्य अछि, तैयो हुनका विनम्र और पूर्णतः निःस्वार्थ रहय पड़तनि । एहि लेल हुनका वास्ते चालीस टा अनिवार्य संस्कार (कर्तव्य) निर्धारित कयल गेल अछि जाहि सँ कि हुनकर विकृति सब दूर हो आर कोणीयता (टेढ़पनी) सब सहज हो ।

यदि मंत्र सब केँ प्रभावी बनेबाक अछि, त अत्यन्त कठोर नियंत्रण आ अनुशासनक पालन करय पड़त । प्रत्येक मंत्रक किछु विशिष्ट आवश्यकता सब पूरा करय पड़ैत छैक, जेना, जप कखन करबाक अछि आ एक-पक्ष (पखवाड़ा) केर कोन दिन जप नहि करबाक अछि, कथी सँ हवन करबाक अछि, आदि । प्रत्येक मंत्रक अपन एकटा विशेष आवश्यकता होइत छैक । यदि एकर पालन नहि कयल जाइछ तँ ओहि व्यक्तिक लेल मंत्रक शक्ति क्षीण भ’ जाइत छैक । उदाहरणक लेल, यदि ग्रहणक दौरान मंत्रक जाप कयल जाय, त ओकर शक्ति बढ़ि जाइत छैक । वेदक एकटा पूरा शाखा मंत्रक स्वरूप तथा प्रभाव केँ स्पष्ट करबाक लेल आ ‘वेदवित्’ अर्थात् वेद में पारंगत व्यक्ति केँ आत्म-साक्षात्कार प्राप्त करबाक लेल समर्पित कयल गेल अछि ।

व्यवहार मे शाखा सभक वर्गीकरण

प्राचीन काल मे मनुष्य लोकनि महान मानसिक तथा शारीरिक क्षमता सँ सम्पन्न छलथि । चूँकि हुनका सब मे उच्च योगिक शक्ति रहनि आर हुनकर बौद्धिक क्षमता अपार रहनि, ताहि द्वारे प्रत्येक व्यक्ति वेद शाखा सभक एकटा पैघ संख्या केँ सिखनाय आ ओकर पाठ करय मे सक्षम रहथि । कतेको ऋषि या मुनि लोकनिक मोन मे सहजहि वेद अपने आप प्रकट भ’ गेल करनि । दोसर (आन), जे असाधारण पराक्रम सँ सम्पन्न रहथि, शिक्षक (गुरु लोकनि) सँ अविश्वनीय रूप सँ पैघ संख्या मे शाखा सब सिखय मे सक्षम रहथि । तेकर बाद, कतेको मामिला मे, वेद मंत्र स्वतः (अपनहि आप) हुनका लोकनि मन मे हुनकर अपनहि इच्छा सँ चमैक उठैत (आबि जाइत) छलन्हि ।

ओ सब अपन शिक्षक लोकनि सँ जे किछु सिखैत छलथि, ताहि मे बहुते सुधार करय मे सेहो सक्षम छलथि । यदि वेद सभक तुलना समुद्र सँ कयल जाय, त ई सच अछि जे कियो गोटे एकरा पूरापूरी नहि जानि पेलथि । लेकिन ओहि प्राचीनकाल मे, कतेको लोक एकर पैघ भाग मे महारत हासिल कय लेने छलथि ।

जेना-जेना समय बितैत गेल, मनुष्य अपन दिव्य योगिक शक्ति सब हेराबय (बिसरय) लगलाह आ जखन कलियुग आयल, त ई (हरेबाक प्रक्रिया) लगभग पूर्ण भ’ गेल । (यानि वेद लगभग विस्मृत भ’ गेल ।) अतीतक ओहि महानुभाव (महापुरुष – giants) सभक तुलना मे जीवन, स्वास्थ्य आर मानसिक क्षमता, सब किछु बहुत छोट बनि गेल ।

ई सबटा ईश्वरक “लीला” थिक । एना कियैक अचि, एकर कोनो कारण नहि सुझाइत अछि । एहि प्रश्नक कोनो उत्तर नहि अछि कि जे लोक सब वेद सभक गहींर (गहन) अध्ययन कयलनि, यज्ञ कय-कय केँ आत्मा सँ साक्षात्कार करयवला योग (आत्म-ध्यान) कयलनि, से सब अपन शुभ प्रभाव अपन आबयवाली पीढ़ी सब केँ कियैक नहि देलनि । एकमात्र उत्तर जे स्वयं (अपने-आप) स्पष्ट अछि, ओ ई जे कि ईश्वर कोनो दोहरावदार पैटर्न (पुनरावृत्तिक प्रारूप) केर पालन करबाक बदला, संसार नामक रंगमंच पर जीवन केर नाटक प्रस्तुत कय रहल छथि । एहि तरहें, जखन कि डार्विन जेहेन सामाजिक दार्शनिक (व्यक्तित्व) आध्यात्मिकता, मानसिक कुशाग्रता, नैतिकता, योग एवं मानसिक शक्ति केर दृष्टिकोण सँ मनुष्य आर पृथ्वी पर जीवनक ‘प्रगतिशील विकास’ पर ज़ोर दैत छथि, ई प्रवृत्ति (वेद-विस्मृतिक सत्य) डार्विन द्वारा उल्लिखित प्रगतिशील विकासक ठीक विपरीत अछि । एहि मे एकटा प्रतिगमन (पाछू मुंहें जेबाक स्थिति) अछि । कलियुग केर आरंभहि मे ‘हिमांक बिन्दु’ (बर्फ जमबाक बिन्दु) पर पहुँचि गेल छल ।

भगवान कृष्ण केर एहि संसार सँ चलि गेलाक संगहि, एकटा घोर अन्धकार एकरा (सांसारिक लोक केँ) घेरि लेलक, तखनहि सँ ई क्षय (वेद-विस्मृतिक स्थिति) बहुत पैघ स्तर (पैमाना) पर शुरू भ’ गेल । अन्धकार हुनकहु (कृष्णहु) पर छायल (प्रभाव कएने) छलन्हि । आधा राति मे कारागार मे जन्म लेबाक कारण हुनकर जन्म अन्धकारहि मे भेल छलन्हि । लेकिन ओ (कृष्ण) समस्त जगत केर वास्ते प्रकाशपुंज, दया एवं करुणाक दीप छलथि । हुनका गेला सँ ज्ञानक ह्रास भेल आर ओहि पर अन्धकारक आवरण पसैर गेल । दुष्ट शक्ति सभक प्रतीक कलिपुरुष, प्रबल भ’ गेल । इहो परमात्मेक खेल थिक, जिनकर मार्ग अज्ञेय अछि ।

भगवान कृष्ण महान वैभव व तेजक संग अयलाह, मुदा बाद मे ओ एहेन स्थिति उत्पन्न कय देलनि जे लोक सब भयभीत भ’ गेल जे कहीं पूर्ण अन्धकार नहि पसरि जाय । कलियुग मे वेद केर चमकब सम्भव नहि अछि । ई कलिपुरुष केँ सौंपल गेल कर्तव्य सब सँ सेहो मेल नहि खाइत अछि ।

लेकिन योजना ई छल जे वेद केँ बिना पूरा लुप्त होबय देने ओकरा कम सँ कम एकटा निश्चित स्तर पर बनाकय राखल जाय । ओ (श्रीकृष्णजी) वेद व्यास, जे कि स्वयं हुनकर एक अंश रूप छलथि, हुनकर माध्यम सँ अपन उद्देश्य पूरा कयलनि ।

तहिया हुनका वेद व्यासक नाम सँ नहि जानल जाइत छल । हुनकर नाम सेहो कृष्ण छल । चूँकि हुनकर जन्म एक गोट द्वीप पर भेल छल, ताहि लेल हुनका द्वैपायन कहल गेलनि । एहि द्वारे हुनका कृष्ण द्वैपायन केर नाम सँ जानल जाइत छलन्हि । हुनका बादरायण केर नाम सँ सेहो जानल जाइत छलन्हि ।

कृष्ण द्वैपायन ओहि समस्त ११८० वेद शाखाक ज्ञाता रहथि जे महर्षि लोकनि (महान ऋषि लोकनि) केर माध्यम सँ एहि संसार मे आयल छल आर द्वापर युग केर अन्त धरि विद्यमान छल । ताहि दिन मे, सबटा वेद बाढ़िक पानि जेकाँ मिश्रित आ समूहित (जहाँ-तहाँ पसरल पानि जमल पोखरि-चभच्चा अथवा चर-चाँचर जेहेन) अबस्था मे छल । केवल प्राचीन ऋषि लोकनि टा मे एहि सबटा केँ ग्रहण करबाक क्षमता रहनि । हमरा लोकनिक सीमित आ क्षीण ग्रहण क्षमता केँ देखियेकय, व्यास द्वारा शाखा सभक चारि गोट प्रमुख समूह मे विभाजित कयल गेल, आर ताहि शाखा मे पुनः अनेकों शाखा सब छल । ई चारि प्रमुख समूह आब चारि टा वेदक रूप मे जानल जाइछ । ई हुनकर (व्यासदेवक) योगिक व अलौकिक शक्ति हुनक तपस्याक शक्तिक कारणे भेल छल ।

ऋग्वेद केर शाखा सब पूजा या प्रार्थनाक लेल उपयुक्त अछि, यजुर्वेद केर शाखा सब कर्मकांड आ यज्ञ प्रक्रिया सभक चित्रण करैछ, सामवेद संगीतमय स्तोत्र थिक तथा अथर्ववेद केर शाखा सब यज्ञक प्रदर्शन पर बल दैत अछि आर एहि मे मनुष्य केँ खतरा तथा शत्रु सब सँ बचेबाक लेल मंत्र रहैत अछि ।

सामवेद, जेकर स्तोत्र सभक गायन सँ देवता अत्यधिक प्रसन्न होइत छथि, ताहि मे सबसँ अधिक संख्या मे शाखा सब छल । ११८० मे सँ एक हज़ार सामवेद केर शाखा अछि । ऋग्वेद मे २१, यजुर्वेद मे १०९ (शुक्ल यजुर्वेद मे १५, कृष्ण यजुर्वेद मे ९४) शाखा सब छल । अथर्ववेद मे ५० शाखा छल ।

कृष्ण द्वैपायन, जे बाद मे वेद व्यासक नाम सँ प्रसिद्ध भेलाह, सोचलनि जे चूँकि कलियुग मे आबयवाली पीढ़ी दुर्बल बौद्धिक शक्तिवाली होयत, तेँ ई पर्याप्त होयत जे प्रत्येक व्यक्ति कुल ग्यारह सौ सँ अधिक शाखा सब मे सँ एकटाक अध्ययन आ पाठ कय सकय । ई ईश्वरक इच्छा छलन्हि जे हुनका एना सोचय लेल मजबूर कय देलकनि । अतः, पुरान प्रथा जेकरा तहत एक व्यक्ति केँ यथासम्भव वेद एवं वेद शाखा सब केँ सीखबाक छलैक, तेकरा आब एकटा शाखाक पक्ष मे संशोधि कयल गेल । ओ विचार कयलनि जे ई पर्याप्त हेतैक जँ कियो लोक (व्यक्ति) चारि वेदक कतेको शाखा सब मे सँ एकटाक पाठ कयनाय सीखि लियय आ ओकरा अन्तर्गत बतायल गेल कर्म सब केँ करय । ओ चारि वेद आर ओकर शाखा सभक प्रचारक काज अपन चारि गोट शिष्य लोकनि केँ सौंपलनि । ऋग्वेद केर शाखा सब पैल केँ, यजुर्वेद केर शाखा सब वैशम्पायन केँ, साम केर शाखा जैमिनी केँ आ अथर्व केर शाखा सब सुमंतु केँ देल गेलनि । ई लोकनि चारू वेद व्यास केर शिष्य हेबाक अलावे स्वयं महान ऋषि सेहो छलथि ।

“व्यास” शब्द केर अर्थ निबन्ध या रचना होइछ । चूँकि एकटा विषय केँ बाकी विषय सब सँ अलग कयकेँ विस्तृत अध्ययन वास्ते लेल जाइत छल, ताहि लेल ओ रचना – या व्यास – केर प्रकृतिक होइत छल । कोनो विषय केँ विषयवार विश्लेषण कयनाय आ ओकरा उचित ढंग सँ वर्गीकृत कयनाय व्यास थिक । चूँकि अस्तित्व मे मौजूद असंख्य वेद शाखा सब केँ एहि प्रकारे विषयवार वर्गीकृत आ व्यवस्थित कयल गेल छल, तेँ कृष्ण द्वैपायन ‘वेद व्यास’ केर रूप मे जानल गेलाह । आर वेदक प्रचार-प्रसार केर कार्य मे हुनकर योगदान एतेक महान छन्हि जे हुनका कोनो आन नाम सँ बेसी व्यापक रूप सँ ‘वेद व्यास’ यानि वेदक संहिताकारक रूप मे जानल जाइत छन्हि ।

चूँकि हुनकर मननाय छलन्हि जे अध्ययनक लेल एकटा शाखा पर्याप्त अछि, तेँ एकर ई अर्थ नहि निकालल जेबाक चाही जे ओ एक सँ अधिक शाखा सीखय पर प्रतिबन्ध लगा देने रहथि । हुनकर विचार छलन्हि जे कम सँ कम एकटा शाखा सीखल जेबाक चाही । लेकिन, वेद व्यासक समयक बाद, हजारों वर्ष धरि, पहिने एक वेस सँ एक शाखा सीखल जाइत छल, फेर दोसर वेद सँ दोसर शाखा, आर एनाही आगुओ । एहि प्रकारे, हमरा सब लग द्विवेदी, त्रिवेदी आ चतुर्वेदी रहथि, अर्थात ओ लोकनि जे क्रमशः दोसर, तेसर आर चारिम वेदक शाखा सभक विद्वान छलथि ।

व्यास द्वारा वेद सभक वर्गीकरण कयल जेबाक ५००० वर्षहु सँ बेसी समय भ’ गेल अछि । किछु हद तक, ई गणना ऐतिहासिक साक्ष्य सबपर आधारित अछि । आधुनिक इतिहासकार सब संभवतः पश्चिमी विद्वान लोकनिक प्रभावक कारण, शास्त्र सबद्वारा व्यास केँ देल गेल निश्चित तिथि केँ स्वीकार नहि कयलनि अछि । हुनक मूल गणना सब महाभारतक तिथि केँ १५०० ईसा पूर्व, बेसी संभावित तिथि मानलक अछि ।

आइ उत्तर भारतीय सभक नामक बाद चतुर्वेदी, त्रिवेदी आर द्विवेदी जेहेन प्रत्यय लगैत छन्हि । “दुबे” आर “दवे” द्विवेदीक अपभ्रंश रूप थिक । चतुर्वेदी हुनका लोकनिक वंशज रहथि जिनका चारू वेदक ज्ञान प्राप्त छलन्हि । बंगाल मे हिनका सब केँ चट्टोपाध्याय या चटर्जी कहल जाइत छन्हि । गोटेक ठाम पर त्रिवेदी सब केँ ‘तिवारी’ सेहो कहल जाइछ । हालाँकि आइ कोनो एकहु वेद मे पारंगत व्यक्ति भेटब मुश्किल अछि, तैयो हिनका सभक कुलनाम प्रत्यय एहि बातक प्रमाण अछि जे हिनका सभक पूर्वज लोकनि एक सँ अधिक वेद सभक अध्ययन कएने रहथि । ई बहुत नीक होयत यदि आइ एहेन उपनाम राखयवला लोक सब अपन महान पूर्वज लोकनिक अनुकरण करता ।

पैछला ५००० वर्षहु सँ बेसी समय सँ, अध्ययनक उपेक्षाक कारण कतेको वेद शाखा सब प्रचलन सँ बाहर भ’ गेल अछि । ११८० केर आँकड़ा लगातार घटैत जा रहल अछि आर आइ हमरा सभ दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति मे छी जे हमरा सब लग केवल ७ या ८ वेद शाखा मात्र बचि गेल अछि । ऋग्वेद मे, २१ शाखा मे सँ केवल एकटा शाखा बचि गेल अछि जेकरा “साकल शाखा” कहल जाइत छैक । चूँकि एहि मे ऐतरेय उपनिषद समाहित अछि, तेँ एकरा “ऐतरेय शाखा” सेहो कहल जाइत छैक । शुक्ल यजुर्वेद केर १५ शाखा सब मे सँ आब केवल दुइए टा ज्ञात अछि, अर्थात् महाराष्ट्र मे “काण्व” शाखा आर विदर्भ तथा उत्तर भारत मे अधिक प्रचलित “मध्यन्दिन” शाखा । कृष्ण यजुर्वेद केर ९४ शाखा मे सँ केवल तैत्तिरीय शाखा टा पूर्णतः उपलब्ध आ प्रयोग मे अछि । दक्षिण भारत मे ई अत्यधिक प्रचलित अछि । कृष्ण यजुर्वेद केर एकटा आर शाखा, “मैत्रायणीय शाखा” केर नाम सँ, महाराष्ट्र मे कोनो तरहें बचि गेल अछि । सामवेद केर शाखा सब मे सँ ९९७ साम शाखा सब लुप्त भ’ चुकल अछि । तमिलनाडु मे सामवेदक केवल जैमिनी शाखाक तलवकार शाखा टा बचल अछि । “राणायनीय” शाखा आब केवल कर्नाटक टा मे पायल जाइछ । गुजरात आ केरल मे “कौथुमा” शाखा अछि । हमरा डर छल जे अथर्ववेद केर कोनो टा शाखा अस्तित्व मे नहि अछि । हालाँकि, एहि वेद केर विद्वान सभक पता लगेबाक निरन्तर प्रयास सँ गुजरातक सिनोर नामक स्थान पर एकटा एहेन व्यक्तिक अस्तित्वक जानकारी भेटल जे अथर्ववेद केर सौनक शाखाक गहन अध्ययन कयने छथि ।

तेँ, हम सब दक्षिण सँ छात्र सब केँ एहि शाखा केँ सीखय लेल पठेलहुँ जाहि सँ कि ओ वेद लुप्त नहि भ’ जाय बल्कि सुरक्षित रहय ।

हमरा सब केँ ऋग्वेद सँ सम्बन्धित ऐतरेय ब्राह्मण तथा कौशीतकी ब्राह्मण (जेकरा संगायन ब्राह्मण सेहो कहल जाइत छैक) सेहो प्राप्त भेल अछि ।

एकर संगत आरण्यक भाग, जाहि मे ऐतरेय उपनिषद आर कौशीतकी उपनिषद शामिल अछि, पहिनहिं सँ उपयोग मे अछि ।

शुक्ल यजुर्वेद सँ प्रयुक्त एकमात्र ब्राह्मण ‘शतपथ’ ब्राह्मण अछि । ऐ मध्यन्दिन शाखा आर काण्व शाखाक समान (यद्यपि किछेक अन्तरक संग) अछि । ई एकटा विशाल ग्रंथ अछि जे सब वेदक लेल एक सामान्य मार्गदर्शक रूप मे कार्य करैत अछि । बृहदारण्यक, जे एकटा आरण्यक हेबाक संग-संग उपनिषद सेहो छी, शुक्ल यजुर्वेद सँ हमरा लोकनि लग उपलब्ध एकमात्र ग्रंथ अछि । हम पहिनहिं उल्लेख कयने रही जे ईशावास्य उपनिषद एहि वेदक संहिता भाग मे टा अबैत अछि ।

कृष्ण यजुर्वेद सँ वर्तमान मे प्रयुक्त ब्राह्मण “तैत्तरीय” अछि । एहि वेद केर आरण्यक भाग मे तैत्तरीय उपनिषद आर महानारायण उपनिषद सेहो सम्मिलित अछि । अधिकतर प्रयुक्त होयवला सूक्त व मंत्र केवल महानारायण उपनिषद टा सँ अछि ।

मैत्रायणी आरण्यक आर एक्के टा नामवला उपनिषद एक्के टा कृष्ण यजुर्वेद मे पाओल गेल अछि । कता शाखा, (संहिता), एकर ब्राह्मण आ आरण्यक सब आइ उपयोग मे नहि अछि, लेकिन कठोपनिषद, जेकरा कठकोपनिषद सेहो कहल जाइत छैक, जे एकर अन्त मे अबैत अछि, बहुते रास अस्तित्व मे अछि सीखल गेल अछि ।

एहि तरहे, यद्यपि श्वेताश्वतर उपनिषद कृष्ण यजुर्वेदक श्वेताश्वतर संहिताक अन्त मे अबैछ, शाखा केर कोनो आन भाग उपलब्ध नहि अछि ।

हालाँकि साम शाखा संहिता सब मे सँ ९९७ लुप्त भ’ गेल अछि, मुदा एकर ७ या ८ ब्राह्मण गलती सँ गुमनामी सँ बचि गेल अछि । ‘दंड्य’ ब्राह्मण, संहितोपनिषद ब्राह्मण, वंश ब्राह्मण, षड् विंस ब्राह्मण, सामविधान ब्राह्मण, छांदोग्य ब्राह्मण और जैमनिय ब्राह्मण सब उपलब्ध अछि । एहि वेद केर एक आरण्यक, जेकरा तलवकार आरण्यक कहल जाइत छैक, ब्राह्मण सेहो थिक । एकर अन्त मे केनोपनिषद् अछि । तेँ केनोपनिषद् केँ तलवकार उपनिषद् सेहो कहल जाइत छैक । छांदोग्य उपनिषद्म सामवेद केर छांदोग्य ब्राह्मण सँ प्राप्त भेल अछि ।

यद्यपि अथर्ववेद केर अधिकांश संहिता सब लुप्त भ’ गेल अछि, तैयो एहि वेद केर ‘प्रश्न’, ‘मुंडक’ व ‘मांडूक्य’ उपनिषद तथा ‘नृसिंह तापिनी उपनिषद्’ आइयो उपलब्ध अछि आर ओकर अध्ययन कयल जाइछ । एहि वेदक एकमात्र उपलब्ध ब्राह्मण ‘गोपथ ब्राह्मण’ अछि ।

एहेन स्थिति मे हमरा सभक कर्तव्य कि थिक ?

हमरा सब केँ ई सुनिश्चित करय पड़त जे ११८० वेद शाखा सब मे सँ केवल सात या आठ संहिताओ नष्ट नहि होए आर ऐगला पीढ़ी लेल अनुपलब्ध नहि भ’ जाए । यदि हमरा लोकनि वर्तमान मे उपलब्ध किछेक वेद शाखा सब केँ आ उपनिषद सब केँ भावी पीढ़ीक लेल संरक्षित करबाक लेल तत्काल आ पर्याप्त कदम नहि उठबैत छी, त ई एकटा अक्षम्य पाप होयत ।

हरिः हरः!!

Veda Saakhas

The Vedas are ‘Ananta’ – endless. Vedanta means the end of the Vedas. What does it mean ‘the end of the endless Vedas’?

It is called ‘Vedanta’ because it contains the conclusion of the various metaphysical truths, viz., the realisation of the self, which is the purport of the Vedas. In other words, it is the end of the Veda’s quest. It also appears at the end (later) of the Vedas.

Everyone born as a brahmin has without asking for any reason necessarily and as a matter of duty to learn, study and practise a Veda Saakha which is one of the branches of the Vedas. A Saakha consists of first the Samhita, next the Braahmana, then the Aaranyaka, at the end of which appear the Upanishad. The conclusion of the Vedasaakha is thus the Upanishad.

What is the reason behind splitting the endless Vedas into so many Saakhas or branches? The individual has to be taught all matters so that spiritual progress is possible for him. First is the study and recitation of the Vedas, then the yajnas and other rituals which he has to study and perform and the mantras relating to these. Next comes an enquiry into the purpose of the Yajnas, and, lastly, an enquiry into the Paramaatma Tatva and bringing it within the range of actual experience. All these are required to be given to a student of the Vedas.

What is given should be adequate to enable a person to attain self-realisation. To master the innumerable Veda Saakhas is an impossible task. A story is told about how sages like Bharadwaja could only obtain a fistful of earth from our of the Vedic mountains even after thousands of years of study. Therefore, the optimum required to enable a person to cleanse his mind of impurities and become fit to merge with the Paramaatma has been classified and compiled from the endless Vedas and given as a Saakha.

The Saakha details the duties of a brahim from the moment of his birth to that of his death. First, the Saakha has to be learnt and recited (Adhyayana), i.e. the Samhita mantras are to be learnt by rote. Then, the prescribed yajnas have to be performed with the help of these mantras as described in the Braahmanas. Then, the Aaranyaka which bridges the gap between external action and internal experience has to be cogitated upon. Then, the contents of the Upanishad, which deals only with the internal truth, has to be digested and, lastly the state of liberation (Moksha), where ‘in’ and ‘out’ lose their distinction has to be attained.

This is the plan and purpose of every Saakha.

Even one mantra is sufficient for an evolved soul to realise the truth.

But a normal common soul has to resort to a multitude of karmas, observances, chanting and meditation to reach that state. Thus, each Saakha contains that measure of mantras, karmas and philosophical instructions as would enable a common man to achieve liberation.

What about those who are not brahmins? 

Is it not necessary for those other than brahmins to achieve evolution? The performance of Vedic karmas and rituals are not for them but whatever jobs they are required to do, lead them to mental upliftment and self realisation. To whatever caste a person may belong, the zealous performance of one’s duties as laid down and dedicating one’s fruit to God lead them to the goal. Lord Krishna makes this very clear in the Bhagavad Gita:

“Sva Karmana Tam Abhyarchya Siddhim Vindanti Maanavah” – 18.46

It is the duty of some to fight and to defend. Another is a trader. Yet another a cowherd who protects cows. Yet, another is a worker or one who supplies the labour force. Each, doing this duty in the chosen field, can attain Him.

While other s perform duties and follow professions which are conductive to better living in this world, what is the duty the Brahmin? The most important aspect of our worldly lives is to obtain the grace of God. It is the duty of the brahmins to obtain such grace for the benefit of society. It is also the duty of brahmins to obtain the goodwill of the Devatas, who are in the nature of God’s officials, to men of all classes.

The mantras which he recites and the Vedic karmas which he performs are meant for the benefit of all people and not for him alone.

Since his duty is with those whose powers transcend the worldly level, he has to learn mantras and obtain mantric powers through controls and disciplines which he has to exercise in a greater measure than others. For others, these are not required to as rigorous an extent as for the brahmin. If it is understood that his duty is to pray for and work for the well-being of all, the wrong feeling that some disciplines are specially laid down for the brahmins will not be entertained.

In addition to the above, a brahmin has to master the arts and sciences and the mode of work of others, so that he can educate them on their duties. Teaching alone is his job. As regards other crafts, he must merely study them so that he could teach them but he should not practise any of those crafts not prescribed for him.

Instead of actually following occupations such as defending the life and property of others, trade, agriculture and crafts, he should endeavour to teach the methods of each occupation and the way of life most conductive to its practice and, through this, he has to mould the character, mind and intellect of others. As such, the brahmin has a very difficult responsibility. Unless a person who performs this job has purity of mind and maturity of outlook, his efforts cannot bear fruit. Only if his mind and intellect are highly evolved can he cause the upliftment of others. At the same time, he has a handicap which others have not. If he thinks that since he uses his intellect for the performance of his duties, he is superior others, this would be a major stumbling block. For these reasons, the brahmin has to keep himself scrupulously clean in outlook. Although there is justification for his ego to swell, he has to remain humble and totally selfless. That is why forty compulsory ‘samkaaraas’ (duties) are prescribed for him so that his kinks are removed and angularities smoothened out.

If mantras are to take effect, then very stringent control and discipline are to be practised. Each mantra has certain specified requirement to be met, e.g., when to practise recitation and on what day of a fortnight it should be practised, what sacrificial offering has to be given, etc. Each mantra has a special requirement for itself. If this is not followed the potency of the mantra so far as that person is concerned becomes weak. If a mantra is recited during eclipse, for e.g., its potency is said to increase. An entire Saakha of the Vedas has been devoted for spelling out the nature and effect of mantras and for the ‘Vedavit’ i.e. one who is proficient in the Veda, to attain self-realisation.

The Classification of Saakhas in Use

Men in ancient times were endowed with great mental and physical ability. Since they imbibed high yogic powers and possessed vast intellectual capacity, each one was able to learn and recite a good number of Veda Saakhas. To many Rishis or sages in intuitive moments the Vedas flashed in their minds by themselves. Others, who were blessed with uncommon prowess, were able to learn an unbelievably large number of Saakhas from teachers. Thereafter, in many cases, the Veda mantras flashed in their minds of their own accord.

They were able to improve vastly on what they had learnt from their teachers. If the Vedas are likened to an ocean, then, it is true that no one got to know it in full. But in those ancient times, many mastered a large part of it.

As time passed, men began losing their divine yogic powers and, when Kali Yuga set in, the loss became near complete. The life, health and mental capacity, all became very small, compared to those giants of the past.

All this is the “leela”, sport of God. We can think of no reason why it is so. There is no answer to the question why people who had studied the Vedas assiduously and did yajnas followed by meditation on the Self had not passed on their good effects to the generations that came after them. The only answer that suggests itself is that, instead of following a repetitive pattern, God is staging the drama of life on the stage called the world. Thus, whils social philosophers like Darwin emphasise the progressive evolution of man and life on earth, from the point of views of spirituality, mental acumen, morality, yogic and psychic power, the trend is just opposite to the progressive evolution outlined by Darwin. There is a regression. The freezing point was reached at the start of the Kali Yuga.

The decay started in a big way with the departure of Lord Krishna from this world, when a great darkness enveloped it. The darkness was on Him too. He was born in darkness being born in a jail at mid-night. But he was the beacon of light to all the world, a lamp of mercy and compassion. With his departure, knowledge suffered and the mantle of darkness was thrown on it. Kali Purusha who stands for evil influences, gained the upper hand. Even this is the sport of the Paramaatma, whose ways are inscrutable.

Lord Krishna came with great glory and effulgence, but, later, created a situation where people were afraid that there might be total darkness. It is not possible for the Vedas to shine brightly during Kali. It cannot also be reconciled with the duties assigned to Kali Purusha.

But the plan was to keep Veda at least at a certain level without it going into total extinction. He fulfilled his purpose through the agency of Veda Vyasa, who is a manifestation of a part of Himself.

He was then not known as Veda Vyasa. His name was also Krishna. Since he was born in an island (Dweepa), he was called Dvaipaayana. He was known, therefore, as Krishna Dvaipaayana. He was also known as Baadaraayana.

Krishna Dvaipaayana was learned in all the 1180 Veda Saakhas that had come into this world through the Maharishis or great sages and were existing at the end of Dwapara Yuga. In those days, all Vedas were in a mixed and conglomerate state,like flood waters. Only the ancient sages had the capacity to grasp all of it. For our sake with our limited and impaired capacity to grasp, Vyasa divided the Saakhas into four major groupings each with a number of Saakhas. These four major groups are now known as the four Vedas. This was due to his yogic and superhuman powers, due to the power of his austerities (Tapas).

Rig Veda Saakhas are conductive to worship or prayer, the Yajus Saakhas portray the ritualistic and yajna procedures, Saama Saakhas are hymns in musical form and Atharva Saakhas stress the performance of yanjna and contain mantras designed to protect men from dangers and enemies.

The Saama Veda, the singing of the hymns of which pleases the Devatas immensely, had the largest number of Saakhas. Out of the 1180, a thousand belong to Saama Veda. Rig Veda had 21, Yajur Veda had 109 (Sukla Yajur 15, Krishna Yajur 94). Atharva Veda had 50 Saakhas.

Krishna Dvaipaayana who later came to be known as Veda Vyasa thought that, since the future generations in Kali Yuga would be men of feeble intellectual power, it would suffice if each one could study and recite one Saakha our of the total eleven hundred and odd. It was God’s will that made him think so. So, the old practice under which a man was to learn as many of the Vedas and Veda Saakhas as possible was modified in favour of one Saakha. He considered that it would be adequate if a person learn to recite one of the several Saakhas of the four Vedas and performed the karmas prescribed thereunder. He entrusted the work of propagating the four Vedas, and their Saakhas to four of his disciples. The Rig Veda Saakhas were given to Paila, the Yajus Saakhas to Vaisampaayana, the Saama Saakhas to Jaimini and the Atharva Saakhas to Sumanthu. These four were, besides being disciples of Veda Vyasa, great sages in their own right.

The word “Vyasa” means an essay or composition. Since one subject was separated from the rest and taken up for detailed study, it was in the nature of a composition – or Vyasa. To deal with a matter subject-wise and classify it suitably is Vaysa. Since the numerous Veda Saakhas in existence were thus classified and arranged subject-wise, Krishna Dwaipaayana became known as Veda Vyasa. And so great is his contribution to the work of propagating the Vedas, that he is more widely known as Veda Vyasa or codifier of the Vedas than by any other name.

Since he considered that one Saakha was sufficient for study, it should not be taken to mean that he placed a ban on learning more than one. His idea was that, as a minimum, at least one Saakha should be learnt. But, after Veda Vyasa’s time, for thousands of years, one used to learn first one Saakha from a Veda, then another Saakha from another Veda and so on. Thus, we had Dwivedis, Trivedis and Chaturvedis, i.e. those learned in the Saakhas of 2, 3 and 4 Vedas respectively.

It is more than 5000 years since Vyasa classified the Vedas. To some extent, this calculation is based on historical evidence. Modern historians have not accepted possibly due to the influence of western scholars, the firm date which saastras ascribe to Vyasa. Their original calculations placed the date of Mahabharata at 1500 BC, as the more probable date.

Today North Indians have suffixes such as Chaturvedi, Trivedi and Dwivedi, after their names. “Dubey” and “Dave” are corrupted abridgements of Dwivedis. The Chaturvedis are descendants of those who had learnt all the four Vedas. In Bengal, they are called Chattopaadhyaaya or Chatterjis. Trivedis in some places are also known as ‘Tiwaris’. Although, today, it is difficult to find a person versed well even in one of the Vedas, the family name suffixes bear evidence to the fact that some of the ancestors of these had learnt more than one Veda, at some earlier point of time. It will indeed be good if those who bear such surnames today really emulate their illustrious ancestors.

During the last 5000 years and more, many Veda Saakhas have gone out of use due to neglect of the study. The figure of 1180 has been steadily dwindling and today we are in the unfortunate position of being left with only seven or eight Veda Saakhas. In Rig Veda, there is only one Saakha left our of the 21 called “Saakala Saakha”. Since the Aithareya Upanishad is contained in this, it is also called the “Aithareya Saakha”. Out of the 15 Saakhas of Sukla Yajur Veda, only two are known now, viz., the “Kaanva” Saakha in Maharashtra and the “Maadhyaandina” Saakha which is more prevalent in Vidarbha and North India. Of the 94 Saakhas of Krishna Yajur Veda, the Taitreeya Saakha alone is fully available and in use. This is very much in vogue in South India. Another Saakha from Krishna Yajur Veda, by the name of “Maitraayaneeya Saakha” just manages to survive in Maharashtra. In Sama Veda out of the 1000, we have lost 997 Saama Saakhas. In Tamil Nadu, the only one left from Sama Veda Saakhas is the Talavakaara Saakha of the Jaimini school. The “Raanaayaneeya” Saakha is now found only in Karnataka. Gujarat and Kerala have “Kouthuma” Saakha. We were afraid that none of the Saakhas of Atharva veda were in existence. Persistent efforts to locate the scholars in this Veda, however, provided information regarding the existence of a person in a place called Sinor in Gujarat who has studied the Sownaka Saakha of Atharva Veda well.

Students from the South were, therefore. sent by us to learn this Saakha from him so that that Veda Saakha does not lapse but can be preserved.

We have also received the Aithareya Braahmana and Kousheetaki Braahmana (also called Sangaayana Braahmana) which belong to the Rig Veda.

The corresponding Aaranyaka portions of these which contain the Aitharyea Upanishad and the Kousheetaki Upanishad are already in use.

The only Braahmana in use from the Sukla Yajur Veda is the ‘Satapatha’ Braahmana. This is akin (although with some differences) to the Maadhyaandina Saakha and Kaanva Saakha. This is a big book which serves as a general guide to all Vedas. The Brahadhaaranyaka, which is an Aaranyaka but is also an Upanishad, is the only one which is available to us from Sukla Yajur Veda. I mentioned earlier that the Isavaasya Upanishad appears in the Samhita portion of this Veda only.

The Braahmana, currently in use from Krishna Yajur Veda, is “Taittareeya”. The Aaranyaka portion of this Veda also contains the Taittareeya Upanishad and Mahaa Naaraayana Upanishad. Sooktas and mantras much in use are only those from Mahaa Naaraayana Upanishad.

The Maitraayani Aaranyaka and the Upanishad bearing the same name have been found in the same Krishna Yajur Veda. Kata Saakha, (Samhita), its Braahmana and Aaranyaka are all not in use today, but the Kathopanishad, also called Kathakopanishad which appears at its end, is very much in existence and learnt.

Likewise, although the Swetasvatara Upanishad appears at the end of the Swetasvatara Samhita of the Krishna Yajur Veda, no other part of the Saakha is available.

Although 997 of the Sama Saakha Samhitas are lost, 7 or 8 of its Braahmanas have accidentally escaped oblivion. ‘Dandya’ Braahmana, Samhitopanishad Braahmana, Vamsa Braahmana, Shad Vimsa Braahmana, Saamavidhaana Braahmana, Chaandogya Braahmana and Jaimaniya Braahmana are all available. One of the Aaranyakas of this Veda, called Talavakaara Aaranyaka, is also Braahmana. At its end, appears Kenopanishad. That is why Kenopanishad is also referred to as Talavakaara Upanishad. The Chaandogya Upanishad has been obtained from the Chaandogya Braahmana of Saama Veda.

Although most of the Samhitas of Atharva Veda are lost, the ‘Prasna’, ‘Mundaka’, and ‘Maandookya’ Upanishads as well as the ‘Nrisimha Taapini Upanishad’ of this Veda are even now available and are studied. The only Braahmana from this Veda which is available is the ‘Gopatha Braahmana’.

In this state of affairs what is our duty?

We have to see that the seven or eight Samhitas which alone are now available out of the 1180 Veda Saakhas do not perish and do not become unavailable to the next generation. It will be an unpardonable sin if we do not take immediate and adequate steps to preserve for posterity the few Veda Saakhas and Upanishads which are now available.

Harih Harah!!

वेद शाखाएँ

वेद ‘अनंत’ हैं – अनंत । वेदान्त का अर्थ है वेदों का अंत । ‘अनंत वेदों का अंत’ का क्या अर्थ है ?

इसे ‘वेदांत’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसमें विभिन्न आध्यात्मिक सत्यों का निष्कर्ष निहित है, अर्थात् आत्मसाक्षात्कार, जो वेदों का तात्पर्य है । दूसरे शब्दों में, यह वेद की खोज का अंत है । यह वेदों के अंत में (बाद में) भी प्रकट होता है ।

ब्राह्मण के रूप में जन्म लेने वाले प्रत्येक व्यक्ति को बिना कोई कारण पूछे, अनिवार्य रूप से और कर्तव्य के रूप में, वेदों की शाखाओं में से किन्हीं एक वेद शाखा को समझना, अध्ययन और अभ्यास करना होता है । एक शाखा में पहले संहिता, फिर ब्राह्मण, फिर आरण्यक होते हैं, जिनके अंत में उपनिषद प्रकट होते हैं । इस प्रकार वेद शाखा का निष्कर्ष उपनिषद है ।

अनंत वेदों को इतनी सारी शाखाओं या शाखाओं में विभाजित करने का क्या कारण है ? व्यक्ति को सभी विषयों की शिक्षा दी जानी चाहिए ताकि उसकी आध्यात्मिक प्रगति संभव हो सके । सबसे पहले वेदों का अध्ययन और पाठ, फिर यज्ञ और अन्य अनुष्ठान और उनसे संबंधित मंत्रों जिनका उसे अध्ययन और पालन करना होता है । इसके बाद यज्ञों के उद्देश्य की जाँच और अंत में, परमात्मा तत्व की जाँच और उसे वास्तविक अनुभव की सीमा में लाना होता है । ये सभी बातें वेदों के अध्येता को दी जानी आवश्यक हैं ।

जो दिया जाता है वह व्यक्ति को आत्मसाक्षात्कार प्राप्त करने में सक्षम बनाने के लिए पर्याप्त होना चाहिए । असंख्य वेद शाखाओं में निपुणता प्राप्त करना एक असंभव कार्य है । एक कथा है कि कैसे भारद्वाज जैसे ऋषि हजारों वर्षों के अध्ययन के बाद भी वैदिक पर्वतों से केवल एक मुट्ठी मिट्टी ही प्राप्त कर सके थे । इसलिए, किसी व्यक्ति को अपने मन की अशुद्धियों को दूर करने और परमात्मा में एकाकार होने के योग्य बनाने के लिए आवश्यक सर्वोत्तम सामग्री को अनंत वेदों से वर्गीकृत और संकलित करके शाखा के रूप में दिया गया है ।

शाखा में ब्राह्मण के जन्म से लेकर मृत्यु तक के कर्तव्यों का विस्तृत वर्णन है । सबसे पहले, शाखा को सीखना और उसका पाठ करना (अध्ययन) होता है, अर्थात् संहिता के मंत्रों को कंठस्थ करना होता है । फिर, ब्राह्मण ग्रन्थों में वर्णित इन मंत्रों की सहायता से निर्धारित यज्ञ करने होते हैं । फिर, बाह्य कर्म और आंतरिक अनुभव के बीच की खाई को पाटने वाले आरण्यक का मनन करना होता है । फिर, उपनिषद की विषयवस्तु, जो केवल आंतरिक सत्य से संबंधित है, को आत्मसात करना होता है और अंत में, मोक्ष की अवस्था प्राप्त करनी होती है, जहाँ ‘अंदर’ और ‘बाहर’ का भेद समाप्त हो जाता है ।

यही प्रत्येक शाखा की योजना और उद्देश्य है ।

एक विकसित आत्मा के लिए सत्य का साक्षात्कार करने हेतु एक मंत्र भी पर्याप्त है ।

लेकिन एक सामान्य आत्मा को उस अवस्था तक पहुँचने के लिए अनेक कर्मों, व्रतों, जप और ध्यान का सहारा लेना पड़ता है । इस प्रकार, प्रत्येक शाखा में मंत्रों, कर्मों और दार्शनिक निर्देशों का वह परिमाण समाहित है जो एक सामान्य व्यक्ति को मोक्ष प्राप्त करने में सक्षम बनाता है ।

जो ब्राह्मण नहीं हैं, उनका क्या?

क्या ब्राह्मणों के अलावा अन्य लोगों के लिए भी विकास प्राप्त करना आवश्यक नहीं है ? वैदिक कर्म और अनुष्ठान करना उनके लिए नहीं है, बल्कि उन्हें जो भी कार्य करने होते हैं, वे उन्हें मानसिक उत्थान और आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाते हैं । व्यक्ति चाहे किसी भी जाति का हो, अपने निर्धारित कर्तव्यों का उत्साहपूर्वक पालन और कर्मफल को ईश्वर को समर्पित करना उसे लक्ष्य तक पहुँचाता है । भगवान कृष्ण ने भगवद्गीता में इसे बहुत स्पष्ट रूप से बताया है:

“स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दन्ति मानवाः” – १८.४६

कुछ लोगों का कर्तव्य युद्ध करना और रक्षा करना है । कुछ लोग व्यापारी हैं । कुछ लोग गौओं की रक्षा करने वाले ग्वाले हैं । कुछ लोग श्रमिक हैं या श्रम शक्ति प्रदान करने वाले हैं । प्रत्येक व्यक्ति, अपने चुने हुए क्षेत्र में इस कर्तव्य का पालन करके, ईश्वर को प्राप्त कर सकता है ।

जबकि अन्य लोग ऐसे कर्तव्य और व्यवसाय करते हैं जो इस संसार में बेहतर जीवन जीने के लिए अनुकूल हैं, ब्राह्मण का कर्तव्य क्या है ? हमारे सांसारिक जीवन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू ईश्वर की कृपा प्राप्त करना है । समाज के हित के लिए ऐसी कृपा प्राप्त करना ब्राह्मणों का कर्तव्य है । देवताओं, जो ईश्वर के सेवक (कार्यकारी पदाधिकारी) हैं, की कृपा सभी वर्गों के लोगों के लिए प्राप्त करना भी ब्राह्मणों का कर्तव्य है ।

वह जो मंत्र पढ़ता है और जो वैदिक कर्म करता है, वे सभी लोगों के कल्याण के लिए हैं, केवल उसके लिए नहीं ।

चूँकि उसका कर्तव्य उन लोगों के साथ है जिनकी शक्तियाँ सांसारिक स्तर से परे हैं, इसलिए उसे मंत्र सीखना होगा और कुछ नियंत्रणों और अनुशासनों के माध्यम से मन्त्र शक्तियाँ प्राप्त करनी होंगी, जिनका उसे दूसरों की तुलना में अधिक मात्रा में अभ्यास करना होगा । दूसरों के लिए, इनकी उतनी कठोरता से आवश्यकता नहीं है जितनी ब्राह्मण के लिए । यदि यह समझा जाए कि उसका कर्तव्य सभी के कल्याण के लिए प्रार्थना करना और कार्य करना है, तो यह गलत धारणा नहीं पनपेगी कि कुछ अनुशासन विशेष रूप से ब्राह्मणों के लिए निर्धारित हैं ।

उपरोक्त के अतिरिक्त, एक ब्राह्मण को कलाओं, विज्ञानों और दूसरों की कार्य-पद्धति में भी निपुणता प्राप्त करनी होगी, ताकि वह उन्हें उनके कर्तव्यों के बारे में शिक्षित कर सके । केवल शिक्षण ही उसका कार्य है । अन्य शिल्पों के संबंध में, उसे केवल उनका अध्ययन करना चाहिए ताकि वह उन्हें सिखा सके, लेकिन उसे उन शिल्पों में से किसी का भी अभ्यास नहीं करना चाहिए जो उसके लिए निर्धारित नहीं हैं ।

दूसरों के जीवन और संपत्ति की रक्षा, व्यापार, कृषि और शिल्प जैसे व्यवसायों को वास्तव में अपनाने के बजाय, उसे प्रत्येक व्यवसाय की विधियों और उनके अभ्यास के लिए सबसे उपयुक्त जीवन शैली को सिखाने का प्रयास करना चाहिए और इसके माध्यम से उसे दूसरों के चरित्र, मन और बुद्धि को ढालना चाहिए । इस प्रकार, ब्राह्मण का उत्तरदायित्व बहुत कठिन है । जब तक इस कार्य को करने वाले व्यक्ति के मन की पवित्रता और दृष्टिकोण की परिपक्वता नहीं होती, तब तक उसके प्रयास फलदायी नहीं हो सकते । केवल तभी जब उसका मन और बुद्धि अत्यधिक विकसित हों, वह दूसरों का उत्थान कर सकता है । साथ ही, उसमें एक ऐसी कमी है जो दूसरों में नहीं है । यदि वह सोचता है कि चूँकि वह अपने कर्तव्यों के पालन के लिए अपनी बुद्धि का उपयोग करता है, इसलिए वह दूसरों से श्रेष्ठ है, तो यह एक बड़ी बाधा होगी । इन कारणों से, ब्राह्मण को अपने दृष्टिकोण को पूरी तरह से शुद्ध रखना होगा । यद्यपि उसके अहंकार के बढ़ने का औचित्य है, फिर भी उसे विनम्र और पूर्णतः निःस्वार्थ रहना होगा । इसीलिए उसके लिए चालीस अनिवार्य संस्कार (कर्तव्य) निर्धारित किए गए हैं ताकि उसकी विकृतियाँ दूर हों और कोणीयताएँ (टेढ़ापन) सहज हों ।

यदि मंत्रों को प्रभावी बनाना है, तो अत्यंत कठोर नियंत्रण और अनुशासन का पालन करना होगा । प्रत्येक मंत्र की कुछ विशिष्ट आवश्यकताएँ पूरी करनी होती हैं, जैसे, जप कब करना है और पखवाड़े के किस दिन करना है, क्या हवन करना है, आदि । प्रत्येक मंत्र की अपनी एक विशेष आवश्यकता होती है । यदि इसका पालन नहीं किया जाता है, तो उस व्यक्ति के लिए मंत्र की शक्ति क्षीण हो जाती है । उदाहरण के लिए, यदि ग्रहण के दौरान मंत्र का जाप किया जाए, तो उसकी शक्ति बढ़ जाती है । वेदों की एक पूरी शाखा मंत्रों के स्वरूप और प्रभाव को स्पष्ट करने और ‘वेदवित्’ अर्थात् वेद में पारंगत व्यक्ति को आत्म-साक्षात्कार प्राप्त करने के लिए समर्पित की गई है ।

व्यवहार में शाखाओं का वर्गीकरण

प्राचीन काल में मनुष्य महान मानसिक और शारीरिक क्षमता से संपन्न थे । चूँकि उनमें उच्च योगिक शक्तियाँ थीं और उनकी बौद्धिक क्षमता अपार थी, इसलिए प्रत्येक व्यक्ति वेद शाखाओं की एक बड़ी संख्या को सीखने और उनका पाठ करने में सक्षम थे । कई ऋषियों या मुनियों के मन में सहज ही वेद स्वतः ही कौंध जाते थे । अन्य, जो असाधारण पराक्रम से संपन्न थे, शिक्षकों से अविश्वसनीय रूप से बड़ी संख्या में शाखाएँ सीखने में सक्षम थे । इसके बाद, कई मामलों में, वेद मंत्र स्वतः ही उनके मन उनकी अपनी इच्छा से ही कौंध जाते थे ।

वे अपने शिक्षकों से जो कुछ सीखते थे, उसमें बहुत सुधार करने में सक्षम थे । यदि वेदों की तुलना समुद्र से की जाए, तो यह सच है कि कोई भी इसे पूरी तरह से नहीं जान पाया । लेकिन उस प्राचीन काल में, कई लोगों ने इसके एक बड़े भाग में महारत हासिल कर ली थी ।

जैसे-जैसे समय बीतता गया, मनुष्य अपनी दिव्य योगिक शक्तियों को खोने लगे और जब कलियुग आया, तो यह (खोने की क्रिया – loss) लगभग पूर्ण हो गया । अतीत के उन महान पुरुषों (giants) की तुलना में जीवन, स्वास्थ्य और मानसिक क्षमता, सब कुछ बहुत छोटा हो गया ।

यह सब ईश्वर की “लीला” है । ऐसा क्यों है, इसका कोई कारण नहीं सूझता । इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं है कि जिन लोगों ने वेदों का गहन अध्ययन किया और यज्ञ करके आत्म-ध्यान किया, उन्होंने अपने शुभ प्रभाव अपनी आने वाली पीढ़ियों को क्यों नहीं दिए । एकमात्र उत्तर जो स्वयं ही स्पष्ट है, वह यह है कि ईश्वर किसी दोहरावदार पैटर्न का पालन करने के बजाय, संसार नामक रंगमंच पर जीवन का नाटक प्रस्तुत कर रहे हैं । इस प्रकार, जबकि डार्विन जैसे सामाजिक दार्शनिक आध्यात्मिकता, मानसिक कुशाग्रता, नैतिकता, योग और मानसिक शक्ति के दृष्टिकोण से मनुष्य और पृथ्वी पर जीवन के प्रगतिशील विकास पर ज़ोर देते हैं, यह प्रवृत्ति डार्विन द्वारा उल्लिखित प्रगतिशील विकास के ठीक विपरीत है । इसमें एक प्रतिगमन है । कलियुग के आरंभ में ही हिमांक बिंदु पहुँच गया था ।

भगवान कृष्ण के इस संसार से चले जाने के साथ ही, जब एक घोर अंधकार ने इसे घेर लिया, तब यह क्षय बड़े पैमाने पर शुरू हुआ । अंधकार उन पर भी छाया था । आधी रात को कारागार में जन्म लेने के कारण उनका जन्म अंधकार में हुआ था । लेकिन वे समस्त जगत के लिए प्रकाशपुंज, दया और करुणा के दीप थे । उनके जाने से ज्ञान का ह्रास हुआ और उस पर अंधकार का आवरण छा गया । दुष्ट शक्तियों का प्रतीक कलिपुरुष, प्रबल हो गया । यह भी परमात्मा का खेल है, जिसके मार्ग अज्ञेय हैं ।

भगवान कृष्ण महान वैभव और तेज के साथ आए, लेकिन बाद में उन्होंने ऐसी स्थिति उत्पन्न कर दी कि लोग भयभीत हो गए कि कहीं पूर्ण अंधकार न छा जाए । कलियुग में वेदों का चमकना संभव नहीं है । यह कलिपुरुष को सौंपे गए कर्तव्यों के साथ भी मेल नहीं खाता ।

लेकिन योजना यह थी कि वेद को कम से कम एक निश्चित स्तर पर बनाए रखा जाए, बिना उसे पूरी तरह से लुप्त हुए । उन्होंने वेद व्यास, जो स्वयं उनके एक अंश के रूप हैं, के माध्यम से अपना उद्देश्य पूरा किया ।

तब उन्हें वेद व्यास के नाम से नहीं जाना जाता था । उनका नाम भी कृष्ण था । चूँकि उनका जन्म एक द्वीप में हुआ था, इसलिए उन्हें द्वैपायन कहा गया । इसलिए उन्हें कृष्ण द्वैपायन के नाम से जाना जाता था । उन्हें बादरायण के नाम से भी जाना जाता था ।

कृष्ण द्वैपायन उन सभी ११८० वेद शाखाओं के ज्ञाता थे जो महर्षियों या महान ऋषियों के माध्यम से इस संसार में आए थे और द्वापर युग के अंत में विद्यमान थे । उन दिनों, सभी वेद बाढ़ के पानी की तरह मिश्रित और समूहित अवस्था में थे । केवल प्राचीन ऋषियों में ही इन सभी को ग्रहण करने की क्षमता थी । हमारी सीमित और क्षीण ग्रहण क्षमता को देखते हुए, व्यास ने शाखाओं को चार प्रमुख समूहों में विभाजित किया, जिनमें से प्रत्येक में कई शाखाएँ थीं । ये चार प्रमुख समूह अब चार वेदों के रूप में जाने जाते हैं । यह उनकी योगिक और अलौकिक शक्तियों, उनकी तपस्या की शक्ति के कारण था ।

ऋग्वेद की शाखाएँ पूजा या प्रार्थना के लिए उपयुक्त हैं, यजुर्वेद की शाखाएँ कर्मकांड और यज्ञ प्रक्रियाओं का चित्रण करती हैं, सामवेद संगीतमय स्तोत्र हैं और अथर्ववेद की शाखाएँ यज्ञ के प्रदर्शन पर बल देती हैं और इनमें मनुष्यों को खतरों और शत्रुओं से बचाने के लिए मंत्र होते हैं ।

सामवेद, जिसके स्तोत्रों के गायन से देवता अत्यधिक प्रसन्न होते हैं, में सबसे अधिक संख्या में शाखाएं थीं । ११८० में से एक हज़ार सामवेद की हैं । ऋग्वेद में २१, यजुर्वेद में १०९ (शुक्ल यजुर्वेद में १५, कृष्ण यजुर्वेद में ९४) शाखाएं थीं । अथर्ववेद में ५० शाखाएं थीं ।

कृष्ण द्वैपायन, जो बाद में वेद व्यास के नाम से प्रसिद्ध हुए, ने सोचा कि चूँकि कलियुग में आने वाली पीढ़ियाँ दुर्बल बौद्धिक शक्ति वाली होंगी, इसलिए यह पर्याप्त होगा कि प्रत्येक व्यक्ति कुल ग्यारह सौ से अधिक शाखाओं में से एक का अध्ययन और पाठ कर सके । यह ईश्वर की इच्छा थी जिसने उन्हें ऐसा सोचने पर मजबूर किया । अतः, पुरानी प्रथा जिसके तहत एक व्यक्ति को यथासंभव वेदों और वेद शाखाओं को सीखना था, को एक शाखा के पक्ष में संशोधित किया गया । उन्होंने विचार किया कि यह पर्याप्त होगा यदि कोई व्यक्ति चार वेदों की कई शाखाओं में से एक का पाठ करना सीख ले और उसके अंतर्गत बताए गए कर्मों को करे । उन्होंने चारों वेदों और उनकी शाखाओं के प्रचार का कार्य अपने चार शिष्यों को सौंपा । ऋग्वेद की शाखाएँ पैल को, यजुर्वेद की शाखाएँ वैशम्पायन को, साम की शाखाएँ जैमिनी को और अथर्व की शाखाएँ सुमंतु को दी गईं । ये चारों वेद व्यास के शिष्य होने के अलावा, स्वयं महान ऋषि भी थे ।

“व्यास” शब्द का अर्थ निबंध या रचना है । चूँकि एक विषय को बाकी विषयों से अलग करके विस्तृत अध्ययन के लिए लिया जाता था, इसलिए वह रचना – या व्यास – की प्रकृति का होता था । किसी विषय का विषयवार विश्लेषण करना और उसे उचित रूप से वर्गीकृत करना व्यास है । चूँकि अस्तित्व में मौजूद असंख्य वेद शाखाओं को इस प्रकार विषयवार वर्गीकृत और व्यवस्थित किया गया था, इसलिए कृष्ण द्वैपायन वेद व्यास के रूप में जाने गए । और वेदों के प्रचार-प्रसार के कार्य में उनका योगदान इतना महान है कि उन्हें किसी अन्य नाम से अधिक व्यापक रूप से वेद व्यास या वेदों के संहिताकार के रूप में जाना जाता है ।

चूँकि उनका मानना ​​था कि अध्ययन के लिए एक शाखा पर्याप्त है, इसलिए इसका यह अर्थ नहीं निकाला जाना चाहिए कि उन्होंने एक से अधिक शाखा सीखने पर प्रतिबंध लगा दिया था । उनका विचार था कि कम से कम एक शाखा सीखी जानी चाहिए । लेकिन, वेद व्यास के समय के बाद, हज़ारों वर्षों तक, पहले एक वेद से एक शाखा सीखी जाती थी, फिर दूसरे वेद से दूसरी शाखा, और इसी तरह आगे भी । इस प्रकार, हमारे पास द्विवेदी, त्रिवेदी और चतुर्वेदी थे, अर्थात वे लोग जो क्रमशः दूसरे, तीसरे और चौथे वेद की शाखाओं के विद्वान थे ।

व्यास द्वारा वेदों का वर्गीकरण किए हुए ५००० वर्ष से भी अधिक समय हो गया है । कुछ हद तक, यह गणना ऐतिहासिक साक्ष्यों पर आधारित है । आधुनिक इतिहासकारों ने संभवतः पश्चिमी विद्वानों के प्रभाव के कारण, शास्त्रों द्वारा व्यास को दी गई निश्चित तिथि को स्वीकार नहीं किया है । उनकी मूल गणनाओं ने महाभारत की तिथि को १५०० ईसा पूर्व, अधिक संभावित तिथि माना है ।

आज उत्तर भारतीयों के नाम के बाद चतुर्वेदी, त्रिवेदी और द्विवेदी जैसे प्रत्यय लगते हैं । “दुबे” और “दवे” द्विवेदी के अपभ्रंश रूप हैं । चतुर्वेदी उन लोगों के वंशज हैं जिन्होंने चारों वेदों का ज्ञान प्राप्त किया था । बंगाल में इन्हें चट्टोपाध्याय या चटर्जी कहा जाता है । कुछ स्थानों पर त्रिवेदियों को ‘तिवारी’ भी कहा जाता है । हालाँकि आज किसी एक वेद में भी पारंगत व्यक्ति मिलना मुश्किल है, फिर भी इनके कुलनाम प्रत्यय इस बात के प्रमाण हैं कि इनके पूर्वजों ने किसी समय एक से अधिक वेदों का अध्ययन किया था । यह बहुत अच्छा होगा यदि आज ऐसे उपनाम रखने वाले लोग अपने महान पूर्वजों का अनुकरण करें ।

पिछले ५००० वर्षों से भी अधिक समय से, अध्ययन की उपेक्षा के कारण कई वेद शाखाएँ प्रचलन से बाहर हो गई हैं । ११८० का आँकड़ा लगातार घटता जा रहा है और आज हम दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति में हैं कि हमारे पास केवल ७ या ८ वेद शाखाएँ ही बची हैं । ऋग्वेद में, २१ शाखाओं में से केवल एक शाखा बची है जिसे “साकल शाखा” कहा जाता है । चूँकि इसमें ऐतरेय उपनिषद समाहित है, इसलिए इसे “ऐतरेय शाखा” भी कहा जाता है । शुक्ल यजुर्वेद की १५ शाखाओं में से अब केवल दो ही ज्ञात हैं, अर्थात् महाराष्ट्र में “काण्व” शाखा और विदर्भ तथा उत्तर भारत में अधिक प्रचलित “माध्यंदिन” शाखा । कृष्ण यजुर्वेद की ९४ शाखाओं में से केवल तैत्तिरीय शाखा ही पूर्णतः उपलब्ध और प्रयोग में है । दक्षिण भारत में यह अत्यधिक प्रचलित है । कृष्ण यजुर्वेद की एक और शाखा, “मैत्रायणीय शाखा” के नाम से, महाराष्ट्र में किसी तरह बची हुई है । सामवेद की शाखाओं में से ९९७ साम शाखाएँ लुप्त हो चुकी हैं । तमिलनाडु में सामवेद की केवल जैमिनी शाखा की तलवकार शाखा ही बची है । “राणायनीय” शाखा अब केवल कर्नाटक में ही पाई जाती है । गुजरात और केरल में “कौथुमा” शाखाएँ हैं । हमें डर था कि अथर्ववेद की कोई भी शाखा अस्तित्व में नहीं है । हालाँकि, इस वेद के विद्वानों का पता लगाने के निरंतर प्रयासों से गुजरात के सिनोर नामक स्थान पर एक ऐसे व्यक्ति के अस्तित्व की जानकारी मिली जिसने अथर्ववेद की सौनक शाखा का गहन अध्ययन किया है ।

इसलिए, हमने दक्षिण से छात्रों को उनसे यह शाखा सीखने के लिए भेजा ताकि वह वेद शाखा लुप्त न हो जाए बल्कि सुरक्षित रहे ।

हमें ऋग्वेद से संबंधित ऐतरेय ब्राह्मण और कौशीतकी ब्राह्मण (जिसे संगायन ब्राह्मण भी कहा जाता है) भी प्राप्त हुए हैं ।

इनके संगत आरण्यक भाग, जिनमें ऐतरेय उपनिषद और कौशीतकी उपनिषद शामिल हैं, पहले से ही उपयोग में हैं ।

शुक्ल यजुर्वेद से प्रयुक्त एकमात्र ब्राह्मण ‘शतपथ’ ब्राह्मण है । यह मध्यंदिन शाखा और काण्व शाखा के समान (यद्यपि कुछ अंतरों के साथ) है । यह एक विशाल ग्रंथ है जो सभी वेदों के लिए एक सामान्य मार्गदर्शक के रूप में कार्य करता है । बृहदारण्यक, जो एक आरण्यक होने के साथ-साथ एक उपनिषद भी है, शुक्ल यजुर्वेद से हमें उपलब्ध एकमात्र ग्रंथ है । मैंने पहले उल्लेख किया था कि ईशावास्य उपनिषद इस वेद के संहिता भाग में ही आता है ।

कृष्ण यजुर्वेद से वर्तमान में प्रयुक्त ब्राह्मण “तैत्तरीय” है । इस वेद के आरण्यक भाग में तैत्तरीय उपनिषद और महानारायण उपनिषद भी सम्मिलित हैं । अधिकतर प्रयुक्त होने वाले सूक्त और मंत्र केवल महानारायण उपनिषद से ही हैं ।

मैत्रायणी आरण्यक और एक ही नाम वाले उपनिषद एक ही कृष्ण यजुर्वेद में पाए गए हैं । कता शाखा, (संहिता), इसके ब्राह्मण और आरण्यक सभी आज उपयोग में नहीं हैं, लेकिन कठोपनिषद, जिसे कठकोपनिषद भी कहा जाता है, जो इसके अंत में आता है, बहुत अस्तित्व में है और सीखा हुआ है ।

इसी तरह, यद्यपि श्वेताश्वतर उपनिषद कृष्ण यजुर्वेद की श्वेताश्वतर संहिता के अंत में आता है, शाखा का कोई अन्य भाग उपलब्ध नहीं है ।

हालाँकि साम शाखा संहिताओं में से ९९७ लुप्त हो गए हैं, लेकिन इसके ७ या ८ ब्राह्मण गलती से गुमनामी से बच गए हैं । ‘दंड्य’ ब्राह्मण, संहितोपनिषद ब्राह्मण, वंश ब्राह्मण, षड् विंस ब्राह्मण, शामविधान ब्राह्मण, छांदोग्य ब्राह्मण और जैमनिया ब्राह्मण सभी उपलब्ध हैं । इस वेद का एक आरण्यक, जिसे तलवकार आरण्यक कहा जाता है, ब्राह्मण भी है । इसके अंत में केनोपनिषद् है । इसीलिए केनोपनिषद् को तलवकार उपनिषद् भी कहा जाता है । छांदोग्य उपनिषद्म सामवेद के छांदोग्य ब्राह्मण से प्राप्त हुआ है ।

यद्यपि अथर्ववेद की अधिकांश संहिताएँ लुप्त हो गई हैं, फिर भी इस वेद के ‘प्रश्न’, ‘मुंडक’ और ‘मांडूक्य’ उपनिषद तथा ‘नृसिंह तापिनी उपनिषद्’ आज भी उपलब्ध हैं और उनका अध्ययन किया जाता है । इस वेद का एकमात्र उपलब्ध ब्राह्मण ‘गोपथ ब्राह्मण’ है ।

ऐसी स्थिति में हमारा कर्तव्य क्या है ?

हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि ११८० वेद शाखाओं में से केवल सात या आठ संहिताएँ भी नष्ट न हों और अगली पीढ़ी के लिए अनुपलब्ध न हो जाएँ । यदि हम वर्तमान में उपलब्ध कुछ वेद शाखाओं और उपनिषदों को भावी पीढ़ी के लिए संरक्षित करने के लिए तत्काल और पर्याप्त कदम नहीं उठाते हैं, तो यह एक अक्षम्य पाप होगा ।

हरिः हरः!!

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