वेदांग छन्द – वेदक पैर
वेदक छह अंग मे सँ एकटा छन्द केँ वेदपुरुषक चरण (पैर) मानल जाइछ । ‘छन्द’ केर एकटा आरो अर्थ अछि । ई स्वयं वेद केँ सन्दर्भित करैत अछि । भगवान कृष्ण वेद केँ सृष्टिक गाछ केर पत्ता कहैत छथि – छन्दांसि यस्य पर्णानि ।
एतय हम ‘छन्द’ केर एकटा अलग अर्थ मे वर्णन करब जेकर अर्थ अछि ‘मात्रिक रचना’ ।
ऋग्वेद आ सामवेद पूर्णतः पद्य मे अछि । यद्यपि यजुर्वेद मे गद्य मे मंत्र अछि, तैयो ओहो छन्दक संग अबैत अछि । वेद अधिकांशतः पद्य-रूप (छन्द) मे हेबाक कारण छन्द सेहो कहाइत अछि ।
यदि हमरा सब केँ कोट सियेबाक जरूरी होइछ, त दर्जी हमरा सभक नाप लैत अछि । ओ कपड़ा केँ ओहि मुताबिक कटैत अछि सिबैत अछि । यदि नाप नहि लेल जाय, त कोट शायद फिट नहि आबय । तहिना, यहि हमरा सब केँ विचार सब काव्य मे अभिव्यक्त करबाक अछि, यदि विचार सब केँ काव्यक रूप धारण करबाक अछि आ पद्य-रूप मे ढालबाक अछि, त ओकरो उचित माप भेनाय आवश्यक छैक । जाहि प्रकारे एकटा कोट कतेको इंच लंबा आर चौड़ा होइत छैक, ताहि प्रकारे एकटा पद्य मे सेहो एकटा निश्चित ‘छन्द’ आर अक्षर सभक संख्या होबक चाही, जाहि सँ कि ओ नीक जेकाँ फिट भ’ सकय । छन्द एकरा लेल नियम निर्धारित करैत अछि । ई छन्द रचनाक सीमा सब केँ परिभाषित करैत अछि – छन्द, तुक आदि मे । एहि विषय पर महत्वपूर्ण आ प्रामाणिक ग्रन्थ पिंगला द्वारा रचित ‘छन्द सूत्र’ थिक ।
जेना कि पहिनहिं उल्लेख कयल जा चुकल अछि, वेदपुरुषक पैर मानल जायवला अंग केँ छन्द कहल जाइत छैक । जे लोक मंत्र जप मे दीक्षित छथि, ओ सब ऋषिक नाम लैत समय अपन सिर (माथ) केँ छुबैत छथि, छन्दक नाम लैत समय अपन नासिका (नाक) केँ छुबैत छथि, आर देवता या मंत्रक अधिष्ठाता देवताक नाम लैत समय हृदय केँ छुबैत छथि ।
काव्य रूप मे सब वेद मंत्र ‘छन्द’ थिक । अन्य, अर्थात् ओ जे वेदक भाग नहि थिक, ‘श्लोक’ कहाइत अछि । संस्कृत मे prose केँ ‘गद्य’ आर छन्द केँ ‘पद्य’ कहल जाइत छैक । अंग्रेजी मे एकरा poetry (काव्य) कहैत छैक । एहि तरहें, केवल वैदिक काव्य मे टा ‘छन्द’ नहि कहल जाइछ, बल्कि ‘छन्द’ केहनो काव्यात्मक अभिव्यक्ति केँ छन्द या तुक (rhyme) केँ सेहो दर्शाबैत अछि, जे सब लयबद्ध होइत अछि । एहि छन्द सब मे, ‘अनुष्टुप’ केर प्रयोग व्यापक रूप सँ कयल जाइछ । पुराण आ वाल्मीकि रामायणक सबटा श्लोक यैह अनुष्टुप छन्द मे अछि । एहि तरहें छन्द, तुक केर सेहो पर्यायवाची होइछ ।
प्रत्येक वृत्त या छन्द मे कतेक पद या चौपाइ या चरण होयबाक चाही आ प्रत्येक पद या पंक्ति मे कतेक अक्षर होयबाक चाही, एकर नियम छैक । आर्य नामक एकटा छन्द छैक जाहि मे ह्रस्व आ दीर्घ ध्वनिय सभक सेहो ध्यान राखय पड़ैत छैक । एहि छन्द मे, ‘राम’ शब्द मे केवल दुइ मात्रा, अर्थात् ‘रा’ और ‘म’, नहि गानल जाइछ । ‘रा’ दीर्घ ध्वनि थिक आर ओकरा दुइ मात्रा मानल जाइछ, ‘म’ जे एकटा लघु थिक, कुल तीन गानल जाइछ ।
अन्य वृत्तक लेल गणनाक एकटा आर विधि अछि जाहि मे दीर्घ व ह्रस्व ध्वनि मे भेद नहि कयल जाइछ आ प्रत्येक छन्द मे, एकटा पाद मे शब्दक संख्या स्थिर राखल जाइछ ।
पाद या चरण
हम छन्द केँ वेदपुरुषक चरण (पाद) केर रूप मे कहलहुँ अछि । संस्कृत मे चरण केँ पाद या पद कहैत छैक । अंग्रेजी मे सेहो, गणना छन्दहि मे ‘feet’ केर रूप मे होइत छैक । अंग्रेजीक छन्द इहो निर्धारित करैछ जे प्रत्येक चरण मे कतेक अक्षर हेबाक चाही । पाद, जे टांगक अन्त केँ दर्शाबैत अछि, छन्द केर विभाजनक इकाई केँ सेहो दर्शाबैत अछि । एहि प्रकारे, पाद या पैर (या एकर समतुल्य) कतेको भाषा सब मे एकटा समान अर्थ राखयवला एक गोट सामान्य भाव थिक । कोनो क्षेत्र मे, सब मानव जाति मे समान समानता दर्शाबयवला एक गोट उदाहरण पेनाय वास्तव मे उत्साहजनक बात अछि । कोनो मंत्र या श्लोक मे पाद ओकर एक चौथाई भाग होइत छैक । मानव शरीर रचना विज्ञान मे, ‘पैर’ नामक अंग वास्तव मे एक चौथाई भाग होइत छैक । शरीरक आधा भाग डाँर्ह (कमर) तक होइत छैक; शेष आधा भाग केर नीचाँ, दुनू पैर एक-चौथाई होइत छैक, जे मिलिकय ‘आधा’ बनैत अछि ।
एकटा वेद मंत्र या एतय धरि कि एकटा अवैदिक श्लोक सेहो आमतौर पर चौपाइ (चारि पद वाला) भेल करैछ । अधिकांशतः, एकरा चारि भाग मे विभाजित कयल जाइछ, प्रत्येक पाद लेल समान संख्या मे अक्षर या समान मात्रा सभक उपयोग कयल जाइछ । जेतय एकटा पाद दोसर पाद केर बराबर नहि होइछ, ओकरा ‘विषम’ कहैत छैक । विषम वास्तव मे वि-सम थिक जेकर अर्थ अछि समान या एक जेहेन नहि भेनाय ।
यदि सब पाद केर लम्बाइ भिन्न हो, त ओकरा ‘विषम वृत्त’ कहल जाइछ । प्रत्येक दोसर पाद जे असमान होइछ, ओकरा ‘अर्ध सम वृत्त’ कहैत छैक । अर्थात्, पहिल आ दोसर पादक संग-संग तेसर व चारिम पाद केर अक्षर सभक संख्या मे सेहो अन्तर हेतैक । दोसर आर चारिम पाद मे अक्षर सभक संख्या समान हेतैक ।
हालाँकि, अधिकांशतः पाद केर लम्बाइ समान हेतैक । उदाहरणक लेल, आउ सबसँ प्रसिद्ध प्रार्थना – श्लोक ली: “शुक्लाम्बरधरं विष्णुं / शशिवर्णं चतुर्भुजं / प्रसन्न वदनं ध्यायेत् / सर्व विघ्नोपाशान्तये” । एहि मे चारि पद लय लैत छी । पहिल, “शुक्लाम्बरधरं विष्णुं”, दोसर, “शशिवर्णं चतुर्भुजं”, तेसर, “प्रसन्न वदनं ध्यायेत्” और चारिम, “सर्व विघ्नोपशान्तये” । यदि गिनती कयल जाय त प्रत्येक पाद मे केवल आठ अक्षर होयत – अंग्रेजी केर अक्षर नहि बल्कि संस्कृत केर अक्षर:
शुक्लाम्बरधरं विष्णुं / शशिवर्णं चतुर्भुजं / प्रसन्न वदनं ध्यायेत् / सर्वविघ्नोपशान्तये /
अक्षर या शब्दांश सभक गिनती लेल मात्र स्वर आर व्यंजन जाहि मे स्वर लगायल गेल अछि ओकरे टा ध्यान मे राखल जेबाक चाही । शुद्ध व्यंजन केर उपेक्षा करबाक चाही (यानि ओकर गिनती नहि करबाक चाही) । तखनहिं उपरोक्त केर योग ठीक-ठीक आठ होयत ।
एहि तरहक श्लोक, जाहि मे एकटा छन्द मे चारि टा पद होइत छैक आर प्रत्येक पद मे आठ टा अक्षर होइत छैक, अनुष्टुप छन्द मे कहल जाइत छैक ।
काव्य छन्द केर जन्मक कथा
वेदक विपरीत, जेतय स्वर सब मे परिवर्तन या स्वर उत्पन्न करबाक लेल ध्वनि सभक स्वर ऊँच या नीच कयल जाइछ, काव्य या आर श्लोक सब मे एहेन कोनो विधि नहि अछि । स्वर मे परिवर्तनवला वेदक अनुष्टुप छन्द केँ सर्वप्रथम वाल्मीकि अपनौने रहथि, लेकिन ओहि मे विविधता सब सेहो छल । ओ एना जानि-बुझिकय या कोनो योजनाक तहत नहि कएने रहथि । संयोग सँ ओ एकटा शिकारी केँ पक्षीक एकटा जोड़ा मे सँ एकटा केँ मारैत देखलनि । अपन संगी केँ मृत देखिकय शोकग्रस्त पक्षीक प्रति हुनकर अपार करुणा, शिकारीक प्रति तीव्र क्रोध मे बदलि गेलनि । तखन ओ शिकारी केँ एहि प्रकारे श्राप देलनि:
मा निषाद प्रतिष्ठांत्वमगमश्शाश्वतीसमाः / यत्क्रौञ्जमिथुनादेकमवधीः काममोहितम् /
“हे शिकारी, तोहर कहियो कल्याण नहि हौउक; तूँ प्रेम मे लीन क्रौंचक जोड़ा मे सँ एकटा केँ मारि देलें अछि ।” तुच्छ इरादा (चाहत) सँ, हुनकर श्राप, जे हुनकर तीव्र क्रोध केर परिणाम छल, शब्द सब मे बँटि गेल आ आकार लय लेलक । ऋषि वाल्मीकि केँ अपन भावुकता पर पश्चाताप भेलनि आ ओ एहि पर गहन चिन्तन कयलनि । तखनहि अचानक हुनकर मोन मे एकटा विचार अयलनि । ओ एक ज्ञान-दृष्टि सँ सम्पन्न सन्त छलाह । ओ देखलनि जे हुनकर श्राप अनुष्टुप छन्द मे रचित छल, जेकर चारि गोट पाद छल आ प्रत्येक पाद मे आठ गोट अक्षर छल । ओहि प्रकारे, श्राप रूपी भावना सेहो हुनकर जानि-बुझिकय नहि रहय । ओ आश्चर्यचकित छलथि । ओ महसूस कयलनि जे हुनकर श्रापक एकटा आरो अर्थ छल । ओ जे शिकारी केँ जे श्राप देलनि, ओकर अर्थ एहि प्रकारक सेहो भ’ सकैत छल: “हे लक्ष्मीपति, ई अहाँ केँ अनन्त यश प्रदान करत कियैक तँ अहाँ एकटा सुखी दम्पत्तिक ओहि पुरुष केँ मारि देने रही, जे काम-वासना मे पूरापूरी हेरायल छल ।” एहि तरहें ई श्लोक विष्णुक अवतार श्री राम पर सटीक बैसैत छल । राम कामातुर रावणक वध करबाक लेल अवतार लेने रहथि । मन्दोदरीक संग सुखपूर्वक विवाहित भेलाक बावजूद, रावण काम आ वासना सभक दास छलथि आ आन स्त्री सभक खोज मे रहैत छलथि । वाल्मीकि एहि श्लोकक घटना मे ईश्वरीय शक्ति देखलनि जे हुनका सँ स्वतः प्रस्फुटित भेलनि । स्वयं सृष्टिकर्ता ‘भगवान ब्रह्मा’ सेहो हुनका आश्वस्त कयलथिन तथा ओ यैह अनुष्टुप छन्द मे रामायणक रचना प्रारम्भ कयलनि ।
एतहि सँ वैदिक स्वर सब सँ रहित एकटा श्लोक केर जन्म भेल । ओ एहि बात सँ प्रसन्न भेलाह जे हुनका सौभाग्य सँ सत्यक प्रचार केर साधन प्राप्त भ’ गेल छलन्हि जेकरा लोक सहजता सँ स्मरण कय सकैत छल । विश्वक प्रथम काव्य रचनाक रूप मे, रामकथा केँ ओ अनुष्टुप छन्द मे अतुलनीय सौन्दर्यक संग प्रस्तुत कयलनि । ताहि सँ रामायण केँ आदि-काव्य या प्रथम-काव्य रचना कहल जाइत छैक ।
गद्य केँ बिसरल जा सकैत अछि, ओकरा याद राखब कठिन होइत छैक । कविता केँ याद रखनाय आसान होइत छैक, कियैक तँ ओ छन्द सँ बान्हल रहैत अछि । तेँ प्राचीन काल मे अधिकांश बात सब पद्य मे व्यक्त कयल जाइत छल । जखन मुद्रण केर आविष्कार भेलैक, त हरेक बात केँ स्मृति मे रखनाय आवश्यक भ’ गेल, कियैक तँ ओकरा आसानी सँ पुस्तक सब मे दर्ज कयल जा सकैत छल आ इहि तरहें गद्य शैलीक विकास भेल । लेकिन, अभिव्यक्तिक माध्यम केर रूप मे, कविता अधिक सुरम्य अछि, एहि मे अधिक ओज आर सौन्दर्य अछि ।
रामायणक जन्म पूर्णतः ईश्वरीय कृपा सँ भेल छल कियैक तँ काव्यात्मक अभिव्यक्ति (छन्द) अनजानहि मे उत्पन्न भ’ गेल छल । ई अन्य स्त्रोत्र (स्तुति केर भजन), पुराण, पौराणिक कथा आ काव्य (कविता) केँ श्लोक – पद्य रूप मे लिखबाक आदर्श स्थापित कयलक ।
छन्दक किछु प्रकार
इंद्र वज्र, उपेंद्र वज्र, श्राग्धर आदि स्तोत्र व काव्य सब मे प्रयुक्त अनेक छन्द सब मे सँ किछेक अछि । किछु छन्द बहुत जटिल होइछ आ केवल विद्वानहि टा एकर रचना कय सकैत छथि ।
हम कहलहुँ जे ‘अनुष्टुप’ ओहि छन्दक नाम थिक जाहि मे एक पाद मे आठ टा अक्षर होइत छैक । यदि नौ अक्षर हो त ओकरा ‘बृहती’ कहैत छैक । जेतय एक पाद मे दस टा अक्षर हो ओकरा ‘पङक्ती’ कहैत छैक । ‘त्रिष्टुप’ छन्द मे एक पाद मे ग्यारह अक्षर होइत छैक । ‘जगति’ मे बारह आर एहि प्रकार सँ आगुओ होइत छैक । एहि तरहें, एकटा पाद मे छब्बीस अक्षर धरिक संख्या वला छन्द होइत छैक, जेना कि भुजंग विजृंभितं नामक पद्धति मे ‘उद्कृति’ नामक छन्द मे । एकटा पाद मे २६ अक्षर सँ अधिक केर छन्द केँ दण्डकं कहैत छैक । एतहुओ एकर कतेक प्रकार छैक ।
किछु छन्द सभक नाम सुन्दर, उपयुक्त तथा काव्यात्मक सौन्दर्य सँ ओतप्रोत अछि । एकटा निश्चित छन्दक अक्षर खेलाइत बाघ जेकाँ फाँगैत अछि । एकरा सारदूल विक्रीड़ितम् कहैत छैक । सारदूल एक बाघ थिक । विक्रीड़ित एक नाटक थिक । एहि मे एकटा पाद मे उन्नैस गोट अक्षर होइत छैक आर ई अतिधृति छन्द या तीव्र गतिक एकटा प्रकार छी । प्रत्येक पाद मे अक्षर सभक बारह आर सात केर दुइ समूह मे विभाजित कयल जाइत छैक । जाहि छन्द मे ससरैत साँप जेकाँ ध्वनि होइछ ओकरा भुजंगप्रयतं कहैत छैक । भुजंग साँप थिक । ई जगती छन्दक एकटा प्रकार थिक जाहि मे एकटा पाद मे बारह टा अक्षर होइछ । नियमक अनुसार, सामान्यतः बारह अक्षरक छह आ छह मे समान रूप सँ विभाजित होयब आवश्यक अछि । उदाहरणक लेल, मा-यू-रा-धि-रू-ढं, मा-हा-वा-क्य गू-ढं ।
आदि शंकराचार्यक ‘सौन्दर्य लहरी’ शिखरिणी छन्द मे अछि । एतय प्रत्येक पाद मे सत्रह टा अक्षर होइत छैक (अद्यष्टि ओहि छन्दक सामान्य नाम थिक जाहि मे सत्रह अक्षर होइछ) । यदि सत्रह अक्षर केँ छह आ ग्यारह मे विभाजित कयल जाय, त ओकरा ‘शिखरिणी’ कहैत छैक । एकटा आर छन्द, श्राग्धरा मे, ध्वनिक एहेन गुंजायमान प्रवाह होइछ मानू ध्वनि मुँह मे ठूसि देल गेल हो आ बाढ़िक पानि जेकाँ बाहर निकलि रहल हो । एतय, प्रत्येक पाद केर एक्कैस अक्षर तीन भाग मे विभाजित अछि, जाहि मे प्रत्येक समूह मे सात अक्षर होइछ । शंकराचार्य केर ईश्वर व विष्णु पर वर्णनात्मक स्तोत्र, जेकरा ‘केशादि पाद’ आ ‘पादादि केश’ स्तोत्र कहल जाइत छैक, एहि छन्द मे अछि ।
इंद्र वज्र, जेकर हम पहिनहिं उल्लेख कयने रही, ‘त्रिष्टुप’ छन्दक एकटा प्रकार थिक जेकर एक पाद मे ग्यारह अक्षर होइत छैक । उपेंद्र वज्र मे सेहो एकटा पाद मे ग्यारह अक्षर होइत छैक, मुदा ओ अलग-अलग रूप मे विभाजित होइत छैक । एहि दुनू केँ मिलाकय उपजाति छन्द बनैत अछि जाहि सँ कालिदास अपन ‘कुमार संभवम्’ आरम्भ कयने छथि ।
ई छन्द उत्तर-वैदिक काव्य व स्तोत्र सब सँ सम्बन्धित अछि । वेद मे आबयवला छन्द एहि प्रकारक अछि: गायत्री, उष्णिक, अनुष्टुप, बृहती, पङ्क्ति, त्रिष्टुप, जगती, आदि ।
मंत्रक राजा – गायत्री महामंत्र – केर रचना जाहि छन्द मे कयल गेल अछि, ओकर नाम मंत्रक नामहि पर “गायत्री छंद” राखल गेल अछि ।
सामान्यतः कोनो मंत्र केर नाम ओहि देवताक नाम पर राखल जाइछ जिनका सँ ओ सम्बन्धित रहैत अछि । ‘शिव पंचाक्षरी’, ‘नारायण अष्टाक्षरी’, ‘राम त्रयोदशी’, किछेक मंत्र केर नाम थिक जाहि मे देवताक नामक संग मंत्र केर अक्षर केर संख्या सेहो सम्मिलित रहैत अछि । गायत्री मंत्र केर देवता सविता छथि । गायत्री केवल छन्द केर नाम थिक । परन्तु मंत्रक नाम ओकर छन्द केर आधार पर गायत्री मंत्र राखल गेल अछि । जाहि प्रकारे ध्वनि आर स्वर मे दिव्य शक्ति सब होइत अछि, एना प्रतीत होइछ जे छन्द आ ओकर रचना मे सेहो एनाही होइत छैक ।
हम पहिने कहने रही जे चारि पाद मिलाकय एकटा मंत्र या श्लोक बनैछ, तेँ चाहे ओ मंत्र हो या श्लोक, ओहि मे पाद अवश्य रहैत होयत । लेकिन एहि सामान्य नियम केर विपरीत, गायत्रीक केवल तीन टा पाद अछि । गायत्री तीन पादवाली छन्द केर नाम थिक, जेकर प्रत्येक पाद मे आठ टा अक्षर रहैत छैक, जाहि मे कुल चौबीस अक्षर बनैत अछि । चूँकि एहि मे तीन पाद होइत छैक, तेँ एकरा “त्रिपाद गायत्री” कहल जाइत छैक । गायत्रीक आरो प्रकार सब छैक । ऋग्वेद केर पहिल मंत्र, जे ‘अग्नि मीलाय’ सँ शुरू होइत छैक, गायत्री छन्द मे नहि अछि ।
किछु काव्य ऋचा सब मे, २४ अक्षरवला गायत्री छन्द केँ छह-छह अक्षरवला चारि गोट पाद मे विभाजित कयल गेल छैक ।
सात अक्षरवला प्रत्येक पाद केँ – जाहि सँ कुल अट्ठाईस अक्षर बनैछ – ‘उष्णिक’ कहैत छैक ।
छन्दक लाभ
जखन कोनो मंत्र आकार लय लैत अछि, त ‘शिक्षा’ ओकर ध्वनिक सही उतार-चढ़ाव संगहि सही उच्चारण केँ सुनिश्चित करैत अछि । लेकिन मंत्र केर सही रूप सुनिश्चित करबाक लेल, ‘छन्द’ (छन्दकी गिनती) आवश्यक अछि । मंत्रक रूप कहियो गलत नहीं भ’ सकैछ, कियैक त कोनो ऋषिक परिश्रम सँ ई नहि रचल गेल अछि, बल्कि ई ध्यान मे ऋषि लोकनि केँ प्रकट भेनाय दिव्य (दैविक) कृपाक परिणाम थिक ।
जखन हम सब कोनो वेद सूक्त या मंत्र केर अध्ययन कय रहल होइत छी, तखन छन्द सभक माध्यम सँ टा ई सुनिश्चित होइत अछि जे ओ अपन मूल रूप मे अछि । यदि कोनो मंत्रक अक्षरक गिनती कयला पर ओ सही नहि लगैछ, त हम सब ओहेन लोक सब सँ सही संस्करण पता लगा सकैत छी जे ई जनैत छथि ।
लेकिन, मंत्रक अलावा, जे स्वयं अस्तित्व मे आयल, काव्य रचना मे श्रम करयवला कवि अपन विचार सब केँ श्लोकक रूप मे शब्द मे व्यक्त करय मे केवल छन्दहि द्वारा निर्देशित रहैत छथि । संगीतक लेल समय केर लय केर जे महत्व छैक, श्लोकक लेल छन्दक वैह महत्व छैक । चूँकि एकरा एकटा ढाँचा मे राखल जाइत छैक, तेँ एकरा एकटा पूर्वनिर्धारित आकार या रूप भेटि जाइत छैक । अगर एकरा छन्द मे राखल जाय त एकरा यादो राखब आसान भ’ जाइत छैक ।
केवल छन्दहि टा ई सुनिश्चित कयलक जे वैदिक पाठ केर मूल स्वरूप पूरापूरी अक्षुण्ण रहय, बिना एकहु गोट अक्षर जोड़ने या घटौने । ई उचिते अछि जे वैदिक ध्वनिक संग कोनो छेड़छाड़ नहि कयल जाय । थोड़बो वृद्धि या कमी ओकर आध्यात्मिक सार केँ बिगाड़ि सकैत अछि ।
वेदक चरण (पैर) मंत्रक नासिका (नाक) केर प्रतिनिधित्व करैत अछि
प्रत्येक मंत्र एकटा देवता केँ समर्पित अछि । तेँ, प्रत्येक मंत्रक एकटा अधिष्ठाता देवता होइत छथि । एकरा लेल एकटा विशेष छन्द होइछ आर एकटा ऋषि होइत छथि जे एहि संसार केँ प्रदान कयने छथि । जाहि ऋषि द्वारा एकरा संसारक ज्ञान मे पहुँचायल गेल, वैह मंत्रक ऋषि थिकाह । जखन कोनो मंत्र शुरू करय सँ पहिने ऋषिक नाम जपैत अपन माथा केँ छुबैत अछि, त ई प्रतीकात्मक तौर पर श्रद्धाक प्रतीक केर रूप मे ऋषिक चरण (पैर) केँ अपन माथ पर रखनाय होइत अछि, कियैक तँ मंत्र हमरा सब केँ ऋषिये लोकनिक माध्यम सँ टा प्राप्त भेल अछि ।
जखन हम सब कोनो मंत्र केर छन्द सभक उल्लेख करैत छी, तखन हम सब अपन आंगुर सँ नासिका केँ छुबैत छी । मंत्र केर एकमात्र संरक्षक छन्द थिक । ई ओकर प्राण-श्वास केर स्वरूप थिक । तेँ हम सब प्राण-श्वास केँ नियंत्रित करयवला नासिका केँ छुबैत छी । श्वासक बिना जीवन नहि भ’ सकैछ । तहिना मंत्रक लेल, छन्द श्वास थिक । हालाँकि, यदि वेद केँ समग्र रूप सँ व्यक्त कयल जाय, त ‘शिक्षा’ ओकर नासिका थिक तथा छन्द ओकर चरण थिक ।
जेना हम सब अपन पैर पर ठाढ़ होइत छी, तहिना वेदपुरुष छन्द सब पर ठाढ़ छथि । हम सब पैरक बिना ठाढ़ नहि भ’ सकैत छी । वेदक शरीर छन्दहि पर टिकल रहैछ, जे पैर केर स्वरूप होइछ ।
हरिः हरः!!
The Vedangas Chandas – The Feet of the Vedas
Chandas, which is one of the six limbs of the Vedas, is regarded as the feet of the Veda Purusha. ‘Chandas’ has another meaning. It refers to the Vedas themselves. Lord Krishna refers to the Vedas as leaves of the tree of creation – Chandaansi Yasya Parnaani.
Here I am going to deal with ‘Chandas’ in a different sense meaning ‘metric composition’.
Rig Veda and Saama Veda are wholly in verses. Although Yajus has mantras in prose, they come interspersed with verses. Vedas being mostly in verse-form (Chandas), also came to be known as Chandas.
If we want a coat, the tailor takes our measurements. He cuts and stitches the cloth accordingly. If measurements are not taken, the coat may not fit. Likewise, if our thoughts are to be expressed in poetry, if the thoughts are to assume the image of poetry, and clothed in verse-form, it must have proper measurement. Like a coat being so many inches long and broad, a verse has to have a specified ‘metre’ and number of letters in it, to obtain a good fit. Chandas lays down the rules for this. It defines the boundaries of metrical composition – into metre, rhyme, etc. The important and authoritative book on the subject is the ‘Chandas Sutra’ by Pingala.
As mentioned already the organ which is regarded as the feet of the Veda Purusha is Chandas. Those who have been initiated into Mantra Japa, touch their head, when the name of the Rishi is mentioned, touch their nose when its Chandas or metre is named, and touch the heart when the name of Devata or the presiding deity of the mantra is mentioned.
All the Veda mantras in the form of poetry are ‘Chandas’. The others, i.e., those which are not part of Vedas are called ‘Slokas’. Prose is called ‘Gadya’ and Chandas is called ‘Padya’ in Sanskrit. In English it is poetry. Thus, not only in Vedic poetry called ‘Chandas’ but ‘Chandas’ also refers to the metre or rhyme of any poetic expression which are all rhythmic. Of these metres, ‘Anushtup’ is the one which is extensively used. The Slokas of the Puraanas and Valmiki Ramayana are all in this Anushtup metre. Chandas is thus synonymous with rhyme also.
There are rules as to how many paadas or quartrets or steps are to be in each Vrtta or Stanza and how many letters are to be in each paadaa or line. There is a Chandas called Aarya which has also to take into account the short and long sounds. In this Chandas, the word ‘Rama’ is not reckoned as having two maatras only, viz., ‘Ra’ and ‘ma’. ‘Ra’ is the long sound and counted as two maatras, ‘ma’ which is short as one, total three.
There is another method of calculation for other Vrittas where the long and short sounds are not differentiated and, in each stanza, the number of words in a paada are kept constant.
Paada or Foot
I called Chandas as such being the feet (paada) of the Veda Purusha. The foot is called Paada or Pada in Sanskrit. Also in English, the reckoning is in terms of ‘feet’ in a stanza. The metres in English also stipulate how many letters should there be in each foot. The foot, which denotes the end of the leg, also denotes the unit of division of a stanza. Thus, the foot or pada (or its equivalent) is a common expression in many languages having the same meaning. It is indeed heartening to find, in any field, an example showing a similarity common to all mankind. In a mantra or in a sloka, a paada is a quarter portion of it. In a human anatomy, the organ called ‘leg’ is indeed one fourth part. Half the body is upto the hip; of the remaining half below, each of the two legs is one quarter adding up to ‘half’.
A Veda mantra or even a non-Vedic sloka is generally a quartet. In most cases, these are split into four, using an equal number of letters or equal number of maatras for each paada. Where one paada is not equal to another paada, it is called ‘Vishama’. Vishama is actually Vi-Sama which means not equal or same.
If all the paadas are different in length, it is said to be in ‘Vishama Vrtta’. Every alternate paada being dissimilar is called ‘Ardha Sama Vrtta’. That is, there will be a difference in the number of letters between the first and the second paada as well as between the third and the fourth paada. The second and the fourth Paada will be of equal number of syllables.
However, in most cases the paadas will be equal in length. For example, let us take the most commonly known prayer – sloka: “Suklaambaradharam Vishnum / Sasi Varnam Chaturbhujam / Prasanna Vadanam Dhyaayet / Sarva Vighnopasaantaye”. Let us take the four paadas in it. First, “Suklaambaradharam Vishnum”, second, “Sasi Varnam Chaturbhujam”, third, “Prasanna Vadanam Dhyaayet” and fourth, “Sarva Vignopasaantaye”. If counted, each paada will have only eight syllables – not the letters in English but the syllables in Sanskrit:
शुक्लांबरधरं विष्णुं / शशिवर्णं चतुर्भुजं / प्रसन्न वदनं ध्यायेत् / सर्वविघ्नोपशान्तये /
For counting the Aksharas or syllables only vowels and consonants with vowels imposed thereon are to be taken into account. Pure consonants should be ignored. Only then will the above add up rightly to eight.
Slokas like this, which have four Paadas to a stanza with each paada having eight syllables are said to be in Anushtup Chandas.
The Story of the Birth of the Poetic Chandas
Unlike in the Vedas, where the pitch of the sounds is raised or lowered to produce tonal variations or Swara there is no such method with Kaavya (Poetry) or other slokas. The Anushtup metre of the Vedas with variations in pitch was first adopted by Valmiki but with the variations. He did not do it deliberately or by design. He happened to see a hunter killing one out of a pair of birds. The his great compassion towards the bereaved bird which saw its mate fall dead became transformed into intense anger toward the hunter. He then cursed the hunter thus:
Maanishaada Pratishaam Twamagamah Saaswateessa-maah / Yatkrounchamithunaadekamavadheeh Kaamamohitam
“O hunter, may you not fare well at any time; you who have killed one out of the pair of Krounchas who were happily engaged in love.” With the slighted intention, his curse, which was the result of his great anger, became so worded and got formed. The Sage Valmiki then repented for his emotional outburst and thought deeply over it. Then suddenly an idea struck him. He was a saint who was gifted with divine vision (Gnaana Drshti). He realised that his curse was composed in Anushtup metre with four paadas and each paada having eight syllables. Just as the emotion in the form of a curse was also not of his deliberate making. He was amazed. He realised that his curse had another meaning to it. What he said to the hunter as a curse could well sustain the meaning: “O Lord of Lakshmi, it will bring you eternal glory for having killed the male of a happy couple, who lost his head completely in lust.” This stanza in verse thus fitted Sri Rama, the Avatar of Vishnu perfectly. Rama took Avatar in order to kill the lustful Ravana. Though happily married to Mandodari Ravana was a slave of lust and passions and sought other women. Valmiki saw the divine hand in this incident of the verse which spontaneously burst forth from him. He was assured by ‘Lord Brahma’, the Creator Himself, and he began to compose the Ramayana in the same Anushtrup metre.
It is from here that a Sloka without Vedic Swara (tonal variations) took birth. He rejoiced in the fact that he had fortuitously obtained the means of propagating high truths which people could conveniently commit to memory and remember. As the first ever poetic composition of the world the story of Rama was unfolded by him in incomparable beauty in the Anushtup Metre. Ramayana is, therefore, called Adi-Kavya or the first poetic composition.
Prose is liable to be forgotten, difficult to commit to memory. Poetry is easy to remember as it is bound by metre. That is why in early days, most things were expressed in verse. When printing was invented, it became unnecessary to retain everything in one’s memory, as they could well be recorded in books and so the prose form developed. But, as a vehicle of expression, poetry is more picturesque and has mor e vigour and beauty.
The birth of Ramayana was solely due to the divine grace in that the poetic expression (Chandas) was unwittingly created. This set the pattern for the writing of other strotras (hymns in praise), puraanas, mythology and kaavyas (poenms) in the form of slokas – verse form.
Some Types of Metre
Indra Vajra, Upendra Vajra, Sragdhara etc. are some of the many metres used in stotras and kaavyas. Some are very complicated and can be composed only by those who are learned.
I said that ‘Anushtup’ was the name of the metre where a paada had eight syllables. If there are nine syllables it is called ‘Brihatee’. Where there are ten letters to a paada it is called ‘Pangti’. ‘Trishtup’ metre contains eleven syllable to a paada. Jagati contains twelve and so on. Thus, there are metres containing as many as twenty-six syllables to a paada as in the metre called ‘Udkriti’ in the pattern called Bhujanga Vijrmbhitam. Any metre beyond 26 syllables to a paada is called Dandakam. There are many types here too.
The names of some metres are beautiful, appropriate and infused with poetic grace. The letters in a certain metre go leaping like a tiger at play. This is called Sardoola Vikreeditam. Saardoola is a tiger. Vikreedita is a play. This contains nineteen letters to a paada and is a type of Ati Dhriti metre or fast tempo. Within each paada the syllables are split into two groups of twelve and seven. The metre which sounds like a creeping snake is called Bhujanga Prayatam. Bhujanga is snake. This is one of the types of ‘Jagati’ metre which has twelve letters to a paada. Under the rules, normally it is necessary for the twelve syllables to be equally spil into six and six. For e.g., Ma-yoo-raa-dhi-roo-dham, Ma-ha-vaakya goo-dham.
The Saundarya Lahari of the Adi Sankaracharya is in the Sikarini metre. Here each paada has seventeen syllables (Adyashti is the general name of metres with seventeen syllables to a paada). If the seventeen letters are split into six and eleven, it is called ‘Sikarini’. In Sragdaraa, another metre, there is a resonant flow of sounds as though the sounds are crammed in the mouth and rush out like flood waters. Here, the twenty-one syllables of each paada are split into three with seven letters in each group. Sankaracharya’s descriptive hymns on Iswara and Vishnu called ‘Keshaadi Paada’ and ‘Paadaadi Kesa’ stotras are in this metre.
Indra Vajra which I mentioned earlier is one type of the ‘Trishtup’ metre with eleven syllables in a paada. Upendra Vajra also has eleven syllables to a paada but split differently. Both these, when mixed, form the upajaati metre in which Kalidasa begins his ‘Kumara Sambhavam’.
These metres pertain to the post-Vedic poetry and hymns. The metres which appear in the Vedas are : Gaayatri, Ushnik, Anushtup, Brihati, Pankti, Trishtup, Jagati, etc.
The metre in which the King of mantras – the Gaayati Maha Mantra – is composed is named after the mantra itself as “Gaayatri Chandas”.
Generally a mantra is named after the Devata to whom it pertains. ‘Siva Panchaakshari’, ‘Narayana Ashtaakshari’, ‘Rama Trayodasi’, are the names of some mantras which combine the name of the Devata with the number of syllables in the mantra. The Devata for Gaayatri mantra is Savita. Gaayatri is only the name of the metre. But the mantra has been named after its metre as Gaayatri mantra. Just as sound and swara have divine powers, it would seem that similar is the case with the metre and its composition.
I said earlier that four quarters (feet) make one mantra or sloka and therefore whether it is a mantra or a sloka, it must have found paadas. But contrary to this general rule, Gaayatri has only three paadas. Gayatri is the name of the metre with three paadas with eight syllables in each paada, making a total of twenty-four syllables or Aksharas. Since it has three paadas, it is called “Tripaada Gaayatri”. There are other types of Gaayatri also. The first mantra of the Rig Veda starting with ‘Agni Meelay’ is not in the Gaayatri metre.
In some poetic hymns, the 24-syllable Gaayatri metre is split into four paadas with six letters in each.
Each paada with seven syllables – making a total of twenty eight syllables is called ‘Ushnik’.
The Advantages of Metres
When a mantra has taken form, Siksha ensures its correct pronunciation in the proper pitch and tone. But to ensure that the form of the mantra is correct, the ‘Chandas’ (metre count) is necessary. The form of the mantra cannot go wrong, because is is not composed as a result of the laboured effort of any sage but they are the result of the flash of divine grace revealed to the sages in meditation.
When we are learning a Veda Sukta or mantra, what helps us to make sure that is is in tits original form, is the Chandas. If, on counting the syllables in a mantra are not correct, then we can determine the correct version from those who know.
But, apart from mantras, which came into being by themselves the poets who labour with poetic composition are solely guided by the metre in translating their thoughts in words in the form of slokas. What the beat of time is to music, chandas is to slokas. Because is brought within a framework, it gets a predetermined shape or form. It is also easy to memorise if set to metre.
Chandas alone ensured that the original form of the Vedic text is kept absolutely in tact, without adding or subtracting even one syllable. It is only proper that no liberties are taken with the Vedic sounds. Even a small plus or minus is bound to disturb their spiritual content.
The Feet of the Veda Represent the Nose of the Mantra
Each mantra is dedicated to a Devata. Therefore, each mantra has a presiding deity. There is a chandas especially for it and there is a rishi who gave it to the world. The rishi who brought it to the knowledge of the world is the rishi of the mantra. When one touches his head on repeating the name of the rishi, before starting the mantra, it is symbolically placing the feet of the sage on one’s head as a mark of reverence, because the mantras were made available to us only through the sages.
When we mention the Chandas of a mantra we touch the nose with our finger. The mantra’s sole guardian is the chandas. It is the nature of its life-breath. Hence we touch the nose which controls the life-breath. There can be no life without breath. Similarly for mantras, Chandas is the breath. However, if Veda as a whole is personified, Siksha is its nose and Chandas its feet.
Just as we stand on our legs, the Veda Purusha stands on chandas. We cannot stand up without legs. The body of the Vedas rests on the Chandas which are in the nature of feet.
Harih Harah!!
वेदांग छंद – वेदों के चरण
वेदों के छह अंगों में से एक छंद को वेद पुरुष के चरण माना जाता है । ‘छंद’ का एक और अर्थ है । यह स्वयं वेदों को संदर्भित करता है । भगवान कृष्ण वेदों को सृष्टि के वृक्ष के पत्ते कहते हैं – छन्दांसि यस्य पर्णानि ।
यहाँ मैं ‘छंद’ का एक अलग अर्थ में वर्णन करूँगा जिसका अर्थ है ‘मात्रिक रचना’ ।
ऋग्वेद और सामवेद पूर्णतः पद्य में हैं । यद्यपि यजुर्वेद में गद्य में मंत्र हैं, फिर भी वे छंदों के साथ आते हैं । वेद अधिकांशतः पद्य-रूप (छंद) में होने के कारण छंद भी कहलाते हैं ।
यदि हमें कोट चाहिए होता है, तो दर्जी हमारा नाप लेता है । वह कपड़े को उसी के अनुसार काटता और सिलता है । यदि नाप न लिया जाए, तो कोट शायद फिट न आए । इसी प्रकार, यदि हमारे विचारों को काव्य में अभिव्यक्त करना है, यदि विचारों को काव्य का रूप धारण करना है और पद्य-रूप में ढालना है, तो उसका उचित माप होना आवश्यक है । जिस प्रकार एक कोट कई इंच लंबा और चौड़ा होता है, उसी प्रकार एक पद्य में भी एक निश्चित ‘छंद’ और अक्षरों की संख्या होनी चाहिए, ताकि वह अच्छी तरह से फिट हो सके । छंद इसके लिए नियम निर्धारित करता है । यह छंद रचना की सीमाओं को परिभाषित करता है – छन्द, तुक आदि में । इस विषय पर महत्वपूर्ण और प्रामाणिक ग्रंथ पिंगला द्वारा रचित ‘छंद सूत्र’ है ।
जैसा कि पहले ही उल्लेख किया जा चुका है, वेदपुरुष के पैर माने जाने वाले अंग को छंद कहा जाता है । जो लोग मंत्र जप में दीक्षित हैं, वे ऋषि का नाम लेते समय अपने सिर को छूते हैं, छंद का नाम लेते समय अपनी नासिका को छूते हैं, और देवता या मंत्र के अधिष्ठाता देवता का नाम लेते समय हृदय को छूते हैं ।
काव्य रूप में सभी वेद मंत्र ‘छंद’ हैं । अन्य, अर्थात् वे जो वेदों का भाग नहीं हैं, ‘श्लोक’ कहलाते हैं । संस्कृत में prose को ‘गद्य’ और छंद को ‘पद्य’ कहा जाता है । अंग्रेजी में इसे poetry (काव्य) कहते हैं । इस प्रकार, केवल वैदिक काव्य में ही ‘छंद’ नहीं कहा जाता, बल्कि ‘छंद’ किसी भी काव्यात्मक अभिव्यक्ति के छन्द या तुक को भी दर्शाता है, जो सभी लयबद्ध होते हैं । इन छन्दों में, ‘अनुष्टुप’ का प्रयोग व्यापक रूप से किया जाता है । पुराणों और वाल्मीकि रामायण के सभी श्लोक इसी अनुष्टुप छन्द में हैं । इस प्रकार छंद, तुक का भी पर्याय है ।
प्रत्येक वृत्त या छंद में कितने पद या चौपाइ या चरण होने चाहिए और प्रत्येक पद या पंक्ति में कितने अक्षर होने चाहिए, इसके नियम हैं । आर्य नामक एक छंद है जिसमें ह्रस्व और दीर्घ ध्वनियों का भी ध्यान रखना होता है । इस छंद में, ‘राम’ शब्द में केवल दो मात्राएँ, अर्थात् ‘रा’ और ‘म’, नहीं गिनी जातीं । ‘रा’ दीर्घ ध्वनि है और उसे दो मात्राएँ माना जाता है, ‘म’ जो एक लघु है, कुल तीन ।
अन्य वृत्तों के लिए गणना की एक और विधि है जहाँ दीर्घ और ह्रस्व ध्वनियों में भेद नहीं किया जाता और प्रत्येक छंद में, एक पाद में शब्दों की संख्या स्थिर रखी जाती है ।
पाद या चरण
मैंने छंद को वेदपुरुष के चरण (पाद) के रूप में कहा है । संस्कृत में चरण को पाद या पद कहते हैं । अंग्रेजी में भी, गणना छंद में ‘feet’ के रूप में होती है । अंग्रेजी के छंद यह भी निर्धारित करते हैं कि प्रत्येक चरण में कितने अक्षर होने चाहिए । पाद, जो टांग के अंत को दर्शाता है, छंद के विभाजन की इकाई को भी दर्शाता है । इस प्रकार, पाद या पैर (या इसके समतुल्य) कई भाषाओं में एक समान अर्थ रखने वाला एक सामान्य भाव है । किसी भी क्षेत्र में, सभी मानव जाति में समान समानता दर्शाने वाला एक उदाहरण पाना वास्तव में उत्साहजनक है । किसी मंत्र या श्लोक में पाद उसका एक चौथाई भाग होता है । मानव शरीर रचना विज्ञान में, ‘पैर’ नामक अंग वास्तव में एक चौथाई भाग होता है । शरीर का आधा भाग कूल्हे तक होता है; शेष आधे भाग के नीचे, दोनों पैर एक-चौथाई होते हैं, जो मिलकर ‘आधा’ होता है ।
एक वेद मंत्र या यहाँ तक कि एक अवैदिक श्लोक भी आमतौर पर चौपाई होता है । अधिकांशतः, इन्हें चार भागों में विभाजित किया जाता है, प्रत्येक पाद के लिए समान संख्या में अक्षरों या समान मात्राओं का उपयोग किया जाता है । जहाँ एक पाद दूसरे पाद के बराबर नहीं होता, उसे ‘विषम’ कहते हैं । विषम वास्तव में वि-सम है जिसका अर्थ है समान या एक जैसा नहीं ।
यदि सभी पादों की लंबाई भिन्न हो, तो उसे ‘विषम वृत्त’ कहा जाता है । प्रत्येक दूसरा पाद जो असमान होता है, उसे ‘अर्ध सम वृत्त’ कहते हैं । अर्थात्, पहले और दूसरे पाद के साथ-साथ तीसरे और चौथे पाद के अक्षरों की संख्या में भी अंतर होगा । दूसरे और चौथे पाद में अक्षरों की संख्या समान होगी ।
हालाँकि, अधिकांशतः पादों की लंबाई समान होगी । उदाहरण के लिए, आइए सबसे प्रसिद्ध प्रार्थना – श्लोक लें: “शुक्लाम्बरधरं विष्णुं / शशिवर्णं चतुर्भुजं / प्रसन्न वदनं ध्यायेत् / सर्व विघ्नोपाशान्तये”। इसमें चार पद ले लेते हैं । पहला, “शुक्लाम्बरधरं विष्णुं”, दूसरा, “शशिवर्णं चतुर्भुजं”, तीसरा, “प्रसन्न वदनं ध्यायेत्” और चौथा, “सर्व विघ्नोपशान्तये” । यदि गिनती की जाए तो प्रत्येक पाद में केवल आठ अक्षर होंगे – अंग्रेजी के अक्षर नहीं बल्कि संस्कृत के अक्षर:
शुक्लाम्बरधरं विष्णुं / शशिवर्णं चतुर्भुजं / प्रसन्न वदनं ध्यायेत् / सर्वविघ्नोपशान्तये /
अक्षर या शब्दांशों की गिनती के लिए केवल स्वरों तथा व्यंजन जिनपर स्वरों को लगाया गया हो उनको ही ध्यान में रखा जाना चाहिए । शुद्ध व्यंजनों की उपेक्षा करनी चाहिए । तभी उपरोक्त का योग ठीक-ठीक आठ होगा ।
इस तरह के श्लोक, जिनमें एक छंद में चार पद होते हैं और प्रत्येक पद में आठ अक्षर होते हैं, अनुष्टुप छंद में कहे जाते हैं ।
काव्य छंदों के जन्म की कथा
वेदों के विपरीत, जहाँ स्वरों में परिवर्तन या स्वर उत्पन्न करने के लिए ध्वनियों का स्वर ऊँचा या नीचा किया जाता है, काव्य या अन्य श्लोकों में ऐसी कोई विधि नहीं है । स्वर में परिवर्तन वाली वेदों की अनुष्टुप छन्द को सर्वप्रथम वाल्मीकि ने अपनाया था, लेकिन उसमें विविधताएँ भी थीं । उन्होंने ऐसा जानबूझकर या किसी योजना के तहत नहीं किया था । संयोग से उन्होंने एक शिकारी को पक्षियों के एक जोड़े में से एक को मारते हुए देखा । अपने साथी को मृत देखकर शोकग्रस्त पक्षी के प्रति उनकी अपार करुणा, शिकारी के प्रति तीव्र क्रोध में बदल गई । तब उन्होंने शिकारी को इस प्रकार श्राप दिया:
मा निषाद प्रतिष्ठांत्वमगमश्शाश्वतीसमाः / यत्क्रौञ्जमिथुनादेकमवधीः काममोहितम् /
“हे शिकारी, तुम्हारा कभी भी कल्याण न हो; तुमने प्रेम में लीन क्रौंचों के जोड़े में से एक को मार डाला है ।” तुच्छ इरादे से, उनका श्राप, जो उनके तीव्र क्रोध का परिणाम था, शब्दों में बँट गया और आकार ले लिया । ऋषि वाल्मीकि को अपनी भावुकता पर पश्चाताप हुआ और उन्होंने इस पर गहन चिंतन किया । तभी अचानक उनके मन में एक विचार आया । वे एक ज्ञान-दृष्टि से संपन्न संत थे । उन्होंने देखा कि उनका श्राप अनुष्टुप छंद में रचित था, जिसके चार पाद थे और प्रत्येक पाद में आठ अक्षर थे । उसी प्रकार, श्राप रूपी भावना भी उनकी जानबूझकर नहीं थी । वे आश्चर्यचकित थे । उन्होंने महसूस किया कि उनके श्राप का एक और अर्थ भी था । उन्होंने शिकारी को जो श्राप दिया, उसका अर्थ इस प्रकार हो सकता था: “हे लक्ष्मीपति, यह आपको अनंत यश प्रदान करेगा क्योंकि आपने एक सुखी दंपत्ति के उस पुरुष को मार डाला था, जो काम-वासना में पूरी तरह से खो गया था ।” इस प्रकार यह श्लोक विष्णु के अवतार श्री राम पर सटीक बैठता था । राम ने कामातुर रावण का वध करने के लिए अवतार लिया था । मंदोदरी के साथ सुखपूर्वक विवाहित होने के बावजूद, रावण काम और वासनाओं का दास था और अन्य स्त्रियों की तलाश में रहता था । वाल्मीकि ने इस श्लोक की घटना में ईश्वरीय शक्ति देखी जो उनसे स्वतः प्रस्फुटित हुई । स्वयं सृष्टिकर्ता ‘भगवान ब्रह्मा’ ने उन्हें आश्वस्त किया और उन्होंने उसी अनुष्टुप छन्द में रामायण की रचना प्रारंभ की ।
यहीं से वैदिक स्वरों से रहित एक श्लोक का जन्म हुआ । वे इस बात से प्रसन्न हुए कि उन्हें सौभाग्य से उच्च सत्यों के प्रचार का साधन प्राप्त हो गया था जिसे लोग सहजता से स्मरण कर सकते थे । विश्व की प्रथम काव्य रचना के रूप में, रामकथा को उन्होंने अनुष्टुप छन्द में अतुलनीय सौंदर्य के साथ प्रस्तुत किया । इसलिए रामायण को आदि-काव्य या प्रथम काव्य रचना कहा जाता है ।
गद्य को भुलाया जा सकता है, उसे याद रखना कठिन होता है । कविता को याद रखना आसान होता है क्योंकि वह छंद से बंधी होती है । इसीलिए प्राचीन काल में अधिकांश बातें पद्य में व्यक्त की जाती थीं । जब मुद्रण का आविष्कार हुआ, तो हर बात को स्मृति में रखना अनावश्यक हो गया, क्योंकि उसे आसानी से पुस्तकों में दर्ज किया जा सकता था और इस प्रकार गद्य शैली का विकास हुआ । लेकिन, अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में, कविता अधिक सुरम्य है, उसमें अधिक ओज और सौंदर्य है ।
रामायण का जन्म पूर्णतः ईश्वरीय कृपा से हुआ था क्योंकि काव्यात्मक अभिव्यक्ति (छंद) अनजाने में ही उत्पन्न हो गई थी । इसने अन्य स्त्रोत्रों (स्तुति में भजन), पुराणों, पौराणिक कथाओं और काव्यों (कविताओं) को श्लोकों – पद्य रूप में लिखने का आदर्श स्थापित किया ।
छन्द के कुछ प्रकार
इंद्र वज्र, उपेंद्र वज्र, श्राग्धर आदि स्तोत्रों और काव्यों में प्रयुक्त अनेक छन्दों में से कुछेक हैं । कुछ छन्द बहुत जटिल होते हैं और केवल विद्वान ही इनकी रचना कर सकते हैं ।
मैंने बताया कि ‘अनुष्टुप’ उस छन्द का नाम है जिसमें एक पाद में आठ अक्षर होते हैं । यदि नौ अक्षर हों तो उसे ‘बृहती’ कहते हैं । जहाँ एक पाद में दस अक्षर हों उसे ‘पङक्ती’ कहते हैं । ‘त्रिष्टुप’ छन्द में एक पाद में ग्यारह अक्षर होते हैं । ‘जगति’ में बारह और इसी प्रकार आगे भी । इस प्रकार, एक पाद में छब्बीस अक्षरों तक की संख्या वाला छन्द होता है, जैसे कि भुजंग विजृंभितं नामक पद्धति में ‘उद्कृति’ नामक छन्द में । एक पाद में २६ अक्षरों से अधिक के छन्द को दण्डकं कहते हैं । यहाँ भी इसके कई प्रकार हैं ।
कुछ छन्दों के नाम सुंदर, उपयुक्त और काव्यात्मक सौंदर्य से ओतप्रोत हैं । एक निश्चित छन्द के अक्षर खेलते हुए बाघ की तरह उछलते हैं । इसे सारदूल विक्रीड़ितम् कहते हैं । सारदूल एक बाघ है । विक्रीड़ित एक नाटक है । इसमें एक पाद में उन्नीस अक्षर होते हैं और यह अतिधृति छन्द या तीव्र गति का एक प्रकार है । प्रत्येक पाद में अक्षरों को बारह और सात के दो समूहों में विभाजित किया जाता है । जिस छन्द में रेंगते हुए साँप जैसा ध्वनि होती है उसे भुजंगप्रयतं कहते हैं । भुजंग साँप है । यह जगती छन्द का एक प्रकार है जिसमें एक पाद में बारह अक्षर होते हैं । नियमों के अनुसार, सामान्यतः बारह अक्षरों का छह और छह में समान रूप से विभाजित होना आवश्यक है । उदाहरण के लिए, मा-यू-रा-धि-रू-ढं, मा-हा-वा-क्य गू-ढं ।
आदि शंकराचार्य की सौंदर्य लहरी शिखरिणी छन्द में है । यहाँ प्रत्येक पाद में सत्रह अक्षर होते हैं (अद्यष्टि उन छन्दों का सामान्य नाम है जिनमें सत्रह अक्षर होते हैं) । यदि सत्रह अक्षरों को छह और ग्यारह में विभाजित किया जाए, तो उसे ‘शिखरिणी’ कहते हैं । एक अन्य छन्द, स्राग्धरा में, ध्वनियों का ऐसा गुंजायमान प्रवाह होता है मानो ध्वनियाँ मुख में ठूँस दी गई हों और बाढ़ के पानी की तरह बाहर निकल रही हों । यहाँ, प्रत्येक पाद के इक्कीस अक्षर तीन भागों में विभाजित हैं, जिनमें प्रत्येक समूह में सात अक्षर होते हैं । शंकराचार्य के ईश्वर और विष्णु पर वर्णनात्मक स्तोत्र, जिन्हें ‘केशादि पाद’ और ‘पादादि केश’ स्तोत्र कहा जाता है, इसी छन्द में हैं ।
इंद्र वज्र, जिसका मैंने पहले उल्लेख किया था, ‘त्रिष्टुप’ छन्द का एक प्रकार है जिसके एक पाद में ग्यारह अक्षर होते हैं । उपेंद्र वज्र में भी एक पाद में ग्यारह अक्षर होते हैं, लेकिन वे अलग-अलग रूप में विभाजित होते हैं । इन दोनों को मिलाकर उपजाति छन्द बनता है जिससे कालिदास ने अपना ‘कुमार संभवम्’ आरंभ किया है ।
ये छंद उत्तर-वैदिक काव्य और स्तोत्रों से संबंधित हैं । वेदों में आने वाले छंद इस प्रकार हैं: गायत्री, उष्णिक, अनुष्टुप, बृहती, पंक्ति, त्रिष्टुप, जगती, आदि ।
मंत्रों के राजा – गायत्री महामंत्र – की रचना जिस छंद में की गई है, उसका नाम मंत्र के नाम पर ही “गायत्री छंद” रखा गया है ।
सामान्यतः किसी मंत्र का नाम उस देवता के नाम पर रखा जाता है जिससे वह संबंधित होता है । ‘शिव पंचाक्षरी’, ‘नारायण अष्टाक्षरी’, ‘राम त्रयोदशी’, कुछ मंत्रों के नाम हैं जिनमें देवता के नाम के साथ मंत्र के अक्षरों की संख्या भी सम्मिलित होती है । गायत्री मंत्र के देवता सविता हैं । गायत्री केवल छंद का नाम है । परन्तु मंत्र का नाम उसके छंद के आधार पर गायत्री मंत्र रखा गया है । जिस प्रकार ध्वनि और स्वर में दिव्य शक्तियाँ होती हैं, ऐसा प्रतीत होता है कि छंद और उसकी रचना में भी ऐसा ही है ।
मैंने पहले कहा था कि चार पाद मिलकर एक मंत्र या श्लोक बनाते हैं, इसलिए चाहे वह मंत्र हो या श्लोक, उसमें पाद अवश्य होते होंगे । लेकिन इस सामान्य नियम के विपरीत, गायत्री के केवल तीन पाद हैं । गायत्री तीन पादों वाली छन्द का नाम है, जिसके प्रत्येक पाद में आठ अक्षर होते हैं, जिससे कुल चौबीस अक्षर बनते हैं । चूँकि इसमें तीन पाद होते हैं, इसलिए इसे “त्रिपाद गायत्री” कहा जाता है । गायत्री के अन्य प्रकार भी हैं । ऋग्वेद का पहला मंत्र, जो ‘अग्नि मीलाय’ से शुरू होता है, गायत्री छन्द में नहीं है ।
कुछ काव्य ऋचाओं में, २४ अक्षरों वाली गायत्री छन्द को छह-छह अक्षरों वाले चार पादों में विभाजित किया गया है ।
सात अक्षरों वाले प्रत्येक पाद को – जिससे कुल अट्ठाईस अक्षर बनते हैं – ‘उष्णिक’ कहते हैं ।
छन्दों के लाभ
जब कोई मंत्र आकार ले लेता है, तो शिक्षा उसके सही उतार-चढ़ाव के सही में सही उच्चारण सुनिश्चित करती है । लेकिन मंत्र का सही रूप सुनिश्चित करने के लिए, ‘छन्दें’ (छन्दों की गिनती) आवश्यक है । मंत्र का रूप कभी गलत नहीं हो सकता, क्योंकि यह किसी ऋषि के परिश्रम से नहीं रचा गया है, बल्कि यह ध्यान में ऋषियों पर प्रकट हुई दिव्य कृपा का परिणाम है ।
जब हम किसी वेद सूक्त या मंत्र का अध्ययन कर रहे होते हैं, तो छन्दों के माध्यम से ही यह सुनिश्चित होता है कि वह अपने मूल रूप में है । यदि किसी मंत्र के अक्षरों की गिनती करने पर वे सही नहीं लगते, तो हम उन लोगों से सही संस्करण का पता लगा सकते हैं जो इसे जानते हैं ।
लेकिन, मंत्रों के अलावा, जो स्वयं अस्तित्व में आए, काव्य रचना में श्रम करने वाले कवि अपने विचारों को श्लोकों के रूप में शब्दों में व्यक्त करने में केवल छन्दों द्वारा निर्देशित होते हैं । संगीत के लिए समय की लय का जो महत्व है, श्लोकों के लिए छन्दों का वही महत्व है । चूँकि इसे एक ढाँचे में रखा जाता है, इसलिए इसे एक पूर्वनिर्धारित आकार या रूप मिल जाता है । अगर इसे छन्दों में रखा जाए तो इसे याद रखना भी आसान होता है ।
केवल छन्दों ने ही यह सुनिश्चित किया कि वैदिक पाठ का मूल स्वरूप पूरी तरह अक्षुण्ण रहे, बिना एक भी अक्षर जोड़े या घटाए । यह उचित ही है कि वैदिक ध्वनियों के साथ कोई छेड़छाड़ न की जाए । थोड़ी सी भी वृद्धि या कमी उनके आध्यात्मिक सार को बिगाड़ सकती है ।
वेद के चरण मंत्र की नासिका का प्रतिनिधित्व करते हैं
प्रत्येक मंत्र एक देवता को समर्पित है । इसलिए, प्रत्येक मंत्र का एक अधिष्ठाता देवता होता है । इसके लिए एक विशेष छंद होता है और एक ऋषि होता है जिसने इसे संसार को प्रदान किया । जिस ऋषि ने इसे संसार के ज्ञान में पहुँचाया, वही मंत्र का ऋषि है । जब कोई मंत्र शुरू करने से पहले ऋषि का नाम जपते हुए अपने सिर को छूता है, तो यह प्रतीकात्मक रूप से श्रद्धा के प्रतीक के रूप में ऋषि के चरणों को अपने सिर पर रखना होता है, क्योंकि मंत्र हमें ऋषियों के माध्यम से ही प्राप्त हुए हैं ।
जब हम किसी मंत्र के छंदों का उल्लेख करते हैं, तो हम अपनी उंगली से नासिका को छूते हैं । मंत्र का एकमात्र संरक्षक छंद है । यह उसके प्राण-श्वास का स्वरूप है । इसलिए हम प्राण-श्वास को नियंत्रित करने वाली नासिका को छूते हैं । श्वास के बिना जीवन नहीं हो सकता । इसी प्रकार मंत्रों के लिए, छंद श्वास है । हालाँकि, यदि वेद को समग्र रूप से व्यक्त किया जाए, तो शिक्षा उसकी नासिका है और छंद उसके चरण हैं ।
जैसे हम अपने पैरों पर खड़े होते हैं, वैसे ही वेदपुरुष छंदों पर खड़े हैं । हम पैरों के बिना खड़े नहीं हो सकते । वेदों का शरीर छंदों पर टिका है, जो पैरों के स्वरूप हैं ।
हरिः हरः!!
