वेद पर शोध
ई खेदक विषय थिक जे भारत मे हमरा सब मे सँ बेसीतर लोकक लेल वेदक ज्ञान केर मुख्य स्रोत प्राच्यविद् कहेनिहार विदेशी लोक आर ओकर पदचिन्ह सब पर चलिकय शोध करयवला हमरा लोकनिक विद्वान् सब द्वारा कयल गेल शोध अछि । हम एहि बात सँ सहमत छी जे वेदक ज्ञान केर सम्बन्ध मे विदेशी विद्वान सब वास्तव मे बहुत उपयोगी योगदान देलनि अछि । हमरा सब केँ एकरा स्वीकार करबाक चाही तथा एहि लेल हुनका लोकनिक आभार सेहो व्यक्त करबाक चाही । मैक्स मूलर जेहेन कतेको विद्वान सब वेदक महिमा सँ प्रेरित भ’ कय सामग्री एकत्र कयनाय आ ओकर विश्लेषण करय मे वास्तव मे बहुते परिश्रम कयलनि अछि । ओ सब वेद पर अनेकों ग्रन्थ लिखलनि अछि । २०० वर्ष पूर्व कलकत्ता उच्च न्यायालयक तत्कालीन न्यायाधीश सर विलियम जोन्स द्वारा स्थापित एशियाटिक सोसाइटी द्वारा प्रकाशित प्रकाशन सभक संख्या देखिकय हम सब आश्चर्यचकित रहि जायब । मैक्स मूलर ईस्ट इंडिया कम्पनीक सहायता सँ सायण केर टीका सहित ऋग्वेद व कतेको अन्य हिन्दू धार्मिक ग्रन्थ सब केँ क्रमबद्ध रूप सँ मुद्रित आ प्रकाशित कएने रहथि । अंग्रेज, जर्मन, फ़्रांसीसी आर एतय धरि जे रूसी सब सेहो अपन शोध सब मे कड़ा मेहनत कएने अछि । ओ सब वेद सभक अनुवादक संग-संग वर्तमान सूत्र सब केँ सेहो एकत्रित आ प्रकाशित कयलनि अछि, जे पूरा भारत भरि मे बिखरल अवस्था मे छल ।
एहनो विदेशी सब छथि जे हमरा लोकनिक सांस्कृतिक विरासत केर किछु आर पहलु सभक रक्षा कयलनि अछि । जखन लॉर्ड कर्जन वायसराय रहथि, तखन प्राचीन स्मारक संरक्षण अधिनियम पारित कयल गेल छल । एहि सँ बर्बरता रुकि गेल । फर्ग्यूसन द्वारा शताब्दी भरिक सब मूर्तिकलाक खज़ानाक तस्वीर सब लेल गेल आ हमरा सब केँ ओकर महत्व सँ अवगत करायल गेल । कनिंघम, मॉर्टिमर व्हीलर, सर जॉन मार्शल सब प्रख्यात पुरातत्वविद् भेलाह । मैकेंज़ी देश भरि सँ प्राचीन ताड़पत्र अभिलेख एकत्र कयलनि जेकर बिना हमरा सब अपन किछु शास्त्रक बारे नहि जानि पबितहुँ । ब्रिटिश शासन केर दौराने मे पुरालेखशास्त्र केर एकटा अलग विभाग स्थापित कयल गेल छल । एहि प्रकार सँ विदेशी प्रभुत्व सँ हमरा लोकनिक बहुते लाभ भेल । मुदा एहि सभक संगहि हानि सेहो भेल । भारतविद् आर प्राच्यविद् वैदिक ग्रन्थ सँ लेल गेल सामग्री सँ प्राचीन इतिहास लिखबाक लेल प्रतिबद्ध रहथि आर एहि प्रक्रिया मे, ओ सब आर्य आ द्रविड़ केर ताहि समय धरिक अनसुनल अवधारणा केँ पेश कयलनि, जाहि सँ आपसी द्वेष सभक जन्म भेल । हुनका सभक निष्कर्ष जाहि पर आधारित छल जेकरा ओ सब ‘तर्कसंगतीकरण’ कहैत रहथि, जेकरा मुताबिक इन्द्रिय सभक पहुँच केर बाहरक कोनो चीज़ केँ केवल रूपक टा मानल जा सकैत अछि । एहि सँ हुनका सब केँ प्राचीन ऋषि लोकनिक आधुनि ऋषि सब सँ निम्नतर आदिमानव मनबाक मौका भेटैत छलन्हि । हमरा सभक धार्मिक ग्रन्थक हुनका सभक विश्लेषण ईसाई धर्म केँ एकटा बेहतर धर्म साबित करबाक इच्छा सँ प्रेरित रहनि । एहि दौरान ओ लोकनि निष्पक्ष शोधक दिखावा कयलनि आ एहि प्रक्रिया सँ अपना सभक धर्म केँ बदनाम कयलनि ।
संस्कृत आ हुनका सभक भाषाक बीच समानताक बिन्दु सभक आधार पर, कतेको लोक अपना सभक ग्रन्थ केर अध्ययन केवल तुलनात्मक भाषाविज्ञान केर हित मे कयलनि ।
हम सब हुनका लोकनिक अथक शोध आ वेद केर महानताक प्रचारक वास्ते हुनकर प्रशंसा कय सकैत छी । लेकिन ओ सब वेदक मूल उद्देश्य केँ बिसरि गेलाह, जे वैदिक मंत्रोच्चार केर प्रसार कय केँ आर वैदिक अनुष्ठानक पालन सुनिश्चित कय केँ समग्र ब्रह्मांड केर कल्याण सुनिश्चित करब अछि । एहि दुइ आवश्यक बात केँ दरकिनार करैत, वेदक, जे हुनका सभक पहुँच सँ परे (दूर) छल, मस्तिष्क द्वारा विश्लेषण करबाक प्रयास कयल गेल अछि । जेकरा आम आदमीक शब्द व कर्म मे जीवित शक्तिक रूप मे रहबाक चाही, तेकरा पुस्तकालय सभक आलमारी सब मे सजायल गेल विशाल पुस्तक सब मे दफना देल गेल अछि, जेना संग्रहालय सब मे जीव-जन्तु सब केँ राखल जाइत अछि, जेतय कंकाल आ पुरातन वस्तु सब राखल जाइत अछि ।
वेदक आयु पर शोध गलत
हम विदेशी विद्वान लोकनि केँ एतय एहि लेल अनलहुँ अछि जाहि सँ वेद केँ “अनादि” या वेदक आरम्भ विन्दु नहि हेबाक उपर हुनका सभक दृष्टिकोण केँ प्रस्तुत कय सकी । हुनकर मन एहि तथ्य केँ स्वीकार नहि करैछ हे वेद अनादि अछि । वैज्ञानिक शोध केर निष्पक्षताक माँगक बावजूदो, हुनका सब मे सँ गोटेक लोक हमरा लोकनि पवित्र ग्रन्थक उत्कृष्टता केँ स्वीकार नहि कय सकलाह । किछु आर लोक, जे शायद एतेक प्रेरित नहि रहथि, सामान्य ज्ञान आ न्यायशास्त्र द्वारा लगायल गेल बन्धन सँ उपर उठय मे असमर्थ रहलाह । ‘अनादि’ केर सिद्धान्त केँ स्वीकार करय मे असमर्थ, ‘शिक्षित’ हिन्दु सब सेहो ‘गहन’ शोध करब आवश्यक बुझलनि अछि ।
एहेन शोधक अनुसार, समयक निर्धारण केर दुइ टा विभाग अछि । पहिल खगोल विज्ञानक प्रमाणक माध्यम सँ । दोसर प्रयुक्त भाषाक शैली केर माध्यम सँ । कि ओ सब वेदक आयु निर्धारित करबाक एहि प्रक्रिया सँ कोनो अकाट्य निष्कर्ष धरि पहुँचि सकलाह ? नहि, ओ सब नहि पहुँचि सकलाह । प्रत्येक शोधकर्ताक अपन अलग राय छन्हि । तिलक कहैत छथि जे वेद लगभग ६००० ईसा पूर्व अस्तित्व मे आयल छल । किछु लोक एकर तिथि ३००० ईसा पूर्व मानैत छथि । किछु आर लोक एहि सँ सेहो हाल-सालक समय, लगभग १५०० ईसा पूर्व, केर बारे मे मानैत छथि ।
अन्य धार्मिक ग्रन्थ पर एहि तरहक मतभेद नहि अछि । एहि बात पर एकमत अछि जे बौद्धक त्रिपिटक सम्राट अशोकक काल मे लिखल गेल छल, लेकिन एहि मे निहित बुद्धक शिक्षाएँ अशोक सँ सदियों पहिने, लगभग २५०० वर्ष पूर्व, बुद्धक समय केर अछि । बाइबिलक नव नियम (नया टेस्टामेन्ट) केर तिथि पर सेहो एकमत अछि, जे लगभग २००० वर्ष पूर्वक अछि । सब एहि बात पर सहमत छथि जे कुरानक रचना लगभग १२०० वर्ष पूर्व भेल छल । केवल अपन वेदक मामिला मे टा, एकर आयुक बारे मे निर्णायक प्रमाणक अभाव अछि ।
हम विस्तार सँ बताबय चाहब जे वेदक आयु निर्धारित करबाक दुइ प्रकारक दृष्टिकोण सब सँ हमर कि तात्पर्य छल ।
किछु स्थान पर, वेद मे ग्रह सभक स्थितिक उल्लेख अछि । ग्रह केर ज्योतिषीय संयोगक आधार पर, किछु खगोलीय गणना सब वेदक आयु ६००० ईसा पूर्व या एहि तरहक कोनो अन्य अवधि मे निर्धारित करैत छथि ।
लेकिन, ई केना कहल जा सकैछ जे एहेन ग्रह संयोग केवल ६००० ईसा पूर्वहि टा मे भ’ सकैत छैक, कोनो आन काल मे नहि ? ग्रहक एहेन स्थिति प्राचीन काल मे सेहो भ’ सकैत छल, वर्तमान ब्रह्माण्डक निर्माण केर समय सँ गणना करब तँ दूरक बात भेल । ताराक यैह स्थिति बहुते पहिने सेहो भ’ सकैत छल, एक बेर नहि, बल्कि कतेको बेर । ई केना निर्धारित कयल जाय जे वेद केकर उल्लेख करैत अछि ? ताहि लेल एहेन गणना सब ओहि वेदक संग मेल नहि खाइत अछि जे हमरा सब केँ ओहि ऋषि लोकनि द्वारा देल गेल छल जे समयक सीमा सब सँ परे (दूर) धरि देखि सकैत छलथि । खगोलीय संदर्भ, जेकरा वेद मे निहित आन्तरिक प्रमाण मानल जाइछ, वास्तव मे स्थिति केँ स्पष्ट नहि करैत अछि ।
वेदक आयु निर्धारित करबाक एकटा अन्य तरीका प्रयुक्त भाषाक माध्यम सँ अछि । भाषाक मुख्य घटक शैली व लिपि थिक । भारत मे आइ जे कोनो लिपि सब साक्ष्यक रूप मे उपलब्ध अछि, ओकर उत्पत्ति ब्राह्मी लिपि सँ भेल अछि ।
आइ, सतही तुलना कयला पर एना लगैछ जे तमिल लिपि व देवनागरी लिपिक बीच कोनो सम्बन्ध नहि भ’ सकैछ । लेकिन सुलेख लोकनि जे एकटा तालिका (चार्ट) तैयार कयलनि अछि जे मूल ब्राह्मी लिपि मे हरेक सौ साल मे भेल परिवर्तन सब केँ दर्शाबैत अछि । एहि सँ पता चलैत अछि जे विभिन्न क्षेत्र मे विभिन्न समय पर परिवर्तन भेल अछि तथा, हालाँकि आइ एना लगैछ जे ओहि मे कोनो सामान्य सम्बन्ध नहि छैक, तैयो विभिन्न भाषा सभक लिपि सब एक्के टा लिपि सँ उत्पन्न भेल प्रतीत होइत अछि । हम पहिनहिं हल्का-फुल्का अन्दाज मे सोचैत छलहुँ जे आधुनिक लिपि सब मोंछवला मूल लिपि जेकाँ देखाइत अछि । अगर अहाँ स्वयं चार्ट देखब, तँ अहाँ हमर बात केँ नीक ढंग सँ बुझि पायब । देवनागरी मे ‘उ’ आर ‘ऊ’ अक्षर एकरा स्पष्ट रूप सँ दर्शाबैत अछि । तहिना, तमिल लिपि एना देखाइत अछि मानू मूल लिपि मे सींग उगि आयल हो । पाथर पर उकेरल गेल आ धातु पर उत्कीर्ण प्राचीन राजा सभक शिलालेख व घोषणा सभक अध्ययन सँ समय-समय पर भेल परिवर्तन सब केँ बुझनाय सम्भव अछि । एहि प्रकारे, लिपि कोनो शिलालेख केर आयु निर्धारित करय मे सहायक होइत अछि ।
लेकिन, जहाँ तक वेदका प्रश्न अछि, ई कतहु पाथर पर उत्कीर्ण नहि छल । एहि लेल लिपि द्वारा समय निर्धारित करबाक प्रश्ने नहि उठैछ । शैली (रूप) केर जाँच टा एकमात्र अन्य तरीका बचैत अछि ।
एतहु, शब्द द्वारा निर्मित छवि आर ध्वनि केर बोध पर प्रभाव समय-समय पर बदलैत रहल अछि । तमिल साहित्यक स्वर्ण युग मे प्रचलित कतेको तमिल शब्द आइ चिन्हबा योग्य नहि अछि । यैह स्थिति आनो भाषा सभक संग मे छैक । गोटेक ध्वनि नहि केवल समयक संग क्षीण भ’ गेल अछि, बल्कि ओकर अर्थ सेहो बदलि गेल अछि ।
वेदक बाद केर साहित्य जेकाँ आसानी सँ बुझल नहि जा सकैछ । एहेन परिवर्तन सब भाषा मे देखल जाइत अछि । उदाहरणक लेल, एंग्लो-सैक्सन भाषा – पुरना अंग्रेज़ी – जे १००० वर्ष सँ कमे पुरान अछि – आधुनिक अंग्रेज़ पीढ़ीक लेल आसानी सँ बुझय मे नहि अबैत अछि । अमेरिका मे, अंग्रेज़ी विगत ३०० वर्ष मे अपन रूप एहि हद धरि बदैल लेलक अछि जे आइ एकरा अमेरिकी अंग्रेज़ी केर रूप मे जानल जाइत छैक ।
शोधकर्ता लोकनि शब्दक प्रयोग केर परिणामस्वरूप ओकर ध्वनि मे होयबला क्षरणक दर केर गणना कयलनि अछि । शब्दक अर्थ बदलय मे लागयवला समय केँ ओतबे सटीकता सँ निर्धारित कयनाय सम्भव नहि भ’ सकल अछि ।
तेँ हेतु, एहि शोधकर्ता लोकनि द्वारा वेदक आयुक निर्धारण केवल वेद मे प्रयुक्त ध्वनि या शब्द सब मे भेल परिवर्तनक प्रमाण केर आधार पर कयल गेल अछि । हुनका लोकनिक मुताबिक, कोनो ध्वनि मे उल्लेखनीय परिवर्तन होय मे लगभग २०० वर्ष लगैत छैक । वेद मे वापस जाकय, हुनका मुताबिक, प्रयोग मे नहि आबयवला शब्द सब सँ, ओहि परिवर्तन या उत्परिवर्तन सभक संख्याक अनुमान लगेनाय सम्भव सम्भव अछि जे भेल होयत । एहि प्रकारे, यदि दस बेर परिवर्तन भेल अछि, त एकर अर्थ अछि जे शब्द २००० वर्ष पुरान थिक । यदि वेद मे कोनो शब्द ३० बेर बदलल अछि, त वेदक आयु अधिकतम ४००० वर्ष ईसा पूर्व भ’ सकैछ । अर्थात्, वेद एहि सँ पहिने अस्तित्व मे नहि भ’ सकैत छल, इत्यादि ।
ई सिद्धान्त मूलतः गलत अछि । दैनिक प्रयोग मे आबयवला शब्द सभक ध्वनि (उच्चारण) मे परिवर्तन होइत अछि आर अर्थ सेहो क्षीण भ’ जाइत छैक । यद्यपि वेदक प्रतिदिन पाठ कयल जा सकैत अछि, तैयो सुन्दरता ई छैक जे मूल ध्वनि केर शुद्धता बिना कोनो क्षरणक अक्षुण्ण बनल रहैत छैक । वेद मे प्रत्येक शब्द केर मूल स्वरूपक रक्षाक बहुत ध्यान राखल गेल छैक । ताहि लेल, वैदिक ध्वनि सब मे कोनो परिवर्तन नहि भेलैक, जेना कि ई शोधकर्ता सब मानलनि अछि, दैनिक प्रयोग मे आबयवला शब्द मे भेलैक अछि ।
एहि विद्वान लोकनिक मुताबिक, वेद मे सबसँ पहिने ऋग्वेद आयल; फेर यजु, फेर साम आर अन्त मे अथर्ववेद; आर प्रत्येक वेद मे, ‘संहिता’ पहिल भाग छी; ओकर बाद ब्राह्मण आर अन्त मे आरण्यक । एहि तर्कक आधार पर, शोधकर्ता वेदक आयुक गणना करैत छथि । ओ सब वेदक शब्द सब मे आयल परिवर्तनक तुलना वाल्मीकि केर रामायण, फेर महाभारत आर फेर कालिदासक रचना सब सँ करैत छथि । ओ चाहे जतेको प्रमाण सभक जाँच करथि, एहि मे सँ कोनो प्रमाण उपयोगी नहि भ’ सकैत अछि कियैक तँ ओ मूल आधारक उपेक्षा करैत छथि । ई मानिकय सेहो जे वैदिक शब्द बदैल सकैत अछि, कठोर सुरक्षाक उपायक बादो, एहेन परिवर्तन २०० वर्षक छोट अवधि मे नहि भ’ सकैत अछि । एकटा छोट सन परिवर्तन होय मे सेहो हजारों वर्ष लगतैक । यदि ई मानि लेल जाय जे साहित्य व बोलचालक भाषा मे प्रयुक्त शब्द सभक घिसाव वैदिक शब्द सब पर लागू नहि होइछ, त ई बुझल जायत जे वेदक आयुक गणना गलत अछि ।
हिन्दी नामक एकटा अलग भाषाक स्थापना किछुए शताब्दी पहिने भेल छल । तैयो, ई एकटा बड पैघ क्षेत्र मे पसैर गेल अछि । अपन छोट सन जीवनकाल मे एहि मे कतेको रास परिवर्तन सेहो भेलैक अछि, कियैक तँ ई संस्कृत, उर्दू, फारसी, अंग्रेजी आदि कतेको भाषा सभक शब्द सब केँ अपना मे समाहित कय लेलक अछि । यद्यपि संस्कृत पूरे देश मे (हिन्दीयो सँ बेसी) पसैर गेल छल, तैयो ई बोलचालक भाषा नहि रहल आ एहि वास्ते एहि मे कोनो परिवर्तन नहि भेलैक । जखन एकर साहित्यक संग एना छैक त वैदिक शब्द सब मे, जेकर शुद्धताक पूरा पूरी रक्षा कयल गेल छलैक, ताहि मे कोनो परिवर्तन होयब वास्तव मे दुर्लभ हेतैक । तेँ, शोधकर्ता लोकनिक गणनाक आधार पर, एकटा सामान्य भाषा मे होयवला परिवर्तन मे, वेद केर मामिला मे सम्भवतः एक लाख वर्षहु सँ अधिक समय लगतैक ।
वैदिक ध्वनि केँ ओकर प्राचीन शुद्धता मे बनेने रहबाक कारण ई छैक जे शब्दक सही उच्चारणहि सँ मंत्र अपन शक्ति प्राप्त करैत छैक । कोनो त्रुटि सँ बचबाक लेल, समुदायक एकटा अलग पीढ़ी सँ दोसर पीढ़ी धृि, बेदाग आ अपन मूल रूप मे सुरक्षित रूप सँ हस्तान्तरित करब अपन कर्तव्य बना लेने छल ।
जाबत धरि एहि मूल तथ्य केँ स्वीकार नहि कयल जाइछ, ताबत धरि शोध ई पता नहि लगा सकैत अछि जे वास्तव मे कि भेल छल । जप केर विभिन्न विधि सब एहि बात केर गवाही दैत छैक जे ध्वनिक शुद्धता केर कतेक सफलतापूर्वक संरक्षित कयल गेल अछि ।
Research On Vedas
It is a matter for regret that the main source of the knowledge about the Vedas for most of us in India is the research done by foreigners called orientalists and our scholars who follow in their footsteps and conduct research. I agree that foreign scholars have indeed made very useful contributions concerning the knowledge about the Vedas. We must acknowledge it and thank them for it. Many like Max Muller have really taken great pains to collect material and analyse it as they were inspired by the grandeur of the Vedas. They have written volumes on the Vedas. We would be struck with wonder at the number of publications released by the Asiatic Society, founded over 200 years ago by Sir William Jones, who was then a Judge of the Calcutta High Court. Max Muller, with the aid of the East India Company, had serially printed and released Rig Veda with Saayana’s commentary and also many other Hindu religious texts. Englishmen, Germans, French and even Russians have worked hard with their researches. They have collected and published translations of the Vedas along with the extant aphorisms, which were scattered in parts all over India.
There are foreigners who have also served the cause of some other aspects of our cultural heritage. When Lord Curzon was the viceroy, the Protection of Ancient Monuments Act was enacted. This stopped vandalism. Ferguson took photographs of all sculptural treasures throughout the century and made us aware of their importance. Cunningham, Mortimer Wheeler, Sir John Marshall are all noted archaeologists. Mckenzie gathered ancient palm leaf scrolls from all over the country without which we could not have known about some of our saastras. A separate department of epigraphy was instituted only during the British Rule. Thus a lot of gain accrued to us from foreign domination. But in their wake came losses too. The Indologists and orientalists were committed to writing ancient history from material taken from Vedic texts and, in the process, introduced the till then unheard of concept of Aryans and Dravidians, which created mutual hatred. Their conclusions were based on what they called ‘rationalisation’, according to which anything outside the ken of the sense organs can only be regarded as allegorical. This would permit them to regard the ancient Rishis as primitive men inferior to the moderns. Their analysis of our religious texts was motivated by the desire to show Christianity as a better religion. All the while they kept up the facade of impartial research and, in the process, denigrated our religion.
Nothing the points of similarity between Sanskrit and their language, many studied our texts purely in the interests of comparative philology.
We can admire them for their tenacious research, and the publicity they gave to the greatness of the Vedas. But they missed the essential purpose of the Vedas which is to ensure the well-being of the universe at large by spreading the sound of Vedic chant and ensuring the performance of Vedic rites. Setting aside these two essentials, the Vedas, which are beyond its reach, have been sought to be analysed by the brain. What should subsist as a living force in word and deed of the common man has been entombed in voluminous books adorning the shelves of libraries, like keeping fauna in museums which house skeletons and archaic objects.
Research on the age of the Vedas incorrect
Why I brought in the foreign scholars here is to project their point of view when talking of Vedas as “anaadi” or having no beginning. Their mind does not accept the fact that the Vedas are without beginning. Notwithstanding the impartiality which scientific research demanded, some of them could not tolerate the excellence of our sacred texts. Some others, who were perhaps not so motivated, found themselves unable to rise above the constraints imposed by common sense and syllogism. Unable to accept the theory of ‘without a beginning’, even ‘educated’ Hindus have found it necessary to undertake ‘deep’ research.
According to such research, the determination of the time factor has two aspects. One is through the evidence of astronomy. The other is through the style of the language used. Have they come to any irrefutable conclusion by such process in determining the age of the Vedas? No, they have not. Each researcher has a different opinion. Tilak says that the Vedas came into being around 6000 B.C. Others fix 3000 B.C. as the date. Some other have come to more recent times, as near as 1500 B.C.
There are no such differences of opinion on other religious texts. Opinion is undivided that the Thripitaka of the Buddhists was written during the time of Emperor Asoka but the teachings of Buddha which it contains date back to centuries before Asoka, roughly 2500 years ago, when Buddha lived. There is also unanimity on the date of the New Testament of the Bible which is some 2000 years ago. All agree that the Koran was composed about 1200 years ago. Only in the case of our Vedas, there is lack of conclusive evidence as to its age.
Let me elaborate as to what I meant by two kinds of approaches in determining the age of the Vedas.
At certain places, the Vedas mention the planetary position of stars. Based on the astrological conjunction of planets, the astronomical calculations of some fix the age of the Vedas 6000 B.C. or some other period as per such calculations.
But, how can it be said that such a planetary conjunction can happen in 6000 B.C. only and at no other period in time? Similar positioning of planets could have happened in the hoary past, let alone reckoning from the time which the current Universe was created. The same disposition of stars could have occurred long ago, not once but many times. How to determine which one does the Vedas refer to? Such calculations do not therefore fit in with the Vedas which were given to us by the Rishis who could see beyond the confines of time. The astronomical references which are regarded as the internal evidence contained in the Vedas, do not, in reality, clarify the position.
Another approach to fixing the age of the Vedas is through the language used. The chief constituents of language are style and script. All the scripts which are today in evidence in India owe their origin to the Braahmi script.
Today, it looks on a superficial comparison that there could be no connection between, say, the Tamil script and the Devanagari script. But calligraphists have prepared a chart showing the changes that have taken place in the original Braahmi script every hundred years. This reveals that changes have taken place in various regions at various times and, although, today, it looks as though there is no common link at all, the scripts of the various languages appear to have originated from a common script. I used to think, in a lighter vein, that the modern scripts look like the original with moustaches. If you looked at the chart yourself, you would appreciate what I say better. The letters ‘u’ and ‘oo’ in Devanagari would convincingly illustrate this. Similarly, the Tamil script looks as though the original script has sprouted horns. It is possible to understand the changes which have occurred from time to time from an examination of edicts and proclamations of ancient kings carved in stone and engraved on metal. Thus, the script is helpful in determining the age of an edict.
But, in-so-far as the Vedas are concerned, these were nowhere engraved in stone. The question of the script determining the time does not therefore arise. The only other method left is the examination of the style.
Here again, the image created by words and the impact of sound on understanding have also changed from time to time. Many Tamil words current at the golden age of Tamil literature are today unrecognisable. So is the case with other languages. Some sounds have not only become eroded with age but the meaning has also changed.
Vedas are not as easily understandable as the later day literature. Such shift is noticed in all languages. For example, the Anglo-Saxon language – old English – which is under 1000 years old – cannot be easily understood by the modern generation of Englishmen. In America, English has changed its form within the last 300 years to such an extent that, today, it goes under the changed name of American English.
Researchers have calculated the rate at which erosion takes place in the sound of words as a result of usage. It has not been possible to determine, with equal accuracy, the time it takes for the meaning of words to change.
Therefore, the age of the Vedas has been determined by these researchers solely on the evidence offered by the changes in the sound or words used in the Vedas. According to them it takes roughly about 200 years for a sound to change noticeably. Going back to the Vedas, from words not in use, it is possible according to them to arrive at the number of changes or mutations that must have taken place. Thus, if ten changes have taken place, then it means the word is 2000 years old. If a word in the Vedas had changed 30 times, the age of the Vedas can at best be 4000 B.C. That is, the Vedas could not have existed earlier than that and so on.
This theory is fundamentally incorrect. Words in daily usage undergo changes in sound (pronunciation) and also get corroded in meaning. Although the Vedas may be chanted every day, the beauty is that the purity of the original sound is kept intact unchanged without any erosion. Great care has been taken to safeguard the original form of every word in the Vedas. Therefore, the Vedic sounds did not suffer any mutations as words in everyday use did, as assumed by these researchers.
According to these scholars, amongst the Vedas, the Rig came first; then the Yajus, then the Saama and lastly the Atharva Veda and in every Veda, the ‘Samhitaas’ are the first part; the Braahmanaas next and the Aranyakaas last. So arguing, the researchers calculate the age of the Vedas. They compare the mutations in words from the Vedas to Valmiki’s Ramayana, then to Mahabharata and then to Kalidasa’s works. However much they may examine evidences, none of these can be of any avail as they ignore the basic premises. Even assuming that Vedic words could change, in spite of rigid safeguards, such changes cannot happen in a short span of 200 years. It would take thousands of years for even a small change to take place. If it is conceded that the wear and tear of words in use in literature as well as in the spoken language does not apply to Vedic words, it will be understood that the calculation on the age of the Vedas is incorrect.
The establishment of a separate language called Hindi occurred only a few centuries ago. Even so, it has spread over a large area. It has also undergone many changes during its short life, because it has accepted within its fold words from many languages such as Sanskrit, Urdu, Persian, English and so on. Although Sanskrit had spread (even more than Hindi) all over the country it was not a spoken language and hence did not change. When that is the case with its literature, it would indeed be rare for any changes in Vedic words, whose purity was zealously guarded. Therefore, on the basis of the calculation of the researchers, changes that would take a thousand years to occur in the case of an ordinary language would perhaps take over a hundred thousand years in the case of the Vedas.
The reason why the Vedic sounds have been maintained in their pristine purity is because, only by the correct intonation of words, would the mantras attain their power. Lest any mistake should creep in, a separate dedicated section of the community had made it its business to hand it down safely from one generation to the next, unsullied and in its original form.
Research cannot find out what exactly happened, unless this basic fact is recognised. The various methods of chanting bear testimony to the success with which the purity of the sounds have been guarded.
वेदों पर शोध
यह खेद का विषय है कि भारत में हममें से अधिकांश लोगों के लिए वेदों के ज्ञान का मुख्य स्रोत प्राच्यविद् कहे जाने वाले विदेशियों और उनके पदचिन्हों पर चलकर शोध करने वाले हमारे विद्वानों द्वारा किया गया शोध है । मैं इस बात से सहमत हूँ कि वेदों के ज्ञान के संबंध में विदेशी विद्वानों ने वास्तव में बहुत उपयोगी योगदान दिया है । हमें इसे स्वीकार करना चाहिए और इसके लिए उनका आभार व्यक्त करना चाहिए । मैक्स मूलर जैसे कई विद्वानों ने वेदों की महिमा से प्रेरित होकर सामग्री एकत्र करने और उसका विश्लेषण करने में वास्तव में बहुत परिश्रम किया है । उन्होंने वेदों पर अनेक ग्रंथ लिखे हैं । 200 वर्ष पूर्व कलकत्ता उच्च न्यायालय के तत्कालीन न्यायाधीश सर विलियम जोन्स द्वारा स्थापित एशियाटिक सोसाइटी द्वारा प्रकाशित प्रकाशनों की संख्या देखकर हम आश्चर्यचकित रह जाएँगे । मैक्स मूलर ने ईस्ट इंडिया कंपनी की सहायता से सायण की टीका सहित ऋग्वेद और कई अन्य हिंदू धार्मिक ग्रंथों को क्रमबद्ध रूप से मुद्रित और प्रकाशित किया था । अंग्रेजों, जर्मनों, फ़्रांसीसी और यहाँ तक कि रूसियों ने भी अपने शोधों में कड़ी मेहनत की है । उन्होंने वेदों के अनुवादों के साथ-साथ वर्तमान सूत्रों को भी एकत्रित और प्रकाशित किया है, जो पूरे भारत में बिखरे हुए थे ।
ऐसे विदेशी भी हैं जिन्होंने हमारी सांस्कृतिक विरासत के कुछ अन्य पहलुओं की भी रक्षा की है । जब लॉर्ड कर्जन वायसराय थे, तब प्राचीन स्मारक संरक्षण अधिनियम पारित किया गया था । इससे बर्बरता रुक गई । फर्ग्यूसन ने शताब्दी भर की सभी मूर्तिकला की खज़ानों की तस्वीरें लीं और हमें उनके महत्व से अवगत कराया । कनिंघम, मॉर्टिमर व्हीलर, सर जॉन मार्शल सभी प्रख्यात पुरातत्वविद् हैं । मैकेंज़ी ने देश भर से प्राचीन ताड़पत्र अभिलेख एकत्र किए, जिनके बिना हम अपने कुछ शास्त्रों के बारे में नहीं जान पाते । ब्रिटिश शासन के दौरान ही पुरालेखशास्त्र का एक अलग विभाग स्थापित किया गया था । इस प्रकार विदेशी प्रभुत्व से हमें बहुत लाभ हुआ । लेकिन उनके साथ हानि भी हुई । भारतविद् और प्राच्यविद् वैदिक ग्रंथों से ली गई सामग्री से प्राचीन इतिहास लिखने के लिए प्रतिबद्ध थे और इस प्रक्रिया में, उन्होंने आर्यों और द्रविड़ों की उस समय तक अनसुनी अवधारणा को पेश किया, जिससे आपसी द्वेष पैदा हुआ । उनके निष्कर्ष उस पर आधारित थे जिसे वे ‘तर्कसंगतीकरण’ कहते थे, जिसके अनुसार इंद्रियों की पहुँच से बाहर की किसी भी चीज़ को केवल रूपक ही माना जा सकता है । इससे उन्हें प्राचीन ऋषियों को आधुनिक ऋषियों से निम्नतर आदिमानव मानने का अवसर मिलता था । हमारे धार्मिक ग्रंथों का उनका विश्लेषण ईसाई धर्म को एक बेहतर धर्म साबित करने की इच्छा से प्रेरित था । इस दौरान उन्होंने निष्पक्ष शोध का दिखावा किया और इस प्रक्रिया से हमारे धर्म को बदनाम किया ।
संस्कृत और उनकी भाषा के बीच समानता के बिंदुओं के आधार पर, कई लोगों ने हमारे ग्रंथों का अध्ययन केवल तुलनात्मक भाषाविज्ञान के हित में किया ।
हम उनके अथक शोध और वेदों की महानता के प्रचार के लिए उनकी प्रशंसा कर सकते हैं । लेकिन वे वेदों के मूल उद्देश्य को भूल गए, जो वैदिक मंत्रोच्चार का प्रसार करके और वैदिक अनुष्ठानों का पालन सुनिश्चित करके समग्र ब्रह्मांड का कल्याण सुनिश्चित करना है । इन दो आवश्यक बातों को दरकिनार करते हुए, वेदों का, जो उसकी पहुँच से परे हैं, मस्तिष्क द्वारा विश्लेषण करने का प्रयास किया गया है । जिसे आम आदमी के शब्दों और कर्मों में जीवित शक्ति के रूप में रहना चाहिए, उसे पुस्तकालयों की अलमारियों में सजाए गए विशाल पुस्तकों में दफना दिया गया है, जैसे संग्रहालयों में जीव-जन्तुओं को रखा जाता है, जहां कंकाल और पुरातन वस्तुएं रखी जाती हैं ।
वेदों की आयु पर शोध गलत
मैंने विदेशी विद्वानों को यहाँ इसलिए लाया है ताकि वेदों को “अनादि” या वेदों के आरम्भ विन्दु नहीं होने पर उनके दृष्टिकोण को प्रस्तुत कर सकूँ । उनका मन इस तथ्य को स्वीकार नहीं करता कि वेद अनादि हैं । वैज्ञानिक शोध की निष्पक्षता की माँग के बावजूद, उनमें से कुछ हमारे पवित्र ग्रंथों की उत्कृष्टता को स्वीकार नहीं कर सके । कुछ अन्य, जो शायद इतने प्रेरित नहीं थे, सामान्य ज्ञान और न्यायशास्त्र द्वारा लगाए गए बंधनों से ऊपर उठने में असमर्थ रहे । ‘अनादि’ के सिद्धांत को स्वीकार करने में असमर्थ, ‘शिक्षित’ हिंदुओं ने भी ‘गहन’ शोध करना आवश्यक समझा है ।
ऐसे शोध के अनुसार, समय के निर्धारण के दो पहलू हैं । एक खगोल विज्ञान के प्रमाणों के माध्यम से । दूसरा प्रयुक्त भाषा की शैली के माध्यम से । क्या वे वेदों की आयु निर्धारित करने की इस प्रक्रिया से किसी अकाट्य निष्कर्ष पर पहुँचे हैं ? नहीं, वे नहीं पहुँचे हैं । प्रत्येक शोधकर्ता की अपनी अलग राय है । तिलक कहते हैं कि वेद लगभग ६००० ईसा पूर्व अस्तित्व में आए थे । कुछ लोग इसकी तिथि ३००० ईसा पूर्व मानते हैं । कुछ अन्य लोग इससे भी हाल के समय, लगभग १५०० ईसा पूर्व, के बारे में मानते हैं ।
अन्य धार्मिक ग्रंथों पर इस तरह के मतभेद नहीं हैं । इस बात पर एकमत है कि बौद्धों का त्रिपिटक सम्राट अशोक के काल में लिखा गया था, लेकिन इसमें निहित बुद्ध की शिक्षाएँ अशोक से सदियों पहले, लगभग २५०० वर्ष पूर्व, बुद्ध के समय की हैं । बाइबिल के नए नियम की तिथि पर भी एकमत है, जो लगभग २००० वर्ष पूर्व की है । सभी इस बात पर सहमत हैं कि कुरान की रचना लगभग १२०० वर्ष पूर्व हुई थी । केवल हमारे वेदों के मामले में ही, इसकी आयु के बारे में निर्णायक प्रमाणों का अभाव है ।
मैं विस्तार से बताना चाहूँगा कि वेदों की आयु निर्धारित करने के दो प्रकार के दृष्टिकोणों से मेरा क्या तात्पर्य था ।
कुछ स्थानों पर, वेदों में ग्रहों की स्थिति का उल्लेख है । ग्रहों के ज्योतिषीय संयोग के आधार पर, कुछ खगोलीय गणनाएँ वेदों की आयु ६००० ईसा पूर्व या इसी प्रकार की किसी अन्य अवधि में निर्धारित करती हैं ।
लेकिन, यह कैसे कहा जा सकता है कि ऐसा ग्रह संयोग केवल ६००० ईसा पूर्व में ही हो सकता है, किसी अन्य काल में नहीं ? ग्रहों की ऐसी स्थिति प्राचीन काल में भी हो सकती थी, वर्तमान ब्रह्मांड के निर्माण के समय से गणना करना तो दूर की बात है । तारों की यही स्थिति बहुत पहले भी हो सकती थी, एक बार नहीं, बल्कि कई बार । यह कैसे निर्धारित किया जाए कि वेद किसका उल्लेख करते हैं ? इसलिए ऐसी गणनाएँ उन वेदों के साथ मेल नहीं खातीं जो हमें उन ऋषियों द्वारा दिए गए थे जो समय की सीमाओं से परे देख सकते थे । खगोलीय संदर्भ, जिन्हें वेदों में निहित आंतरिक प्रमाण माना जाता है, वास्तव में स्थिति को स्पष्ट नहीं करते हैं ।
वेदों की आयु निर्धारित करने का एक अन्य तरीका प्रयुक्त भाषा के माध्यम से है । भाषा के मुख्य घटक शैली और लिपि हैं । भारत में आज जो भी लिपियाँ साक्ष्य के रूप में उपलब्ध हैं, उनकी उत्पत्ति ब्राह्मी लिपि से हुई है ।
आज, सतही तुलना करने पर ऐसा लगता है कि तमिल लिपि और देवनागरी लिपि के बीच कोई संबंध नहीं हो सकता । लेकिन सुलेखकों ने एक चार्ट तैयार किया है जो मूल ब्राह्मी लिपि में हर सौ साल में हुए परिवर्तनों को दर्शाता है । इससे पता चलता है कि विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न समयों पर परिवर्तन हुए हैं और, हालाँकि आज ऐसा लगता है कि उनमें कोई सामान्य संबंध नहीं है, फिर भी विभिन्न भाषाओं की लिपियाँ एक ही लिपि से उत्पन्न हुई प्रतीत होती हैं । मैं पहले हल्के-फुल्के अंदाज़ में सोचता था कि आधुनिक लिपियाँ मूंछों वाली मूल लिपि जैसी दिखती हैं । अगर आप स्वयं चार्ट देखें, तो आप मेरी बात को बेहतर ढंग से समझ पाएँगे । देवनागरी में ‘उ’ और ‘ऊ’ अक्षर इसे स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं । इसी प्रकार, तमिल लिपि ऐसी दिखती है मानो मूल लिपि में सींग उग आए हों । पत्थर पर उकेरे गए और धातु पर उत्कीर्ण प्राचीन राजाओं के शिलालेखों और घोषणाओं के अध्ययन से समय-समय पर हुए परिवर्तनों को समझना संभव है । इस प्रकार, लिपि किसी शिलालेख की आयु निर्धारित करने में सहायक होती है ।
लेकिन, जहाँ तक वेदों का प्रश्न है, ये कहीं भी पत्थर पर उत्कीर्ण नहीं थे । इसलिए लिपि द्वारा समय निर्धारित करने का प्रश्न ही नहीं उठता । शैली की जाँच ही एकमात्र अन्य तरीका बचा है ।
यहाँ भी, शब्दों द्वारा निर्मित छवि और ध्वनि का बोध पर प्रभाव समय-समय पर बदलता रहा है । तमिल साहित्य के स्वर्ण युग में प्रचलित कई तमिल शब्द आज पहचानने योग्य नहीं हैं । यही स्थिति अन्य भाषाओं के साथ भी है । कुछ ध्वनियाँ न केवल समय के साथ क्षीण हो गई हैं, बल्कि उनके अर्थ भी बदल गए हैं ।
वेदों को बाद के साहित्य की तरह आसानी से समझा नहीं जा सकता । ऐसा परिवर्तन सभी भाषाओं में देखा जाता है । उदाहरण के लिए, एंग्लो-सैक्सन भाषा – पुरानी अंग्रेज़ी – जो १००० वर्ष से कम पुरानी है – आधुनिक अंग्रेज़ पीढ़ी के लिए आसानी से समझ में नहीं आती । अमेरिका में, अंग्रेज़ी ने पिछले ३०० वर्षों में अपना रूप इस हद तक बदल लिया है कि आज इसे अमेरिकी अंग्रेज़ी के रूप में जाना जाता है ।
शोधकर्ताओं ने शब्दों के प्रयोग के परिणामस्वरूप उनकी ध्वनि में होने वाले क्षरण की दर की गणना की है । शब्दों के अर्थ बदलने में लगने वाले समय को उतनी ही सटीकता से निर्धारित करना संभव नहीं हो पाया है ।
इसलिए, इन शोधकर्ताओं ने वेदों की आयु का निर्धारण केवल वेदों में प्रयुक्त ध्वनि या शब्दों में हुए परिवर्तनों के प्रमाणों के आधार पर किया है । उनके अनुसार, किसी ध्वनि में उल्लेखनीय परिवर्तन होने में लगभग २०० वर्ष लगते हैं । वेदों में वापस जाकर, उनके अनुसार, प्रयोग में न आने वाले शब्दों से, उन परिवर्तनों या उत्परिवर्तनों की संख्या का अनुमान लगाना संभव है जो हुए होंगे । इस प्रकार, यदि दस बार परिवर्तन हुए हैं, तो इसका अर्थ है कि शब्द २००० वर्ष पुराना है । यदि वेदों में कोई शब्द ३० बार बदला है, तो वेदों की आयु अधिकतम ४००० ईसा पूर्व हो सकती है । अर्थात्, वेद इससे पहले अस्तित्व में नहीं हो सकते थे, इत्यादि ।
यह सिद्धांत मूलतः गलत है । दैनिक प्रयोग में आने वाले शब्दों की ध्वनि (उच्चारण) में परिवर्तन होता है और अर्थ भी क्षीण हो जाते हैं । यद्यपि वेदों का प्रतिदिन पाठ किया जा सकता है, फिर भी सुंदरता यह है कि मूल ध्वनि की शुद्धता बिना किसी क्षरण के अक्षुण्ण बनी रहती है । वेदों में प्रत्येक शब्द के मूल स्वरूप की रक्षा का बहुत ध्यान रखा गया है । इसलिए, वैदिक ध्वनियों में कोई परिवर्तन नहीं हुआ, जैसा कि इन शोधकर्ताओं ने माना है, दैनिक प्रयोग में आने वाले शब्दों में हुआ ।
इन विद्वानों के अनुसार, वेदों में सबसे पहले ऋग्वेद आया; फिर यजु:, फिर साम: और अंत में अथर्ववेद; और प्रत्येक वेद में, ‘संहिताएँ’ पहला भाग हैं; उसके बाद ब्राह्मण और अंत में आरण्यक । इस तर्क के आधार पर, शोधकर्ता वेदों की आयु की गणना करते हैं । वे वेदों के शब्दों में आए परिवर्तन की तुलना वाल्मीकि की रामायण, फिर महाभारत और फिर कालिदास की रचनाओं से करते हैं । वे चाहे जितने भी प्रमाणों की जाँच करें, इनमें से कोई भी प्रमाण उपयोगी नहीं हो सकता क्योंकि वे मूल आधारों की उपेक्षा करते हैं । यह मानकर भी कि वैदिक शब्द बदल सकते हैं, कठोर सुरक्षा उपायों के बावजूद, ऐसे परिवर्तन २०० वर्षों की छोटी अवधि में नहीं हो सकते । एक छोटा सा परिवर्तन होने में भी हजारों वर्ष लगेंगे । यदि यह मान लिया जाए कि साहित्य और बोलचाल की भाषा में प्रयुक्त शब्दों का घिसाव वैदिक शब्दों पर लागू नहीं होता, तो यह समझा जाएगा कि वेदों की आयु की गणना गलत है ।
हिंदी नामक एक अलग भाषा की स्थापना कुछ ही शताब्दियों पहले हुई थी । फिर भी, यह एक बड़े क्षेत्र में फैल गई है । अपने छोटे से जीवनकाल में इसमें कई परिवर्तन भी हुए हैं, क्योंकि इसने संस्कृत, उर्दू, फ़ारसी, अंग्रेजी आदि कई भाषाओं के शब्दों को अपने में समाहित कर लिया है । यद्यपि संस्कृत पूरे देश में (हिंदी से भी अधिक) फैल चुकी थी, फिर भी यह बोलचाल की भाषा नहीं थी और इसलिए इसमें कोई परिवर्तन नहीं हुआ । जब इसके साहित्य के साथ ऐसा है, तो वैदिक शब्दों में, जिनकी शुद्धता की पूरी तरह से रक्षा की गई थी, कोई भी परिवर्तन होना वास्तव में दुर्लभ होगा । इसलिए, शोधकर्ताओं की गणना के आधार पर, एक सामान्य भाषा में होने वाले परिवर्तनों में, वेदों के मामले में संभवतः एक लाख वर्ष से भी अधिक समय लगेगा ।
वैदिक ध्वनियों को उनकी प्राचीन शुद्धता में बनाए रखने का कारण यह है कि शब्दों के सही उच्चारण से ही मंत्र अपनी शक्ति प्राप्त करते हैं । किसी भी त्रुटि से बचने के लिए, समुदाय के एक अलग समर्पित वर्ग ने इसे एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक, बेदाग और अपने मूल रूप में सुरक्षित रूप से हस्तांतरित करना अपना कर्तव्य बना लिया था ।
जब तक इस मूल तथ्य को स्वीकार नहीं किया जाता, तब तक शोध यह पता नहीं लगा सकता कि वास्तव में क्या हुआ था । जप की विभिन्न विधियाँ इस बात की गवाही देती हैं कि ध्वनियों की शुद्धता को कितनी सफलतापूर्वक संरक्षित किया गया है ।

1 Comment
Badd neek san fairchha k likh dene chhiyai je paidh k badd neek lagal. Okar parinam je padhne bina rahi nai pabi rahal chhi.
Kichhu byakti samuchit baat bujhne bina kichh san kichh byanbJi karait dekha jait chhathin.
जप केर विभिन्न विधि सब एहि बात केर गवाही दैत छैक जे ध्वनिक शुद्धता केर कतेक सफलतापूर्वक संरक्षित कयल गेल अछि ।
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