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वेदांगः व्याकरण – वेदक मुँह

1393 भ्यूज

वेदांग: व्याकरण

वेदपुरुषक दोसर अंग हुनक मुख अछि । व्याकरण यैह अत्यन्त महत्वपूर्ण अंग थिक ।

व्याकरण पर अनेक ग्रंथ अछि । एहि मे सँ सर्वाधिक प्रचलित ऋषि पाणिनिक व्याकरण अछि । पाणिनिक व्याकरण सूत्र रूप मे अछि । हुनक व्याकरण सूत्र पर वररुचि द्वारा एकटा विस्तृत भाष्य या ‘वार्तिक’ लिखल गेल अछि । ऋषि पतंजलि सेहो एकटा भाष्य लिखने छथि । एहि तीनूक संयुक्त रूप केँ व्याकरण शास्त्र जेहेन महत्वपूर्ण ग्रंथ मानल जाइत अछि ।

अन्य शास्त्र एवं व्याकरण मे अन्तर अछि । अन्य शास्त्र सब मे, सूत्र भाष्य सब सँ अधिक महत्वपूर्ण होइत अछि । व्याकरणक संग एहेन नहि छैक । वार्तिक या विस्तृत भाष्य स्वयं सूत्र सँ अधिक महत्वपूर्ण होइत अछि ।

सूत्र व्याख्यात्मक हेबाक बदला केवल संकेतक होइत छैक । प्रत्येक शास्त्र केर एकटा भाष्य होइत छैक । प्रत्येक भाष्यक एकटा अलग नाम सँ सम्बोधन कयल जाइत छैक जे कि ओकर महत्व केँ दर्शाबैत अछि । जेना कि पहिनहिं उल्लेख कयल जा चुकल अछि, ई (व्याकरण) महाभाष्ट ऋषि पतञ्जलि द्वारा रचित छल ।

व्याकरण आ भगवान शिव

शिव प्रतिमा मे एकटा मंडप भेल करय जेकरा ‘व्याकरण दान मंडप’ कहल जाइत छलैक । शिव केर मंदिर मे व्याकरण दान मंडप कियैक होइत अछि ? विष्णु मंदिर सब मे ई कियैक नहि होइछ ? भाषा एवं शिव, या एना कही जे शिव आ व्याकरण केर बीच कि सम्बन्ध अछि ? दक्षिणामूर्ति केर रूप मे शिव वस्तुतः मौन छथि; बिना कोनो वाणी केँ छथि । हम बुझबैत छी । एकटा श्लोक एहि प्रकारक अछि:

नृत्तावसाने नटराजराजो ननाद ढक्कां नवपञ्चवारं ।
उद्धर्तुकामः सनकादि सिद्धान् एतत् विमर्शो शिवसूत्रजालम् ॥

मौन शिव बिना कोनो गति केँ स्थिर रहैत छथि । जखन ओ ब्रह्मांडीय नृत्य केर अन्त मे ढक्क (डमरू) बजौलनि, त भाषाविज्ञान केर जन्म भेल । यैह उपरोक्त श्लोक केर सार थिक ।

नटराज नृत्य करैत शिव केर नाम छियनि । नटराज ओ छथि जिनकर नृत्य मे कोनो तुलना नहि अछि । ओ ब्रह्मांडीय नृत्य केर राजा छथि । ई महान नृत्य अछि । नटराजक प्रतिमा मे हुनक माथ पर गंगा आर अर्धचंद्रक आकृति जेहेन किछु देखाय दैछ । ई शिव केर जटाक प्रतिनिधित्व करैत अछि; जखन शिव नृत्य करैत आ घूमैत छथि, तँ ई जटा सब सेहो घूमैत अछि । रुकबा बेर मे, लट दुनू दिश पसरि जाइत अछि । एहि क्षण केँ कलाकार सब अपन कल्पना मे कैद करैत छथि आ पाथर या धातु मे गढ़ैत छथि ।

नटराजक हाथ मे ‘ढक्क’ या ‘डमरू’ नामक एकटा छोट ढोल भेटत । ई भ्रमणशील भविष्यवक्ता लोकनिक छोट ढोल सँ कनेक पैघ अछि । जखन शिव नृत्य करैत छथि त ओ नृत्यक लय केर संग डमरू या ढक्क केँ हिलबैत छथि । उपरोक्त श्लोक मे “ननाद ढक्कां” शब्द सँ एकर संकेत भेटैत अछि ।

महत्वपूर्ण वाद्य यंत्र सब केँ तीन टा समूह मे वर्गीकृत कयल जा सकैछ । ओ थिक: (१) चर्म वाद्य अर्थात, ताल वाद्य जाहिमे चमड़ा या खाल केर उपयोग कयल जाइत अछि । जेना, ढक्क, मृदंग, चेंडा (केरल केर), मादल, आदि । (२) तंत्री वाद्य जेना, वीणा व वायलिन जाहिमे तार केर उपयोग होइत अछि; (३) वायुरंध्रवाद्य या वायु वाद्य जेना बांसुरी एवं नादस्वरम् शहनाई आदि, जाहि मे वायु केँ रिक्त स्थान सब सँ बाहर निकालल जाइछ । चर्म वाद्य या ताल वाद्य हाथ सँ या छड़ी सँ बजायल जा सकैत अछि । समापनक समय, ‘चोपु’ नामक तीव्र मुदा सुरीला थाप केर सहारा लेल जाइछ । एहि प्रकार सँ, नृत्यक समापन केर समय, (नृत्त-अवसाने) – ‘चोपु’ केर ध्वनि सुनाय दैत छल, अर्थात् एक प्रकारक स्वर आरोहण (स्वरोत्कर्ष) सुनाइत छल ।

जखन नटराज महान नृत्य करैत छथि, तँ सनक, पतंजलि, व्याघ्रपाद आदि ऋषि आस-पास ठाढ़ भ’ कय आनन्दपूर्वक देखैत छथि । महान ऋषि व द्रष्टा हेबाक कारण ओ लोकनि ओहि नृत्य केँ अपन आँखि सँ देखि सकैत छलथि जेकरा सामान्य मनुष्य नहि देखि सकैछ, कियैक तँ नटराजक नृत्य मात्र दिव्य नेत्र मात्र सँ देखल जा सकैछ । देवता, ऋषि एवं योगी सब अपन तपस्याक बल पर नटराजक नृत्य केँ देखबाक क्षमता प्राप्त कयलनि । दिव्य रूप केँ देखबाक एहि क्षमता केँ भगवद्गीता मे “दिव्य दृष्टि” या ‘दिव्य चक्षु’ कहल गेल छैक ।

सनक आदि ऋषिगण अपन आँखि सँ भगवानक नृत्य केर दर्शनक आनन्द लय रहल छलथि । विष्णु नटराज केर नृत्यक संग विशाल ढोल बजा रहल छलथि । ब्रह्मा नृत्यक गतिक संग ताल बजा रहल छलथि । नृत्य केर विरामक समय ढक्क सँ ‘चोपु’ या अन्तिम चरमोत्कर्ष चौदह अलग-अलग ताल सभक रूप मे शीघ्रता सँ निकलैछ । उपरोक्त श्लोक केर ‘नवपञ्चवारं’ मे एहि नौ आ पाँच ताल यानि चौदह (बेर) केर उल्लेख अछि ।

ढक्क केर समान तालक आधार पर विद्या सभक संख्या चौदह अछि । यदि चौदह विद्या केँ हिन्दू धर्मक आधार कहल जाइछ, त नटराजक डमरू या ढक्क सेहो चौदह विभिन्न ताल या लयबद्ध ध्वनि दैत छल । छन्द कहैत अछि जे चौदह ताल सनक तथा आन-आन ऋषि सब केँ ऊँच स्तर धरि पहुँचेबाक आ आध्यात्मिक रूप सँ आगू विकसित होय मे मदति कयलक । ई सनक व आन के-के छथि ? जाहि मन्दिर मे दक्षिणामूर्ति स्थापित छथि, हम सब दक्षिणामूर्तिक चारू दिश चारि गोट वृद्ध लोक केँ चित्रित देखैत छी । ओ चारि महान ऋषि छथि: सनक, सनंदन, सनातन आ सनत कुमार जिनका आमतौर पर सनकादि (सनक व अन्य) कहल जाइत छन्हि । उत्पन्न भेल चौदह ध्वनि सब एहि ऋषि लोकनिक वास्ते शिव केर रूप केँ प्राप्तिक मार्ग या माध्यम बनि गेलनि । यैह ध्वनि केँ “शिव भक्ति सूत्र” कहल गेल, जाहि पर नन्दिकेश्वर एकटा लिखलनि ।

नृत्य मे उपस्थित लोक सब मे सँ एक गोट ऋषि पाणिनि रहथि । पाणिनिक कथा “कथा सरित सागर” मे वर्णित अछि । पाटलिपुत्र (आधुनिक पटना) मे वर्षोपाध्याय तथा उपवर्षोपाध्याय नामक दुइ व्यक्ति रहैत छलथि । वर्षोपाध्याय ओहि दुनू मे सँ छोट छोट छलथि आर हुनकर पुत्रीक नाम उपकोसला छल । पाणिनि आर वररुचि दुनू वर्षोपाध्यायक अधीन अध्ययन कय रहल छलथि । पाणिनि अपेक्षाकृत एकटा मन्दबुद्धि छात्र छलथि आर ओ पढ़ाइ मे अधिक प्रगति नहि कयने रहथि । तेँ वर्षोपाध्याय हुनका तपस्या करबाक निर्देश दय केँ हिमालय पठा देलनि । ओ तदनुसार तपस्या कयलनि आ शिव केर कृपा प्राप्त कयलनि । हुनका नटराजक नृत्य केँ अपन आँखि सँ देखबाक शक्ति प्राप्त भेलनि ।

ब्रह्मांडीय नृत्यक समापनक समय (डमरू पर) उत्पन्न चौदह ध्वनिक सहायता सँ, भगवान शिव व्याकरण सूत्र सभक नींव रखलनि । चौदह सूत्र केँ पाणिनि कंठस्थ कयलनि तथा ओहिक आधार पर ओ ‘अष्टाध्यायी’ नामक मूल ग्रंथ लिखलनि, कियैक तँ एहि मे आठ गोट अध्याय अछि ।

चौदह सूत्र केँ “महेश्वर सूत्र” कहल जाइछ । ई चौदह सूत्र हम सब श्रावण पूर्णिमा केँ उपाकर्मक समय पढ़ैत छी, जेकरा तमिलनाडु मे “आवणियावित्तम” केर नाम सँ जानल जाइछ ।

एहि प्रकारे, नटराजक डमरूक ध्वनि सँ उत्पन्न महेश्वर सूत्र, शिव मंदिर सब मे व्याकरण मंडप केर आधार बनि गेल ।

व्याकरणक पुस्तक सब

भगवान शिव केँ चंद्रवत्सा, चंद्रशेखर, इंदुशेखर आदि कहल जाइत छन्हि कियैक तँ हुनकर माथा पर चन्द्रमा एक आभूषणक रूप मे अछि । व्याकरण केर दुइ पुस्तक केँ ‘इंदुशेखर’ नाम देल गेल अछि । एकटा “शब्देंदुशेखरम्” अछि । दोसर केँ ‘परिभाषेंदुशेखरम्’ केर नाम सँ जानल जाइछ । यदि कियो लोक व्याकरण मे एहि ग्रन्थ सभक स्तर तक पारंगत अछि, त ओकरा ‘शेखरांत’ तक अध्ययन करयवला कहिकय प्रशंसापूर्वक उल्लेख कयल जाइत छैक ।

जाहि प्रकारे शिक्षा शास्त्र पर लगभग ३० टा पुस्तक सब अछि, ओहि प्रकारे व्याकरण पर सेहो अनेकों पुस्तक सब अछि । लेकिन एहि मे सँ सबसँ प्रसिद्ध पाणिनि केर सूत्र, पतंजलि केर भाष्य तथा वररुचि केर वार्त्तिक अछि, जेना कि पहिनहिं उल्लेख कयल जा चुकल अछि ।

वररुचि राजा विक्रमादित्यक दरबार केर नौ रत्न मे सँ एकटा रत्न रहथि । ओ व्याकरण पर पुस्तक सब लिखने छथि । ओ वार्त्तिक सेहो लिखलनि या नहि, एहि पर मतभेद अछि ।

भर्तृहरिक “वाक्य पद्यम्” सेहो व्याकरण पर महत्वपूर्ण ग्रन्थ मे सँ एक अछि । महत्वपूर्ण व्याकरण ग्रंथ सब केँ “नवव्याकरण” कहल जाइत अछि । एना कहल जाइछ जे एहि नौ ग्रन्थ मे श्री रामजीक महान भक्त श्री हनुमानजी स्वयं सूर्यदेव सँ शिक्षा प्राप्त कएने रहथि । ‘ऐन्द्रम्’ नामक एक ग्रन्थ, जेकर रचयिता स्वयं भगवान इंद्र रहथि, ई ‘तोल्काप्पियम’ नामक तमिल व्याकरण ग्रन्थक आधार मानल जाइत अछि ।

भाषाई अनुसंधान एवं धार्मिक ग्रन्थ

शिक्षा, व्याकरण, छन्द आर निरुक्त, वेदक चारि अंग थिक जे भाषा सँ सम्बन्धित अछि । किछु लोकक ई तर्क भ’ सकैत अछि जे धार्मिक ग्रन्थ सब केँ ईश्वर, पूजा पद्धति, पूजा बनाम ज्ञान, ज्ञानक शब्द सब, अनुशासन, जीवनक नियम सब आदिये धरि सीमित रखबाक चाही, नहि कि भाषा, व्याकरण, ध्वनिविज्ञान आदि धरि ।

वेद शीर्षकक अन्तर्गत, एहेन विषय सभक उल्लेख कयल गेल अछि जे विशुद्ध रूप सँ धर्म सँ सम्बन्धित मानल जाइत छल । जाहि शास्त्र सभक अध्ययन कयल जायत, अर्थात् कल्प, मीमांसा, न्याय, पुराण व धर्मशास्त्र, ओहि मे निश्चित रूप सँ एहेन विषय होयत । लेकिन, बीच मे भाषा, ध्वनि, व्याकरण आदि शास्त्र सेहो आबि गेल अछि, जेकर धर्म सँ कोनो सम्बन्ध नहि अछि । कियैक ? कियैक तँ वैदिक धर्मक अनुसार, सब किछु ईश्वर सँ जुड़ल अछि, आर शुद्ध धर्म सँ सम्बन्धित विषय सब तथा अन्य विषय सब सँ सम्बन्धित विषय सभक बीच कोनो स्पष्ट अन्तर नहि कयल जा सकैछ । तेँ चिकित्सा विज्ञान या आयुर्वेद, जे शारीरिक रोग सब आ ओकर उपचार सँ सम्बन्धित अछि, आर धनुर्विद्या (धनुर्वेद), जे युद्ध मे उपयोगी अछि, केँ सेहो आत्माक विकास केँ प्रभावित करयवला मानल जाइछ आर तेँ एकरा सब केँ चौदह विद्या (या विषय) मे वर्गीकृत कयल गेल अछि । अर्थशास्त्र तथा राजनीति, जेकर उल्लेख अर्थशास्त्र मे कयल गेल अछि, सेहो आत्मविद्याक हिस्सा थिक ।

एकरा धार्मिक ग्रन्थ केर दर्जा देल गेल अछि कियैक तँ ई आत्माक प्राप्तिक मार्ग केर संकेत दैत अछि जाहि मे जीवनक सब पक्ष (पहलू) केर नियमन शामिल अछि ।

शिक्षा, व्याकरण आदि मे अनन्त (परमात्मा) केँ हुनक सब सँ महिमामय अभिव्यक्ति, अर्थात् ध्वनि, मे पाओल जा सकैत अछि । ध्वनि सँ जुड़ल भाषा सभक प्रभाव सँ मोक्ष दिश हमरा लोकनिक प्रगति मे सहायता भेटि सकय, एहि वास्ते शिक्षा व व्याकरणक विकास भेल अछि ।

व्याकरण ‘शब्द ब्रह्म वाद’ केर प्रतिपादन करैछ – ई सिद्धांत जे ध्वनि आ अनन्त (परमात्मा) आपस मे जुड़ल छथि । एकर एकटा शाखा नाद ब्रह्म उपासना थिक – अनन्त में परिणत होयवाली राग केर परम्परा – जे शुद्ध संगीतक आधार छी । जखन ध्वनि सब केँ ठीक सँ बुझल जाइछ आ वाणीक रूप मे प्रयोग कयल जाइछ, त हम सब नहि केवल अपन विचार सब संचार कय सकैत छी, बल्कि आत्म-शुद्धिक लेल सेहो प्रयास कय सकैत छी । एहि दिशा मे, भाषा सँ सम्बन्धित ई विज्ञान सहायक अछि ।

प्राचीन मध्य प्रान्त मे ‘धार’ नामक एकटा राज्य छल, जेकरा स्वतंत्र भारत मे मध्य प्रदेशक नाम सँ जानल जाय लागल । ई ‘धार’ कोनो आर नहि, बल्कि ‘धारा’ रहय, जे सबटा कलाक प्रसिद्ध संरक्षक, राजा भोज केर राजधानी रहय, जे उदारता एवं परोपकारक प्रतीक छल । धारा नगरी मे एकटा मस्जिद अछि । पता चलल जे मस्जिदक एकटा आला (आलय) मे किछु संस्कृत शिलालेख देखाय दय रहल छल । चूँकि ओ स्थान मुसलमान सभक छल आर ओकरा सभक अनुमति बिना कियो ओहि लेखन केँ प्राप्त कयकेँ ओकर जाँच नहि कय सकैत छल, ताहि द्वारे पुरालेख विभाग स्वयं किछु वर्ष धरि ओतय धरि नहि पहुँचि सकल छल । फेर स्वतंत्रता प्राप्तिक गोटेक वर्ष बाद, पुरालेख विभाग केर लोक सब मस्जिदक अधिकारी लोकनि सँ अनुमति प्राप्त कयलनि आर शिलालेख सब मे लिखल लेखनक जाँच कयलनि ।

देवाल पर एकटा विशाल चक्र अंकित छल जाहिपर कतेको श्लोक लिखल गेल छल । ई सब श्लोक व्याकरण पर आधारित छल । सम्पूर्ण व्याकरण शास्त्र पद्य मे लिखल गेल छल आर एकटा चक्रक आकार मे अंकित कयल गेल छल । राजा भोजक समय मे जे सरस्वतीक मन्दिर छल, से आब मस्जिद बनि गेल अछि ।

मूल शिल्पकार व निर्माणकर्ता लोकनिक उद्देश्य स्पष्ट छल; वाणी आ विद्याक देवी सरस्वतीक मन्दिर मे, व्याकरण, जे वेदपुरुषक मुख थिक, केर माध्यम सँ भाषाविज्ञान सदैव विद्यमान रहय । एना कहल जाइछ जे विशाल चक्र पर एक दृष्टि देला मात्र सँ सम्पूर्ण व्याकरण स्पष्ट भ’ जाइत अछि । चूँकि व्याकरण केँ श्रद्धा आ पूजाक वस्तु केर दर्जा प्राप्त रहय, तेँ व्याकरण चक्र केँ एकटा मन्दिर मे स्थापित कयल गेल । मन्दिर केँ मस्जिद बनलाक कतेको वर्षक बाद, वाणीक देवीक कृपा सँ हमरा सब केँ चक्र प्राप्त भेल अछि । पुरालेख विभाग एहि चक्र केँ मुद्रित रूप मे प्रकाशित कयलक हँ । एकर अंग्रेजी मे अनुवाद सेहो कयल गेल अछि ।

एहि सँ ई स्पष्ट अछि जे व्याकरण जेहेन विज्ञान केँ ताहि दिन मे राजा लोकनि आर सरकार सब द्वारा केवल विषय सभक रूप मे पृष्ठभूमि मे नहि ठेलल गेल छल, बल्कि ओकरा एकटा एहेन स्तर धरि उन्नत कयल गेल छल जेतय ओ पूजाक वस्तु बनि गेल छल । एहि सँ अहाँ बुझि सकैत छी जे हमरा लोकनिक देश मे प्राचीनकाल मे भाषाक शुद्धता आ परिष्करण केँ कतेक महत्वपूर्ण मानल जाइत छल ।

हरिः हरः!!

Vedangas: Vyaakarana

The second organ of the Veda Purusha is his mouth. Vayaakarana or grammar is this very important organ.

There are many books on grammar. The one mostly in use is the Vyaakarana of sage Paanini. Paanini’s Vyaakarna is in the form of Sutras or aphorisms. His Vyaakarana Sutras have an elaborate commentary or ‘Vaartika’ by Vararuchi. Sage Patanjali also wrote a Bhaashya or commentary. These three together are regarded as important texts in Vyaakarana Saastra.

There is a difference between other Saastras and Vyaakarana. In the case of others, the Sutras or aphorisms are more important than the Bhaashyas or commentaries. It is not so with Vyaakarana. The Vaartika or detailed commentary is more important than the Sutra itself.

Instead of being explanatory the Sutras are only indicators. Every Saastra has a Bhaashya or commentary. Each one is called by a separate name indicative of what it is the Bhaashya or the great Bhaashya bespeaking of its importance. This Maha-Bhaashya, as already mentioned, was written by Sage Patanjali.

Vyaakarana and Lord Siva 

In Siva stemples, there used to be a mandapa (hall) called the ‘Vyaakarana dana mandapa’. Why does the temple of Siva have a vyaakarana dana mandapa? Why is it not there in the Vishnu temples? What is the connection between language and Siva or for that matter Siva and Grammar? Siva, as Dakshinaamurthi, is in fact silent; without any speech. I will explain. There is a sloka as under:

Nrttaavasaanay Nataraajaraajo Nanaada
Dhakhaam Navapancha Vaaram
Uddhartukaamah Sanakaadi Siddhan
Etat Vimarso Sivaasootra Jaalam.

The silent Siva remains still without any movement or motion. When he at the end of the cosmic dance sounded is Dhakka, the science of language was born. This is the gist of the above sloka.

Nataraaja is the name of the dancing Siva. Nataraja is one who cannot be surpassed in dancing. He is the king of the Cosmic Dance. This is the big dance. In a Nataraaja image one will see something like a projection on his head adorned with a depiction of Ganga and the crescent moon. These represent the matted tresses of Siva; when Siva dances and whirls about, these tresses also whirl. At the moment of stopping, the tresses spread out on either side. This moment is what is caught by the artist in his imagination and sculpted in stone or metal.

A small drum called ‘Dhakka’ or ‘Damaru’ will be found in Nataraaja’s hand. It is slightly bigger than the itinerant fortuneteller’s small hand-drum. When Siva dances he shakes the damaru or dhakka in tune with the rhythm of the dance. This is indicated by the words “Nanaada dhakkaam” in the above slokas.

The important musical instruments can be classified into three groups. They are: (1) Charma Vaadya i.e., percussion instruments where leather or hides are used. e.g. Dhakka, Mrdanga, Chenda (of Kerala), Maddalam, etc., (2) Tantri Vaadya like, Veena and Violin using strings; (3) Vaayu Randravaadya or wind instruments like flute and Nadaswaram clarinet, etc. where air is forced out of spaced-out holes. The Charma Vaadya or the percussion instruments can be played either by hand or using a stick. When bringing it to a close, as a finale brisk but tuned beating called ‘chopu’ is resorted to. Likewise, at the time of concluding the dance, )Nrtta-Avasaanay) – the sound of ‘Chopu’ was heard i.e. a sort of crescendo.

When Nataraaja dances the great dance, sages like Sanaka, Patanjali, Vyaaghrapaada and other stand around and joyfully watch. Being great sages and Seers they could see the dance which ordinary mortals cannot see, with their own eyes because Nataraaja’s dance can only seen by divine eyes. The Gods, Sages and Yogis because of the power of their penance obtained the ability to see Nataraaja’s dance. That ability to see the divine form is called “Divya Drishti” or what is called ‘Divya Chakshus’ in the Bhagavad Gita.

The Sages like Sanaka and other were enjoying the sight of the Lord’s dance through their own eyes. Vishnu was beating the big drum to Nataraaja’s dance. Brahma was keeping time or Tala to the movements. At the moment of the cessation of the dance the ‘chopu’ or the final crescendo comes out of the Dhakka as fourteen different beats in quick succession. The ‘Nava Pancha Vaaram’ of the above sloka has reference to this nine plus five or fourteen (times) beats.

The number of Vidyas are fourteen on the basis of the same number of beats of the Dhakka. If fourteen Vidyas are said to be the foundation of the Hindu Dharma, the damaru or dhakka of Nataraaja also gave fourteen different beats or rhythmic sounds. The stanza says that the fourteen beats helped the Sages like Sanaka and others to reach higher and evolve further spiritually. Who are these Sanaka and others? In temples where Dakshinamurthi is installed, we see depicted around Dakshinamurthi four old people. They are the four great Sages: Sanaka, Sanandana, Sanatana and Sanat Kumara usually referred to as Sanakaadi (Sanaka and others). The fourteen sounds that arose became for these sages the path or medium for the realisation of Siva’s form. The sounds were called the “Siva Bhakti Sutra” on which Nandikeshwara wrote a commentary or Bhaashya.

One of those present at the dance was the Sage Paanini. The story of Paanini is mentioned in Kathaa Sarit-Saagara. In Pataliputra (the modern Patna), there lived two men named Varshopadhyaya and Upavarshopadhyaya. The latter was the younger of the two and his daughter was called Upakosla. Paanini and Vararuchi were both studying under Varshopadhyaya. Paanini was comparatively a dull student and did not make much progress in studies. Therefore, Varshopadhaya sent him to the Himalayas with instructions to practise austerities. He accordingly did penance and was blessed with Siva’s grace. He was blessed with the power to see the dance of Nataraja with his own eyes.

With the aid of the fourteen sounds that were produced (on the damaru) at the time of the conclusion of the cosmic dance, Lord Siva laid the foundation of the Vyaakarana Sutras. The fourteen Sutras were committed to memory by Paanini and on that basis he wrote the basic text called ‘Ashtaadhyaayi’ so called because it contain eight chapters.

The fourteen Sutras are referred to as “Maheswara Sutras”. These fourteen Sutras are recited by us on Sravana Pournima at the time of Upakarma popularly known in Tamil Nadu as “Aavaniavittam”.

Thus the Maheswara Sutras, which originated from Nataraja’s damaru sound, became the foundation of Vyaakarana Mandapas in Siva temples.

Books on Grammar

Lord Siva is called Chandravatamsa, Chandrasekhara, Indusekhara, etc. because He has the moon as an adrnment on His head. Two of the Vyaakarana books bear the ‘Indusekhara’ nomenclature. One is “Sabdendu Sekharam”. The other is known as Paribhaashendu Sekharam. If, in Vyaakarana, one is proficient up to the level of these books he is referred to admiringly as having studied upto ‘Sekharaanta’.

Just as there are some 30 books on Siksha Saastra, there are also a number of books on Vyaakarana. But the most celebrated of these are Paanini’s Sutras, Patanjali’s Bhaashya and Vararuchi’s Vaartika, as already mentioned earlier.

Vararuchi was one of the nine ‘jewels’ in King Vikramaaditya’s court. He has written books on Vyaakarana. Whether he also wrote the Vaartika or not is a matter on which opinion is divided.

Bhatruhari’s “Vaakya Padyam” is also one of the important texts on Vyaakarana. The important grammar texts are referred to as “Navavyaakarana”. These nine were stated to have been mastered by Anjaneya or Hanuman the great devotee of Sri Rama, having received instruction from the Sun God Himself. One of the texts called ‘Aindram’ said to be authored by Lord Indra Himself is believed to be the basis of the Tamil grammar book called ‘Tolkaappiyam’.

Linguistic Reasearch and Religious Text

Siksha, Vyaakarana, Chandas and Nirukta are four of the Vedangas (limbs of the Vedas) that relate to language. It might be contended by some people that religious texts should confine themselves to matters such as God, methods of worship, worship versus knowledge, words of wisdom, disciplines, laws of life and so on and not to language, grammar, phonetics, etc.

Under the caption of Veda, such matters which were considered as purely relating to religion were mentioned. Those that are going to be dealt with, viz., Kalpa, Meemaamsa, Nyaaya, Puraana and Dharma Saastra, will surely contain such matters. But, in between, these sciences of language and phonetics, grammar, etc., which have no connection with religion, have also come up. Why? Because, according to the Vedic religion, everything is connected with God, and there can be no clear-cut distinction between matters pertaining to pure religion and those relating to other subjects. That is why medical science or Ayurveda which deals with bodily ailments and their cure and the science of Archery (Danur Veda) which is useful in war are also regarded as affecting the evolution of the Self and are hence grouped with the fourteen Vidyas (or disciplines). Economics and Politics which are mentioned in Artha Saastra are also part of Aatma Vidya.

These have been assigned the status of religious texts since they indicate the path to the realisation of the self which involves regulating all aspects of life.

In Siksha, Vyaakarana etc. can be found the Infinite in its most glorious manifestation, viz., sound. In order that we may be helped in our progress towards salvation by the influence of languages which is connected with sound, Siksha and Vyaakarana have been evolved.

Vyaakarana propounds the ‘Sabda Brahma Vaada’ – the theory that sound and Infinite are inter-linked. One of its offshoots is the Naada Brahma Upasana – the cult of melody culminating in the Infinite – which is the basis of pure music. When the sounds are properly understood and used as speech, we can not only communicate our thoughts but also strive for self-purification. Towards this end, these sciences relating to language are helpful.

There was a kingdom called ‘Dhar’ in the old Central Provinces which under independent India has come to known as Madhya Pradesh. This ‘Dhar’ was none other than ‘Dhara’, the capital city of King Bhoja, the celebrated patron of all arts, who was a byword for generosity and philanthropy. There is a mosque in the town of Dhara. It came to light that some Sanskrit inscriptions were visible inside a niche in the mosque. Since the place belonged to Muslims and without their consent one could not get and examine the writing, the Epigraphical Department itself could not get at it for a few years. Then some years after the attainment of Independence, men from the Epigraphical Department obtained the permission of the authorities of the mosque and investigated the writing in the inscriptions.

There was a huge wheel depicted on the wall on which were written many verses. These verses were all on Vyaakarana. The entire Vyaakarana Saastra had been written in verse and charted in the form of a wheel. What during the days of King Bhoja was the temple of Sarasvati apparently has now become a mosque.

The intention of the original sculptors and builders was obvious; that in the temple of Sarasvati, the Goddess of speech and learning, the science of language should be always present through Vyaakarana which is the mouth of the Veda Purusha. It is claimed that a mere glance at the giant wheel would make the whole Vyaakarana clear. Since Vyaakarana had the status of an object of reverence and worship, the wheel of Vyakarana was installed in a temple. Many years after the temple became a mosque we have been able to get the Chakra through the grace of the Goddess of Speech. The Department of Epigraphy has published the wheel in print. It has also been translated into English.

From this, it is evident that sciences like the Vyaakarana had not relegated to the background as mere disciplines by Kings and Governments in those days but elevated to a level where they became objects of worship. You can realise from this how purity and refinement in language was considered very important in old times in our country.

Harih Harah!!

वेदांग: व्याकरण

वेदपुरुष का दूसरा अंग उनका मुख है । व्याकरण यह अत्यंत महत्वपूर्ण अंग है ।

व्याकरण पर अनेक ग्रंथ हैं । इनमें से सर्वाधिक प्रचलित ऋषि पाणिनि का व्याकरण है । पाणिनि का व्याकरण सूत्रों के रूप में है । उनके व्याकरण सूत्रों पर वररुचि द्वारा एक विस्तृत भाष्य या ‘वार्तिक’ है । ऋषि पतंजलि ने भी एक भाष्य लिखा था । इन्हीं तीनों के संयुक्त रूप को व्याकरण शास्त्र जैसा महत्वपूर्ण ग्रंथ माना जाता है ।

अन्य शास्त्रों और व्याकरण में अंतर है । अन्य शास्त्रों में, सूत्र भाष्यों से अधिक महत्वपूर्ण होते हैं । व्याकरण के साथ ऐसा नहीं है । वार्तिक या विस्तृत भाष्य स्वयं सूत्र से अधिक महत्वपूर्ण होता है ।

सूत्र व्याख्यात्मक होने के बजाय केवल संकेतक होते हैं । प्रत्येक शास्त्र का एक भाष्य होता है । प्रत्येक भाष्य को एक अलग नाम से पुकारा जाता है जो उसके महत्व को दर्शाता है । जैसा कि पहले ही उल्लेख किया जा चुका है, यह (व्याकरण) महाभाष्य ऋषि पतंजलि द्वारा रचित था ।

व्याकरण और भगवान शिव

शिव प्रतिमाओं में एक मंडप हुआ करता था जिसे ‘व्याकरण दान मंडप’ कहा जाता था । शिव के मंदिर में व्याकरण दान मंडप क्यों होता है ? विष्णु मंदिरों में यह क्यों नहीं होता ? भाषा और शिव, या यूँ कहें कि शिव और व्याकरण के बीच क्या संबंध है ? दक्षिणामूर्ति के रूप में शिव वस्तुतः मौन हैं; बिना किसी वाणी के । मैं समझाऊँगा । एक श्लोक इस प्रकार है:

नृत्तावसाने नटराजराजो ननाद ढक्कां नवपञ्चवारं ।
उद्धर्तुकामः सनकादि सिद्धान् एतत् विमर्शो शिवसूत्रजालम् ॥

मौन शिव बिना किसी गति के स्थिर रहते हैं । जब उन्होंने ब्रह्मांडीय नृत्य के अंत में ढक्क (डमरू) बजाया, तो भाषा विज्ञान का जन्म हुआ । यही उपरोक्त श्लोक का सार है ।

नटराज नृत्य करते शिव का नाम है । नटराज वह हैं जिनका नृत्य में कोई मुकाबला नहीं है । वे ब्रह्मांडीय नृत्य के राजा हैं । यह महान नृत्य है । नटराज की प्रतिमा में उनके सिर पर गंगा और अर्धचंद्र की आकृति जैसा कुछ दिखाई देगा । ये शिव की जटाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं; जब शिव नृत्य करते और घूमते हैं, तो ये जटाएँ भी घूमती हैं । रुकने के क्षण में, लटें दोनों ओर फैल जाती हैं । इसी क्षण को कलाकार अपनी कल्पना में कैद करता है और पत्थर या धातु में गढ़ता है ।

नटराज के हाथ में ‘ढक्क’ या ‘डमरू’ नामक एक छोटा ढोल मिलेगा । यह भ्रमणशील भविष्यवक्ताओं के छोटे ढोल से थोड़ा बड़ा है । जब शिव नृत्य करते हैं तो वे नृत्य की लय के साथ डमरू या ढक्क को हिलाते हैं । उपरोक्त श्लोकों में “ननाद ढक्कां” शब्दों से इसका संकेत मिलता है ।

महत्वपूर्ण वाद्य यंत्रों को तीन समूहों में वर्गीकृत किया जा सकता है । वे हैं: (१) चर्म वाद्य अर्थात, ताल वाद्य जिनमें चमड़े या खाल का उपयोग किया जाता है । जैसे, ढक्क, मृदंग, चेंडा (केरल का), मादल, आदि। (२) तंत्री वाद्य जैसे, वीणा और वायलिन जिसमें तारों का उपयोग होता है; (३) वायुरंध्रवाद्य या वायु वाद्य जैसे बांसुरी और नादस्वरम् शहनाई आदि, जिनमें वायु को रिक्त स्थानों से बाहर निकाला जाता है । चर्म वाद्य या ताल वाद्य हाथ से या छड़ी से बजाए जा सकते हैं । समापन के समय, ‘चोपु’ नामक तीव्र लेकिन सुरीली थाप का सहारा लिया जाता है । इसी प्रकार, नृत्य के समापन के समय, (नृत्त-अवसाने) – ‘चोपु’ की ध्वनि सुनाई देती थी, अर्थात एक प्रकार का स्वर आरोहण (स्वरोत्कर्ष) ।

जब नटराज महान नृत्य करते हैं, तो सनक, पतंजलि, व्याघ्रपाद आदि ऋषि आस-पास खड़े होकर आनंदपूर्वक देखते हैं । महान ऋषि और द्रष्टा होने के कारण वे उस नृत्य को अपनी आँखों से देख सकते थे जिसे सामान्य मनुष्य नहीं देख सकते, क्योंकि नटराज का नृत्य केवल दिव्य नेत्रों से ही देखा जा सकता है । देवताओं, ऋषियों और योगियों ने अपनी तपस्या के बल पर नटराज के नृत्य को देखने की क्षमता प्राप्त की । दिव्य रूप को देखने की इस क्षमता को भगवद्गीता में “दिव्य दृष्टि” या ‘दिव्य चक्षु’ कहा गया है ।

सनक आदि ऋषिगण अपनी आँखों से भगवान के नृत्य के दर्शन का आनंद ले रहे थे । विष्णु नटराज के नृत्य के साथ विशाल ढोल बजा रहे थे । ब्रह्मा नृत्य की गतियों के साथ ताल बजा रहे थे । नृत्य के विराम के समय ढक्क से ‘चोपु’ या अंतिम चरमोत्कर्ष चौदह अलग-अलग तालों के रूप में शीघ्रता से निकलता है । उपरोक्त श्लोक के ‘नवपञ्चवारं’ में इन्हीं नौ और पाँच तालों यानि चौदह (बार) का उल्लेख है ।

ढक्क की समान ताल के आधार पर विद्याओं की संख्या चौदह है । यदि चौदह विद्याओं को हिंदू धर्म का आधार कहा जाता है, तो नटराज का डमरू या ढक्क भी चौदह विभिन्न ताल या लयबद्ध ध्वनियाँ देता था । छंद कहता है कि चौदह तालों ने सनक और अन्य ऋषियों को ऊँचे स्तर तक पहुँचने और आध्यात्मिक रूप से आगे विकसित होने में मदद की । ये सनक और अन्य कौन हैं ? जिन मंदिरों में दक्षिणामूर्ति स्थापित हैं, हम दक्षिणामूर्ति के चारों ओर चार वृद्ध लोगों को चित्रित देखते हैं । वे चार महान ऋषि हैं: सनक, सनंदन, सनातन और सनत कुमार जिन्हें आमतौर पर सनकादि (सनक और अन्य) कहा जाता है । उत्पन्न हुई चौदह ध्वनियाँ इन ऋषियों के लिए शिव के रूप की प्राप्ति का मार्ग या माध्यम बन गईं । इन ध्वनियों को “शिव भक्ति सूत्र” कहा गया, जिस पर नंदिकेश्वर ने एक भाष्य लिखा ।

नृत्य में उपस्थित लोगों में से एक ऋषि पाणिनि थे । पाणिनि की कथा “कथा सरित सागर” में वर्णित है । पाटलिपुत्र (आधुनिक पटना) में वर्षोपाध्याय और उपवर्षोपाध्याय नाम के दो व्यक्ति रहते थे । वर्षोपाध्याय उन दोनों में से छोटे थे और उनकी पुत्री का नाम उपकोसला था । पाणिनि और वररुचि दोनों वर्षोपाध्याय के अधीन अध्ययन कर रहे थे । पाणिनि अपेक्षाकृत एक मंदबुद्धि छात्र थे और उन्होंने पढ़ाई में अधिक प्रगति नहीं की थी । इसलिए वर्षोपाध्याय ने उन्हें तपस्या करने का निर्देश देकर हिमालय भेज दिया । उन्होंने तदनुसार तपस्या की और शिव की कृपा प्राप्त की । उन्हें नटराज के नृत्य को अपनी आँखों से देखने की शक्ति प्राप्त हुई ।

ब्रह्मांडीय नृत्य के समापन के समय (डमरू पर) उत्पन्न चौदह ध्वनियों की सहायता से, भगवान शिव ने व्याकरण सूत्रों की नींव रखी । चौदह सूत्रों को पाणिनि ने कंठस्थ किया और उसी के आधार पर उन्होंने ‘अष्टाध्यायी’ नामक मूल ग्रंथ लिखा, क्योंकि इसमें आठ अध्याय हैं ।

चौदह सूत्रों को “महेश्वर सूत्र” कहा जाता है । ये चौदह सूत्र हम श्रावण पूर्णिमा को उपाकर्म के समय पढ़ते हैं, जिसे तमिलनाडु में “आवणियावित्तम” के नाम से जाना जाता है ।

इस प्रकार, नटराज के डमरू की ध्वनि से उत्पन्न महेश्वर सूत्र, शिव मंदिरों में व्याकरण मंडपों का आधार बन गए ।

व्याकरण की पुस्तकें

भगवान शिव को चंद्रवत्सा, चंद्रशेखर, इंदुशेखर आदि कहा जाता है क्योंकि उनके सिर पर चंद्रमा एक आभूषण के रूप में है । व्याकरण की दो पुस्तकों को ‘इंदुशेखर’ नाम दिया गया है । एक “शब्देंदुशेखरम्” है । दूसरे को ‘परिभाषेंदुशेखरम्’ के नाम से जाना जाता है । यदि कोई व्याकरण में इन ग्रंथों के स्तर तक पारंगत है, तो उसे ‘शेखरांत’ तक अध्ययन करने वाला कहकर प्रशंसापूर्वक उल्लेख किया जाता है ।

जिस प्रकार शिक्षा शास्त्र पर लगभग ३० पुस्तकें हैं, उसी प्रकार व्याकरण पर भी अनेक पुस्तकें हैं । लेकिन इनमें से सबसे प्रसिद्ध पाणिनि के सूत्र, पतंजलि के भाष्य और वररुचि की वार्त्तिक हैं, जैसा कि पहले ही उल्लेख किया जा चुका है ।

वररुचि राजा विक्रमादित्य के दरबार के नौ रत्नों में से एक थे । उन्होंने व्याकरण पर पुस्तकें लिखी हैं । उन्होंने वार्त्तिक भी लिखी या नहीं, इस पर मतभेद हैं ।

भर्तृहरि का “वाक्य पद्यम्” भी व्याकरण पर महत्वपूर्ण ग्रंथों में से एक है । महत्वपूर्ण व्याकरण ग्रंथों को “नवव्याकरण” कहा जाता है । ऐसा कहा जाता है कि इन नौ ग्रंथों में श्री राम के महान भक्त हनुमान जी ने स्वयं सूर्य देव से शिक्षा प्राप्त की थी । ‘ऐन्द्रम्’ नामक एक ग्रंथ, जिसके रचयिता स्वयं भगवान इंद्र थे, यह ‘तोल्काप्पियम’ नामक तमिल व्याकरण ग्रंथ का आधार माना जाता है ।

भाषाई अनुसंधान और धार्मिक ग्रंथ

शिक्षा, व्याकरण, छंद और निरुक्त, वेदों के चार अंग हैं जो भाषा से संबंधित हैं । कुछ लोगों का यह तर्क हो सकता है कि धार्मिक ग्रंथों को ईश्वर, पूजा पद्धतियों, पूजा बनाम ज्ञान, ज्ञान के शब्दों, अनुशासन, जीवन के नियमों आदि तक ही सीमित रखना चाहिए, न कि भाषा, व्याकरण, ध्वनिविज्ञान आदि तक ।

वेद शीर्षक के अंतर्गत, ऐसे विषयों का उल्लेख किया गया है जिन्हें विशुद्ध रूप से धर्म से संबंधित माना जाता था । जिन शास्त्रों का अध्ययन किया जाएगा, अर्थात् कल्प, मीमांसा, न्याय, पुराण और धर्मशास्त्र, उनमें निश्चित रूप से ऐसे विषय होंगे । परन्तु, बीच में भाषा, ध्वनि, व्याकरण आदि शास्त्र भी आ गए हैं, जिनका धर्म से कोई संबंध नहीं है । क्यों ? क्योंकि वैदिक धर्म के अनुसार, सब कुछ ईश्वर से जुड़ा है, और शुद्ध धर्म से संबंधित विषयों और अन्य विषयों से संबंधित विषयों के बीच कोई स्पष्ट अंतर नहीं किया जा सकता । इसीलिए चिकित्सा विज्ञान या आयुर्वेद, जो शारीरिक रोगों और उनके उपचार से संबंधित है, और धनुर्विद्या (धनुर्वेद), जो युद्ध में उपयोगी है, को भी आत्मा के विकास को प्रभावित करने वाला माना जाता है और इसीलिए इन्हें चौदह विद्याओं (या विषयों) में वर्गीकृत किया गया है । अर्थशास्त्र और राजनीति, जिनका उल्लेख अर्थशास्त्र में किया गया है, भी आत्म विद्या का हिस्सा हैं ।

इन्हें धार्मिक ग्रंथों का दर्जा दिया गया है क्योंकि ये आत्मा की प्राप्ति के मार्ग का संकेत देते हैं जिसमें जीवन के सभी पहलुओं का नियमन शामिल है ।

शिक्षा, व्याकरण आदि में अनंत को उसकी सबसे महिमामय अभिव्यक्ति, अर्थात् ध्वनि, में पाया जा सकता है । ध्वनि से जुड़ी भाषाओं के प्रभाव से मोक्ष की ओर हमारी प्रगति में सहायता मिल सके, इसके लिए शिक्षा और व्याकरण का विकास हुआ है ।

व्याकरण ‘शब्द ब्रह्म वाद’ का प्रतिपादन करता है – यह सिद्धांत कि ध्वनि और अनन्त (परमात्मा) आपस में जुड़े हुए हैं । इसकी एक शाखा नाद ब्रह्म उपासना है – अनंत में परिणत होने वाली राग की परंपरा – जो शुद्ध संगीत का आधार है । जब ध्वनियों को ठीक से समझा जाता है और वाणी के रूप में प्रयोग किया जाता है, तो हम न केवल अपने विचारों का संचार कर सकते हैं, बल्कि आत्म-शुद्धि के लिए भी प्रयास कर सकते हैं । इस दिशा में, भाषा से संबंधित ये विज्ञान सहायक हैं ।

प्राचीन मध्य प्रांत में ‘धार’ नामक एक राज्य था, जिसे स्वतंत्र भारत में मध्य प्रदेश के नाम से जाना जाने लगा । यह ‘धार’ कोई और नहीं, बल्कि ‘धारा’ थी, जो सभी कलाओं के प्रसिद्ध संरक्षक, राजा भोज की राजधानी थी, जो उदारता और परोपकार के प्रतीक थे । धारा नगरी में एक मस्जिद है । पता चला कि मस्जिद के एक आले में कुछ संस्कृत शिलालेख दिखाई दे रहे थे । चूँकि वह स्थान मुसलमानों का था और उनकी अनुमति के बिना कोई भी उस लेखन को प्राप्त करके उसकी जाँच नहीं कर सकता था, इसलिए पुरालेख विभाग स्वयं कुछ वर्षों तक उस तक नहीं पहुँच सका । फिर स्वतंत्रता प्राप्ति के कुछ वर्षों बाद, पुरालेख विभाग के लोगों ने मस्जिद के अधिकारियों से अनुमति प्राप्त की और शिलालेखों में लिखे लेखन की जाँच की ।

दीवार पर एक विशाल चक्र अंकित था जिस पर कई श्लोक लिखे हुए थे । ये सभी श्लोक व्याकरण पर आधारित थे । संपूर्ण व्याकरण शास्त्र पद्य में लिखा गया था और एक चक्र के आकार में अंकित किया गया था । राजा भोज के काल में जो सरस्वती का मंदिर था, वह अब मस्जिद बन गया है ।

मूल शिल्पकारों और निर्माणकर्ताओं का उद्देश्य स्पष्ट था; वाणी और विद्या की देवी सरस्वती के मंदिर में, व्याकरण, जो वेदपुरुष का मुख है, के माध्यम से भाषा विज्ञान सदैव विद्यमान रहे । ऐसा कहा जाता है कि विशाल चक्र पर एक दृष्टि डालने मात्र से ही संपूर्ण व्याकरण स्पष्ट हो जाता है । चूँकि व्याकरण को श्रद्धा और पूजा की वस्तु का दर्जा प्राप्त था, इसलिए व्याकरण चक्र को एक मंदिर में स्थापित किया गया । मंदिर के मस्जिद बनने के कई वर्षों बाद, वाणी की देवी की कृपा से हमें चक्र प्राप्त हुआ है । पुरालेख विभाग ने इस चक्र को मुद्रित रूप में प्रकाशित किया है । इसका अंग्रेजी में अनुवाद भी किया गया है ।

इससे यह स्पष्ट है कि व्याकरण जैसे विज्ञानों को उन दिनों राजाओं और सरकारों द्वारा केवल विषयों के रूप में पृष्ठभूमि में नहीं धकेला गया था, बल्कि उन्हें एक ऐसे स्तर तक उन्नत किया गया था जहाँ वे पूजा की वस्तु बन गए थे । इससे आप समझ सकते हैं कि हमारे देश में प्राचीन काल में भाषा की शुद्धता और परिष्करण को कितना महत्वपूर्ण माना जाता था ।

हरिः हरः!!

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