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वेद अनन्त अछि – ज्ञानक अन्त नहि (अत्यन्त मननीय पाठ)

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वेद अनन्त अछि

यदि सम्पूर्ण सृष्टि आ सृष्टि सँ पहिने या बाद के जेहो किछु अछि, से सबटा स्पन्दनक जगत मे समाहित अछि, त एकर परिणाम अवश्ये विशाल होयत । अतः, सवाल उठैत अछि जे कि वेद मंत्र सब मे समस्त विविध सार्वभौमिक क्रिया केना समाहित अछि ।

ई बुझय पड़त जे वेद विशाल अछि आर वेदक रूप मे जे हमरा सब लग आयल अछि ओकर विस्तार सीमित अछि । वेद मे कहल गेल छैक जे वेद वास्तव मे अनन्त अछि – “अनंता वै वेदाः” । ई नहि कहल जा सकैछ जे वेद अपन सम्पूर्णता मे ऋषि लोकनि केँ प्रकट भेलनि । केवल एकटा अंश – असीम वेदक एकटा छोट सन अंश – मात्र हुनका सब केँ प्रकट भेलनि । चारि टा वेद आ वेदक एक हजार सँ अधिक शाखा सब ओहि ज्ञानक एकटा अंश मात्र छी जे कि हुनका सब केँ ज्ञात भेल छलन्हि ।

परमात्माक श्वास, जेकर प्रतिध्वनि ब्रह्मा केँ सृष्टि करबाक लेल प्रेरित कयलकन्हि, अनेक ब्रह्मा लोकनिक बादो समय-समय पर भेल सब विनाशकारी प्रलयक बावजूद अन्तरिक्ष मे विद्यमान अछि । एकर नहि त कोनो क्षय छैक आ न मृत्यु । महाप्रलयक बाद आबयवला प्रत्येक ब्रह्मा वेद मंत्र या आदिध्वनि केर एहि कम्पन सभक सहायता सँ सृष्टिक कार्य करैत छथि ।

एकर उद्गम कम्पनात्मक गति अछि । एहि गति केँ ब्रह्मा वेद केर रूप मे ग्रहण कयलनि आ एकरहि जाप सँ सृष्टि प्रकट भेल ।

एना कहल जाइत अछि जे यदि गाछ सब लग कोनो ध्वनि छोड़ल जाय, तँ ई गाछ सभक वृद्धि केँ तीव्र करैत अछि आ उपजा (फल) सेहो बेसी दैत अछि । तहिना किछु कम्पन वृद्धि केँ धीमा कय दैत अछि । ई बात जे ध्वनि कम्पन सृजन, संरक्षण आ विनास मे सक्ष अछि, गाछ सभक वृद्धि जेहेन सामान्य मामिला सब मे सेहो स्पष्ट रूप सँ सिद्ध होइत अछि ।

ब्रह्मा यैह तप या ध्यान केर शक्ति द्वारा वैदिक ध्वनि सभक सहायता सँ सम्पूर्ण ब्रह्मांडक रचना करय मे सक्षम छलथि ।

एना केना होइछ जे एकटा सन्त पुरुष मात्र एक बेर पंचाक्षर मंत्रक जाप कय केँ कोनो रोगक उपचार कय सकैत छथि, जेकर जाप हम सब प्रतिदिन करैत छी ? स्पष्टतः एहि लेल जे हुनका मे एकाग्रताक शक्ति बेसी होइत छन्हि आ कम्पन केँ उचित तरीका सँ आह्वान करबाक शक्ति रहैत छन्हि । एकर अलावे, मंत्रक जाप ओकर शुद्धता मे, शब्द या स्वर (आवाज) मे कोनो परिवर्तन कएने बिना कयल जेबाक चाही । तखनहि परिणाम प्राप्त भ’ सकैत अछि । चूँकि ब्रह्मा स्वयं केँ परमात्मा सँ खाली सृष्टिक निर्माण लेल मात्र प्रकट कयने रहथि, तेँ वेद पर हुनका पूर्ण महारत छलन्हि ।

शून्य आकाश सँ निकलयवाली विद्युत (बिजली) केर सहायता सँ आइ-काल्हि अनेकों काज सम्पन्न या सिद्ध होइत अछि । एहि प्रकारे समस्त सृष्टि ओहि निर्गुण ब्रह्म सँ उत्पन्न होइत अछि जे समस्त चेतनाक स्रोत थिक । प्रलयक समय चेतना निष्क्रिय रहैत अछि । जखन कोनो पहलवान सुतैत अछि, त ओकर शक्तिक अनुभव नहि भेटैछ । केवल जखन ओ कुश्ती लड़ि रहल होइत अछि या एहने कोनो गतिविधि मे संलग्न होइत अछि, तखनहिं टा ओकर शक्तिक पता चलैत अछि । एहि प्रकार सँ, सृष्टिक दौरान, ब्रह्मांडीय शक्ति अनेकों कार्य करैत अछि । ओहि निष्क्रिय सत्ता सँ एहेन कार्य सब केँ कराबक लेल एकटा शक्ति निकलैत (मुक्त होइत) अछि । ब्रह्मा एहने शक्ति सँ उत्पन्न भेल छलाह । चूँकि हुनकर जन्म तापस केर रूप भेल छलन्हि, ताहि लेल ओ सब वेद केँ ओकर पूर्ण शक्तिक संग आत्मसात करय मे सक्षम छलथि । ओ वैदिक ध्वनि सभक सहायता सँ ब्रह्मांडक रचना कयलनि । वेद असीम अछि, कियैक तँ सृष्टि सेहो विविध आ अनेक अछि ।

जखन ब्रह्मा आकार लेलनि, त सबटा वैदिक ध्वनि हुनकर हृदय – अंतरात्मा मे उत्पन्न भेलनि । ओ ओकरा सृष्टिक मार्ग देखौलनि । ओ चारू दिश वैदिक ध्वनि सभक अनुभव कयलनि आ हुनका वेद सहजहि ज्ञात भ’ गेलनि ।

वेदक असीमता बारे एकटा कथा अछि । महान ऋषि भारद्वाज तीन बेर सांसारिक जीवन भरि वेदक अध्ययन कयलनि, ई (अवसर) हुनका विशेष रूप सँ यैह उद्देश्य (वेदक अध्ययन) लेल प्रदान कयल गेल छलन्हि । भगवान परमेश्वर हुनका समक्ष प्रकट भेलाह आ कहलाह, “हम अहाँ केँ चारिम जीवनकाल दैत छी, अहाँ एकर कि (उपयोग) करब ?” भारद्वाज उत्तर देलखिन जे ओ एहि अतिरिक्त समयक उपयोग वेदहि केर अध्ययन मे करता । चूँकि अनगिनत जीवनकालहु मे सबटा वेदक अध्ययन सम्भव नहि रहैक, ताहि लेल भगवान केँ ऋषिक निरर्थक प्रयास पर दया आबि गेलनि आ ओ हुनका सुधारबाक तथा हुनका सामने आबयवला भारी कठिनाइ केर बोध करेबाक इच्छा व्यक्त कयलनि । ओ ओतय तीन टा विशाल पर्वत प्रकट कयलनि आ मुट्ठी भरि माटि उठाकय कहलनि, “अहाँ एखन धरि जे अध्ययन कयलहुँ अछि ओ एहि मुट्ठी भरि माटिक बराबर अछि । अहाँ केँ आब जे सिखबाक अछि से एहि पर्वत सभक समान अछि ।” भारद्वाज ऋषिक प्रसंग वेदक ‘काठक’ भाग मे भेटैत अछि ।

एहि तरहें, हम सब वेदक असीमता केँ देखैत छी । चारि टा वेद आ हज़ार शाखा मे संहिताकरण बहुत बाद मे भेलैक ।

तेँ, मंत्र ओहि ऋषि लोकनि लेल रहस्योद्घाटन थिक जे सब गहन तपस्या करैत छथि । वैह ओ ऋषि छथि जिनकर मंत्र थिक से मानल जाइत अछि । हुनका लग ओहि मंत्र केँ सुनबाक वास्ते दिव्य कान छन्हि । योग शास्त्र कहैत अछि जे, यदि आकाश मे व्याप्त आकाशीय विस्तार तथा मन मे सूक्ष्म रूप मे विद्यमान अन्तरिक्ष केँ एकीकृत कय देल जाय, तँ अन्तरिक्ष मे स्थित सब ध्वनि सब हमरा सब केँ सुनाइ दियए लागत । जे लोक सृष्टिक सब वस्तुतक संग एकरूपताक अनुभव करैत अछि, केवल वैह टा ध्वनिक अनुभव कय सकैत अछि । एहि प्रकारे, ऋषि लोकनि द्वारा विश्वक कल्याण लेल मंत्र सभक आविष्कार कयल, नहि कि ओकर रचना कयल गेल । तैयो, ओ सब मानवजाति केँ ओहि (मंत्र सभक) ज्ञान प्रदान कय केँ मानवजातिक महान सेवा कयलनि अछि, जे (मंत्र सब) पहिनहिं सँ अस्तित्व मे रहय, लेकिन अज्ञात रहय तेकरा ओ सब खोजिकय सोझाँ रखलनि । हम सब ओहि व्यक्ति केँ प्रणाम करैत छी जे हमरा सब केँ गंगाजल आनि दैत छथि । कि ओ गंगाजल बनौलनि ? ओ त बस ओहि गंगाजल केँ हमरो सब लेल आनि देलनि । तैयो, हम सब हुनका ओतेक दूर सँ गंगाजल अनबाक लेल धन्यवाद दैत छी । तहिना ओहि ऋषि लोकनिक जतेको प्रशंसा कयल जाय कम अछि, जे हमरा सब केँ ओ मंत्र प्रदान कयलनि, जे हमरा लोकनिक समझ सँ बहुत दूर छल ।

योग मंत्र आर मंत्र सिद्धि

सम्पूर्ण चौदह भुवन (लोक) एकटा राज्य छी । एहि राज्य पर एकटा सम्राट केर शासन अछि । समस्त सृजित प्राणी एकर प्रजा थिक । सम्राट आ प्रजा केर समय (सन्दर्भ) मे कोनो आरम्भ नहि अछि । यदि कोनो राज्य अछि आर एकटा सम्राट छथि, त नियम (कानून) केर सेहो एकटा समूह अवश्य टा होयत । चूँकि तीनू (राज्य, सम्राट आ प्रजा) अनादि अछि, तेँ नियम (कानून) सेहो अनादि अछि ।

यैह अनादि नियम टा वेद थिक । यद्यपि राज्य अनादि अछि, समय-समय पर एकर एकटा अस्थायी अन्त भेल करैत छैक जेकर बाद ई सृष्टि मे फेर प्रकट होइत अछि । लेकिन परमात्मा, जे सम्राट छथि, आर वेद, जे नियम थिक, वास्तव मे अनादि आ अन्तहीन अछि ।

जाहि अद्भुत संसार केँ हम सब जनैत छी, ओ सृजित अछि; ई बढ़ैत अछि आर फेर गोटेक लाख वर्षक बाद जलप्रलय मे लुप्त भ’ जाइत अछि । फेर एकरा रचना होइत छैक । एहि तरहें ई चलैत रहैत अछि । हालाँकि, सम्राट आ नियम स्थिर रहैछ । प्रत्येत सृष्टिक आरम्भ मे, सम्राट प्रभारी अधिकारी लोकनिक निर्माण करैत छथि । ओ हुनका सब केँ आवश्यक शक्ति सब प्रदान करैत छथि जाहि सँ ओ सब अपन काज कय सकथि ।

जेना कि हम पहिने कहलहुँ, योगशास्त्र कहैत अछि जे व्यक्तिक कान आर ब्रह्माण्ड केर स्थानिक विस्तार केर बीच एकटा कड़ी छैक । यदि ई स्थापित भ’ जाय, त व्यक्ति केँ ‘दिव्य कान’ प्राप्त होइत छैक । एहि दिव्य कानक सहायता सँ, अधिकारी लोकनि परमात्माक कृपा सँ अनादि काल सँ आकाश मे पसरल ध्वनि तरंग सब केँ चिन्हय मे सक्षम भेलाह । एहि प्रकार सँ ओ सब वेद केँ जानयवला प्रथम व्यक्ति बनलाह । ओ सब महर्षि थिकाह जिनकर मंत्र थिकनि ।

हम सब विभिन्न ध्वनि सब सुनैत आ बजैत छी । लेकिन प्रत्येक तंत्रिका केंद्र केर कम्पन, मन मे एकटा विशेष भावना उत्पन्न करैत अछि । किछु वासना सब उत्पन्न करैत अछि, किछु आलस्य, आर किछु आन अप्रसन्नता । दोसर शब्द मे, जखन कियो आवेश मे रहैत अछि, त एकटा विशेष तंत्रिका कम्पन होइत छैक आ एहि प्रकारे जखन कियो क्रोध मे रहैत अछि तखनहुँ कोनो विशेष तंत्रिका कम्पन होइत छैक ।

एहि तरहें, भावनाक प्रत्येक प्रकारक संग, तंत्रिका केंद्र सब मे कम्पन केर एक अलग समूह उत्पन्न होइत छैक । यैह हमरा लोकनिक वास्तविक अनुभव सँ स्पष्ट अछि । मानसिक शांति एकटा विशेष शांति उत्पन्न करैत अछि जे चेहरा पर प्रतिबिम्बित होइत अछि । एना एहि लेल होइत छैक कियैक तँ किछु नाड़ी शान्त आ स्थिर भ’ जाइत छैक । एहिना आवेश आ क्रोध चेहरा पर प्रतिबिम्बित होइत छैक । नाड़ीक धड़कने ई संकेत सब केँ उत्पन्न करैत छैक । एहि प्रकारे, यदि मन द्वारा उत्पन्न किछु भावना सभक परिणामस्वरूप व्यक्तिक नाड़ीक धड़कन मे परिवर्तन होइत छैक, त नाड़ीक धड़कन केँ नियंत्रित कय केँ हम सब आवेश या क्रोध पर नियंत्रण पाबि सकैत छी । एहि तरहें, राजयोग, जे आत्मसाक्षात्कारक दिश लय जायवला मार्ग सब मे सँ एक अछि, मन केँ नियंत्रित करबाक मुख्य साधनक रूप मे श्वास नियंत्रण (प्राणायाम) केर उपयोग करैत अछि ।

एहि तरहें, मंत्र योग एकटा अन्य मार्ग छी, जेतय जखन हम सब कोनो शब्द बजैत छी, तँ प्राणवायु केँ गला, जीह, ठोरक – उपरी या निचला – मुँह आदिक रिक्त स्थान सब सँ गुजरय देल जाइत छैक । तखने शब्द सभक ध्वनि निकलैत अछि आ सुनाय दैत अछि । एहि क्षेत्र सब मे स्थित तंत्रिका केन्द्र सब मे कम्पन्न उत्पन्न होइत छैक जाहि देने श्वास सेहो गुजरैत अछि आ शब्दक ध्वनि उत्पन्न होइत अछि । उचित अनुशासनक संग उचित रूप सँ उच्चारित वेद मंत्र मन मे आवश्यक भावना सब उत्पन्न करैत अछि जे उच्चारण करयवला व्यक्तिक संग-संग संसारहु केर कल्याण सुनिश्चित करैत अछि । एहि प्रक्रिया मे अन्य निम्नतर भावना सब सेहो बनल रहैत अछि ।

परन्तु परिभाषाक अनुसार, मंत्र केर अर्थ अछि ओ जे बेर-बेर ध्यान कयला सँ रक्षा करैत अछि । मननात् त्रायते इति मंत्रः । ब्राह्मण केर कर्तव्य अछि जे ओ मंत्र सभक बेर-बेर जप करय जाहि सँ आवश्यक कम्पन्न बेर-बेर उत्पन्न होइक, जेकर परिणामस्वरूप ओकर अपन कल्याण होइक आ एहि प्रकारे उत्पन्न शक्तिक माध्यम सँ संसारक समग्र कल्याण होइक ।

यदि केकरो मंत्र मे सफलता प्राप्त करबाक अछि आर ओहि सँ पूर्ण लाभ प्राप्त करबाक अछि, त जप केर एक निर्धारित विधि अछि । विद्वान् लोकनि छह विधि सँ कयल गेल जप केँ अनुचित मानैत छथि, एहि सँ बचबाक सलाह दैत छथि ।

गीतीशीघ्री शिरःकम्पी तथालिखितपाठकः ।
अनर्थज्ञः अल्पकंठश्च षडैते पाठकाधमाः ॥

गीती ओ अछि जे गाबिकय जप करैत अछि । ई सही नहि अछि । यद्यपि सामवेदक पाठ संगीतमय छैक, तैयो एकरा केवल स्वीकृत संगीतमय तरीका टा सँ कयल जा सकैछ, अपन इच्छानुसार नहि । एकर अतिरिक्त, चूँकि ध्वनि आ ओकर विभिन्न रूप सब मे शक्ति रहैत छैक, ताहि लेल उचित स्वर केर अलावा कोनो स्वर मे पाठ नहि केवल अनुचित छैक, बल्कि हानिकारक सेहो छैक । एकरा केवल निर्धारित विधि टा सँ करबाक चाही । शीघ्री ओ अछि जे तीव्र गति सँ जप करैत अछि आर पाठ शीघ्रहि समाप्त कय दैत अछि । इहो गलत अछि । यदि पूर्ण लाभ प्राप्त करबाक अछि त वैदिक शब्द सभक उच्चारण प्रत्येक शब्द-ध्वनिक उच्चारण लेल निर्धारित समय सीमाक कड़ाई सँ पालन करिते कयल जेबाक चाही । शिरःकम्पी ओ अछि जे जप करैत समय अनावश्यक रूप सँ अपन सिर हिलबैत आ घुमबैत रहैछ । व्यक्ति केँ एकाग्रता मे सीधा बैसबाक चाही आ नाड़ी कम्पन केँ स्वाभाविक रूप सँ होबय देबाक चाही । संगीतकार जेकाँ सिर हिलेला सँ कम्पन बाधित होइत छैक । लिखितपाठकः ओ अछि जे लिखित कथा (स्क्रिप्ट) देखिकय पढ़ैत अछि । ई सही नहि अछि । जेना कि हम पहिनहिं कहलहुँ, एकरा गुरुक मुख सँ जप (वाचन) होइत कान (सँ सुनिकय) सीखल जेबाक चाही आ उचित तरीका सँ याद कयल जेबाक चाही । अनर्थज्ञः केर अर्थ अछि ओ जे अर्थ नहि बुझैत अछि । मंत्रक पूर्ण लाभकारी प्रभाव प्राप्त करबाक वास्ते ओकर शब्द सभक अर्थ जननाय आवश्यक छैक । अल्पकंठ ओ अछि जे मन्द स्वर मे पाठ करैत अछि । ध्वनि कम्पन केर नीक प्रभाव पड़य, एहि लेल ध्वनि केँ ठीक सँ सुनल जेबाक चाही, नहि कि बुदबुदायल जेबाक चाही ।

ध्वनि आर पदार्थ केर प्रयोग

एतय, हमरा हल्का-फुल्का अन्दाज़ मे किछु कहबाक चाही हमर मोन मे आयल । यदि कोनो संस्कृत शब्द मे ‘तरं’ प्रत्यय जोड़ल जाइत अछि त ई दर्शाबैत अछि जे तुलनात्मक रूप सँ कोनो आर दोसर वस्तु सँ बेहतर अछि । वीर्यवत् केर अर्थ अछि शक्तिवला । वीर्यवत्तरं केर अर्थ अछि सामान्य सँ अधिक शक्ति । छांदोग्य उपनिषद (१.१.१०) मे कहल गेल छैक कि जे लोक ओंकार केर ध्यान करैत अछि आ ओकर अर्थ सेहो बुझैत अछि, ओकरा बेहतर परिणाम (वीर्यवत्तरं) प्राप्त होइत छैक । “तरं” प्रत्यय केर प्रयोग सँ स्पष्ट अछि कि जे लोक ओंकार केर अर्थ बुझने बिना ध्यान करैत अछि, ओकरा कमे परिणाम टा प्राप्त होइत छैक । हालाँकि, आदि शंकराचार्य अपन टीका मे कहैत छथि कि, यद्यपि अर्थ बुझयवलाक बराबर नहि, तैयो आन लोक सब केँ सेहो पर्याप्त लाभ भेटैत छैक ।

चाहे कियो अर्थ बुझय या नहि बुझय, एहि विश्वासक संग कयल गेल कार्य जे पूर्वकालक विद्वान् सब ई करबाक निर्देश देने छथि, नीक परिणाम दैत अछि । अन्य कार्य सभक अपेक्षा, वैदिक जप केर अभ्यास मे एहि बात पर बेसी बल जेबाक चाही, कियैक तँ केवल सही स्वर-उच्चारण सँ उत्पन्न कम्पन टा आवश्यक परिणाम उत्पन्न करैत छैक । एतय, ध्वनि द्वारा उत्पन्न प्रभाव सर्वोपरि अछि । अर्थ केर प्रभाव गौण अछि ।

एहि पर हल्का-फुल्का अन्दाज़ मे विचार करैत, कखनहुँ-कखनहुँ हमरा लगैत अछि जे अर्थ जनला सँ सामान्य (वीर्यवत्त) परिणाम प्राप्त होइत अछि; अज्ञानता बेहतर (वीर्यवत्तरं) परिणाम दैत छैक । हम केना सोचैत छी जे बुझय के कमी बेहतर परिणाम दैत छैक आ नहि बुझय के ?

एकटा कलेक्टर छथि । (भारत मे कलेक्टर कोनो राज्यक राजस्व ज़िलाक प्रमुख होइत छथि ।) एकटा किसान कलेक्टर केँ सम्बोधित एकटा याचिका लिखबाक लेल एकटा वकील केँ नियुक्त करैत अछि । ओ स्वयं कलेक्टर केँ ई याचिका प्रस्तुत करैत अछि । यद्यपि ओ अनपढ़ अछि, तैयो ओकर याचिका कलेक्टर सँ अनुकूल आदेश केर प्रार्थना सँ समाप्त होइत छैक । कलेक्टर स्वाभाविक रूप सँ ई निष्कर्ष निकालता जे बेचारा ज़्यादा नहि जनैत अछि, लेकिन ओकरा अपना लेल न्याय पर विश्वास छैक, आर तेँ ओ अनुकूल आदेश दैत छथि । मंत्र केर संग सेहो यैह स्थिति अछि । ओकर पूरा अर्थ केवल ईश्वरहि टा जनैत छथि । हालाँकि, हमर सब केँ अपना दृष्टिकोण मे गलत करयवला नहि होयबाक चाही । यदि वकीलक तर्क मे कोनो त्रुटि छैक, त कलेक्टर स्वाभाविक रूप सँ क्रोधित भ’ जाइत छथि । आ जँ ओ ई सोचथि जे किसानहु केँ ई गलतीक एहसास (आभास) छैक, त ओ आर बेसी क्रोधित होइतथि, जखन कि कलेक्टर केँ लगैत छैक जे गलतीक लेल किसान जिम्मेदार नहि अछि, आर अगर कलेक्टर केँ लगितनि जे किसान वकीलक गलती लेल ज़िम्मेदार नहि अछि, त ओ किसानक प्रति अनुकूल रुइख रखितथि । तेँ हेतु, ई कहब सही नहि अछि जे, “हमरा बुझय मे नहि आबि रहल अछि । तखन फेर जाप कयला सँ कि लाभ ?” जेना कि हम कहलहुँ, बिना बुझनहियो जप करब आर बेहतर काज करैत छैक, बशर्ते ओहिमे निर्दोषपन (मासूमियत) हो । ई मज़ाक लेल कहल गेल छल । हालाँकि, आइ-काल्हिक दुनिया मे बुद्धि तेज़ भ’ गेल अछि । जखन हम देखैत छी जे अशिक्षित लोकनिक विनम्रता कमज़ोर भ’ रहल छैक, त हमरा लगैत अछि जे शायद श्रद्धाहीन बुद्धिक बजाय बुद्धिहीन श्रद्धा रखनाय बेहतर (नीक) हेतैक ।

लेकिन, सच त ई छैक जे विनम्रताक संग बुद्धि सेहो होयबाक चाही । हालाँकि मंत्र केर अर्थ ओकर सही उच्चारणक आगू गौण छैक, कियैक तँ मंत्र हमरा सभक धार्मिक नियम छी, तेँ हम सब ओहि अनुसार तखनहिं कार्य कय सकैत छी जखन ओकर अर्थ बुझय मे आबि जाय । ताहि लेल मंत्रक उच्चारण केँ आर अधिक शक्तिशाली बनेबाक लेल ओकर महत्व केँ सेहो बुझबाक प्रयास करबाक चाही ।

वेदक उच्चारण भव्यताक संग कयल जेबाक चाही, जाहि सँ ओकर ध्वनि ठीक सँ सुनल जा सकय । वैदिक मंत्र नहि केवल ओकरा ठीक सँ जपयवलाक नाड़ी मे लाभकारी कम्पन उत्पन्न करैत अछि, बल्कि ओकरा सुनयवला मे सेहो समान कम्पन उत्पन्न करैत अछि । चूँकि ई वातावरण मे पसरैत अछि, ताहि लेल ई इहलोक और परलोक मे कल्याण सुनिश्चित करैत अछि । तेँ, एकर उच्चारण श्रव्य रूप सँ कयल जेबाक चाही जाहि सँ ई वातावरण मे दूर-दूर धरि पसरि सकय ।

वेदक शक्ति

वेदक मुख्य विशेषता सब, जेना कि पहिनहिं उल्लेख कयल जा चुकल अछि, ई अछि: (१) एकर कोनो आरम्भ नहि छैक (अनादि), (२) एकर कियो मानवीय रचयिता नहि छैक (अपौरुषेय), आर (३) ई समस्त सृष्टिक मूल मे छैक । लेकिन एतबा बात नहि छैक ।

एकर उच्चारण केर समय उत्पन्न ध्वनि हमरा सभक तंत्रिका केन्द्र सब केँ सक्रिय करैत अछि आर वातावरण केँ सेहो प्रभावित करैत अछि, जेकर परिणामस्वरूप विश्वक व्यक्तिगत एवं सामूहिक कल्याण होइत छैक । सामूहिक कल्याण केवल मानवता मात्र सन्दर्भित नहि करैछ ।

वेद जतेज जीव आ गाछ-वृक्षक भलाइ लेल जोर कोनो आर धार्मिक ग्रन्थ मे नहि देल गेल छैक । वेद कहैत अछि, “नहि केवल दुइ पैरवला, बल्कि चारि पैरवला प्राणी केर सेहो समृद्ध हेबाक चाही ।” (शं नो अस्तु द्विपदे शं चतुष्पदे) । ई अहू सँ बढ़िकय झाड़ी, वृक्ष, पहाड़ आर नदी सभक – बल्कि समस्त सृष्टिक भलाइ पर जोर दैत अछि ।

वैदिक ग्रन्थ सब मे अर्थक भंडार अछि । अपन काव्यात्मक भव्यताक अतिरिक्त, एहि मे सुव्यवस्थित समाज आर सामाजिक जीवन लेल विस्तृत निर्देश, महान दार्शनिक सत्य तथा एतय तक कि वैज्ञानिक नियम सेहो निहित छैक ।

वेद मंत्र सब, जे मूलतः ध्वनिक कम्पन छी, केर मौखिक अर्थ भेनाय जरूरी नहि छैक जेना कि हम सब सामान्यतया बुझैत छी ।

दैनिक जीवन मे, हम सब राग अलापनाय, या संगीत केर स्वर सभक विस्तृत चित्रण या राग पबैत छी जाहि मे कोनो शब्द नहि होइछ, केवल एकटा प्रतीकात्मक अर्थ होइत छैक, तैयो ओ हर्ष आर शोक केर भावना सब उत्पन्न करय मे सक्षम होइत अछि । प्रयोग सब सँ पता चलल अछि जे वाद्य संगीत सँ सब्जी सभक पैदावार बढ़ैत छैक । एहि सँ पता चलैत अछि जे ध्वनि मे सृजनात्मक क्षमता होइत अछि । एकर अलावे, ध्यान देबा योग्य सबसँ महत्वपूर्ण बात ई छैक जे चूँकि ध्वनि सब एकटा वाद्य यंत्र सँ निकलैत अछि, ताहि लेल प्रभावोत्पादकताक वास्ते कोनो शब्द या अर्थक जरूरतक कोनो प्रश्ने नहि उठैछ । संगीतमय ध्वनिक सेहो अपन प्रभाव होइत छैक ।

तेँ, वेदक उत्कृष्ट विशेषता ई अछि जे मंत्रक उच्चारण केर समय ओकर ध्वनिक सेहो एकटा अर्थ होइत छैक, शब्दक अलावे, जे अर्थपूर्ण सेहो होइत छैक ।

एहि प्रकारे, वेद केर महानता ओकर मंत्र मे निहित अछि जाहि मे ध्वनि आ अर्थ दुनू गुण छैक । एकटा गोली कड़ू (तीत) भ’ सकैत अछि, लेकिन स्वास्थ्यक लेल नीक भ’ सकैछ । एकटा मिठाइ केर स्वाद नीक भ’ सकैत अछि, लेकिन ओ नुकसानदेह भ’ सकैत अछि । कतेक नीक होयत जे किछु एहेन हो जे नहि केवल स्वादिष्ट हो, बल्कि मीठ टॉनिक जेकाँ स्वास्थ्य केँ सेहो बेहतर बनाबय ? वेद मंत्र केर ई दोब्बर लाभ छैक ।

वेद मे एहि लोक आर परलोक मे कल्याण सुनिश्चित करबाक निर्देश छैक । ई व्यक्तिक जन्म सँ लयकय ओकर अन्तिम श्वास धरि आर ओकर बाद मोक्ष केँ सुनिश्चित करबाक लेल ओकरा कर्म प्रति मार्गदर्शन करैत छैक । ई केवल व्यक्तिगत मोक्ष धरि सीमित नहि छैक । समाज केँ केना व्यवहार करबाक चाही, सामान्य व्यक्तिक कर्तव्य कि छैक, एकटा ब्राह्मण केँ केहेन आचरण करबाक चाही, राजा केँ देश पर केना शासन करबाक चाही, स्त्रिय सभक आचरण केहेन हेबाक चाही – ई सबटा बात सब वेद मे संहिताबद्ध रूप मे हमरा लोकनिक सोझाँ प्रस्तुत कयल गेल अछि ।

Vedas Are Without End

If the whole of creation and all that is before and beyond creation is involved in the world of vibrations, it must indeed be colossal in magnitude. That being so, the question arises as to how all of the manifold universal activities are encompassed within the Veda mantras.

It has to be understood that the Vedas are vast and what has come to us as Vedas is limited in extent. What is stated in the Vedas is that they are verily endless – “ananta vai Vedah”. It cannot be said that the Vedas in their entirety got revealed to the Rishis. Only a portion – a small portion of the limitless Vedas – became revealed to them. The four Vedas and a thousand and odd Veda saakhaas (or branches) of the Vedas are only a portion of what was made known to them.

The breath of the Paramaatma, whose resonance inspired Brahma to undertake creation, still exists in space in spite of all destructive deluges which have happened from time to time even after many Brahmas. This has no decay or death. Every Brahma who comes after the great Deluge or Pralaya undertakes creation with the help of these vibrations of the Veda mantras or primordial sound.

Their origin is vibratory movement. This movement was captured by Brahma as Vedas and, on chanting them, creation became manifest.

It is said that if certain sound vibrations are released near plants, these induce faster growth and higher yield. Similarly some vibrations retard growth. That sound vibrations are capable of creation, preservation and destruction, is thus clearly proved even in such ordinary matters as the growth of plants.

Brahma was able to create the whole Universe with the aid of Vedic sounds by this Tapas or power of meditation.

How does it happen that a saintly person is able to cure a disease by chanting only once the Panchaakshara mantra (five syllabled word) which we chant daily? Obviously because he has greater power of concentration and power of invoking the vibrations in the proper manner. In addition, the mantra should be chanted in its purity without any change of words or tone. Only then can result be obtained. Since Brahma manifested Himself from the Paramaatma solely for the purpose of creation, his mastery of the Vedas was total.

With the aid of electricity which gets released from the empty skies, a great many things are nowadays performed or achieved. Likewise all creation emanates from the attributeless Brahman which all consciousness. During the deluges, the consciousness is quiescent. When a wrestler sleeps, his strength remains unfelt. It is only when he is wrestling or indulging in some such activity that his power is known. Similarly, during creation, the cosmic force performs a number of jobs. From out of the quiescent being, a force is released to do such jobs. Brahma came out of such a force. Since he was born in the form of Tapas, he was able to absorb all the Vedas with their full vigour. He created the universe with the help of Vedic resonances. The Vedas are limitless, as creation is also varied and manifold.

When Brahma took form, all the Vedic sounds were born in his heart – inner self. They showed him the path of creation. He felt the Vedic sounds all around and to him all the Vedas became known intuitively.

There is story about the limitlessness of the Vedas. The great sage, Bharadwaaja, studied the Vedas through three spans of earthly life, specially granted to him for the purpose. Lord Parmeswara appeared before him and said “I will give you a fourth span, what will you do with it?”. Bharadwaaja replied that he would utilise the extra time also in the study of the Vedas. Since it was not possible to study all the Vedas even during countless spans of life, the Lord took pity on the Rishi’s futile efforts and desired to correct him and give him an idea of the tremendous difficulty that he faced. He made three huge mountains to appear there and picking up a handful of earth said, “What you have so far studied is equal to this handful of earth. What you have yet to learn is of the order of these mountains”. The episode of Bharadwaaja Rishi is found in Kaataka porta of the Vedas.

Thus, we see the limitlessness of the Vedas. The codification into four Vedas and the thousand and odd saakhas is something that came much later.

Mantras are, therefore, revelations to the Rishis who perform deep Tapas. They are the Rishis to whom the mantras are said to belong. They have the divine ear to hear those mantras. Yoga Saastra says that, if the spatial expanse in the skies and the space which exists in a microform in the mind are unified, all the suspended sounds in space will become audible to us. Those who feel in unison with all objects in creation can alone feel the sound. Thus, the Rishis brought forth the mantras for the benefit of the world and did not create them. Even so, they have rendered a great service to mankind by bringing to its ken what was already in existence but not known. We make obeisance to a person who brings us the Ganga water. Did he produce the Ganga water? He only brought it to us. Nevertheless, we thank him for bringing it to us from a long distance. Similarly no praise is too high for the Rishis who have vouchsafed to us the mantras which were beyond our grasp.

Yoga Mantra And Mantra Siddhi

All the fourteen worlds are kingdom. This kingdom is ruled by an emperor. All the created beings are His subjects. The emperor and the subjects have no beginning in time. If there is a kingdom and there is an emperor, there must be a set of laws. Since all the three are without beginning, the laws are also without a beginning.

This law without a beginning is the Veda. Although the kingdom is without a beginning, from time to time, it has a temporary end after which it reappears in creation. But the Paramaatma, who is the emperor, and the Veda which is the law are truly without a beginning and without an end.

The phenomenal world that we know of is created; it grows and then is lost in the deluge after a few million years. Again it is created. Thus, it goes on. However, the emperor and the law remain stable. At the start of each creation, the emperor creates authorities-in-charge. He infuses them with the necessary powers so that they could perform their assignment.

As I said earlier, the Yoga Saastra says that there is a link between one’s ear and the spatial expanse of the universe. If this is established, one obtains ‘divine ears’, so to say. With the aid of these divine ears, those in authority were able to cognise the sound waves which are diffused in the sky from time immemorial, by the grace of the Paramaatma. They thus became the first to know the Vedas. They are the maharishis to whom mantras belong.

We hear as well as utter different sounds. But the vibration of each nerve centre, a certain emotion is created in the mind. Some create passions, some laziness, and some others unhappiness. Putting it differently, when one is in a passion, a certain nerve vibration occurs and similarly when one is in anger.

Thus, with every kind of emotion, a different set of vibrations and caused to the nerve centres. These are evident from our actual experience. Mental peace produces a certain calmness which is reflected in the face. This is because certain naadis get cool and composed. Similarly passion and anger get reflected in the face. The pulse beat alone produces these signs. Thus, if certain emotions caused by the mind result in changes in one’s pulse beat, by controlling the pulse beats we can exercise control over passion or anger. Thus, Raajayoga, which is one of the paths leading to realisation uses breath control (Praanaayaama) as the chief instrument in the control of the mind.

Similarly, Mantra Yoga is another path, when we utter a word, the life breath is allowed to pass though the gaps in the throat, tongue, lips – upper or lower – mouth, etc. Only then the sound of the words emanates and becomes audible. Vibrations are caused to the nerve centres situated in these areas through which breath passes to produce the sound of the word. Veda mantras properly recited with the proper discipline produce the necessary emotions in the mind which ensure well-being to the person reciting as well as to the world. Other baser emotions are also kept in the process.

But definition, mantra means that be repeatedly meditating upon which one is saved. Mananaat Traayate Iti Mantrah. It is the duty of a brahmin to chant the mantras repeatedly so that the necessary vibrations are created again and again, resulting in his own well-being and, through the power so created, cause the general well-being of the world.

If one is to succeed with the mantras and get the fullest benefit from them, there is a prescribed method for chanting it. Learned people consider six methods of recitation, as not correct and advise that they be avoided.

Geetee Seeghree Sirah Kampee Tathaa Likhit Paathakah.
Anarthajnah Alpakanthascha Shadaitay Pathakaadhamaah.

Geetee is one who chants in a sing-song fashion. This is not correct. Though Samaveda is musically recited, it can be recited only in the approved musical way and not as one pleases. Further, since the sound and its variations have potency, recitation other than in the proper swara is not only not proper but harmful. It should be recited only in the prescribed mode. Seeghree is one who chants in a quick tempo and ends the recitation quickly. This is also wrong. The Vedic words should be intoned by closely adhering to the time limits prescribed for uttering each word-sound if full benefits are to result. Shirahkampee is one who shakes and nods his head needlessly while chanting. One should sit straight in concentration and allow the pulse vibrations to occur naturally by themselves. Nodding of the head like a musician disturbs the vibrations. Likhitapaathakah is one who reads from the written script. This is not right. As I said earlier, it should be learnt by the ear from oral chanting y a teacher and committed to memory in the proper manner. Anarthajnah means one who does not understand the meaning. It is necessary to know the meaning of the words of the mantras in order to have the full beneficial effect. Alpakantha is one who recites in a feeble voice. In order that the sound vibrations have good effect, the sounds should be properly audible and not mumbled.

The use of sound and material

Here, I must say something which occurs to me, in a lighter vein. If the suffix ‘taram’ is added to a Sanskrit word, it denotes that a certain thing is better than another, comparatively speaking. Veeryavat means one with power. Veeryavattaram means more power than the ordinary. It is stated in Chaandogya Upanishad (1.1.10) that better results (Veeryavattaram) accrues to those who meditate on the omkara, understanding what it connotes. It is obvious from the use of the suffix “taram” that those who meditate without understanding the significance obtain only lesser results. Adi Sankaracharya, in his commentary, however, says that, although not at par with those who understand the meaning, others also get sizeable benefits.

Whether one understands the meaning or not, a job done in the belief that the learned ones of the past had prescribed its performance, produces good results. More than in other acts, this should be stressed in the practice of Vedic Japa, because the vibrations created by correct intonation alone produces essential results. Here, the effect that sound produces is all-important. The effect of the meaning is secondary.

Thinking of this, in a lighter vein, sometimes I feel that knowing the meaning produces ordinary (Veeryavath) results; not knowing produces better (Veeryavattaram) results. How do I think that lack of understanding produces better results and not understanding?

There is a Collector. (Collector in India is a head of a revenue district of a state.) A farmer engages a lawyer to write a petition for him addressed to the Collector. He himself submits this petition to the Collector. Although illiterate his submission ends with a prayer for favourable orders from the Collector. The Collector would naturally conclude that the poor man does not know much but has faith in his justice. and so he passes favourable orders. So, is the case with mantras. Their full import is only known to God. We should not, however, be mischievous in our approach. If there is a fault in the lawyer’s argument, the Collector is naturally annoyed. He would be more annoyed if he thought that the farmer also was aware of the fault, whereas, if the Collector thought that the farmer was not responsible for the fault, whereas, if the Collector thought that the farmer was not responsible for the fault of the lawyer, he would be favourably disposed towards the farmer. Therefore, it is not correct to say, “I do not understand. So what is the use of chanting it?” As I said, recitation without understanding works even better, provided there is innocence. This was said for fun. In the present-day world, however, intellect has become sharp. When I find that the humility of the uneducated is undermined, I feel that it would perhaps be better to have faith devoid of intellect instead of intellect devoid of faith.

But, in truth, one must have intellect with humility. Although the meaning of mantras is only secondary to the sound of their correct intonation, since the mantras are our Dharmic laws, we can act accordingly only if their meaning is understood. Hence one must try to understand the import of the mantras also to lend greater strength to the chanting of the same.

Vedas must be chanted with grandeur, so that the sound can be properly heard. Vedic mantras not only produce beneficial vibrations in the pulse of the one who chants them properly but also similar vibrations in those who may hear them. Since it is spread in the atmosphere, it ensures well-being here and hereafter. Therefore, it must be audibly chanted so that it can spread far and wide in the atmosphere.

The Power of the Vedas

The main characteristics of the Vedas as mentioned already are: (1) They are without a beginning (Anaadi), (2) They have no human authorship (Apourusheya), and (3) They are at the root of all creation. But this is not all.

The sound while chanting them activates our nerve centres and also affects the atmosphere, resulting in individual as well as collective well-being of the world. Collective well-being does not refer only humanity.

No other religious text emphasises the well-being of animals and plants as much as the Vedas. “Not only two-legged but four-legged beings should prosper,” says the Veda. (Sam No Astu Dwipade Sam Chatushpade). It goes even further and stresses the well-being of shrubs, trees, mountains and rivers – in fact all creation.

The Vedic texts contain a wealth of meaning. Besides its poetic grandeur they contain detailed injunctions for a well-ordered society and social life, great philosophical truth and even scientific laws.

It is not necessary for the Veda mantras, which are essentially vibrations of sound, to have a verbal meaning as we commonly understand it.

In every day life, we find the Raga Aalapana, or the detailed delineation of musical notes or Ragas which contain no words but only a symbolic meaning nevertheless capable of producing emotions of joy and sorrow. Experiments have shown that the yield of vegetables has been increased by instrumental music. This shows that sound has a creative ability. That apart, the most important thing to note is that, since the sounds emanate from a musical instrument, there is no question of any words or meaning being essential for effectiveness. The very musical sound itself has an effect.

The outstanding features of the Vedas, therefore, lies in the fact that the sound of the mantras by itself when chanted, has a meaning, apart from the words which are also full of meaning.

Thus, the greatness of the Vedas lies in the mantras having properties of sound and meaning. A pill may be bitter but may be good for health. A sweet may taste well but may cause harm. How nice it would be to have something that would not only taste well but also improve health like a sweet tonic? Veda mantras have this two-fold advantage.

Vedas contain injunctions for ensuring the well-being in this world and the world to come. It guides the actions of a person from the moment of birth to the moment he breathes his last and thereafter to ensure his salvation. It does not stop at individual salvation. How should society behave, what are the duties of the common man, how should a brahmin conduct himself, how should the king govern the country, what should be the conduct of women – all these matters have been presented to us in a codified form in the Vedas.

वेद अनंत हैं

यदि संपूर्ण सृष्टि और सृष्टि से पूर्व और परे जो कुछ भी है, वह सब स्पंदनों के जगत में समाहित है, तो इसका परिमाण अवश्य ही विशाल होगा । अतः, प्रश्न उठता है कि वेद मंत्रों में समस्त विविध सार्वभौमिक क्रियाएँ कैसे समाहित हैं ।

यह समझना होगा कि वेद विशाल हैं और जो वेद के रूप में हमारे पास आया है, उसका विस्तार सीमित है । वेदों में कहा गया है कि वेद वास्तव में अनंत हैं – “अनंता वै वेदाः” । यह नहीं कहा जा सकता कि वेद अपनी संपूर्णता में ऋषियों को प्रकट हुए । केवल एक अंश – असीम वेदों का एक छोटा सा अंश – ही उन्हें प्रकट हुआ । चार वेद और वेदों की एक हज़ार से अधिक शाखाएँ उस ज्ञान का केवल एक अंश मात्र हैं जो उन्हें ज्ञात हुआ था ।

परमात्मा का श्वास, जिसके प्रतिध्वनि ने ब्रह्मा को सृष्टि करने के लिए प्रेरित किया, अनेक ब्रह्माओं के बाद भी समय-समय पर हुए सभी विनाशकारी प्रलय के बावजूद अंतरिक्ष में विद्यमान है । इसका न तो कोई क्षय है और न ही मृत्यु । महाप्रलय के बाद आने वाला प्रत्येक ब्रह्मा वेद मंत्रों या आदि ध्वनि के इन कंपनों की सहायता से सृष्टि का कार्य करता है ।

इनका उद्गम कंपनात्मक गति है । इस गति को ब्रह्मा ने वेदों के रूप में ग्रहण किया और इनके जाप से सृष्टि प्रकट हुई ।

ऐसा कहा जाता है कि यदि पौधों के पास कुछ ध्वनि कंपन छोड़े जाएँ, तो ये पौधों की वृद्धि को तीव्र करते हैं और अधिक उपज देते हैं । इसी प्रकार कुछ कंपन वृद्धि को धीमा कर देते हैं । यह बात कि ध्वनि कंपन सृजन, संरक्षण और विनाश में सक्षम हैं, पौधों की वृद्धि जैसे सामान्य मामलों में भी स्पष्ट रूप से सिद्ध होती है ।

ब्रह्मा इसी तप या ध्यान की शक्ति द्वारा वैदिक ध्वनियों की सहायता से संपूर्ण ब्रह्मांड की रचना करने में सक्षम थे ।

ऐसा कैसे होता है कि एक संत पुरुष केवल एक बार पंचाक्षर मंत्र का जाप करके किसी रोग का उपचार कर सकता है, जिसका जाप हमलोग प्रतिदिन करते हैं ? स्पष्टतः इसलिए क्योंकि उसमें एकाग्रता की शक्ति अधिक होती है और कंपनों को उचित तरीके से आह्वान करने की शक्ति होती है । इसके अतिरिक्त, मंत्र का जाप उसकी शुद्धता में, शब्दों या स्वर में किसी भी परिवर्तन के बिना किया जाना चाहिए । तभी परिणाम प्राप्त हो सकता है । चूँकि ब्रह्मा ने स्वयं को परमात्मा से केवल सृष्टि के निर्माण के लिए ही प्रकट किया था, इसलिए वेदों पर उनकी पूर्ण महारत थी ।

शून्य आकाश से निकलने वाली विद्युत की सहायता से आजकल अनेक कार्य संपन्न या सिद्ध होते हैं । इसी प्रकार समस्त सृष्टि उस निर्गुण ब्रह्म से उत्पन्न होती है जो समस्त चेतना का स्रोत है । प्रलय के समय चेतना निष्क्रिय रहती है । जब कोई पहलवान सोता है, तो उसकी शक्ति का अनुभव नहीं होता । केवल जब वह कुश्ती लड़ रहा होता है या ऐसी ही किसी गतिविधि में संलग्न होता है, तभी उसकी शक्ति का पता चलता है । इसी प्रकार, सृष्टि के दौरान, ब्रह्मांडीय शक्ति अनेक कार्य करती है । उस निष्क्रिय सत्ता से ऐसे कार्यों को करने के लिए एक शक्ति मुक्त होती है । ब्रह्मा ऐसी ही शक्ति से उत्पन्न हुए थे । चूँकि उनका जन्म तापस के रूप में हुआ था, इसलिए वे सभी वेदों को उनकी पूर्ण शक्ति के साथ आत्मसात करने में सक्षम थे । उन्होंने वैदिक ध्वनियों की सहायता से ब्रह्मांड की रचना की । वेद असीम हैं, क्योंकि सृष्टि भी विविध और अनेक है ।

जब ब्रह्मा ने आकार लिया, तो सभी वैदिक ध्वनियाँ उनके हृदय – अंतरात्मा में उत्पन्न हुईं । उन्होंने उन्हें सृष्टि का मार्ग दिखाया । उन्होंने चारों ओर वैदिक ध्वनियों का अनुभव किया और उन्हें सभी वेद सहज ही ज्ञात हो गए ।

वेदों की असीमता के बारे में एक कथा है । महान ऋषि भारद्वाज ने तीन बार के सांसारिक जीवन में वेदों का अध्ययन किया, जो उन्हें विशेष रूप से इसी उद्देश्य के लिए प्रदान किए गए थे । भगवान परमेश्वर उनके समक्ष प्रकट हुए और बोले, “मैं तुम्हें चौथा जीवनकाल देता हूँ, तुम इसका क्या करोगे ?” भारद्वाज ने उत्तर दिया कि वे इस अतिरिक्त समय का उपयोग वेदों के अध्ययन में करेंगे । चूँकि अनगिनत जीवनकालों में भी सभी वेदों का अध्ययन संभव नहीं था, इसलिए भगवान को ऋषि के निरर्थक प्रयासों पर दया आ गई और उन्होंने उन्हें सुधारने और उनके सामने आने वाली भारी कठिनाई का बोध कराने की इच्छा व्यक्त की । उन्होंने वहाँ तीन विशाल पर्वत प्रकट किए और मुट्ठी भर मिट्टी उठाकर कहा, “तुमने अब तक जो अध्ययन किया है वह इस मुट्ठी भर मिट्टी के बराबर है । तुम्हें अभी जो सीखना है वह इन पर्वतों के समान है ।” भारद्वाज ऋषि का प्रसंग वेदों के काठक भाग में मिलता है ।

इस प्रकार, हम वेदों की असीमता को देखते हैं । चार वेदों और हज़ारों शाखाओं में संहिताकरण बहुत बाद में हुआ ।

इसलिए, मंत्र उन ऋषियों के लिए रहस्योद्घाटन हैं जो गहन तपस्या करते हैं । वे ही ऋषि हैं जिनके मंत्र हैं यह माना जाता है । उनके पास उन मंत्रों को सुनने के लिए दिव्य कान हैं । योग शास्त्र कहता है कि, यदि आकाश में व्याप्त आकाशीय विस्तार और मन में सूक्ष्म रूप में विद्यमान अंतरिक्ष को एकीकृत कर दिया जाए, तो अंतरिक्ष में स्थित सभी ध्वनियाँ हमें सुनाई देने लगेंगी । जो लोग सृष्टि की सभी वस्तुओं के साथ एकरूपता का अनुभव करते हैं, केवल वही ध्वनि का अनुभव कर सकते हैं । इस प्रकार, ऋषियों ने विश्व के कल्याण के लिए मंत्रों का आविष्कार किया, न कि उनकी रचना की । फिर भी, उन्होंने मानवजाति को वह ज्ञान प्रदान करके उसकी महान सेवा की है जो पहले से ही अस्तित्व में था, लेकिन अज्ञात था । हम उस व्यक्ति को प्रणाम करते हैं जो हमें गंगाजल ला देता है । क्या उसने गंगाजल बनाया ? वह तो बस उसे हमारे लिए लाया । फिर भी, हम उसे इतनी दूर से गंगाजल लाने के लिए धन्यवाद देते हैं । इसी प्रकार उन ऋषियों की भी जितनी भी प्रशंसा की जाए कम है जिन्होंने हमें वे मंत्र प्रदान किए जो हमारी समझ से परे थे ।

योग मंत्र और मंत्र सिद्धि

सभी चौदह भुवन (लोक) एक राज्य हैं । इस राज्य पर एक सम्राट का शासन है । सभी सृजित प्राणी उसकी प्रजा हैं । सम्राट और प्रजा का काल में कोई आरंभ नहीं है । यदि कोई राज्य है और एक सम्राट है, तो नियमों का एक समूह अवश्य होगा । चूँकि तीनों अनादि हैं, इसलिए नियम भी अनादि हैं ।

यह अनादि नियम ही वेद है । यद्यपि राज्य अनादि है, समय-समय पर इसका एक अस्थायी अंत होता है जिसके बाद यह सृष्टि में पुनः प्रकट होता है । लेकिन परमात्मा, जो सम्राट है, और वेद, जो नियम है, वास्तव में अनादि और अंतहीन हैं ।

जिस अद्भुत जगत को हम जानते हैं, वह सृजित है; यह बढ़ता है और फिर कुछ लाख वर्षों के बाद जलप्रलय में लुप्त हो जाता है । पुनः इसकी रचना होती है । इस प्रकार यह चलता रहता है । हालाँकि, सम्राट और नियम स्थिर रहते हैं । प्रत्येक सृष्टि के आरंभ में, सम्राट प्रभारी अधिकारियों का निर्माण करता है । वह उन्हें आवश्यक शक्तियाँ प्रदान करता है ताकि वे अपना कार्य कर सकें ।

जैसा कि मैंने पहले कहा, योगशास्त्र कहता है कि व्यक्ति के कान और ब्रह्मांड के स्थानिक विस्तार के बीच एक कड़ी है । यदि यह स्थापित हो जाए, तो व्यक्ति को ‘दिव्य कान’ प्राप्त होते हैं । इन दिव्य कानों की सहायता से, अधिकारी लोग परमात्मा की कृपा से अनादि काल से आकाश में फैली ध्वनि तरंगों को पहचानने में सक्षम हुए । इस प्रकार वे वेदों को जानने वाले प्रथम व्यक्ति बने । वे महर्षि हैं जिनके मंत्र हैं ।

हम विभिन्न ध्वनियाँ सुनते और बोलते हैं । लेकिन प्रत्येक तंत्रिका केंद्र का कंपन, मन में एक विशेष भावना उत्पन्न करता है । कुछ वासनाएँ उत्पन्न करते हैं, कुछ आलस्य, और कुछ अन्य अप्रसन्नता । दूसरे शब्दों में, जब कोई आवेश में होता है, तो एक विशेष तंत्रिका कंपन उत्पन्न होता है और इसी प्रकार जब कोई क्रोध में होता है ।

इस प्रकार, भावना के प्रत्येक प्रकार के साथ, तंत्रिका केंद्रों में कंपनों का एक अलग समूह उत्पन्न होता है । ये हमारे वास्तविक अनुभव से स्पष्ट हैं । मानसिक शांति एक विशेष शांति उत्पन्न करती है जो चेहरे पर प्रतिबिम्बित होती है । ऐसा इसलिए होता है क्योंकि कुछ नाड़ियाँ शांत और स्थिर हो जाती हैं । इसी प्रकार आवेश और क्रोध चेहरे पर प्रतिबिम्बित होते हैं । नाड़ी की धड़कन ही इन संकेतों को उत्पन्न करती है । इस प्रकार, यदि मन द्वारा उत्पन्न कुछ भावनाओं के परिणामस्वरूप व्यक्ति की नाड़ी की धड़कन में परिवर्तन होता है, तो नाड़ी की धड़कन को नियंत्रित करके हम आवेश या क्रोध पर नियंत्रण पा सकते हैं । इस प्रकार, राजयोग, जो आत्मसाक्षात्कार की ओर ले जाने वाले मार्गों में से एक है, मन को नियंत्रित करने के मुख्य साधन के रूप में श्वास नियंत्रण (प्राणायाम) का उपयोग करता है ।

इसी प्रकार, मंत्र योग एक अन्य मार्ग है, जहाँ जब हम कोई शब्द बोलते हैं, तो प्राणवायु को गले, जीभ, होठों – ऊपरी या निचले – मुँह आदि के रिक्त स्थानों से गुजरने दिया जाता है । तभी शब्दों की ध्वनि निकलती है और सुनाई देती है । इन क्षेत्रों में स्थित तंत्रिका केंद्रों में कंपन उत्पन्न होते हैं जिनसे होकर श्वास गुजरती है और शब्द की ध्वनि उत्पन्न होती है । उचित अनुशासन के साथ उचित रूप से उच्चारित वेद मंत्र मन में आवश्यक भावनाएँ उत्पन्न करते हैं जो उच्चारण करने वाले व्यक्ति के साथ-साथ संसार का भी कल्याण सुनिश्चित करती हैं । इस प्रक्रिया में अन्य निम्नतर भावनाएँ भी बनी रहती हैं ।

परन्तु परिभाषा के अनुसार, मंत्र का अर्थ है वह जिसका बार-बार ध्यान करने से सुरक्षा प्राप्त होता है । मननात् त्रायते इति मंत्रः । ब्राह्मण का कर्तव्य है कि वह मंत्रों का बार-बार जप करे ताकि आवश्यक कंपन बार-बार उत्पन्न हों, जिसके परिणामस्वरूप उसका अपना कल्याण हो और इस प्रकार उत्पन्न शक्ति के माध्यम से संसार का समग्र कल्याण हो ।

यदि किसी को मंत्रों में सफलता प्राप्त करनी है और उनसे पूर्ण लाभ प्राप्त करना है, तो जप की एक निर्धारित विधि है । विद्वान लोग जप की छह विधियों को अनुचित मानते हैं और इनसे बचने की सलाह देते हैं ।

गीतीशीघ्री शिरःकम्पी तथालिखितपाठकः ।
अनर्थज्ञः अल्पकंठश्च षडैते पाठकाधमाः ॥

गीति वह है जो गाकर जप करता है । यह सही नहीं है । यद्यपि सामवेद का पाठ संगीतमय है, फिर भी इसे केवल स्वीकृत संगीतमय तरीके से ही किया जा सकता है, अपनी इच्छानुसार नहीं । इसके अतिरिक्त, चूँकि ध्वनि और उसके विभिन्न रूपों में शक्ति होती है, इसलिए उचित स्वर के अलावा अन्य किसी स्वर में पाठ न केवल अनुचित है, बल्कि हानिकारक भी है । इसे केवल निर्धारित विधि से ही करना चाहिए । शीघ्री वह है जो तीव्र गति से जप करता है और पाठ शीघ्र ही समाप्त कर देता है । यह भी गलत है । यदि पूर्ण लाभ प्राप्त करना है तो वैदिक शब्दों का उच्चारण प्रत्येक शब्द-ध्वनि के उच्चारण के लिए निर्धारित समय सीमा का कड़ाई से पालन करते हुए किया जाना चाहिए । शिरःकम्पी वह है जो जप करते समय अनावश्यक रूप से अपना सिर हिलाता और घुमाता है । व्यक्ति को एकाग्रता में सीधा बैठना चाहिए और नाड़ी कंपन को स्वाभाविक रूप से होने देना चाहिए । संगीतकार की तरह सिर हिलाने से कंपन बाधित होता है । लिखितपाठकः वह है जो लिखित पटकथा से पढ़ता है । यह सही नहीं है । जैसा कि मैंने पहले कहा, इसे गुरु द्वारा मौखिक जप से कान द्वारा सीखा जाना चाहिए और उचित तरीके से याद किया जाना चाहिए । अनर्थज्ञः का अर्थ है वह जो अर्थ नहीं समझता । मंत्रों का पूर्ण लाभकारी प्रभाव प्राप्त करने के लिए उनके शब्दों का अर्थ जानना आवश्यक है । अल्पकंठ वह है जो मंद स्वर में पाठ करता है । ध्वनि कंपनों का अच्छा प्रभाव हो, इसके लिए ध्वनियों को ठीक से सुना जाना चाहिए, न कि बुदबुदाया जाना चाहिए ।

ध्वनि और पदार्थ का प्रयोग

यहाँ, मुझे हल्के-फुल्के अंदाज़ में कुछ कहना चाहिए जो मेरे मन में आया । यदि किसी संस्कृत शब्द में ‘तरं’ प्रत्यय जोड़ा जाता है, तो यह दर्शाता है कि तुलनात्मक रूप से कोई वस्तु दूसरी वस्तु से बेहतर है । वीर्यवत् का अर्थ है शक्ति वाला । वीर्यवत्तरं का अर्थ है सामान्य से अधिक शक्ति । छांदोग्य उपनिषद (१.१.१०) में कहा गया है कि जो लोग ओंकार का ध्यान करते हैं और उसका अर्थ समझते हैं, उन्हें बेहतर परिणाम (वीर्यवत्तरं) प्राप्त होते हैं । “तरं” प्रत्यय के प्रयोग से स्पष्ट है कि जो लोग ओंकार का अर्थ समझे बिना ध्यान करते हैं, उन्हें कम परिणाम ही प्राप्त होते हैं । हालाँकि, आदि शंकराचार्य अपनी टीका में कहते हैं कि, यद्यपि अर्थ समझने वालों के बराबर नहीं, फिर भी अन्य लोगों को भी पर्याप्त लाभ मिलता है ।

चाहे कोई अर्थ समझे या न समझे, इस विश्वास के साथ किया गया कार्य कि पूर्वकाल के विद्वानों ने उसे करने का निर्देश दिया है, अच्छे परिणाम देता है । अन्य कार्यों की अपेक्षा, वैदिक जप के अभ्यास में इस बात पर अधिक बल दिया जाना चाहिए, क्योंकि केवल सही स्वर-उच्चारण से उत्पन्न कंपन ही आवश्यक परिणाम उत्पन्न करते हैं । यहाँ, ध्वनि द्वारा उत्पन्न प्रभाव सर्वोपरि है । अर्थ का प्रभाव गौण है ।

इस पर हल्के-फुल्के अंदाज़ में विचार करते हुए, कभी-कभी मुझे लगता है कि अर्थ जानने से सामान्य (वीर्यवत्त) परिणाम प्राप्त होते हैं; अज्ञानता बेहतर (वीर्यवत्तारम) परिणाम देती है । मैं कैसे सोचता हूँ कि समझ की कमी बेहतर परिणाम देती है और नहीं समझने की ?

एक कलेक्टर है । (भारत में कलेक्टर किसी राज्य के राजस्व ज़िले का प्रमुख होता है ।) एक किसान कलेक्टर को संबोधित एक याचिका लिखने के लिए एक वकील को नियुक्त करता है । वह स्वयं कलेक्टर को यह याचिका प्रस्तुत करता है । यद्यपि वह अनपढ़ है, फिर भी उसकी याचिका कलेक्टर से अनुकूल आदेश की प्रार्थना के साथ समाप्त होती है । कलेक्टर स्वाभाविक रूप से यह निष्कर्ष निकालेगा कि बेचारा ज़्यादा नहीं जानता, लेकिन उसे अपने न्याय पर विश्वास है, और इसलिए वह अनुकूल आदेश देता है । मंत्रों के साथ भी यही स्थिति है । उनका पूरा अर्थ केवल ईश्वर ही जानता है । हालाँकि, हमें अपने दृष्टिकोण में शरारती नहीं होना चाहिए । यदि वकील के तर्क में कोई त्रुटि है, तो कलेक्टर स्वाभाविक रूप से नाराज़ हो जाता है । अगर वह सोचता कि किसान को भी गलती का एहसास है, तो वह और भी नाराज़ होता, जबकि अगर कलेक्टर को लगता कि किसान गलती के लिए ज़िम्मेदार नहीं है, और अगर कलेक्टर को लगता कि किसान वकील की गलती के लिए ज़िम्मेदार नहीं है, तो वह किसान के प्रति अनुकूल रुख़ रखता । इसलिए, यह कहना सही नहीं है कि, “मुझे समझ नहीं आ रहा । तो फिर इसका जाप करने से क्या फ़ायदा ?” जैसा कि मैंने कहा, बिना समझे जप करना और भी बेहतर काम करता है, बशर्ते उसमें मासूमियत हो । यह मज़ाक के लिए कहा गया था । हालाँकि, आजकल की दुनिया में बुद्धि तेज़ हो गई है । जब मैं देखता हूँ कि अशिक्षितों की विनम्रता कमज़ोर हो रही है, तो मुझे लगता है कि शायद श्रद्धाहीन बुद्धि के बजाय बुद्धिहीन श्रद्धा रखना बेहतर होगा ।

लेकिन, सच तो यह है कि विनम्रता के साथ बुद्धि भी होनी चाहिए । हालाँकि मंत्रों का अर्थ उनके सही उच्चारण के आगे गौण है, क्योंकि मंत्र हमारे धार्मिक नियम हैं, इसलिए हम उनके अनुसार तभी कार्य कर सकते हैं जब उनका अर्थ समझ में आ जाए । इसलिए मंत्रों के उच्चारण को और अधिक शक्तिशाली बनाने के लिए उनके महत्व को भी समझने का प्रयास करना चाहिए ।

वेदों का उच्चारण भव्यता के साथ किया जाना चाहिए, ताकि उनकी ध्वनि ठीक से सुनी जा सके । वैदिक मंत्र न केवल उन्हें ठीक से जपने वाले की नाड़ी में लाभकारी कंपन उत्पन्न करते हैं, बल्कि उन्हें सुनने वालों में भी समान कंपन उत्पन्न करते हैं । चूँकि यह वातावरण में फैलता है, इसलिए यह इहलोक और परलोक में कल्याण सुनिश्चित करता है । इसलिए, इसका उच्चारण श्रव्य रूप से किया जाना चाहिए ताकि यह वातावरण में दूर-दूर तक फैल सके ।

वेदों की शक्ति

वेदों की मुख्य विशेषताएँ, जैसा कि पहले ही उल्लेख किया जा चुका है, ये हैं: (१) इनका कोई आरंभ नहीं है (अनादि), (२) इनका कोई मानवीय रचयिता नहीं है (अपौरुषेय), और (३) ये समस्त सृष्टि के मूल में हैं । लेकिन इतना ही नहीं है।

उनके उच्चारण के दौरान उत्पन्न ध्वनि हमारे तंत्रिका केंद्रों को सक्रिय करती है और वातावरण को भी प्रभावित करती है, जिसके परिणामस्वरूप विश्व का व्यक्तिगत और सामूहिक कल्याण होता है । सामूहिक कल्याण केवल मानवता को ही संदर्भित नहीं करता ।

वेदों जितना जीवों और पौधों की भलाई पर जोर किसी और धार्मिक ग्रंथ में नहीं दिया गया है । वेद कहता है, “न केवल दो पैरों वाले, बल्कि चार पैरों वाले प्राणियों को भी समृद्ध होना चाहिए ।” (शं नो अस्तु द्विपदे शं चतुष्पदे) । यह इससे भी आगे बढ़कर झाड़ियों, पेड़ों, पहाड़ों और नदियों – बल्कि समस्त सृष्टि की भलाई पर जोर देता है ।

वैदिक ग्रंथों में अर्थों का भंडार है । अपनी काव्यात्मक भव्यता के अलावा, इनमें सुव्यवस्थित समाज और सामाजिक जीवन के लिए विस्तृत निर्देश, महान दार्शनिक सत्य और यहाँ तक कि वैज्ञानिक नियम भी निहित हैं ।

वेद मंत्रों, जो मूलतः ध्वनि के कंपन हैं, का मौखिक अर्थ होना आवश्यक नहीं है जैसा कि हम आमतौर पर समझते हैं ।

दैनिक जीवन में, हम राग आलापना, या संगीत के स्वरों का विस्तृत चित्रण या राग पाते हैं जिनमें कोई शब्द नहीं होते, केवल एक प्रतीकात्मक अर्थ होता है, फिर भी वे हर्ष और शोक की भावनाएँ उत्पन्न करने में सक्षम होते हैं । प्रयोगों से पता चला है कि वाद्य संगीत से सब्जियों की पैदावार बढ़ी है । इससे पता चलता है कि ध्वनि में सृजनात्मक क्षमता होती है । इसके अलावा, ध्यान देने योग्य सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि चूँकि ध्वनियाँ एक वाद्य यंत्र से निकलती हैं, इसलिए प्रभावोत्पादकता के लिए किसी शब्द या अर्थ की आवश्यकता का कोई प्रश्न ही नहीं उठता । संगीतमय ध्वनि का भी अपना प्रभाव होता है ।

इसलिए, वेदों की उत्कृष्ट विशेषता यह है कि मंत्रों के उच्चारण के समय उनकी ध्वनि का भी एक अर्थ होता है, शब्दों के अलावा, जो अर्थपूर्ण भी होते हैं ।

इस प्रकार, वेदों की महानता उनके मंत्रों में निहित है जिनमें ध्वनि और अर्थ दोनों गुण हैं । एक गोली कड़वी हो सकती है, लेकिन स्वास्थ्य के लिए अच्छी हो सकती है । एक मिठाई का स्वाद अच्छा हो सकता है, लेकिन नुकसानदायक हो सकता है । कितना अच्छा होगा कि कुछ ऐसा हो जो न केवल स्वादिष्ट हो, बल्कि मीठे टॉनिक की तरह स्वास्थ्य को भी बेहतर बनाए ? वेद मंत्रों का यह दोहरा लाभ है ।

वेदों में इस लोक और परलोक में कल्याण सुनिश्चित करने के निर्देश हैं । यह व्यक्ति के जन्म से लेकर उसके अंतिम श्वास तक और उसके बाद उसके मोक्ष को सुनिश्चित करने के लिए उसके कर्मों का मार्गदर्शन करता है। यह केवल व्यक्तिगत मोक्ष तक ही सीमित नहीं है । समाज को कैसा व्यवहार करना चाहिए, सामान्य व्यक्ति के कर्तव्य क्या हैं, एक ब्राह्मण को कैसा आचरण करना चाहिए, राजा को देश पर कैसे शासन करना चाहिए, स्त्रियों का आचरण कैसा होना चाहिए – ये सभी बातें वेदों में संहिताबद्ध रूप में हमारे सामने प्रस्तुत की गई हैं ।

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