‘द वेदाज’ नामक पोथी सँ एक गोट महत्वपूर्ण लेख – मैथिली जिन्दाबाद केर पाठक लेल
मूल लेखकः श्री चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वती (काञ्चीपीठक ५९वाँ शंकराचार्य) – भावानुवादः प्रवीण नारायण चौधरी
वैदिक धर्म पर प्रामाणिक ग्रंथ
आइ विभिन्न विषय सब पर अनेकों पुस्तक सब उपलब्ध अछि । प्रत्येक धर्म पर अनेकों पुस्तक सब अछि । हालांकि, प्रत्येक धर्म मे कोनो खास पुस्तक केँ एकटा विशेष स्थान देल गेल छैक । प्रत्येक धर्मक एकटा संस्थापक होइत छथि आर हुनकर लिखल आ कहल उपदेश सब केँ ताहि धर्म मे विशेष स्थान देल जाइत छैक । एना मानल जाइत छैक जे संस्थापकक पुस्तक सर्वथा सही आ प्रामाणिक होइत अछि । गोटेक मामिला मे, धार्मिक पुस्तकक पूजा सेहो कयल जाइत अछि आर ओकरा मंदिर मे स्थापित कयल जाइत अछि । उदाहरण लेल, सिख समुदाय एना करैत छथि । ओ सब अपन पवित्र ग्रंथ केँ श्रद्धापूर्वक ‘ग्रंथ साहिब’ कहैत छथि । तहिना, प्रत्येक धर्म आत्म-सुधार (अपन नीक) आर मोक्ष (मुक्ति) केर मार्ग देखेबाक लेल एकटा विशेष ग्रंथ केँ अपनेने अछि । यद्यपि कोनो पुस्तकक नाम ओकर संस्थापकक नाम पर राखल जा सकैत अछि, लेकिन मानल जाइत अछि जे ओहि मे भगवानक अपन शब्द रहल करैछ – संस्थापक या विद्वान या पैगंबर केर माध्यम सँ आबायवला बात हुनकहि आज्ञा भेल करैत अछि । तेँ, ओकरा “प्रकट ग्रंथ” कहल जाइत छैक । हम हिंदू सब अपन पवित्र ग्रंथ वेद केँ ‘अपौरुषेयम्’ कहैत छी – जेकर अर्थ भेल जे ओ पुरुष या मनुष्य द्वारा रचित नहि अछि, मनुष्य त ईश्वर केर वचन सभक प्रचार-प्रसारक वास्ते एकटा साधन मात्र होइछ ।
ओ प्रामाणिक पुस्तक कोन छी जाहि पर केकरो धर्म आधारित अछि ? आन धर्म सभक लोक एहि प्रश्नक उत्तर बिना कोनो हिचकिचाहट केँ दय सकैत छथि । ईसाई सब एकरा ‘बाइबिल’ कहैत अछि; मुसलमान सब एकरा ‘कुरान’ कहैत अछि; बौद्ध एकरा ‘धम्मपद’ कहैत अछि; आर पारसी एकरा ‘जेंद अवेस्ता’ कहैत अछि । लेकिन हम हिंदू सब लेल, एहेन कोनो उत्तर नहि अछि कियैक तँ ई कोनो एकटा पुस्तक नहि अछि; नहिये एकर लेखक कोनो मनुष्य केँ मानल गेल छैक ।
किछु लोक रामायण केँ अपन पवित्र ग्रंथ मानैछ – किछु आर लोक, भगवद् गीता केँ; तैयो आर लोक कहत जे वेदांतिक ग्रंथ टा अनुसरण करबा योग्य पुस्तक सब थिक । हमेशा एहेन नहि छलैक । दृष्टिकोण मे भ्रम आ मतभेद एहि लेल उत्पन्न भेलैक अछि, कियैक तँ जेतय आर धर्म सब मे बुनियादी धार्मिक शिक्षा एकटा बुनियादी पाठ्य पुस्तक केर माध्यम सँ प्रदान कयल जाइत छैक, ओतहि हमरा सब लग एहेन कोनो प्रारंभिक धार्मिक शिक्षा नहि देल जाइछ । ताहि लेल आइ-काल्हि हम सब देखैत छी जे अपने आपस मे अपन पवित्र ग्रंथ सभक आलोचना आर निन्दा करैत रहैत छी, जखन कि आर धर्मक अनुयायी सब अपन धर्मक ग्रंथ सभक रक्षा करैत अछि आर कहियो-कहियो अन्य धार्मिक सिद्धांत सभक निन्दा सेहो करैत अछि ।
यदि हम सब अपन धर्म केर आवश्यक ग्रंथ सब केँ बच्चे मे सीख ली, जेना कि आर धर्मावलम्बी सब कय रहल अछि, त हमरा सब केँ अपन धार्मिक ग्रंथ सभक बारे मे सन्देह नहि होयत, नहिये हमरा सब केँ एहि बारे मे आइ जेकाँ अज्ञानता होयत ।
हमरा सब केँ ई बुझय पड़त जे हमर धर्म कि थिक आर से केवल हमरा सभक पवित्र ग्रन्थ सभक माध्यम टा सँ सीखल जा सकैत छैक । ताहि सँ पहिने, हमरा सब केँ ईहो जानय पड़त जे हमरा सब केँ धर्म कियैक रखबाक चाही । धर्मक अर्थ केवल अनुष्ठान नहि होइछ । एकर अर्थ अछि धर्म । धर्म कि अछि ? ओ जेकर पालन कयला सँ हम सब सन्तुष्ट आ प्रसन्न रहब । धर्म और धर्मक सिद्धांत सब केँ जनबाक लेल, हमरा सब केँ किछु विशिष्ट ग्रंथ या पुस्तक सभक सन्दर्भ लेबाक चाही । एहेन पुस्तक सब केँ “धर्मप्रमाण” कहल जाइत अछि । “प्रमाण” केर अर्थ भेल जे सत्य केँ स्थापित कय सकय । त “धर्मप्रमाण” केर अर्थ भेल जे लोक केँ धर्म केर सच ज्ञान दैत अछि । ओ कोन पवित्र ग्रंथ अचि जे सत्य धर्मक बारे मे बात करैत अछि ?
अंगानि वेदश्चत्वारो मीमांसा न्याय विस्तरः
पुराणं धर्मशास्त्रं च विद्या ह्येताश्चतुर्दशः ।
ई चौदह टा अछि आ ओ थिक : चारि वेद (जेना ऋग, यजुर, साम, अथर्व); छह वेदांग या वेदक सहायक, अर्थात्, ‘शिक्षा’ जे व्यंजना ओ उच्चारण थिक; ‘व्याकरण’ जे व्यंजना ओ उच्चारणक नियम थिक; ‘छन्द’ या मीटर (मापन आधार); ‘निरुक्त’ या व्युत्पत्ति; ‘ज्योतिष’ या खगोल विज्ञान; ‘कल्प’ या प्रक्रिया, ‘मीमांसा’ या वैदिक ग्रंथ केर व्याख्या; ‘न्याय’ या तर्क; ‘पुराण’ या पौराणिक कथा सब आर ‘धर्म शास्त्र’ जाहि मे आचार संहिता समाहित अछि ।
एहि मे ज्ञान आर बुद्धि निहित अछि । ताहि लेल एहि चौदह केँ ‘विद्यास्थान’ केर नाम सँ जानल जाइत अछि ।
एहि चौदह मे चारि आर जोड़ल जा सकैत अछि जेकरा ‘उपांग’ या वेदांग सभक परिशिष्ट कहल जाइत अछि । ओ सब अछिः (१) आयुर्वेद या जीवन केर विज्ञान; (२) अर्थशास्त्र, धन या अर्थ केर विज्ञान; (३) धनुर्वेद, शस्त्र, मिसाइल आर युद्ध सँ सम्बन्धित विज्ञान आर (४) गंधर्ववेद या संगीत, नृत्य, नाटक आदि जेहेन ललित कला पर ग्रंथ ।
चारि टा वेद अपना सभक धर्म केर मूल छी । ओ सर्वोच्च अधिकारिक – प्रमाण थिक । वेद मूल संरचना बनबैत अछि जाहि सँ वेदक बारे पूरा बुझबाक (समझ पूरा करबाक) लेल छह गोट वेदांग आर चारि गोट उपांग निकालल गेल अछि । वेदक अध्ययन एकर अन्य दस घटकक संग कयल जेबाक चाही ।
कोनो आरम्भ नहि – कियो रचयिता नहि
वेद केँ अनादि कहल जाइत छैक, यानि कालक दृष्टि सँ अनादि । अर्थात्, एहि सँ पहिने या एहि सँ पुरान कोनो वस्तु अस्तित्व मे नहि रहल । एकर अर्थ भेल जे ई सर्वकालिक रूप सँ विद्यमान रहल अछि । एकरा केना स्वीकार कयल जा सकैछ ? कोनो पुस्तकक एकटा रचयिता होयब आवश्यक छैक; यदि बेसी नहि तँ कम सँ कम एकटा त होइते टा छैक । पुरना नियम अनेकों पैगम्बर लोकनिक कहल बात (उपदेश) केर संग्रह थिक । कुरान मे ओ सब बात अछि जे पैगंबर मोहम्मद द्वारा प्रचारित कयल गेल । ई सब कोनो समय अस्तित्व मे रहथि । हुनकर समय सँ पहिने, हुनकर शिक्षा सब उपलब्ध नहि छल । एहि तरहें, तार्किक रूप सँ, वेदहु केर एक या एक सँ बेसी रचयिता हेबाक चाहैत छल जे कोनो न कोनो समय रहल हेताह । हुनकर समय सँ पहिने, हुनकर शिक्षा सब उपलब्ध नहि हेबाक चाहैत छल । भ’ सकैत छैक, ई बहुते समय पहिनेक बात होइ; बहुत-बहुत समय पहिने; लाखों वर्ष पहिने के बात होइ । तैयो, किछु लोकक मुताबिक, वेद केँ ‘अनावश्यक’ कहनाय गलत होयत । यदि कियो ई मामि लियए जे वेद मनुष्य सब द्वारा लिखल गेल छल, त एहेन सन्देह स्वाभाविक रूप सँ उत्पन्न होइत अछि । अन्यथा, कोनो पुस्तक केना लिखल जा सकैत छैक ? कोनो पुस्तक लेल ग्रन्थकारिता एकटा पूर्व अपेक्षा थिक आ ग्रन्थकार केर कोनो न कोनो कालखंड मे अस्तित्व अवश्य रहल होयत । सामान्य तर्क एहि दावीक समर्थन नहि करैछ जे कोनो पुस्तकक कियो ग्रन्थकार नहि भ’ सकैछ ।
तेँ, एकटा सिद्धांत ई प्रतिपादित कयल गेल जे ‘ऋषि’ कहल जायवला विकसित (बौद्धिक) लोक सब वेद केर रचना कयलनि । एहेन कहल जाइछ जे वेद मे अनेकों ‘सूक्त’ या ज्ञानक वचन, अनेकों ऋषि सभक कथन छन्हि ।
वेद मंत्रक पाठ करय सँ पहिने, ओहि विशेष भाग सँ सम्बन्धित ऋषि या मुनिक नाम, ओहि ‘छंद’ या छंद जाहिमे मंत्र प्रकट होइत छैक या रचल गेल छैक आ ओहि मंत्रक देवता या अधिष्ठाताक उल्लेख कयनाय प्रथागत छैक । चूँकि वेद मंत्र मे अनेकों ऋषि सभक उल्लेख अछि, ताहि लेल ई मान्यता छैक जे वेद सभक अनेकों ग्रन्थकार हेबाक चाही । अधिकांश मामिला मे, एक्के टा नामवला दुइ वा अधिक ऋषिक भ्रम सँ बचबाक लेल ऋषिक वंशावलीक सेहो उल्लेख कयल जाइत छैक । उदाहरणक लेल, “अगस्त्यो मैत्र-वारुणी” अर्थात् मित्र और वरुण केर पुत्र अगस्त्य । त, अगर कोनो मंत्र हुनकर नाम पर अछि, त कि एकर मतलब ई नहि जे अगस्त्य ओकर रचयिता थिकाह ? त कि एहि सँ ई सिद्ध नहि होइत छैक जे हुनकर समय सँ पहिने ओ वेद मंत्र अस्तित्वहीन छल ? तखन फेर हम सब ओकरा “अनादि” केना कहि सकैत छी ? यानी अनादि ? लेकिन वास्तविकता ई छैक जे ई ऋषि, या एना कहू जे कोनो आने ऋषि, मंत्रक रचना नहि कयलनि । एहि द्वारे ऋषि सब केँ रचयिता नहि कहल जा सकैछ ।
परिभाषा अनुसार, वेद “अपौरुषेय” या गैर-मानवीय मूल केर अछि । “पौरुषेय” मानवक रचना छी । चूँकि ई मानवक रचना नहि छी तेँ ऋषि लोकनि जे मानव रहथि से नहि लिखि सकैत छलथि । अगर ओ सब ई लिखने रहितथि त हुनका मंत्र कर्ता या मंत्र रचयिता कहल जइतन्हि । लेकिन वास्तव मे, ओ केवल मंत्र द्रष्टा यानि मंत्रक द्रष्टा कहल जाइत छथि । एकर अर्थ भेल जे ऋषि सब वेद केँ प्राप्त कयलनि यानि खोज कयलनि, नहि कि ओकर रचना या सृजन कयलनि ।
जखन कियो कहैत अछि जे कोलंबस अमेरिकाक खोज कयलक, त एकर कि अर्थ भेलैक ? कि ओ अमेरिकाक निर्माण कयलक ? नहि । ओ पहिनहिं सँ अस्तित्व मे रहल अमेरिका केँ दुनियाक सोझाँ आनय मे मदति कयलक । न्यूटन, आइंस्टीन व अन्य प्रसिद्ध वैज्ञानिक सब ओ नियम नहि बनेलाह जेकरा लेल हुनका सब केँ सम्मानित कयल जाइत छन्हि । कि कोनो वस्तु गुरुत्वाकर्षणक कारण खसैत अछि त न्यूटन सँ पहिने ओ अस्तित्व मे नहि छल ? ई वैज्ञानिक सब पहिनहिं सँ कार्यरत नियम सब केँ पहिने बुझलनि, आ ओकरा पहिल बेर दुनिया केँ बतेलनि । तहिना, ऋषि लोकनि पहिनहिं सँ विद्यमान मंत्र सब केँ बुझलनि आ ओकरा दुनिया केँ बतेलनि । मंत्र हमेशा सँ अस्तित्व मे छल । जहिया सँ ऋषि सब ओकर खोज कयलनि, हुनकर नाम मंत्रक संग जुड़ि गेलनि । तेँ ऋषि सब केँ पहिने सँ विद्यमान, लेकिन ताबत धरि अज्ञात वेदमंत्र केँ मनुष्य लोकनिक ज्ञान मे अनबाक श्रेय देल जेबाक चाही । एहि द्वारे हम सब हुनकर नाम लैत समय अपन सिर केँ छूबिकय हुनकर स्मृति केँ नमन करैत छी । ई हुनकर महान सेवाक सम्मान मे एकटा संकेत अछि । हम सब मंत्रक पाठ सँ पहिने हुनकर नाम के उल्लेख कयकेँ एकरा स्वीकार करैत छी । अच्छा, अगर ऋषि सब मंत्र सभक खोज कएने छलति, त खोज सँ पहिने ओ कतय विद्यमान छल ? यदि ओकरा “अनादि” कहल जाइत अछि, त कि एकर अर्थ ई अछि जे ओ सदा सँ छल ? ओ कतय विद्यमान छल ? अंतरिक्ष मे ?
यदि हम सब मानि ली जे वेद मंत्र प्रथम सृष्टिक संगहि प्रकट भेल, त एकर अर्थ ई होयत जे महान ईश्वर एकरा सृष्टिक संगहि रचलनि । कि ईश्वर वेद केँ लिखिकय ओकरा भण्डारित (संग्रहित) कयलनि जाहि सँ ऋषिगण बाद मे ओकर अंश (टुकड़ा) मे खोजि सकलाह ? कोनो हाल मे, यदि वेद प्रथम सृष्टिक संगहि अस्तित्व मे आयल, त ओकरा अनादि नहि कहल जा सकैछ । ब्रह्मा द्वारा वर्तमान सृष्टिक गणना समय केर आधार पर कयल जाइछ । चारू युग (कृतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग) केर एकटा निश्चित अवधि होइत छैक । ब्रह्माक लेल एक हज़ार चतुर्युग चक्रक रात्रि सँ भिन्न एकटा दिन मानल जाइछ । एकटा आर हज़ार चतुर्युग चक्र हुनकर रात्रिक निर्माण करैछ । एहि आधार पर, ई मानल जाइछ जे आइ ब्रह्माक आयु पचास वर्ष सँ किछु बेसी छन्हि । एहि आधार पर हुनकर आयु सौ वर्षक छन्हि । एहि सँ पहिने, ई ब्रह्मा नहि रहथि; एकटा अन्य ब्रह्मा अस्तित्व मे रहथि ।
अतः वर्तमान ब्रह्म आ सृष्टि ‘अनादि’ नहि अछि । फेर ‘अनादि’ कि अछि ? परमात्माक अस्तित्व ब्रह्मा सँ सेहो पहिने, कोनो ब्रह्मा सँ पहिनहिं रहल होयत । ब्रह्म, या निराकार ईश्वर, हर समय विद्यमान रहल छथि । ओ काल केर निरन्तरता थिकाह, जाहि सँ ब्रह्मांड आ समस्त पदार्थ समय-समय पर प्रकट आ लुप्त होइत रहैत अछि । परमात्मा ब्रह्माक माध्यम सँ अपन सृष्टि करैत छथि, विष्णुक माध्यम सँ सृष्टिक पालन करैत छथि तथा रुद्र (शिव) केर माध्यम सँ संहार करैत छथि । अन्ततः ब्रह्मा, विष्णु आ शिव केर सेहो अस्तित्व समाप्त भ’ जाइत छन्हि । ताहि हेतु ब्रह्माक आयु गणना योग्य अछि । अपन सौ ‘ब्रह्मा वर्ष’ केर अवधि पूरा कयलाक बाद, ओ परमात्मा मे विलीन भ’ जाइत छथि । एकटा अन्य ब्रह्मा कार्यभार सम्हारैत छथि ।
वेदक बात करी तँ, कि परमात्मा या सर्वोच्च सत्ता द्वारा कोनो ब्रह्मा सँ पहिने, स्वयं सृष्टि सँ पहिने वेदक रचना कएने छलथि ?
शास्त्र सब सँ ज्ञात होइत अछि जे वेद सृष्टि सँ पहिने अस्तित्व मे छल, कियैक तँ कहल जाइछ जे स्वयं ब्रह्मा द्वारा वेद मंत्रक सहायता सँ सृष्टिक कार्य कयल गेल छल, जे केवल अंतरिक्षा मे ध्वनिक रूप मे विद्यमान् छल । एकर पुष्टि पुराण मे सँ एक, श्रीमद्भागवत पुराण सँ होइछ, जाहि मे आर बातक अलावे, ब्रह्मा द्वारा सृष्टिक रचनाक वर्णन अछि ।
त कि ई अनुमान लगेनाय सही अछि जे ईश्वर (परमात्मा) आ वेद दुनू अनादि अछि ? विचार कयला पर, एना प्रतीत होइछ जे ई धारणा सेहो सही नहि छैक । यदि ई बुझल जाय जे ईश्वर द्वारा सृष्टिक रचना सँ पहिनहिं वेद सभक रचना कयल गेल छल, त एकर तात्पर्य ई हेतैक जे (ओकर रचना सँ पहिने) एकटा समय एहेन छल जहिया ओ अस्तित्व मे नहि छल । एकर ई हेतैक जे, यद्यपि वेद सभक रचना ब्रह्मांड आ जीवन सँ पहिने भेल छलैक, वेद सभक रचना ईश्वर द्वारा समयक अवधारणाक रचनाक बादे भेलैक । एहि सँ “अनादि” विशेषणक सेहो खंडन हेतैक ।
यदि ईश्वर आ वेद दुनू अनादि होइतथि, त ओ वेद सभक रचना नहि कय सकैत छलथि । यदि ओ एकर रचना कएने रहितथि, त ओकर एकटा आरम्भ होइतैक । सब वस्तु ईश्वरहि सँ उत्पन्न भेल अछि । चूँकि ईश्वर सँ भिन्न किछुओ नहि अछि, ताहि लेल ईश्वर आ वेद दुनू बिना आरम्भक संग-संग अस्तित्व मे रहल होयत । लेकिन ई सही प्रतीत नहि होइत अछि । ईश्वर द्वारा सृजित नहि होयब, हुनका सँ स्वतंत्र अस्तित्व नहि होयब, तैयो अनादि (बिना आरंभ केर) होयब – भला ई केना संभव छैक ?
ई भ्रम स्वयं वेद द्वारा दूर कयल गेल अछि । बृहदारण्यक उपनिषद् (२.४.१०) मे कहल गेल छैक जे ऋग्, यजुर्वेद, सामवेद आर अथर्ववेदक रूप ईश्वर केर श्वास थिक । ‘निश्वासितम्’ शब्द श्वासक निःश्वसन केर वास्ते प्रयुक्त होइत अछि ।
कि हम सब श्वासक बिना अस्तित्व मे रहि सकैत छी ? एहि प्रकार सँ, वेद मानू परमात्मा या परम आत्मा केर प्राणवायु थिक । यदि परमात्मा, जिनकर काल (समय) मे कोनो आरम्भ नहि छन्हि, सदा विद्यमान छथि (काल मे कोनो अन्त नहि छन्हि), त वेद हुनकर प्राणवायुक रूप मे स्वाभाविक रूप सँ अनादि अछि, कियैक तँ ओ हुनकहि संग सह-अस्तित्व मे अछि ।
एतय ध्यान देबा योग्य बात ई छैक जे इहो नहि कहल गेल छैक जे ईश्वर वेद केँ अस्तित्व मे अनलनि । ई कहनाय गलत हेतैक जे हम अपन श्वास स्वयं बनेलहुँ । ई ओहि समय सँ अस्तित्व मे अछि जहिया सँ हमर अस्तित्व शुरू भेल । ईश्वर आर वेद सेहो एहिना छथि । एतय तक कि इहो नहि कहल जा सकैत अछि जे वैह एकर रचलनि अछि । ई दुनू सदैव एक संग विद्यमान् रहल छथि ।
वेदभाष्य (वेद उपर भाष्य) लिखयवला विद्यारण्य अपन गुरु केँ ईश्वर या स्वयं परमात्मा जेकाँ मानैत छथि, आर हुनकर स्तुति करैत कहैत छथि, “जिनकर ‘निश्वासितम्’ वेद थिक।” विद्यारण्यक भाष्य हमरा सब केँ ई त बतबैत अछि जे हुनकर गुरु वेद सब मे कतेक गहींर डूबल छलथि, संगहि, एहि पर सेहो जोर दैत अछि जे वेद ईश्वरक रचना सेहो नहि थिक ।
भगवान कृष्ण गीता मे कहैत छथि, “हम ओ व्यक्ति छी जेकरा सब वेद सँ जानल जाइत अछि – वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः।” एकर अलावे, स्वयं केँ वेदक रचयिता कहबाक बदला, ओ स्वयं केँ समस्त वेदान्तक विषय – वेदांतकृत् – कहैत छथि, वेदकृत् नहि । ओ स्वयं केँ सब वेदक ज्ञाता – वेदवित् कहैत छथि । वेदान्त मे वर्णित अपन निरपेक्ष आर वैचारिक अवस्था मे, स्वयं केँ मानव विकासक अन्तिम उत्पाद बनेबा सँ पहिने, सृष्टि सँ सेहो पहिने, ईश्वर और वेद सह-अस्तित्व मे रहथि ।
गीता जेकाँ, भागवत पुराण सेहो ईश्वर द्वारा वेद सभक रचना करबाक बात नहि करैछ । कहल जाइछ जे वेद हुनकर हृदय सँ प्रकट भेल अछि । ‘स्पुत’ शब्द केर अर्थ अछि पहिनहिं सँ विद्यमान कोनो वस्तुक अचानक प्रकट होयब । ई कोनो एहेन स्थितिक उल्लेख नहि करैछ जेतय पहिनहिं सँ अस्तित्व मे नहि रहल कोनो वस्तु केँ अस्तित्व मे आनल गेल होइक । ब्रह्मा जे सबसँ पहिने जन्म लेलनि वैह प्रथम ऋषि छलथि जे सब वेद मंत्रक ज्ञान प्राप्त कयलथि । हुनका वेदक ज्ञान ईश्वर द्वारा करायल गेलनि । केना ? कि ईश्वर ब्रह्मा द्वारा सीखबाक लेल वेद पढ़िकय सुनेने रहथि ? नहि, ओ अपन हृदय सँ हुनका प्रदान कएने रहथि । भागवत पुराणक आरंभिक श्लोक मे एकरा ‘तेने ब्रह्म हृदाय आदिकवये’ कहल गेल अछि । अतः ई स्पष्ट अछि जे वेद सदैव हुनकर भीतर हुनकर श्वास केर रूप मे विद्यमान छल । ईश्वरक इच्छा होइते ब्रह्मा केँ ओकर ज्ञान भ’ गेलनि । ब्रह्मा भगवानक हृदय सँ प्राप्त स्पंदन सँ, आ स्पन्दन सँ प्राप्त मार्गदर्शन सँ अपन सृष्टिक शुरुआत कयलनि । कि ई सम्भव छैक ? कि स्पन्दन केर कोनो महत्व भ’ सकैत छैक ? (आगू पढ़नाय जारी राखब !)
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Authoritative Text on Vedic Religion
There are many books available today on a variety of subjects. There are several books on each of the religions. However, the pride of place is given in each religion to a particular book. Each religion has a founder and his writings and preaching are given pride of place in that religion. It is believed that the founder’s book is the most authentic and authoritative. In some cases, the book is worshipped and enshrined in a temple. For example, the Sikhs do so. They reverently refer to their holy book as the ‘Granth Sahib’. Similarly, every religion has adopted a particular text as showing the path to self betterment and salvation. Although a book may be named after its founder, it is believed to contain the Lord’s own words – His commandments coming through the founder or Savant or Prophet as the case may be. They are, therefore, called “Revealed Texts”. We Hindus call the Vedas, our sacred texts, as ‘Apourusheyam’ – meaning not authored by Purusha or man, man being merrily an instrument of God to spread His words.
What is the authoritative book on which one’s religion is based? People of other religions can unhesitatingly reply to this question. The Christian call it the ‘Bible’; the Mohemmedans call it the ‘Koran’; to the Buddhists it is ‘Dhammapada’; and to the Parsees, the ‘Zend Avesta’. But for us Hindus, there is no similar ready answer because it is not a single book; nor is the authorship attributed to any human being.
Some will consider the Ramayana to be our sacred text – some others, the Bhagavad Gita; yet others will say that the Vedantic texts are the books to be followed. This was not always so. The confusion and divergence in view points have arisen because, whereas in other religions there is a basic religious education provided through a basic text book in Hinduism, we have no such preliminary religious education being insisted upon. Hence nowadays we find that we ourselves criticize and denigrate our holy books while the followers of other religions safeguard their own text and sometimes even vilify other religious doctrines.
If we learn the essential texts of our religion even in our childhood as other religionists are doing, we will not be doubting about our religious texts, nor will we have the present-day ignorance about them.
We have to know what our religion is and this can be learnt only through our sacred texts. Before that, we must know why we should have a religion. Religion does not mean mere ritual. It means Dharma. What is Dharma? That which, if we follow, will make us contented and happy. To know Dharma and the principles of Dharma, we must refer to certain specific texts or books. Such books are referred to as “Dharmapramana”. “Pramana” means that which establishes the truth. So “Dharmapramana” means that which gives one the true knowledge of Dharma. Which are the sacred texts that speak about true Dharma?
Angaani Vedaaschatwaro Meemaamsa Nyaaya Vistarah
Puraanam Dharmasaastramcha Vidyaahyetaah Chaturdasa.
These are fourteen and they are : The four Vedas (e.g. Rig, Yajur, Sama, Atharva); the six Vedaangas or auxilliaries to the Vedas, viz., ‘Siksha’ which is euphony and pronunciation; ‘Vyaakarna’ which is grammar; ‘Chandas’ or metre; ‘Nirukta’ or etymology; ‘Jyotisha’ or astronomy; ‘Kalpa’ or procedure, ‘Meemaamsa’ or interpretation of Vedic texts; ‘Nyaaya’ or logic; ‘Puraana’ or mythology and ‘Dharma Saastras’ which contain the codes of conduct.
Knowledge and wisdom are enshrined in these. Hence these fourteen are known as the ‘Vidyaasthaanas’.
To these fourteen may be added four more which are called ‘Upaangas’ or appendices to the Vedaangas. They are: (1) Aayurveda or the science of life; (2) Arthasaastra, the science of wealth or economics; (3) Dhanur Veda, the science relating to weaponry, missiles and warfare and (4) Gaandharva Veda or the treatises on the fine arts like music, dance, drama, etc.
The four Vedas form the core of our religion. They are the supreme authority – Pramaana. The Vedas form the basic structure from which have been derived the six Vedaangas and the four Upaangas, in order to supplement the understanding of the Vedas. The Vedas are meant to be studied with the other ten of its constituents.
No beginning – no authorship
The Vedas are called Anaadi, i.e., without a beginning in terms of time. That is to say, anything previous to it or older than it does not exist. This means it has existed at all times. How can this be accepted? A book has necessarily to have an author; at least one, if not more. The Old Testament is a collection of the sayings of many prophets. The Koran contains what Mohammed, the prophet, propagated. These people existed at some point of time. Before their time, their teachings were not available. Likewise, logically, the Vedas should also have one or more authors who must have lived at some time or the other. Before their times, their teachings should not have been available. May be, this was a long time ago; long long time ago; millions of years ago. Even then, it would be wrong, according to some, to call the Vedas as ‘without a beginning’. Such doubts naturally arise if one assumes that the Vedas were written by men. The, how else would a book come to be written? Authorship is a pre-requisite of any book and the author must have existed at some time. Ordinary logic does not seem to support the claim that a book could have no author.
A theory has, therefore, been put forward that evolved persons called ‘Rishis’ or sages wrote the Vedas. It is stated that the Vedas contain many ‘Suktas’ or words of wisdom, wise sayings, attributed to several sages.
Before reciting the Veda Mantras, it is customary to mention the name of the Rishi or sage concerned with that particular portion, the ‘Chandas’ or metre in which the mantra appears or is composed and the Devata or the presiding deity of that mantra. Since the Veda mantras refer to a number of rishis, that has led to the belief that there should be many authors. In most cases, the genealogy of the rishi is also mentioned to avoid confusion with two rishis having the same name. For example “Agastyo Maitra-Varuni” that is Agastya, the son of Mitra and Varuna. So, if a mantra is in his name, does it not mean that Agastya is its author? Then does it not prove that, before his time, the Veda mantra was non-existent? The how can we call it “anaadi”? i.e. without beginning? But the real fact is that this, or that Rishi for that matter any other rishi, did not compose the mantras. That is why the Rishis cannot be called the authors.
By definition, the Vedas are “Apourusheya” or of non-human origin. “Pourusheya” is the work of man. Since it is not the work of man the rishis who were human beings could not have written them. If they had written them, they (the rishis) would have been called Mantra Kartas or the composers of the mantras. But in actual fact, they are called only Mantra Drishtas or the seers of the mantras. This means that the rishis “found” or discovered the Vedas and did not compose them or create them.
What does it mean when one says that Columbus discovered America? Did he create America? No. He helped to bring America which was already in existence to the notice of the world. Newton, Einstein and other famous scientists did not create the laws for which they are honoured. Does an object fall due to the gravitational pull not existent earlier to Newton? These scientists understood the laws already in operation but made them known to the world for the first time. Likewise, the rishis cognised the mantras already in existence and made them known to the world. The mantras had existed always. Since the rishis discovered them, their names are associated with the mantras. Therefore credit is due to the rishis for having brought the already existing but till then unknown Vedamantras to the knowledge of men. We therefore bow to their memory by touching our head when mentioning their name. This is the gesture in recognition of their great service. We acknowledge it by mentioning their name before the recital of the mantra. Well, if the rishis discovered the mantras, where were they existing before discovery? If they are called “anaadi” does it mean that they were there always? Where did they exist? In space?
If we suppose that the Veda mantras appeared along with the first creation, it would imply that the great Lord created them along with the world. Did God write the Vedas and keep them in storage so that the rishis may subsequently discover them in parts? In any case, if the Vedas came into being with the first creation, they can not be said to be without beginning. The present creation by Brahma is calculated in terms of time. The four Yugas (Krita Yuga, Treta Yuga, Dwaapara Yuga and Kali Yuga) have each a specified duration of time. A thousand four-yuga cycle is reckoned as a day for Brahma as distinct from night. Another thousand four-yuga cycle constitutes his night. On this basis, it is believed that today Brahma is just over fifty years of age. His span of life is one hundred years, calculated on this basis. Before that, this Brahma was not there; another Brahma was in existence. Therefore, the present Brahma and creation are not ‘anaadi’. Then what is ‘anaadi’? The Paramaatma must have existed before Brahma, before any Brahma. Brahman, or the impersonal God, existed at all times. He is the time continuum, from which the universe and all matter appear and disappear from time to time. The Paramaatma does His creation through Brahma, maintains the creation through Vishnu and annihilates through Rudra (Siva). Eventually, Brahma, Vishnu and Siva also cease to exist as such. That is why Brahma’s age is calculable. After completion of his term of one hundred ‘Brahma Varsha’, he merges with the Paramaatma. The another Brahma takes over.
Getting Back to the Vedas, did the Paramaatma or the Supreme Being create the Vedas before any of the Brahmas, before creation itself?
It is known from the Saastras that the Vedas existed prior to creation because Brahma himself is said to have undertaken creation with the aid of the Veda mantras which merely existed as sound in space. This is borne out by one of the Puranas, Srimad Bhagavata, which, amongst other things, describes how Brahma created the worlds.
Then, is it correct to infer that both God (Paramaatma) and Vedas are anaadi? On reflection, it would appear that even this assumption is not correct. If it is understood that God created the Vedas before he created the world, then it would imply that there was a time (before their creation) when they did not exist. This would imply that, although created prior to the Universe and Life, the Vedas were created only after God created the time concept. This would also discredit the epithet or “anaadi”.
God could not have created the Vedas if both He and they were anaadi. If he created them, they would have a beginning. All things have emanated from Iswara. Since there is nothing apart from Him, both Iswara and Veda must have existed side by side without a beginning. But this does not seem to be right. Uncreated by Iswara, not having an existence independent of him but still being anaadi (without a beginning) – well, how is this possible?
This confusion is cleared by Veda itself. Brihadharanyaka Upanishad (2.4.10) says that the Veda in the Rig, Yajur, Sama and Atharva forms are Iswara’s breath ‘Nishwasitam’ is the word used denoting exhalation of breath.
Can we exist without breathing? Likewise, the Vedas are the life breath, as it were, of the Paramaatma or the supreme self. If the Paramaatma who has no beginning in time exists forever (without any end in time), then the Vedas as his life breath, are naturally anaadi, as they coexist with Him or it.
The point to note here is that even God is not said to have brought the Vedas into existence. It would incorrect to say that we created our own breath. It exists from the time we started existing. So are Iswara and the Vedas. Even He cannot be said to have created them. They have always existed together.
Vidyaranya who wrote the Veda Bhaashya (commentary on the Vedas) regarded his guru (teacher) as Iswara or God himself, and whilst singing his praise says “whose ‘niswasitam’ are the Vedas”. In addition to giving us an idea of how deeply his guru was immersed in the Vedas, Vidyaranya’s commentary stresses the fact that the Vedas are not even the creation of Iswara.
Lord Krishna says in the Gita “I am the person who is to be known by all the Vedas – Vedaischa Sarvairahamev Vedyah. Further, instead of calling himself as the one who made the Vedas, he calls himself as the one who is the subject of all Vedanta – Vedantakrit, – not as Vedakrit. He calls himself as the one who knows all the Vedas – Vedavit. In his absolute and conceptual state as described in the Vedanta, before He made himself the end-product of human evolution, even before creation, Iswara and the Vedas have co-existed.
As in the Git, the Bhagavata Purana also does not talk of God having made the Vedas. The Vedas are said to have manifested from his heart. The word used in ‘Sputa’ which means sudden manifestation of something already existing. It does not refer to a situation where something not already in existence has been brought into being. Brahma, the first born was the first rishi who came to know all the Veda mantras. He is made aware of these by Iswara. How? Did he recite them to be learnt by Brahma? No, He gave them through his heart. The opening verse of Bhagavata Purana refers to it as ‘Tenay Brahma Hirdaya Adikavaye’. It is clear, therefore, that the Vedas always existed within Him as his breath. Brahma became aware of them as soon as Iswara willed it. Brahma began his creation with the guidance he got from the vibrations received from the Lord’s heart. Is this possible? Can vibrations amount to much?
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Next Chapter: Sound and Creation
वैदिक धर्म पर प्रामाणिक ग्रंथ
आज विभिन्न विषयों पर अनेक पुस्तकें उपलब्ध हैं । प्रत्येक धर्म पर अनेक पुस्तकें उपलब्ध हैं । हालाँकि, प्रत्येक धर्म में किसी एक विशेष ग्रंथ को विशेष स्थान दिया गया है । प्रत्येक धर्म का एक संस्थापक होता है और उसके लेखन और उपदेशों को उस धर्म में विशेष स्थान दिया जाता है । ऐसा माना जाता है कि संस्थापक का ग्रंथ सबसे सटीक और प्रामाणिक होता है । कुछ मामलों में, उस ग्रंथ की पूजा की जाती है और उसे मंदिर में स्थापित किया जाता है । उदाहरण के लिए, सिख ऐसा करते हैं । वे श्रद्धापूर्वक अपने पवित्र ग्रंथ को ‘ग्रंथ साहिब’ कहते हैं । इसी प्रकार, प्रत्येक धर्म ने आत्म-सुधार और मोक्ष का मार्ग दिखाने वाले एक विशेष ग्रंथ को अपनाया है । यद्यपि किसी ग्रंथ का नाम उसके संस्थापक के नाम पर रखा जा सकता है, ऐसा माना जाता है कि उसमें भगवान के अपने वचन होते हैं – उनके आदेश संस्थापक, विद्वान या पैगंबर के माध्यम से आते हैं । इसलिए, इन्हें “प्रकट ग्रंथ” कहा जाता है । हम हिंदू अपने पवित्र ग्रंथों, वेदों को ‘अपौरुषेयम्’ कहते हैं – जिसका अर्थ है कि वे पुरुष या मनुष्य द्वारा रचित नहीं हैं, मनुष्य तो ईश्वर के वचनों का प्रचार करने का एक साधन मात्र है ।
वह प्रामाणिक ग्रंथ कौन सा है जिस पर हमारा धर्म आधारित है ? अन्य धर्मों के लोग इस प्रश्न का उत्तर निःसंकोच दे सकते हैं । ईसाई इसे ‘बाइबिल’ कहते हैं; मुसलमान इसे ‘कुरान’ कहते हैं; बौद्ध इसे ‘धम्मपद’ कहते हैं; और पारसी इसे ‘जेंद अवेस्ता’ कहते हैं । लेकिन हम हिंदुओं के लिए, इसका कोई निश्चित उत्तर नहीं है क्योंकि यह कोई एक ग्रंथ नहीं है; न ही इसका रचयिता किसी मनुष्य को माना गया है ।
कुछ लोग रामायण को अपना पवित्र ग्रंथ मानेंगे – कुछ अन्य, भगवद् गीता को; और कुछ अन्य कहेंगे कि वेदांतिक ग्रंथ ही अनुसरणीय ग्रंथ हैं । हमेशा से ऐसा नहीं था । दृष्टिकोणों में भ्रम और मतभेद इसलिए उत्पन्न हुए हैं क्योंकि जहाँ अन्य धर्मों में एक बुनियादी पाठ्य पुस्तक के माध्यम से बुनियादी धार्मिक शिक्षा प्रदान की जाती है, वहीं हिंदू धर्म में ऐसी किसी प्रारंभिक धार्मिक शिक्षा पर ज़ोर नहीं दिया जाता । इसलिए आजकल हम देखते हैं कि हम स्वयं अपने पवित्र ग्रंथों की आलोचना और निंदा करते हैं, जबकि अन्य धर्मों के अनुयायी अपने ग्रंथों की रक्षा करते हैं और कभी-कभी अन्य धार्मिक सिद्धांतों की निंदा भी करते हैं ।
यदि हम बचपन से ही अपने धर्म के मूल ग्रंथों का अध्ययन करें, जैसा कि अन्य धर्मावलंबी कर रहे हैं, तो हमें अपने धार्मिक ग्रंथों के बारे में संदेह नहीं होगा और न ही आज की तरह उनके बारे में अज्ञानता होगी ।
हमें यह जानना होगा कि हमारा धर्म क्या है और यह केवल हमारे पवित्र ग्रंथों के माध्यम से ही सीखा जा सकता है । इससे पहले, हमें यह जानना होगा कि हमें धर्म क्यों अपनाना चाहिए । धर्म का अर्थ केवल कर्मकांड नहीं है । इसका अर्थ है धर्म । धर्म क्या है ? वह जिसका पालन करने से हम संतुष्ट और सुखी हो जाएँ । धर्म और धर्म के सिद्धांतों को जानने के लिए, हमें कुछ विशिष्ट ग्रंथों या पुस्तकों का संदर्भ लेना चाहिए । ऐसी पुस्तकों को “धर्मप्रमाण” कहा जाता है । “प्रमाण” का अर्थ है जो सत्य को स्थापित करता है । तो “धर्मप्रमाण” का अर्थ है जो व्यक्ति को धर्म का सच्चा ज्ञान देता है । वे कौन से पवित्र ग्रंथ हैं जो सच्चे धर्म के बारे में बात करते हैं ?
अंगानि वेदश्चत्वरो मीमांसा न्याय विस्तारः
पुराणं धर्मशास्त्रं च विद्याहयेतः चतुर्दशः।
ये चौदह हैं और वे हैं: चार वेद (जैसे ऋग, यजुर, साम, अथर्व); छह वेदांग या वेदों के सहायक, अर्थात्, ‘शिक्षा’ जो व्यंजना और उच्चारण है; ‘व्याकरण’ जो व्याकरण है; ‘छंदस’ या छंद; ‘निरुक्त’ या व्युत्पत्ति; ‘ज्योतिष’ या खगोल विज्ञान; ‘कल्प’ या प्रक्रिया, ‘मीमांसा’ या वैदिक ग्रंथों की व्याख्या; ‘न्याय’ या तर्क; ‘पुराण’ या पौराणिक कथाएँ और ‘धर्मशास्त्र’ जिनमें आचार संहिताएँ निहित हैं ।
इनमें ज्ञान और बुद्धि निहित है । इसलिए इन चौदह को ‘विद्यास्थान’ कहा जाता है ।
इन चौदह में चार और जोड़े जा सकते हैं जिन्हें ‘उपांग’ या वेदांगों के परिशिष्ट कहा जाता है । ये हैं: (१) आयुर्वेद या जीवन का विज्ञान; (२) अर्थशास्त्र, धन या अर्थशास्त्र का विज्ञान; (३) धनुर्वेद, शस्त्र, प्रक्षेपास्त्र और युद्ध से संबंधित विज्ञान और (४) गांधर्ववेद या संगीत, नृत्य, नाटक आदि ललित कलाओं पर ग्रंथ ।
चार वेद हमारे धर्म का मूल हैं । ये सर्वोच्च प्रमाण हैं – प्रमाण । वेद ही वह मूल संरचना हैं जिनसे वेदों की समझ को बढ़ाने के लिए छह वेदांग और चार उपांग निकाले गए हैं । वेदों का अध्ययन उसके अन्य दस घटकों के साथ किया जाना है ।
कोई आरंभ नहीं – कोई रचयिता नहीं
वेदों को अनादि कहा जाता है, अर्थात काल की दृष्टि से अनादि । अर्थात्, इससे पहले या इससे प्राचीन कोई भी वस्तु अस्तित्व में नहीं है । इसका अर्थ है कि यह सर्वकालिक रूप से विद्यमान रही है । इसे कैसे स्वीकार किया जा सकता है ? किसी भी पुस्तक का एक रचयिता होना आवश्यक है; यदि अधिक नहीं तो कम से कम एक तो होता ही है । पुराना नियम अनेक पैगम्बरों के कथनों का संग्रह है । कुरान में वे बातें हैं जो पैगंबर मोहम्मद ने प्रचारित कीं । ये लोग किसी समय अस्तित्व में थे । उनके समय से पहले, उनकी शिक्षाएँ उपलब्ध नहीं थीं । इसी प्रकार, तार्किक रूप से, वेदों के भी एक या एक से अधिक रचयिता होने चाहिए थे जो किसी न किसी समय रहे होंगे । उनके समय से पहले, उनकी शिक्षाएँ उपलब्ध नहीं होनी चाहिए थीं । हो सकता है, यह बहुत समय पहले की बात हो; बहुत बहुत समय पहले; लाखों वर्ष पहले की । फिर भी, कुछ लोगों के अनुसार, वेदों को ‘अनावश्यक’ कहना गलत होगा । यदि कोई यह मान ले कि वेद मनुष्यों द्वारा लिखे गए थे, तो ऐसे संदेह स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होते हैं । अन्यथा, कोई पुस्तक कैसे लिखी जा सकती है ? किसी भी पुस्तक के लिए ग्रन्थकारिता एक पूर्वापेक्षा है और ग्रन्थकार का किसी न किसी काल में अस्तित्व अवश्य रहा होगा । सामान्य तर्क इस दावे का समर्थन नहीं करता कि किसी पुस्तक का कोई ग्रन्थकार नहीं हो सकता ।
इसलिए, एक सिद्धांत यह प्रतिपादित किया गया है कि ‘ऋषि’ कहे जाने वाले विकसित व्यक्तियों ने वेदों की रचना की । ऐसा कहा जाता है कि वेदों में अनेक ‘सूक्त’ या ज्ञान के वचन, अनेक ऋषियों के कथन हैं ।
वेद मंत्रों का पाठ करने से पहले, उस विशेष भाग से संबंधित ऋषि या मुनि का नाम, वह ‘छंद’ या छंद जिसमें मंत्र प्रकट होता है या रचा गया है और उस मंत्र के देवता या अधिष्ठाता का उल्लेख करना प्रथागत है । चूँकि वेद मंत्रों में अनेक ऋषियों का उल्लेख है, इसलिए यह मान्यता है कि उनके अनेक ग्रन्थकार होने चाहिए । अधिकांश मामलों में, एक ही नाम वाले दो ऋषियों के भ्रम से बचने के लिए ऋषि की वंशावली का भी उल्लेख किया जाता है । उदाहरण के लिए, “अगस्त्यो मैत्र-वारुणी” अर्थात् मित्र और वरुण के पुत्र अगस्त्य । तो, अगर कोई मंत्र उनके नाम पर है, तो क्या इसका मतलब यह नहीं कि अगस्त्य उसके रचयिता हैं ? तो क्या इससे यह सिद्ध नहीं होता कि उनके समय से पहले वेद मंत्र अस्तित्वहीन थे ? तो फिर हम उन्हें “अनादि” कैसे कह सकते हैं ? यानी अनादि ? लेकिन वास्तविकता यह है कि इस ऋषि ने, या यूँ कहें कि किसी अन्य ऋषि ने, मंत्रों की रचना नहीं की । इसलिए ऋषियों को रचयिता नहीं कहा जा सकता ।
परिभाषा के अनुसार, वेद “अपौरुषेय” या गैर-मानवीय मूल के हैं । “पौरुषेय” मानव की रचना है । चूँकि यह मानव की रचना नहीं है, इसलिए ऋषि जो मानव थे, इन्हें नहीं लिख सकते थे । अगर उन्होंने इन्हें लिखा होता, तो उन्हें (ऋषियों को) मंत्र कर्ता या मंत्र रचयिता कहा जाता । लेकिन वास्तव में, उन्हें केवल मंत्र द्रष्टा या मंत्रों के द्रष्टा कहा जाता है । इसका अर्थ है कि ऋषियों ने वेदों को “प्राप्त” किए या खोज किये, न कि उनकी रचना या सृजन किये ।
जब कोई कहता है कि कोलंबस ने अमेरिका की खोज की, तो इसका क्या अर्थ है ? क्या उसने अमेरिका का निर्माण किया ? नहीं । उसने पहले से ही अस्तित्व में रहे अमेरिका को दुनिया के सामने लाने में मदद की । न्यूटन, आइंस्टीन और अन्य प्रसिद्ध वैज्ञानिकों ने वे नियम नहीं बनाए जिनके लिए उन्हें सम्मानित किया जाता है । क्या कोई वस्तु गुरुत्वाकर्षण के कारण गिरती है जो न्यूटन से पहले अस्तित्व में नहीं था ? इन वैज्ञानिकों ने पहले से ही कार्यरत नियमों को समझा, लेकिन उन्हें पहली बार दुनिया को बताया । इसी प्रकार, ऋषियों ने पहले से ही विद्यमान मंत्रों को पहचाना और उन्हें दुनिया को बताया । मंत्र हमेशा से अस्तित्व में थे । जब से ऋषियों ने उनकी खोज की, उनके नाम मंत्रों के साथ जुड़ गए । इसलिए ऋषियों को पहले से ही विद्यमान, लेकिन तब तक अज्ञात वेदमंत्रों को मनुष्यों के ज्ञान में लाने का श्रेय दिया जाना चाहिए । इसलिए हम उनका नाम लेते समय अपने सिर को छूकर उनकी स्मृति को नमन करते हैं । यह उनकी महान सेवा के सम्मान में एक संकेत है । हम मंत्र के पाठ से पहले उनके नाम का उल्लेख करके इसे स्वीकार करते हैं । अच्छा, अगर ऋषियों ने मंत्रों की खोज की थी, तो खोज से पहले वे कहाँ विद्यमान थे ? यदि उन्हें “अनादि” कहा जाता है, तो क्या इसका अर्थ यह है कि वे सदैव से थे ? वे कहाँ विद्यमान थे ? अंतरिक्ष में ?
यदि हम मान लें कि वेद मंत्र प्रथम सृष्टि के साथ ही प्रकट हुए, तो इसका अर्थ यह होगा कि महान ईश्वर ने उन्हें सृष्टि के साथ ही रचा । क्या ईश्वर ने वेदों को लिखकर उन्हें भण्डारित किया ताकि ऋषिगण बाद में उन्हें अंशों (टुकड़ों) में खोज सकें ? बहरहाल, यदि वेद प्रथम सृष्टि के साथ ही अस्तित्व में आए, तो उन्हें अनादि नहीं कहा जा सकता । ब्रह्मा द्वारा वर्तमान सृष्टि की गणना समय के आधार पर की जाती है । चारों युगों (कृतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग) की एक निश्चित अवधि होती है । ब्रह्मा के लिए एक हज़ार चतुर्युग चक्र को रात्रि से भिन्न एक दिन माना जाता है । एक और हज़ार चतुर्युग चक्र उनकी रात्रि का निर्माण करता है । इस आधार पर, यह माना जाता है कि आज ब्रह्मा की आयु पचास वर्ष से कुछ अधिक है । इसी आधार पर उनकी आयु सौ वर्ष है । इससे पहले, यह ब्रह्मा नहीं थे; एक अन्य ब्रह्मा अस्तित्व में थे ।
अतः वर्तमान ब्रह्म और सृष्टि ‘अनादि’ नहीं हैं । फिर ‘अनादि’ क्या है ? परमात्मा का अस्तित्व ब्रह्मा से भी पहले, किसी भी ब्रह्मा से पहले रहा होगा । ब्रह्म, या निराकार ईश्वर, हर समय विद्यमान रहे हैं । वे काल की निरंतरता हैं, जिससे ब्रह्मांड और समस्त पदार्थ समय-समय पर प्रकट और लुप्त होते रहते हैं । परमात्मा ब्रह्मा के माध्यम से अपनी सृष्टि करते हैं, विष्णु के माध्यम से सृष्टि का पालन करते हैं और रुद्र (शिव) के माध्यम से संहार करते हैं । अंततः ब्रह्मा, विष्णु और शिव का भी अस्तित्व समाप्त हो जाता है । इसीलिए ब्रह्मा की आयु गणना योग्य है । अपने सौ ‘ब्रह्मा वर्ष’ की अवधि पूरी करने के बाद, वे परमात्मा में विलीन हो जाते हैं । एक अन्य ब्रह्मा कार्यभार संभालते हैं ।
वेदों की बात करें तो, क्या परमात्मा या सर्वोच्च सत्ता ने किसी भी ब्रह्मा से पहले, स्वयं सृष्टि से पहले वेदों की रचना की थी ?
शास्त्रों से ज्ञात होता है कि वेद सृष्टि से पहले अस्तित्व में थे क्योंकि कहा जाता है कि स्वयं ब्रह्मा ने वेद मंत्रों की सहायता से सृष्टि का कार्य किया था, जो केवल अंतरिक्ष में ध्वनि के रूप में विद्यमान थे । इसकी पुष्टि पुराणों में से एक, श्रीमद्भागवत पुराण से होती है, जिसमें अन्य बातों के अलावा, ब्रह्मा द्वारा सृष्टि की रचना का वर्णन है ।
तो क्या यह अनुमान लगाना सही है कि ईश्वर (परमात्मा) और वेद दोनों अनादि हैं ? विचार करने पर, ऐसा प्रतीत होता है कि यह धारणा भी सही नहीं है । यदि यह समझा जाए कि ईश्वर ने सृष्टि की रचना से पहले वेदों की रचना की थी, तो इसका तात्पर्य यह होगा कि (उनकी रचना से पहले) एक समय ऐसा था जब वे अस्तित्व में नहीं थे । इसका तात्पर्य यह होगा कि, यद्यपि वेदों की रचना ब्रह्मांड और जीवन से पहले हुई थी, वेदों की रचना ईश्वर द्वारा समय की अवधारणा की रचना के बाद ही हुई । इससे “अनादि” विशेषण का भी खंडन होगा ।
यदि ईश्वर और वेद दोनों ही अनादि होते, तो वे वेदों की रचना नहीं कर सकते थे । यदि उन्होंने उनकी रचना की होती, तो उनका एक आरंभ होता । सभी वस्तुएँ ईश्वर से उत्पन्न हुई हैं । चूँकि ईश्वर से भिन्न कुछ भी नहीं है, इसलिए ईश्वर और वेद दोनों बिना आरंभ के साथ-साथ अस्तित्व में रहे होंगे । लेकिन यह सही प्रतीत नहीं होता । ईश्वर द्वारा सृजित न होना, उनसे स्वतंत्र अस्तित्व न होना, फिर भी अनादि (बिना आरंभ के) होना – भला यह कैसे संभव है ?
यह भ्रम स्वयं वेद द्वारा दूर किया गया है । बृहदारण्यक उपनिषद् (२.४.१०) में कहा गया है कि ऋग्, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद के रूप ईश्वर की श्वास हैं । ‘निश्वासितम्’ शब्द श्वास के निःश्वसन के लिए प्रयुक्त होता है ।
क्या हम श्वास के बिना अस्तित्व में रह सकते हैं ? इसी प्रकार, वेद मानो परमात्मा या परम आत्मा की प्राणवायु हैं । यदि परमात्मा, जिसका काल में कोई आरंभ नहीं है, सदा विद्यमान है (काल में कोई अंत नहीं है), तो वेद उसकी प्राणवायु के रूप में स्वाभाविक रूप से अनादि हैं, क्योंकि वे उसके साथ सह-अस्तित्व में हैं ।
यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि यह भी नहीं कहा गया है कि ईश्वर ने वेदों को अस्तित्व में लाया । यह कहना गलत होगा कि हमने अपनी श्वास स्वयं बनाई । यह उस समय से अस्तित्व में है जब से हमारा अस्तित्व शुरू हुआ । ईश्वर और वेद भी ऐसे ही हैं । यहाँ तक कि यह भी नहीं कहा जा सकता कि उन्होंने ही इन्हें रचा है । ये दोनों सदैव एक साथ विद्यमान रहे हैं ।
वेदभाष्य (वेदों पर भाष्य) लिखने वाले विद्यारण्य अपने गुरु को ईश्वर या स्वयं परमात्मा जैसे मानते थे, और उनकी स्तुति करते हुए कहते हैं, “जिनके ‘निश्वासितम्’ वेद हैं।” विद्यारण्य का भाष्य हमें यह तो बताता ही है कि उनके गुरु वेदों में कितने गहरे डूबे हुए थे, साथ ही, इस बात पर भी ज़ोर देता है कि वेद ईश्वर की रचना भी नहीं हैं ।
भगवान कृष्ण गीता में कहते हैं, “मैं वह व्यक्ति हूँ जिसे सभी वेदों से जाना जाता है – वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः।” इसके अलावा, स्वयं को वेदों का रचयिता कहने के बजाय, वे स्वयं को समस्त वेदान्त का विषय – वेदांतकृत् – कहते हैं, वेदकृत् नहीं । वे स्वयं को सभी वेदों का ज्ञाता – वेदवित् कहते हैं । वेदान्त में वर्णित अपनी निरपेक्ष और वैचारिक अवस्था में, स्वयं को मानव विकास का अंतिम उत्पाद बनाने से पहले, सृष्टि से भी पहले, ईश्वर और वेद सह-अस्तित्व में थे ।
गीता की तरह, भागवत पुराण भी ईश्वर द्वारा वेदों की रचना करने की बात नहीं करता । कहा जाता है कि वेद उनके हृदय से प्रकट हुए हैं । ‘स्पुत’ शब्द का अर्थ है पहले से विद्यमान किसी वस्तु का अचानक प्रकट होना । यह किसी ऐसी स्थिति का उल्लेख नहीं करता जहाँ पहले से अस्तित्व में न रही किसी वस्तु को अस्तित्व में लाया गया हो । ब्रह्मा जो सबसे पहले जन्म लिये वही प्रथम ऋषि थे जिन्हें सभी वेद मंत्रों का ज्ञान प्राप्त किये । उन्हें इनका ज्ञान ईश्वर द्वारा कराया गया । कैसे ? क्या उन्होंने ब्रह्मा से सीखने के लिए उन्हें पढ़कर सुनाया था ? नहीं, उन्होंने उन्हें अपने हृदय से दिया था । भागवत पुराण के आरंभिक श्लोक में इसे ‘तेने ब्रह्म हृदाय आदिकवये’ कहा गया है । अतः यह स्पष्ट है कि वेद सदैव उनके भीतर उनकी श्वास के रूप में विद्यमान थे । ईश्वर की इच्छा होते ही ब्रह्मा को उनका ज्ञान हो गया । ब्रह्मा ने भगवान के हृदय से प्राप्त स्पंदनों से प्राप्त मार्गदर्शन से अपनी सृष्टि की शुरुआत की । क्या यह संभव है ? क्या स्पंदनों का कोई महत्व हो सकता है ? (आगे पढ़ना जारी रखें !)
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अगला अध्याय: ध्वनि और सृष्टि

1 Comment
Bahut sundar jankari lagal. Eh ego khas jankari seho bhetal ki je bed sristi san pahinek chhi. Tahi lel kahal jait chhi je jate beshi padhta o ote jankari san purna hetah.
अंगानि वेदश्चत्वारो मीमांसा न्याय विस्तरः
पुराणं धर्मशास्त्रं च विद्या ह्येताश्चतुर्दशः ।
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