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वेदांगः निरुक्तम् – वेदक कान

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वेदांगः निरुक्तम् – वेदक कान

निरुक्त वैदिक शब्दकोश छी । संस्कृत मे शब्दकोश केँ कोश कहैत छैक । ‘अमर कोश’ नामक एकटा प्रसिद्ध संस्कृत शब्दकोश अछि । शब्दकोश केँ ‘निघंडु’ सेहो कहल जाइत छैक । प्रत्येक शब्द केँ अक्षर-वार विभाजित कयल गेल छैक, जाहि सँ ओकर उत्पत्ति केर मूल पता चलैत छैक आर प्रत्येक शब्दांश (अक्षर) केर अर्थ सेहो दर्शायल गेल छैक । यैह निरुक्त शास्त्र थिक जेकरा अंग्रेजी मे व्युत्पत्ति विज्ञान (etymology) कहल जाइत छैक ।

निरुक्त वेदपुरुष, अर्थात् कान जेकाँ श्रवण अंग केर रूप मे कार्य करैत अछि । ई वेद मे प्रयुक्त दुर्लभ व असामान्य शब्द सभक सटीक अर्थ केँ इंगित करैत अछि । ई कोनो विशेष शब्द केर प्रयोगक कारण, अर्थात् प्रयोग द्वारा अर्थ केँ सेहो बतबैत अछि ।

एहि विषय पर कतेको रास लेखक सब पुस्तकें लिखलनि अछि । लेकिन यास्क द्वारा लिखित पुस्तक सबसँ मूल्यवान मानल जाइछ ।

वैदिक निघंडु वेद सब मे प्रत्येक शब्दक उत्पत्तिक व्याख्या करैछ । आउ ‘हृदयम्’ शब्द ली, जेकर अर्थ छैक हृदय । एहि शब्द केँ कियैक चुनल गेल ? वेद स्वयं एकर उत्तर दैछ । एकर अर्थ अछि ‘हृदि अयम्’ – ओ (परमात्मा) हृदय मे निवास करैत छथि । ‘हृद’ मानव हृदय केर सेहो नाम थिक । लेकिन चूँकि हृदय मे स्थित ईश्वर सेहो एहि शब्द मे समाहित छथि, तेँ एकर आध्यात्मिक महत्व आरो बढ़ि जाइत अछि । कोनो शास्त्र अनिवार्य रूप सँ ईश्वर दिश लयकय जाइत अछि । चूँकि परमेश्वर ओहि मे निवास करैत छथि, तेँ एकर ‘हृदयम्’ कहल जाइत अछि । एहि तरहें, प्रत्येक शब्दक निर्माण केर एकटा कारण होइत छैक । निरुक्त एकर विश्लेषण करैत अछि ।

संस्कृत मे, सब शब्द ‘मूल’ आधार या धातु सँ व्युत्पन्न होइत अछि ।

प्रत्येक ध्वनि केर अपन मूल सेहो होइत छैक । अंग्रेजी मे, केवल क्रिया सभक मूल होइत छैक, संज्ञा सभक नहि । लेकिन, संस्कृत मे, सब शब्दक मूल होइत छैक । संस्कृत केर शब्द सब केँ, थोड़ेक-बहुत परिवर्तनक संग, आन भाषा सब मे सेहो प्रयोग मे आनल गेल अछि । तेँ एहि भाषा सब मे मूल शब्द नहि भेटैछ, कियैक तँ ई शब्द ओहि भाषाक लेल विदेशी छैक । समय केँ अंग्रेजी मे ‘hour’ (आवर) कहल जाइत छैक । यदि एहि शब्द केँ बनाबयलवला अक्षर सभक उच्चारणक आधार पर विश्लेषण कयल जाय, त हम सब ‘हौ’ आ ‘ओर’ पर पहुँचैत छी । सुदूर अतीत मे कोनो समय एकर उच्चारण ‘होरा’ रहल होयत । संस्कृत मे एकटा शास्त्र अछि, जेकरा ‘होरा शास्त्र’ कहैत छैक । ई शब्द ‘अहोरात्र’ सँ बनल अछि, जेकर अर्थ छैक दिन आ राति (अहो – दिन, रात्र – राति) । होरा एक घंटाक बराबर समयक माप थिक । यैह ‘होरा’ अंग्रेजी मे ‘hour’ बनि गेल होयत आर ‘आवर’ उच्चारित होइत होयत, जाहि मे ‘ह’ मौन रहैत छैक । एहि प्रकारें ‘हार्ट’ शब्द संस्कृतक ‘हृद’ सँ बनल अछि । एहेन कतेको रास शब्द सब अछि । एहि अन्य भाषा सब मे अपन वर्तमान रूप मे पहुँचय मे ओकरा बहुते लम्बा समय लागल हेतैक । यैह कारण छैक जे भाषाशास्त्री ओही भाषा मे एकर मूल नहि ताकि पबैत छथि ।

जखन कोनो भाषाक अर्थ ज्ञात नहि हो, तखन ओकरा सुनबाक कोनो खास फायदा नहि छैक । एना करब ओकरा नहि सुनय या अनसुना कय देबाक समान अछि । तेँ निरुक्त, जे प्रत्येक शब्द केँ ओकर घटक मूल सब मे विभाजित करैत अछि आर ओकर अर्थक विश्लेषण करैत अछि, केर तुलना वेदपुरुष केर कान सँ कयल गेल अछि ।

ई ‘श्रुति’ केर श्रोत सेहो थिक, अर्थात वेद सभक, जेकरा कानक माध्यम सँ सर्वोत्तम रूप सँ सीखल जा सकैछ । व्याकरण आर निरुक्त केर विज्ञान अंग्रेज सब बनारसक पंडित सब सँ सीखने छल । ओ सब सिखलक जे निरुक्त प्रत्येक शब्दक उत्पत्तिक पता लगबैत अछि आर ओकर अर्थ बतबैत अछि । परिणामस्वरूप ओ सब भाषाक एकटा नव विज्ञान विकसित कयलक जेकरा ‘भाषाविज्ञान’ कहल जाइत छैक । एहि प्रकारे, आधुनिक भाषाविज्ञान केर जन्म वेद सभक व्याकरण आर निरुक्त सँ भेल अछि ।

ओकरा लोकनिक शोध एहि निष्कर्ष दिश संकेत करैत अछि जे सब भाषा सभक विकास एक्कहि गोट मूल भाषा सँ भेल होयत । एना मानल जाइत अछि जे आदिमानव वैह क्षेत्र मे निवास करैत छलाह जेतय ई भाषा बाजल जाइत छल आ फलस्वरूप समस्त मानवजाति मूल रूप सँ एक्कहि स्थान पर विद्यमान रहल होयत । लेकिन एहि बात पर मतभेद अछि जे ई स्थान विश्वक कोन भाग मे स्थित छल । हमरा सब केँ एहि सन्दर्भ अनावश्यक रूप सँ एहिठाम चिन्ता करबाक जरूरत नहि अछि ।

हरिः हरः!!

The Vedangas ‘Niruktam’ – Veda’s Ears

Nirukta is the Vedic dictionary. Dictionary is called Kosa in Sanskrit. There is a celebrated Sanskrit dictionary called ‘Amar Kosa’. Dictionary is also called ‘Nighandu’. Each word is broken syllable-wise indicating the root from which it is derived and the meaning of each syllable is indicated. This is the Nirukta Saastra which is called etymology in English.

Nirukta serves as the hearing organ of the Veda Purusha, i.e. the ears. This indicates the precise meaning of rare and uncommon words used in Vedas. It also explains the reason why a particular word has been been used, i.e., the meaning by usage.

There are many authors who have written books on this subject. But the book written by Yaksa is regarded as most valuable.

The Vedic Nighandu explains the origin of each word in the Vedas. Let us take the word ‘Hrdayam’ meaning heart. Why this word been chosen? The Vedas themselves give the answer. It means ‘Hrdi Ayam’ – He lives in the heart. ‘Hrid’ is the name of the human heart also. But since Isvara in the heart is also included in the word, its spiritual significance is heightened. Any Saastra must inevitably lead to Isvara. Since Parameswara resides in it, it is called ‘Hridayam’. Thus, there is a reason for the formation of each word. Nirukta analyses it.

In Sanskrit, all words are derived from basic ‘roots’ or Dhatus.

Each sound has its root too. In English, only verbs have roots, not the nouns. But, in Sanskrit, all words have roots. The Sanskrit words were, with slight variations, taken into use in other languages. That is why in these languages, the root words cannot be found, as words are foreign to the language. Time is called the ‘hour’ in English. If the letters composing this word are analysed on the basis of pronunciation, we arrive at ‘Hou’ and ‘or’. At some time in the distant past, it must have been pronounced as ‘hora’. There is a Saastra in Sanskrit, called ‘Hora Saastra’. This word in turn has been derived from Ahoraatra, meaning day and night (Aha: day, Ratra: night). Hora is a measure of time equal to one hour. This ‘hora’ must have become in English the ‘hour’ and pronounced as ‘our’ with ‘h’ remaining silent. Similarly the word ‘heart’ has been derived from the Sanskrit ‘Hrid’. There are many such words. It must have taken a very long time for them to have reached their present form in these other languages. That is why philologists are unable to find their roots in the same language.

There is not much use listening to a language being spoken when the meaning is not known. It is as good as not listening to it, or its falling on deaf ears. That is why Nirukta, which breaks up each word into its component roots and analyses its meaning, is likened to the ear of the Veda Purusha.

It is also the ear (Srotra) of ‘Sruti’ i.e., the Vedas which are best learnt through the ear. The sciences of Vyaakarana and Nirukta were learnt by Englishmen from the Pundits of Banaras. They learned that Nirukta traces the origin of each word and gives its meaning. They evolved the new science of language called philology as a result. Thus, the modern philology owes its birth to Vyaakarana and Nirukta of the Vedas.

Their research points to the conclusion that all languages must have been evolved from a common parent language. It is thought that the primordial man existed in the region where this language was spoken and consequently all mankind itself must have originally existed at one place. But there is difference of opinion as to in which part of the world this place was located. We need not unduly bother about it here.

Harih Harah!!

वेदांग ‘निरुक्तम्’ – वेद के कान

निरुक्त वैदिक शब्दकोश है । संस्कृत में शब्दकोश को कोश कहते हैं । ‘अमर कोश’ नामक एक प्रसिद्ध संस्कृत शब्दकोश है । शब्दकोश को ‘निघंडु’ भी कहा जाता है । प्रत्येक शब्द को अक्षर-वार विभाजित किया गया है, जिससे उसकी उत्पत्ति का मूल पता चलता है और प्रत्येक शब्दांश (अक्षरों) का अर्थ भी दर्शाया गया है । यही निरुक्त शास्त्र है जिसे अंग्रेजी में व्युत्पत्ति विज्ञान (etymology) कहा जाता है ।

निरुक्त वेदपुरुष, अर्थात् कानों के श्रवण अंग के रूप में कार्य करता है । यह वेदों में प्रयुक्त दुर्लभ और असामान्य शब्दों के सटीक अर्थ को इंगित करता है । यह किसी विशेष शब्द के प्रयोग का कारण, अर्थात् प्रयोग द्वारा अर्थ को भी बताता है ।

इस विषय पर कई लेखकों ने पुस्तकें लिखी हैं । लेकिन यास्क द्वारा लिखित पुस्तक सबसे मूल्यवान मानी जाती है ।

वैदिक निघंडु वेदों में प्रत्येक शब्द की उत्पत्ति की व्याख्या करता है । आइए ‘हृदयम्’ शब्द लें, जिसका अर्थ है हृदय । इस शब्द को क्यों चुना गया ? वेद स्वयं इसका उत्तर देते हैं । इसका अर्थ है ‘हृदि अयम्’ – वह (परमात्मा) हृदय में निवास करता है । ‘हृद’ मानव हृदय का भी नाम है । किन्तु चूँकि हृदय में स्थित ईश्वर भी इस शब्द में समाहित है, इसलिए इसका आध्यात्मिक महत्व और भी बढ़ जाता है । कोई भी शास्त्र अनिवार्य रूप से ईश्वर की ओर ले जाता है । चूँकि परमेश्वर उसमें निवास करते हैं, इसलिए इसे ‘हृदयम्’ कहा जाता है । इस प्रकार, प्रत्येक शब्द के निर्माण का एक कारण होता है । निरुक्त इसका विश्लेषण करता है ।

संस्कृत में, सभी शब्द ‘मूल’ आधार या धातुओं से व्युत्पन्न होते हैं ।

प्रत्येक ध्वनि का अपना मूल भी होता है । अंग्रेजी में, केवल क्रियाओं के मूल होते हैं, संज्ञाओं के नहीं । लेकिन, संस्कृत में, सभी शब्दों के मूल होते हैं । संस्कृत के शब्दों को, थोड़े-बहुत परिवर्तनों के साथ, अन्य भाषाओं में भी प्रयोग में लाया गया । इसीलिए इन भाषाओं में मूल शब्द नहीं मिलते, क्योंकि ये शब्द उस भाषा के लिए विदेशी हैं । समय को अंग्रेजी में ‘घंटा’ कहा जाता है । यदि इस शब्द को बनाने वाले अक्षरों का उच्चारण के आधार पर विश्लेषण किया जाए, तो हम ‘हौ’ और ‘ओर’ पर पहुँचते हैं । सुदूर अतीत में किसी समय इसका उच्चारण ‘होरा’ रहा होगा । संस्कृत में एक शास्त्र है, जिसे ‘होरा शास्त्र’ कहते हैं । यह शब्द अहोरात्र से बना है, जिसका अर्थ है दिन और रात (अहो – दिन, रात्र – रात) । होरा एक घंटे के बराबर समय का माप है । यही ‘होरा’ अंग्रेजी में ‘hour’ बन गया होगा और ‘आवर’ उच्चारित होता होगा, जिसमें ‘ह’ मौन रहता है । इसी प्रकार ‘हार्ट’ शब्द संस्कृत के ‘हृद’ से बना है । ऐसे कई शब्द हैं । इन अन्य भाषाओं में अपने वर्तमान रूप में पहुँचने में इन्हें बहुत लंबा समय लगा होगा । यही कारण है कि भाषाशास्त्री उसी भाषा में इनके मूल नहीं खोज पाते ।

जब किसी भाषा का अर्थ ज्ञात न हो, तो उसे सुनने का कोई खास फायदा नहीं है । ऐसा करना उसे न सुनने या अनसुना कर देने के समान है । इसीलिए निरुक्त, जो प्रत्येक शब्द को उसके घटक मूलों में विभाजित करता है और उसके अर्थ का विश्लेषण करता है, की तुलना वेदपुरुष के कान से की गई है ।

यह ‘श्रुति’ का श्रोत भी है, अर्थात वेदों का, जिन्हें कान के माध्यम से सर्वोत्तम रूप से सीखा जा सकता है । व्याकरण और निरुक्त का विज्ञान अंग्रेजों ने बनारस के पंडितों से सीखा था । उन्होंने सीखा कि निरुक्त प्रत्येक शब्द की उत्पत्ति का पता लगाता है और उसका अर्थ बताता है । परिणामस्वरूप उन्होंने भाषा का एक नया विज्ञान विकसित किया जिसे भाषाविज्ञान कहा जाता है । इस प्रकार, आधुनिक भाषाविज्ञान का जन्म वेदों के व्याकरण और निरुक्त से हुआ है ।

उनका शोध इस निष्कर्ष की ओर संकेत करता है कि सभी भाषाओं का विकास एक ही मूल भाषा से हुआ होगा । ऐसा माना जाता है कि आदिमानव उसी क्षेत्र में निवास करता था जहाँ यह भाषा बोली जाती थी और फलस्वरूप समस्त मानवजाति मूल रूप से एक ही स्थान पर विद्यमान रही होगी । लेकिन इस बात पर मतभेद है कि यह स्थान विश्व के किस भाग में स्थित था । हमें यहाँ इस बारे में अनावश्यक रूप से चिंता करने की आवश्यकता नहीं है ।

हरिः हरः!!

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