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कहियो अनाथाश्रम जाउः प्रवीण संस्मरण

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अलग अनुभव भेल

– प्रवीण नारायण चौधरी

– सन्दर्भ अम्बिकाक जन्मदिन-२०२६

बहुत दिन सँ मन मे रहय जे सेवा समर्पण लेल उपयुक्त स्थान पर जाय । अस्पताल, विद्यालय, वृद्धाश्रम, अनाथाश्रम, आदि जाय आ किछु सेवाकार्य करी । ई अवसर काल्हि बड़की बेटी अम्बिकाक जन्मदिन पर भेटल । बेटी सँ ओकर बर्थडे पर विराटनगर मे कि कयल जेबाक चाही, सलाह कयला उपरान्त ओ माय-भाय केर मार्फत विचार देलक जे भोज-भात नहि करू पापा बरु अनाथाश्रम मे जाउ आ ओतय किछु सेवादान करू ।

बौआ लग ई सब आइडिया काफी छैक । ओ समाजक काज मे हमरो सँ बेसी मन लगाकय काज करय मे रुचि रखैत अछि । बौआ कहलक जे पापा पूर्वाञ्चल अनाथाश्रम मे अनाथ बच्चा सब संग जन्मदिन बड नीक सँ मनबैत अछि लोक सब । हम सब सेहो चलि सकैत छी । बौआ जन्मदिन मनेबाक लेल बान्हल गेल सेवा-दस्तुर सहित ओतय बच्चा सभक लेल भोजन आ संगहि बच्चा सभक कपड़ा धोयवला साबुन आ सर्फक विशेष मांग केँ पूरा कय आयल ।

बेटीक फरमाइश छल जे हमर जन्मदिन ओहि बच्चा सभक संग अहाँ सब मनाउ आ फोटो-वीडियो पठाउ । कार्यव्यस्तता मे निर्धारित समय ‘४ बजे’ निकलि गेल । आब जाउ कि नहि जाउ, बड़ा असमंजस मे पड़ि गेलहुँ । कारण अनाथाश्रम अत्यन्त अनुशासित नियम मुताबिक चलैत अछि । आब जायब त बच्चा सब आने काज मे व्यस्त होयत से सोचि बड़ा असमंजस मे रही । तखन बौआ अनाथाश्रम संचालन करयवाली दीदी जे हमरा बिल्कुल ‘मदर टेरेसा’ जेकाँ सब दिन बुझाइत रहली, हुनका संग बात करौलक । ओ कहलनि जे “अब त बर्थडे मनाउने बेला सकि सक्यो’ – यानि ओ समय निकलि गेल, मुदा अहाँ सब आउ आ बच्चा सभक संग किछु समय ओकरा सभक नास्ता टेबल पर बिता सकैत छी । तदनुसार ५ः३० बजे सन्ध्या मे हम सब पहुँचलहुँ ।

संचालिका दीदी एतबे ज्ञानी आ विवेकी छथि जे पुछू जुनि । कनिकबेकाल मे एतेक गहींर ज्ञानक बात सब करय लगलिह जे काफी प्रेरणा भेटल । हमर धर्मपत्नीक एक गोट प्रश्न –

“दीदी, अहाँक मन मे अनाथाश्रम चलबैक विचार केना आयल?”

एकर जबाब दैत ओ कहलनि –

“सब सँ पहिने लोक केँ हम के छी, हमर जीवनक अभीष्ट कि अछि आ हमरा अपन जीवन मे कि करबाक चाही – एकर जबाब तकबाक चाही । हम सेहो अपन गृहस्थी जीवन मे ४-४ टा बच्चा केँ पोसि-पालि पैघ बनबैत सब दिन अपन निजी उम्र मे अनाथ बच्चा सब लेल किछु करब से सोच बनेलहुँ । अपन बच्चा सब छँटगर भ’ गेल छल, हमर किछु बच्चा सब अमेरिका मे रहैत अछि आ ओतहि एक सँ एक क्षेत्र मे काज करैत अछि । हमर छोटकी बेटी सेहो एहि सोच मे सहयोग कयलक । पहिने भाड़ाक घर मे ६ वर्ष चलेलहुँ । आइ ई अपन जमीन कीनिकय एतय अनाथ बच्चा सभक सेवा कय रहल छी ।”

फेर संचालिका दीदी हमरा सब केँ घुमबय लगलिह पूरा अनाथाश्रम । बच्चा सभक नास्ताक समय भेलैक । नास्ता मे चुरा, दही आ केराक संग पुरी आ पुआ, गरम-गरम दूध आदिक इन्तजाम सेहो रहैक । अनाथाश्रम मे करीब १०-२० गाय केर सेवा सेहो चलि रहल छलैक । दूध अपनहि गाय केर । बिल्कुल शुद्ध । औंटैत देखलियैक त मन मे लालचो आबि गेल…. आब एहेन ओरिजिनल दूध बाहर मे कतय भेटत । एकटा जमाना रहैक, लोक मे ईमानदारी रहैक, तहिया एहेन दूध बाबी-काकी सब केँ औँटैत देखने रही । खैर… !

घुमिते-फिरिते ४-५ गोट बकारहीन दीदी जे सब संचालिका दीदीक मित्र सब रहथि, तिनका सब संग परिचय भेल । ओ सब अपना तरहें इशारा मे कतेको रंगक बात कय रहल छलथि, मुदा हमरा एक्के टा बात बुझय मे आबि रहल छल, ओ सब हमरा जेहेन आगन्तुक सब केँ देखि मात्र अपन प्रेम आ सिनेह लुटा रहल छलिह ।

एतबा मे एकटा बच्चा (जेकरा संग हम शेल्फी लेने छी से) आयल आ हमर छाती सँ चिपकि गेल । ओकर मुखाकृति मे बच्चे सँ रोगाक्रान्त भेल बुझायल, मुदा ओकर निश्छल हँसी आ जाहि (पिताक) प्रेम सँ वंचित रहल से हमरा छाती सँ सटिकय शायद ताकि रहल छल ओ… आँखि भरभरा गेल तखनहि हमर । तेकर बाद बड़ीकाल धरि कनिते रहि गेल छलहुँ हम । बुझय मे नहि आबि रहल छल – तामश चढ़ि रहल छल ओहि माय-बाप पर जे अपन पापक सजाय एहि ठोहि भरिक बच्चा सब केँ केना दैत अछि । एखनहुँ लिखि रहल छी आ आँखि सँ नोर ढपढपा रहल अछि ।

ओ एक्केटा बच्चा नहि रहय । लगभग ३०-४० टा बच्चा । बेटी बेसी छल । हमर मन अत्यन्त दयार्द्रता सँ भरल, ओकरा सभक हँसी सँ हँसितो रही, मुदा मोन द्रविते रहय । सब बच्चाक चेहरा पर एकटा अदृश्य उदासी देखाइत रहल हमरा । आ भीतर एकटा क्रोध ओहि माय-बाप पर जे सिर्फ कामुकता आ वासनाक खेल करब बुझलक, लेकिन भगवानक लीला जे सन्तानोत्पत्तिक सम्भावना केँ पर्यन्त नकारिकय ओ नान्हिटा बच्चा केँ केना फेक देलक सड़क पर, आइयो धरि एना होइते अछि… लोक एतेक क्रूर केना भ’ जाइत अछि, आदि बातक घोर तामश सेहो चढ़ल ।

लेकिन ओतय गेल रही अपन बेटीक जन्मदिन मनाबय…

दीदी खाना तैयारी भ’ रहल किचन मे लय गेलिह । थारी सब निकलल । एकटा आर सहायिका दीदी रहथि या फेर हमरे जेकाँ कियो आगन्तुक दीदी – ओ फटाफट चुरा देलनि, संचालिका दीदी स्वयं दही तथा एक आर सहायिका दीदी केरा सोहि-सोहि कय दैत गेलिह । हम आ वन्दनाजी सजायल थारी लय-लय बच्चा सभक सोझाँ रखलहुँ ।

सब सम्भ्रान्त बच्चा बुझायल । कारण ओतय संस्कार, शिक्षा आ शासन केर मिश्रित प्रभाव पड़ैछ बच्चा सब पर । एकटा बहुते छोट बच्चा फेर लग मे आयल आ एकदम संस्कारी बच्चा जेकाँ बात करय लागल । हम अलबौका जेकाँ सभक मुँह देखी आ मनक भीतर जे रन्ज रहय से नोर बनि-बनिकय आँखि सँ बाहर होइत रहल ।

ताबत दीदी आबिकय एकटा पुआ खुऔलनि आ हमरे ‘हैप्पी बर्थडे टु यू’ कहिकय बौंसय लगलिह । वन्दनाजी कहलखिन जे हिनकर बेटीक बर्थडे छन्हि दीदी, ओकर नाम अम्बिका छैक । एक बेर ओकर नाम लय केँ अहाँ आशीर्वाद दय दियौक । ओहो दीदी आब काफी वृद्धा भ’ गेल छथि । तथापि, ओ हमरा सभक भावना, हृदय, मन आ वाणी सब किछु एकदम ठीक-ठीक बुझैत अपन आशीर्वाद प्रदान कयलिह । हम हुनकर आ ईश्वर दुनू केर एकदम आभारी भ’ कृत्-कृत्य भ’ घर वापस भेलहुँ ।

रास्ता मे वन्दनाजी पुछलनि, “कनलियैक कियैक?” हमरा लग कोनो जबाब नहि छल । हम वाकहीन रही । परमपिता परमेश्वर अपन दया – माया सँ किन्नहुँ अनाथ नहि बनबिहथि । एतबे प्रार्थना । जीवन मे जतेक धरि सकब, एहि अनाथ बच्चा सब लेल सेवाकार्य करैत रहब । से कृत्संकल्पित भेलहुँ । प्रणाम !! लम्बा लेख पढ़य पड़ल ताहि लेल क्षमा करब, धरि लिखब जरूरी बुझल तेँ लिखि देल ।

हरिः हरः!!

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