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मानव छी त कष्ट उठबय पड़त, सुमिरन मात्र सँ सुख भेटत

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सुमिरन मात्र सँ सुख भेटत

– प्रवीण नारायण चौधरी

मानव संसार मे अनेकों दुःख, पीड़ा, शोक, सन्ताप आदिक भरमार अछि । एहेन कियो नहि जेकरा ई सब किछु नहि भोगय पड़ैछ । भगवान् रामचन्द्र जी पर्यन्त पिताक शोक, मानव जीवनक दुरुह कष्ट वनवास, पत्नी-विरह, विमाताक कोप आदि झेललनि । सीताक चरित्र देखब त ओ सामान्य लोक जेकाँ अशोकक गाछ सँ पर्यन्त शोकक हरण लेल विनती कयलनि । पति संग बिछोड़क विरह आ दुर्जन रावणक देल धौंस-धमकी आ पहरा मे कैदक कष्ट सँ आइग लेल आकाशक तारारूपी अंगार केँ आह्वान कयलनि । आदि ।

आजुक महत्वपूर्ण उचार ई भेल अछिः

नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः ।
नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम् ॥

एहि श्लोक सँ देवता लोकनि माता पार्वती – अपराजिता देवी केँ गिरिराज हिमालय पर पहुँचि स्तुति करब आरम्भ कयलनि । कखन ? जखन ओ सब शुम्भ-निशुम्भ जेहेन दुर्दान्त शक्तिशाली राक्षसक राक्षसी सँ हारि-थाकि गेलथि तखन ।

अहाँ गौर करब – दुर्गा सप्तशतीक पाँचम अध्याय मे भगवतीक स्तुति करैत काल देवगण कोन-कोन स्वरूपक ध्यान कयलनि अछि ।

स्तुति गायन मे वास्तव मे शक्तिसम्पन्न परमात्माक विभिन्न रूप केँ स्मरण करब, वैह वाचन करब, ओकरे गाबिकय प्रस्तुत करब – वैज्ञानिक ढंग सँ सोचिकय देखब त पता चलत जे जखन कोनो निश्चित स्वरूप केर चिन्तन आरम्भ होइछ त अन्तर्मन मे एक तरहक गम्भीरता आबि जाइछ । सब तंत्रिका तंत्र जे कि ध्वनि व कम्पन सँ नियंत्रित अछि, मन-मस्तिष्क, बुद्धि-ज्ञान आ विवेक – ई सारा एहि ध्वनि-कम्पन केर आवृत्ति (फ्रीक्वेन्सीज) अनुसार काजो करैछ आ नियंत्रणो मे रहैछ; एहि तरहें प्रकृति आ परमात्मा सँ शक्ति ग्रहण करैछ ।

एकटा उदाहरण लियौक –

हमर एकटा फेवरेट भजन अछि “पूजा कोना केँ करू हे भवानी” । आब एहि भजन मे एक-एक टा हरफ मे कोनो न कोनो भाव अभरत । जेना –

अच्छत न चन्दन माँ, नैवेद्यक न डाला
कोना कय चढ़ाबू माँ केँ, ई फूल माला
महिमा अहाँ के बच्चे सँ गाबी….

एहि पंक्ति मे भगवतीक सामान्य स्वरूप जे हम सब बच्चे सँ देखैत आबि रहल छी, माँ-बाबी-काकी अथवा पुरुष वर्ग सब केँ जे फुलडाली मे फूल-माला, धूप, अच्छत, सिनुर, आदि लय केँ प्रतिदिन पूजा-अर्चना करैत देखलहुँ, अपनहुँ मोन मे आयल जे ई सुन्दर काज हमरो करबाक चाही… एहि सँ हमरो जीवनक उतार-चढ़ाव नियंत्रित होयत, त तहिया सँ आइ धरि एहि भाव मे छी आ एहेन भजन गाबिकय मन स्वतःस्फूर्त आनन्दभाव केँ प्राप्त करैछ ।

आखिर कतेक छटपटायब ? संसार मे सब चीज सदैव अपन अनुकूल नहि नजरि पड़त । मन खिन्न होइत रहत । दुःख, कष्ट, पीड़ा बेर-बेर अभरबे टा करत । कारण ओकर काजे छैक जे एहि मायावी संसार मे ओ बेर-बेर जन्म लैत रहय । फेर ईश्वरक विधान एहेन छन्हि जे साधनारत लोक केँ मन मे स्थिरता प्रदान करब, बाकी छटपटाय जतेक छटपटेबाक छैक ।

उपरोक्त स्तुति देवगण तखन कयलनि जखन शुम्भ-निशुम्भ जेहेन शक्तिशाली राक्षस धर्म विरूद्ध निजमतिक अनुशासनहीन उत्पात मचाबय लागल । गौर कय केँ देखबय त ओहो राक्षस पहिने धर्महि केर आचरण कयलक, शक्ति अर्जित कयलक, मुदा बाद मे धर्महि विपरीत अपन दुर्मति सँ उत्पन्न दानवी प्रवृत्ति मे लीन भ’ सृष्टिक नियम विपरीत आचरण करय लागल । एहि तरहें देवता सब परेशान भ’ कय माता अपराजिता देवी जे पूर्व मे देवता सब केँ वरदान देने रहथिन, कि कष्टक समय हम फेर आबि जायब अहाँ सब केँ बचेबाक लेल… देवता सब स्मरण मे अनलनिः

तयास्माकं वरो दत्तो यथाऽऽपत्सु स्मृताखिलाः । भवतां नाशयिष्यामि तत्क्षणात्परमापदः ॥दु.स. ५-६॥

त, बन्धुगण ! भक्तजन ! हम-अहाँ अपन जीवन मे हारल-थाकल जेकाँ अनुभव कय सकैत छी । कतेको बेर ई कष्ट सीमा सँ बाहर बुझायत । लेकिन हम-अहाँ सिवाय सुमिरनक आर किछु नहि कय सकैत छी । किंकर्त्तव्यविमूढ़ता मे आर विशेष ध्यान करब त समस्याक निदान स्वतः अभरत । उपरोक्त वैज्ञानिक सूत्र अनुसार अपन सम्पूर्ण तंत्रिका तंत्र केँ मंत्र सँ सिक्त करैत रहू । बम बम करू ।

हरिः हरः!!

 

 

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