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प्रवीण नारायण चौधरी

केना जियत कलाकर्मः सन्दर्भ लोककला आ रंगकर्म

विचार – प्रवीण नारायण चौधरी केना जियत कलाकर्म जनकपुर के सन्तोष, प्रीतिक नेतृत्व मे चलि रहल अछि एक रंगकर्मी समूह। ई समूह द्वारा निरन्तर अपन मौलिक संस्कृति केँ बचेबाक अभियान संचालित भ’ रहल अछि। ओना त जनकपुर के जमीन रंगकर्म आ कलाकर्म लेल एतबा हरियर अछि जे मिथिला नाट्यकला परिषद् सन् प्रतिष्ठित समूह विश्व भरि केना जियत कलाकर्मः सन्दर्भ लोककला आ रंगकर्म

रामचरितमानस मोतीः श्री रामजीक लक्ष्मणजी केँ बुझेनाय आ भरतजीक महिमा कहनाय

स्वाध्याय – प्रवीण नारायण चौधरी रामचरितमानस मोती श्री रामजीक लक्ष्मणजी केँ बुझेनाय आ भरतजीक महिमा कहनाय १. देववाणी सुनिकय लक्ष्मणजी सकुचा गेलाह। श्री रामचंद्रजी आर सीताजी हुनकर आदर सँ सम्मान कयलनि आर कहलनि – “हे तात! अहाँ बहुत सुन्दर नीति कहलहुँ। हे भाइ! राज्यक मद सब सँ कठिन मद थिक। जे साधु लोकनिक सभाक सेवन रामचरितमानस मोतीः श्री रामजीक लक्ष्मणजी केँ बुझेनाय आ भरतजीक महिमा कहनाय

रामचरितमानस मोतीः श्री सीताजीक स्वप्न, श्री रामजी केँ कोल-किरात द्वारा भरतजीक आगमनक सूचना, रामजीक शोक, लक्ष्मणजीक क्रोध

स्वाध्याय – प्रवीण नारायण चौधरी रामचरितमानस मोती श्री सीताजीक स्वप्न, श्री रामजी केँ कोल-किरात द्वारा भरतजीक आगमनक सूचना, रामजीक शोक, लक्ष्मणजीक क्रोध १. एम्हर श्री रामचंद्रजी राति शेष रहिते जागि गेलाह। राति केँ सीताजी एहेन सपना देखलीह जे ओ श्री रामचंद्रजी केँ सुनाबय लगलीह, मानू समाज सहित भरतजी एतय आयल छथि। प्रभुक वियोग केर अग्नि रामचरितमानस मोतीः श्री सीताजीक स्वप्न, श्री रामजी केँ कोल-किरात द्वारा भरतजीक आगमनक सूचना, रामजीक शोक, लक्ष्मणजीक क्रोध

रामचरितमानस मोतीः भरतजी चित्रकुटक मार्ग मे

स्वाध्याय – प्रवीण नारायण चौधरी रामचरितमानस मोती भरतजी चित्रकूटक मार्ग मे १. एहि प्रकारे भरतजी मार्ग मे चलल जा रहल छथि। हुनकर हालत देखि मुनि ओ सिद्धगण लोकनि सिहरि रहल छथि। भरतजी जखनहि ‘राम’ कहिकय लम्बा साँस लैत छथि, तखनहि मानू चारू दिश प्रेम उमड़ि पड़ैत अछि। प्रेम और दीनता सँ पूर्ण हुनकर वचन सुनि रामचरितमानस मोतीः भरतजी चित्रकुटक मार्ग मे

रामचरितमानस मोतीः इन्द्र आ वृहस्पति संवाद

स्वाध्याय – प्रवीण नारायण चौधरी रामचरितमानस मोती इंद्र-बृहस्पति संवाद १. भरतजीक प्रेमक प्रभाव देखि देवराज इन्द्र केँ सोच भ’ गेलनि जे कहीं हिनक प्रेमवश श्री रामजी वापस न आबि जाइथ आ हमरा सभक बनल-बनायल कार्य बिगड़ि नहि जाय। संसार भला लेल भला आ ब’द लेल ब’द (खराब लेल खराब) होइछ। मनुष्य जेहेन अपने होइत अछि रामचरितमानस मोतीः इन्द्र आ वृहस्पति संवाद

रामचरितमानस मोतीः भरद्वाज द्वारा भरत केर सत्कार

स्वाध्याय – प्रवीण नारायण चौधरी रामचरितमानस मोती भरद्वाज द्वारा भरत केर सत्कार १. एहि प्रकारे मुनिश्रेष्ठ भरद्वाजजी भरतजीक समाधान कयकेँ आगू कहलनि – आब अपने लोकनि हमर प्रेम प्रिय अतिथि बनू आ कृपा कय केँ कन्द-मूल, फल-फूल जे किछु हम दी से स्वीकार करू।  २. मुनिक वचन सुनिकय भरतक हृदय मे सोच भेलनि जे बेमौका रामचरितमानस मोतीः भरद्वाज द्वारा भरत केर सत्कार

रामचरितमानस मोतीः भरतजीक प्रयाग जायब आर भरत-भरद्वाज संवाद

स्वाध्याय – प्रवीण नारायण चौधरी रामचरितमानस मोती भरतजीक प्रयाग जायब आर भरत-भरद्वाज संवाद १. प्रेम मे उमकि-उमकि “सीताराम-सीताराम” कहैत भरतजी तेसर पहर प्रयाग मे प्रवेश कयलनि। हुनकर पैर मे पड़ल छाला (फोका) एना चमकैत अछि जेना कमल फुलक कोंढ़ी (कली) पर ओसक बूँद चमकैत अछि। भरतजी आइ पैदले चलिकय आयल छथि, ई समाचार सुनिकय सारा रामचरितमानस मोतीः भरतजीक प्रयाग जायब आर भरत-भरद्वाज संवाद

मैथिल मे पसरैत एक महान खराब आदति “परोक्ष निन्दा”

विचार – प्रवीण नारायण चौधरी परोक्ष चर्चा अथवा निन्दा पापकर्म थिक बहुत अफसोस संग अपन मिथिलाक लोक मे आबि रहल कमजोरीक उल्लेख करय पड़ैत अछि। कमजोरी पर आंगूर उठेनाय लेखनी धर्मक कर्तव्य थिक तेँ लिखि रहल छी। परोक्ष मे कुचर्चा करब हमरा सभक खराब आदति बनि गेल अछि। ओना त मानवहि केर खराब आदति मे मैथिल मे पसरैत एक महान खराब आदति “परोक्ष निन्दा”

रामचरितमानस मोतीः भरत-निषाद मिलन आर संवाद – भरतजी एवं नगरवासी लोकनिक प्रेम

स्वाध्याय – प्रवीण नारायण चौधरी रामचरितमानस मोती भरत-निषाद मिलन आर संवाद – भरतजी एवं नगरवासी लोकनिक प्रेम १. दण्डवत करैत देखि भरतजी निषादराज केँ उठाकय छाती सँ लगा लेलनि। हृदय मे प्रेम अँटि नहि रहल छन्हि, मानू स्वयं लक्ष्मणजी सँ भेंट भ’ गेल होइन्ह। भरतजी गुह केँ अत्यन्त प्रेम सँ गला लगा रहल छथि। प्रेम रामचरितमानस मोतीः भरत-निषाद मिलन आर संवाद – भरतजी एवं नगरवासी लोकनिक प्रेम

रामचरितमानस मोतीः निषाद केर शंका आर सावधानी

स्वाध्याय – प्रवीण नारायण चौधरी रामचरितमानस मोती निषाद केर शंका आर सावधानी १. राति भरि सई नदीक तीर पर निवास कय सबेरे ओतय सँ (भरत-शत्रुघ्न संग वनगमन कयनिहार समस्त अयोध्यावासी) चलि देलाह आर सब कियो श्रृंगवेरपुर लग आबि गेलाह। निषादराज सब समाचार सुनलनि त ओ दुःखी भ’ हृदय मे विचार करय लगलाह – कि कारण रामचरितमानस मोतीः निषाद केर शंका आर सावधानी