केना जियत कलाकर्मः सन्दर्भ लोककला आ रंगकर्म

विचार

– प्रवीण नारायण चौधरी

केना जियत कलाकर्म

जनकपुर के सन्तोष, प्रीतिक नेतृत्व मे चलि रहल अछि एक रंगकर्मी समूह। ई समूह द्वारा निरन्तर अपन मौलिक संस्कृति केँ बचेबाक अभियान संचालित भ’ रहल अछि। ओना त जनकपुर के जमीन रंगकर्म आ कलाकर्म लेल एतबा हरियर अछि जे मिथिला नाट्यकला परिषद् सन् प्रतिष्ठित समूह विश्व भरि मे चर्चित अछि, मिनाप के अतिरिक्त आरो कतेको रास समूह द्वारा मिथिलाक लोककला व लोकरंग केर विभिन्न आयाम प्रस्तुत कयल जाइत देखलहुँ। रितेश पाटलिक रंगदर्पण समूह सेहो एहि क्षेत्र मे काफी लब्धप्रतिष्ठित नाम थिक।

विगत किछु वर्ष सँ जनकपुर मे लिटरेचर फेस्टिवल केर लगातार आयोजन भेला सँ एहि कलाकर्म प्रति लोक मे बेस जनजागरण आ आकर्षण होयबाक क्रान्ति सेहो आँखिक सोझाँ देखि रहल छी। संतोष-प्रीतिक समूह ‘विजयलक्ष्मी मीडिया’ व ‘प्रगतिशील युवा क्लब’ आदिक नाम सँ काज करैत अछि। गाम-गाम आ ठाम-ठाम पर सालों भरि मिथिलाक लोककला आ रंगकर्म मार्फत विभिन्न प्रभावी कार्य सब करैत देखि रहल छी।

मैथिली अभियानीक रूप मे हिनका सभक चिन्ता आ सरोकार हमरो सरोकार भेल करैत अछि। विराटनगर मे मैथिली अभियान मे राम भजन कामत जेहेन चर्चित रंगकर्मी भेटलथि आ हमरा बहुत नजदीक सँ हिनका सभक दुःख, कष्ट आ चिन्ता बुझबाक-गुनबाक अवसर भेटल। रंगकर्मी लोकनिक समूहक सामने रोजगारक भारी समस्या आ पेटो भरब आफद होयबाक खतरनाक परिस्थिति हम बहुत नजदीक सँ देखलहुँ। एक बेर यूथ फर ब्लड नाम के युवा समूह जे जरूरतमन्द बीमार लोक केँ रक्त उपलब्ध करेबाक काज करैत अछि, ओहि संस्था केँ सहयोग करबाक लेल एकटा आईडिया देने रही जे कियैक न एहि तरहक सेवामुखी सामाजिक संस्था/समूह लेल किछु कोष स्थापित कयल जाय आ ताहि मे रंगकर्मी युवा समूह संग सहकार्य करैत जनमुखी नुक्कड़ नाटक आदि सँ जनजागरण करैत बढ़ल जाय। ई बहुत सफल सिद्ध भेल छल। हालांकि नुक्कड़ के बदला ओ सब चैरिटी शो के सूत्र मात्र अपना सकल छल, तथापि १२ साल पहिने लाख टका के कोष स्थापित करय मे सफल भेल छल।

रंगकर्मी समूह अगबे रंगकर्म सँ पेट नहि भरि सकैत अछि आजुक युग मे। अन्य नौकरी/पेशा/उद्यम करहे टा पड़तैक। जहाँ अन्य पेशा मे लगैत अछि कि ओकर कलाकर्म बेस प्रभावित होबय लगैत छैक। ओकरा मे रहल प्रतिभा सेहो विचित्र तरहें ह्रास होइत हम प्रत्यक्ष २-४ गोटे रंगकर्मी कलाकार मे देखलियैक। पुनः हमर सलाह सँ एकटा दोसर टेकनिक अपनेबाक बात कहलियैक। रंगकर्म आ वाणिज्य-व्यवसाय केँ जोड़िकय रिटेल मार्केटिंग के मार्जिन सँ रोजगारसम्पन्न बनय लेल कहलियैक। मुदा कलाकार सब मार्केटिंग के नामे सुनिकय डरा गेल आ ठमकि गेल। हम प्रोडक्ट्स सेहो देलियैक, आवश्यक सहयोग-सामग्री सहित नुक्कड़ नाटक मार्फत सन्देश आ रोजीक रूप मे किछु उत्पाद के सीधा उपभोक्ता केँ बिक्रीक फन्डा। नहि मानलक। शायद लाज भेलय।

लेकिन सन्तोष-प्रीतिक समूह केँ हमर ई आईडिया क्लिक कयलक। लोकसंस्कृतिक हेराइत कला केँ समेटैत नुक्कड़ नाटक, हाट-बाजार मे प्रदर्शन, लोकक बीच मे जा-जाकय प्रचार-प्रसार आ कलाकार लेल जीविकोपार्जन हेतु यथासम्भव आर्थिक/व्यवसायिक गतिविधि सँ रंगकला केँ जियाकय रखबाक काज करय लागल। एहि बीच एकरा सभक रंग-समूह केँ नेपालक बड़का-बड़का कम्पनी सब सेहो प्रचार-प्रसार लेल जिम्मा दियए लागल छैक। रंगकर्मी कलाकार लेल रोजगारक नव सहारा धीरे-धीरे स्थापित भ’ रहल अछि। हालांकि संघर्ष एखनहुँ प्रबल छैक, जीतक अनुपात एखन धरि अत्यल्प कही त अतिश्योक्ति नहि होयत। कारण मैथिल उद्यमी आ व्यवसायी मे एखन धरि कोढ़िया चाहे ह’ वाली बात बेसी छैक, प्रचार-प्रसार मे ई सब पाय कम खर्च करैत छथिन आ राति देखल सपना मे करोड़पति बनबाक या फेर ‘छक्कल-बक्कल येल्लो पर्पल’ वला सूत्र पर चलियेकय पाय कमा लेब से बेसी बुझैत छथिन, जँ ई सब एहि तरहक समूहक उपयोग करथि त टर्न ओवर कई गुना बढ़ि जेतनि से गारन्टी अछि।

एहि तरहें मैथिली आ मिथिलाक मौलिक लोककला, रंगकर्म आदि केँ जियेबाक काज कय रहल संतोष-प्रीतिक समूह लेल हमर आह्वान अछि जे हिनका सब केँ हर जगह कार्यक्रम मे अवसर दी, हिनकर प्रस्तुति सँ मिथिलाक दर्शक-समाज केँ जोड़िकय राखी। भाट परम्परा, नट-नटिन, जट-जटिन, पमरिया नाच, झरी-झरी, कमला नाच, भाओ-भगैत, आदिक संग भिन्न-भिन्न विषयक लघु-नाटक केर प्रस्तुति जतेक बेसी प्रभावशाली होइछ से कारपोरेट वर्ल्ड आ एडवान्स टेक्नोलोजी नहि भ’ सकैत अछि। बस, प्रयोग कय केँ देखू जे हमर दावी कतेक सही अछि।

रामलीला के टोली एकटा पैघ रोजगार भेल करय कहियो। कतेको गरीब विद्यार्थी रामलीला मे काज कय केँ अपन पढ़ाई खर्च निकालय, गरीब माँ-बाप लेल सहारा बनय, अभाव केँ दूर करय। मुदा बदलैत संसार मे रामलीला आ मौलिक कला-प्रस्तुति सँ लोकक चित्त उखड़ैत चलि गेल छैक। अफीमक नशा जेकाँ टेलिविजन आ फिल्म के असरि पड़ैत चलि गेल छैक। आधुनिक टेक्नोलोजी आ रोबोट युग मे मार-धाड़ आ लेजर वेपन्स व कम्प्यूटरीकृत काल्पनिक दृश्य सभक असरि सँ के पुछैत अछि मौलिक लोककला व लोकरंग केँ, धरि मौलिकताक महत्व केँ कियो नकारि नहि सकैत छी आ मूल शक्ति सेहो मौलिक वस्तु सँ भेटैत अछि से नहि काटि सकैत अछि कियो। कल्पना सँ अतीत के संसार मे कतबू जायब, सन्तुष्टि यथार्थता आ विद्यमान प्रासंगिकता मे मात्र होइत छैक।

अन्त मे, अपन कला, कलाकर्म ओ कलाकार प्रति हम जिम्मेदार समाज जे कय सकी से करी।

हरिः हरः!!