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प्रवीण नारायण चौधरी

रामचरितमानस मोतीः भरतजीक प्रयाग जायब आर भरत-भरद्वाज संवाद

स्वाध्याय – प्रवीण नारायण चौधरी रामचरितमानस मोती भरतजीक प्रयाग जायब आर भरत-भरद्वाज संवाद १. प्रेम मे उमकि-उमकि “सीताराम-सीताराम” कहैत भरतजी तेसर पहर प्रयाग मे प्रवेश कयलनि। हुनकर पैर मे पड़ल छाला (फोका) एना चमकैत अछि जेना कमल फुलक कोंढ़ी (कली) पर ओसक बूँद चमकैत अछि। भरतजी आइ पैदले चलिकय आयल छथि, ई समाचार सुनिकय सारा रामचरितमानस मोतीः भरतजीक प्रयाग जायब आर भरत-भरद्वाज संवाद

मैथिल मे पसरैत एक महान खराब आदति “परोक्ष निन्दा”

विचार – प्रवीण नारायण चौधरी परोक्ष चर्चा अथवा निन्दा पापकर्म थिक बहुत अफसोस संग अपन मिथिलाक लोक मे आबि रहल कमजोरीक उल्लेख करय पड़ैत अछि। कमजोरी पर आंगूर उठेनाय लेखनी धर्मक कर्तव्य थिक तेँ लिखि रहल छी। परोक्ष मे कुचर्चा करब हमरा सभक खराब आदति बनि गेल अछि। ओना त मानवहि केर खराब आदति मे मैथिल मे पसरैत एक महान खराब आदति “परोक्ष निन्दा”

रामचरितमानस मोतीः भरत-निषाद मिलन आर संवाद – भरतजी एवं नगरवासी लोकनिक प्रेम

स्वाध्याय – प्रवीण नारायण चौधरी रामचरितमानस मोती भरत-निषाद मिलन आर संवाद – भरतजी एवं नगरवासी लोकनिक प्रेम १. दण्डवत करैत देखि भरतजी निषादराज केँ उठाकय छाती सँ लगा लेलनि। हृदय मे प्रेम अँटि नहि रहल छन्हि, मानू स्वयं लक्ष्मणजी सँ भेंट भ’ गेल होइन्ह। भरतजी गुह केँ अत्यन्त प्रेम सँ गला लगा रहल छथि। प्रेम रामचरितमानस मोतीः भरत-निषाद मिलन आर संवाद – भरतजी एवं नगरवासी लोकनिक प्रेम

रामचरितमानस मोतीः निषाद केर शंका आर सावधानी

स्वाध्याय – प्रवीण नारायण चौधरी रामचरितमानस मोती निषाद केर शंका आर सावधानी १. राति भरि सई नदीक तीर पर निवास कय सबेरे ओतय सँ (भरत-शत्रुघ्न संग वनगमन कयनिहार समस्त अयोध्यावासी) चलि देलाह आर सब कियो श्रृंगवेरपुर लग आबि गेलाह। निषादराज सब समाचार सुनलनि त ओ दुःखी भ’ हृदय मे विचार करय लगलाह – कि कारण रामचरितमानस मोतीः निषाद केर शंका आर सावधानी

रामचरितमानस मोतीः अयोध्यावासी सहित श्री भरत-शत्रुघ्न केर वनगमन

स्वाध्याय – प्रवीण नारायण चौधरी रामचरितमानस मोती अयोध्यावासी सहित श्री भरत-शत्रुघ्न आदिक वनगमन १. ओ सम्पत्ति, घर, सुख, मित्र, माता, पिता, भाइ जरि जाय जे श्री रामजीक चरणक सम्मुख होइ मे हँसिते सहयोग नहि करय। घरे-घर लोक अनेको प्रकारक सवारी सब सजा रहल अछि। हृदय मे बड़ा भारी हर्ष छैक जे भोरे चलबाक अछि। २. भरतजी रामचरितमानस मोतीः अयोध्यावासी सहित श्री भरत-शत्रुघ्न केर वनगमन

रामचरितमानस मोतीः वशिष्ठ-भरत संवाद, श्री रामजी केँ अनबाक लेल चित्रकूट जेबाक तैयारी

स्वाध्याय – प्रवीण नारायण चौधरी रामचरितमानस मोती वशिष्ठ-भरत संवाद, श्री रामजी केँ अनबाक लेल चित्रकूट जेबाक तैयारी १. वशिष्ठजी कहलखिन – हे तात! हृदय मे धीरज धरू आर जाहि कार्यक अवसर अछि, से करू। गुरुजीक वचन सुनि भरतजी उठलाह आ ओ अन्त्येष्टिक तैयारी करय लेल कहलनि। २. वेद मे बतायल गेल विधि मुताबिक राजाक देह रामचरितमानस मोतीः वशिष्ठ-भरत संवाद, श्री रामजी केँ अनबाक लेल चित्रकूट जेबाक तैयारी

रामचरितमानस मोतीः भरत-कौसल्या संवाद और दशरथजीक अन्त्येष्टि क्रिया

स्वाध्याय – प्रवीण नारायण चौधरी रामचरितमानस मोती भरत-कौसल्या संवाद और दशरथजीक अन्त्येष्टि क्रिया १. कौसल्याजी मैल वस्त्र पहिरने छथि, चेहराक रंग बदलल छन्हि, व्याकुल भ’ रहल छथि, दुःखक बोझ सँ शरीर सुखा गेल छन्हि। एना देखाइत छथि जेना सोनाक सुन्दर कल्पलताक वन मे पाला मारि देने होइक। भरत केँ देखिते माता कौसल्याजी उठि दौड़लीह। लेकिन रामचरितमानस मोतीः भरत-कौसल्या संवाद और दशरथजीक अन्त्येष्टि क्रिया

रामचरितमानस मोतीः भरत केर आगमन आ शोक

स्वाध्याय – प्रवीण नारायण चौधरी रामचरितमानस मोती श्री भरत-शत्रुघ्न का आगमन और शोक १. बाजार आ रास्ता देखल नहि जाइछ, मानू नगर मे दसों दिशा मे दावाग्नि लागल रहय! पुत्रक अबाय सुनिकय सूर्यकुलरूपी कमल लेल चाँदनीरूपी कैकेइ बहुत हर्षित भेलीह। ओ आरती सजा आनन्द सँ भरल उठिकय दौड़लीह आ दरबज्जे पर भेटिकय भरत-शत्रुघ्न केँ महल रामचरितमानस मोतीः भरत केर आगमन आ शोक

रामचरितमानस मोतीः गुरु वशिष्ठजी द्वारा भरत केँ बजेबाक लेल दूत पठायब

स्वाध्याय – प्रवीण नारायण चौधरी रामचरितमानस मोती मुनि वशिष्ठ द्वारा भरतजी केँ बजेबाक लेल दूत पठेनाय १. राजा दशरथक प्राणान्त आ शोक-विरह सँ व्याप्त अयोध्याक राजमहल मे गुरु वशिष्ठ मुनि समय अनुकूल अनेक इतिहास कहिकय अपन विज्ञानक प्रकाश सँ सभक शोक दूर कयलनि। वशिष्ठजी नाव मे तेल भरबाकय राजाक शरीर केँ ओहि मे रखबा देलनि। रामचरितमानस मोतीः गुरु वशिष्ठजी द्वारा भरत केँ बजेबाक लेल दूत पठायब

रामचरितमानस मोतीः दशरथ-सुमंत्र संवाद – दशरथ मरण

स्वाध्याय – प्रवीण नारायण चौधरी रामचरितमानस मोती दशरथ-सुमन्त्र संवाद, दशरथ मरण १. महारानी कौसल्याक दरबार मे मंत्री सुमंत्र राजा दशरथ केँ देखि ‘जयजीव’ कहिकय दण्डवत्‌ प्रणाम कयलनि। सुनिते राजा व्याकुल भ’ कय उठलथि आ कहला – “सुमंत्र! कहू, राम कतय छथि?” राजा सुमंत्र केँ हृदय सँ लगा लेलनि। मानू डूबैत आदमी केँ किछु सहारा भेटि रामचरितमानस मोतीः दशरथ-सुमंत्र संवाद – दशरथ मरण