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प्रवीण नारायण चौधरी

लेखक रमेश केर जन्मदिन पर अंजय चौधरीक विज्ञतापूर्ण व्यक्तित्व परिचय

व्यक्तित्व-कृतित्व परिचय – अंजय चौधरी नवम दशकक समकालीन मैथिलीक प्रगतिवादी जनचिंतनधाराक महत्वपूर्ण कवि, कथाकार, गजलकार आ समीक्षक, विमर्शक, सर्वाधिक प्रयोगधर्मी रमेशजी केँ जन्मदिनक हार्दिक शुभकामना आ प्रणाम। डाॅ सुभाष चन्द्र यादव, डॉ शिवेन्द्र दास हिनक कवि कर्म’क समाजशास्त्र, व्यापक फलक, साहसिक स्वर ओ समकालीन दृष्टि पर ओ शिवशंकर श्रीनिवास हिनक गजल‌ महत्वपूर्ण टिप्पणी’क सौंदर्य ओहिना स्मरण लेखक रमेश केर जन्मदिन पर अंजय चौधरीक विज्ञतापूर्ण व्यक्तित्व परिचय

प्रत्येक मैथिल लेल मनन योग्य किछु जरूरी बात

तीत सत्य   हम मैथिल छी, हमर मूल धर्म अछि ‘आत्मविद्या के आश्रयदाता मैथिल राजा जनकक विदेह धर्म’ अपनबैत बन्धनमुक्त कर्म करैत मुक्तजीव बनबाक सम्पूर्ण चेष्टा करब। ई ‘बन्धनमुक्त कर्म’ के अर्थ बहुत व्यापक आ व्यवहार करय मे बड कठिनाह जरूर छैक, मुदा असम्भव नहि छैक। एहि मे कहल गेल छैक ममता, मोह, मास्चर्य, मत्सर, प्रत्येक मैथिल लेल मनन योग्य किछु जरूरी बात

रामचरितमानस मोतीः श्री रामजीक बाण सँ रावणक मुकुट-छत्रादिक खसनाय

स्वाध्याय – प्रवीण नारायण चौधरी रामचरितमानस मोती श्री रामजीक बाण सँ रावणक मुकुट-छत्रादिक खसनाय पैछला अध्याय मे श्री राम द्वारा पुछल गेल प्रश्न जे सुन्दर चन्द्रमा मे कारी धब्बा जे देखा रहल अछि से कथी थिक, अपन-अपन बुद्धि अनुसार कहय जाउ, ताहि पर सब विभिन्न तरहक बात सब कहलखिन। स्वयं श्री रामचंद्रजी सेहो कहलखिन जे रामचरितमानस मोतीः श्री रामजीक बाण सँ रावणक मुकुट-छत्रादिक खसनाय

रामचरितमानस मोतीः सुबेल पर श्री रामजीक झाँकी आर चंद्रोदय वर्णन

स्वाध्याय – प्रवीण नारायण चौधरी रामचरितमानस मोती सुबेल पर श्री रामजीक झाँकी आर चंद्रोदय वर्णन १. एम्हर श्री रघुवीर सुबेल पर्वत पर सेनाक बड़ा भारी समूहक संग उतरलाह। पर्वत केर एक गोट खूब ऊँचगर आ परम रमणीय समतल आ विशेष रूप सँ उज्ज्वल शिखर देखिकय – ताहि ठाम लक्ष्मणजी गाछक कोमल-कोमल पत्ता सब आ सुन्दर रामचरितमानस मोतीः सुबेल पर श्री रामजीक झाँकी आर चंद्रोदय वर्णन

रामचरितमानस मोतीः रावण केँ मन्दोदरी द्वारा बुझेनाय, रावण-प्रहस्त संवाद

स्वाध्याय – प्रवीण नारायण चौधरी रामचरितमानस मोती रावण केँ मन्दोदरी द्वारा बुझेनाय, रावण-प्रहस्त संवाद १. रावण केँ जखन ई खबरि लगलैक जे श्री रामजी समुद्र पर सेतुबन्ध बनबा लेलनि आ लंकाक सीमा पर आबि गेलाह त ओ घोर विस्मित होइत स्वतः बाजि उठैछ – वननिधि, नीरनिधि, जलधि, सिंधु, वारीश, तोयनिधि, कंपति, उदधि, पयोधि, नदीश केँ रामचरितमानस मोतीः रावण केँ मन्दोदरी द्वारा बुझेनाय, रावण-प्रहस्त संवाद

सीता आ हम

सब सँ पहिने ‘सीता’ एक अवतारी नारी रहथि से मन सँ कनिकाल लेल बगल मे राखू। आर, एकदम अपनहि जीवन जेकाँ सब कियो, नारी हो या पुरुष, सब कियो हुनकर जीवन सँ अपन जीवन केँ मिलाउ।   चलू पुनौराधाम। महाराजा (पिता, जनक) खेत जोतय गेलाह। महाराजा ई अभिमान छोड़िकय गेलाह जे हम राजा छी, हमरा सीता आ हम

रामचरितमानस मोतीः श्री रामजीक सेना सहित समुद्र पार उतरब, सुबेल पर्वत पर निवास, रावणक व्याकुलता

स्वाध्याय – प्रवीण नारायण चौधरी रामचरितमानस मोती श्री रामजीक सेना सहित समुद्र पार उतरब, सुबेल पर्वत पर निवास, रावणक व्याकुलता १. सेतुबन्ध पर बहुते भीड़ भ’ गेलैक, ताहि सँ किछु बानर सब आकाश मार्ग सँ उड़य लागल आ दोसर कतेको रास जलचर जीव सब पर चढ़ि-चढ़ि ओहि पार जा रहल अछि। कृपालु रघुनाथजी (तथा लक्ष्मणजी) रामचरितमानस मोतीः श्री रामजीक सेना सहित समुद्र पार उतरब, सुबेल पर्वत पर निवास, रावणक व्याकुलता

रामचरितमानस मोतीः नल-नील द्वारा पुल निर्माण, श्री रामजी द्वारा श्री रामेश्वर केर स्थापना

स्वाध्याय – प्रवीण नारायण चौधरी रामचरितमानस मोती नल-नील द्वारा पुल निर्माण, श्री रामजी द्वारा श्री रामेश्वर केर स्थापना १. समुद्रक वचन सुनि प्रभु श्री रामजी मंत्री लोकनि केँ बजाकय कहलनि – “आब विलम्ब कियैक कय रहल छी? पुल तैयार करू जाहि सँ सेना पार उतरय।” जाम्बवान्‌ हाथ जोड़िकय कहलखिन – “हे सूर्यकुल के ध्वजास्वरूप (कीर्ति रामचरितमानस मोतीः नल-नील द्वारा पुल निर्माण, श्री रामजी द्वारा श्री रामेश्वर केर स्थापना

मैथिल आ वृहत् संयुक्त परिवार

  हम मैथिल जनसमुदाय केर एकटा बड पैघ खासियत छल, किछु-किछु एखनहुँ अछि – ओ ई अछि जे हम मैथिल वृहत् संयुक्त परिवार मे जिबय के परम्परा स्वतःस्फूर्त भाव सँ जिबैत छी। हम सब माता-पिता, काका-काकी, भैया-भौजी, बाबा-बाबी, मामा-मामी, नाना-नानी, मौसी-मौसा, पीसी-पीसा, मित्र-भाइ, गौआँ-अनगौआँ, इलाका-भाषा के लोक आदिक एतेक वृहत् सम्बन्ध केँ स्वाभाविक रूप सँ मैथिल आ वृहत् संयुक्त परिवार

शक्तिविहीन मिथिला – शक्तिहीन पुरुष

आइ मस्तिष्क मन्थन कय रहल अछि जे मिथिला केँ शिथिला बनय मे स्त्री शक्तिक भूमिका केहेन भ’ रहल अछि। जे मिथिलाक जीवनशैली मे गीतनाद आ मनन योग्य धर्मक व्यवहार प्रचलित अछि, ताहि ठाम वर्तमानक विपन्नता विद्रूप केना? एहि सवालक जवाब ताकैत एकटा व्यंग्य प्रसंग सँ शुरुआत करय छी। एकटा हास्य कवि बड नीक सँ कहैत शक्तिविहीन मिथिला – शक्तिहीन पुरुष