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शक्तिविहीन मिथिला – शक्तिहीन पुरुष

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आइ मस्तिष्क मन्थन कय रहल अछि जे मिथिला केँ शिथिला बनय मे स्त्री शक्तिक भूमिका केहेन भ’ रहल अछि। जे मिथिलाक जीवनशैली मे गीतनाद आ मनन योग्य धर्मक व्यवहार प्रचलित अछि, ताहि ठाम वर्तमानक विपन्नता विद्रूप केना? एहि सवालक जवाब ताकैत एकटा व्यंग्य प्रसंग सँ शुरुआत करय छी। एकटा हास्य कवि बड नीक सँ कहैत रहथिन –
 
“आब हमरा पता चलल जे भारतवर्ष मे हर पति अपन पत्नी के अधीन कियैक रहैत छैक। वास्तव मे पत्नीये सँ शक्ति (ऊर्जा) प्राप्त करबाक विधान बनल छैक, तेँ पति सब पत्नीक सोझाँ नतमस्तक रहल करैत छथि।”
 
पब्लिक सब सुनलक त कविमन के गूढ़ बात ओतेक नहि फरिछेलय। कवि ताहि पर आगू बजलाह –
 
“आब देखू न! हमरा सभक भगवान विष्णु आ शिवजी, बिना काजहि के पड़ल छथि। धन चाही त लक्ष्मीजी, विद्या चाही त सरस्वतीजी, सुख-शान्ति चाही त पार्वतीजी – सबटा पावरफुल प्रोफाइल त भगवतिये सब लग छन्हि। भगवान सब त मंत्री विदाउट पोर्टफोलियो वला सब थिकाह। एकटा समुद्र मे शेषशय्या पर पड़ल छथि त दोसर कैलाश पहाड़ मे रहनाय पसिन कयलनि। शिवजी केँ पहिरन त देखू! अगबे साँप सब गर्दनि मे लेपटौने, भस्म रमौने उघारे दिगम्बर देह, एम्हर देवी सभक संख्या मे आर एकटा गंगाजी जटा सँ प्रकट कय केँ लोक सब केँ अपन शुचिता-पवित्रता लेल देवीक संख्या बढ़ा देलाह। भोजन कि-केना करैत छथि से सब केँ बुझले अछि, आक-धथूर-भांग आदिक सेवन करता…. जे कियो नहि पियत से हलाहल विष पिबि लेता…. आब कहू जे ओ ताण्डव नहि करता त दोसर करबे कि करता!”
 
बन्धुगण!
 
हम मिथिलावासी गौर कय केँ देखब त पता चलत जे सचमुच ‘मातावर्ग’ द्वारा मूल शक्तिक संचरण होइत अछि। भोजन, रहन-सहन, विध-व्यवहार, भक्ति-भजन, खेतीबारी, घर-गृहस्थी, कर-कुटुम्ब – हर बात मे स्त्री शक्ति हावी रहैत छथिन। त उपरोक्त कवि-कल्पना यथार्थक वर्णन करैत स्पष्टे अछि।
 
आइ जे मिथिला हेरायल-भोथियायल अछि ताहि मे यैह स्त्री शक्ति सब अपन मैथिली-मिथिला छोड़ि परदेशक जीवन केँ बेसी रुचिगर बुझय लगलखिन अछि। आब बियनि डोलाकय हवा अपना संग अपन पति-परिवार लेल नहि चाही – पतिक चाइन पर चूरा कुटय लगती जे सिलिंग फैन कि टेबुल फैन आनि दिअ’ नहि त कोप भवन मे कुपित भ’ पड़ि रहब।
 
आब त असर नवतुरिया स्त्री शक्ति सब पर सेहो पड़ि गेल छैक। “नहि यौ बाबू, हमरा जंगल मे द’ आउ मुदा ओहेन अवारा पति सँ ब्याह नहि कराउ… ओ भैर दिन मुंह मे बीड़ी आ गुटखा रखने रहैत अछि, टौआइत रहैत अछि, कोनो काज-धन्धा नहि छय कहाँ दिना, हमरा एहेन घर मे ब्याह नहि कराउ यौ बाबू। जे परदेश मे रहै छय आ उद्यम-धन्धा कय के रोजी कमाइत छय, ओकरा सँ करा दिअ’। आ, आब हम कि केकरो सँ कम यौ बाबू? आब त हम अपनो कमाइवाली छी। बम्बइ मे शोलिन्द्रा के कनियाँ टिफिन डिब्बा बेचिकय आइ देखियौ केहेन कोठा-सोफा बना लेलक। परदेश मे रहब त कमाइ के पचास गो बाट यौ बाबू!”
 
एहेन अवस्था सँ मिथिला गुजरि रहल अछि जे हरेक गाम मे एहने नव क्रान्तिकारी स्त्री शक्ति सभक चलते कय टा ‘शिव’ बिना पार्वती के अपन कैलाश मे निवास करय लेल बाध्य अछि। भांग-गाँजा चढ़ौने, लाल टुहटुह आँखि, खन ओहि पोखरि, खन ओहि डबरा… कतहु चुभैककय चौक-चौराहा सब पर ताण्डव कय-कय के हरैद-चून लगबा परलोक गमन के तैयारी कय रहल अछि। बदलैत व्यवस्था आ बदलल स्त्री शक्ति सँ ऊर्जा (शक्ति) प्राप्तिक बदलल स्वरूप मे मिथिला वास्तव मे शिथिला भ’ रहल अछि। एहि वास्ते जरूरी छैक जे सम्भ्रान्त स्त्री शक्ति स्वयं ‘काली-दुर्गा’ बनिकय ‘महिषासुर-शुम्भ-निशुम्भ’ (सामाजिक प्रदूषण) केँ कम करथि, अन्यथा ‘इ विहीन शिव’, अर्थात् शवरूपी पुरुख सँ मिथिला पुनः शक्तिशाली होयबाक आसार कम अछि।
 
हरिः हरः!!

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