विशेष सम्पादकीय
मैथिली भाषा आ संस्कृतिक दुरावस्थाक कारण की ?
कियो मैथिली कियैक पढ़य ?
शिक्षा मे मैथिलीक अनिवार्यता आ तेकर लाभ कि छैक ?
भारत मे लागू कयल गेल नव शिक्षा पद्धति NEP-2020 सँ त्रिभाषा शिक्षाक आधार सँ छात्र केँ कि सब लाभ भेटतैक ?
नेपाल मे मैथिली पाठ्यक्रमक विकास, शिक्षकक नियुक्ति आ पढ़ाइ-लिखाइ केर अनिवार्यता, शासन-प्रशासन मे मैथिलीक प्रयोग केँ बढ़ावा (सरकारी कामकाजक भाषा रूप मे मान्यता) – ई सब कहिया धरि ?
संघीयता लागू भेलाक बादो ‘एकल भाषा’ नीति सँ बहुभाषिक राष्ट्र मे नेपाली वाहेक अन्य भाषाभाषी मे समान राष्ट्रीयताक भावनाक विकास केना सम्भव हेतैक ?
प्रश्ने-प्रश्न सँ भरल अछि मैथिलीक वर्तमान ।
भारत संग-संग नेपाल मे संविधान मे मैथिली भाषा केँ सम्मानित स्थान देल गेल छैक । संविधान मे सम्मान भेटलाक बादहु व्यवहार मे सरकारी कार्यालय सब मे मैथिली भाषाक प्रचलन अपनहुँ राज्य बिहार मे नहि भ’ सकल छैक । हिन्दी मात्र प्रचलन मे देखल जाइछ । आब आम लोक हिन्दीक आदी बनि गेल बुझू ।
भारत मे त हिन्दी आ उर्दू लादिये देल गेलैक, नेपालहु मे संविधानक मर्म बिपरीत हिन्दी आ उर्दू राजनीतिक हित वास्ते ‘हिन्दू-मुसलमान वोट बैंक’ आ बाकी जाति, धर्म, वर्ग आदिक नाम पर सत्ता-स्वाद चखबाक नीति मात्र चलेबाक कुचक्र विद्यमान देखाइछ ।
शिक्षा मे मैथिली भाषा (विषयरूप मे) रहितो शिक्षकक अभाव छैक । शिक्षक केँ मैथिली पठन-पाठन लेल कतहु प्रशिक्षण (ट्रेनिंग) तक देबाक नीति व व्यवहार अथवा सोच तक नहि छैक । मैथिलीभाषी क्षेत्र मे शासन-प्रशासनक कुशल संचालन लेल मैथिली प्रयोगक अनिवार्यता सरकारी तंत्र मे कर्मचारी नियुक्त करैत काल अनिवार्य करयवला नीति सेहो लागू नहि कयल गेल अछि ।
छात्र व अभिभावक मे एखन तक मैथिली भाषाक पठन-पाठनक लाभ बारे कनिको टाक बात पता नहि छैक । तहिना लोक-समाज मे सेहो निजभाषाक प्रयोग आ तेकर प्राकृतिक लाभ व न्याय पर्यन्त सँ समाज वंचिते देखाइछ । सब हिन्दीक गुलामी करैत-करैत आब व्यवहारक भाषा पर्यन्त हिन्दी बना लेलक । एलिट्स मे पहिने ई हिन्दीमोह आयल, जे आब रिक्शाचालक, टेम्पूचालक, बस-कन्डक्टर-खलासी-ड्राइवर आ होइत-होइत घर-घर धरि हिन्दी प्रवेश कय गेल अछि ।
मैथिली भाषाक अस्तित्व व्यवहारिक तौर पर दिन-ब-दिन कमजोरे भेल जा रहल अछि । स्पष्टतः एहि भाषा प्रति चिन्ता करब गोहिक नोर बहायब समान मात्र अछि ।
संविधान अधिकार दैत छैक जे हरेक भाषाभाषी समुदाय केँ प्राथमिक शिक्षा मातृभाषाक माध्यम सँ भेटैक । लेकिन विडम्बना देखियौक जे स्वतंत्रता प्राप्तिक कइएक दशक बितला बादो धरि मैथिली लेल कोनो अनिवार्यता या नियम-कायदा विकसित नहि कयल गेल छैक ।
मैथिली माध्यम सँ प्राथमिक शिक्षा लेल एखन धरि पाठ्यक्रम तक केर विकास नहि होयब सीधा संकेत करैत छैक जे उपरे-उपर मैथिली भाषाक संरक्षण आ संवर्धनक बात छैक, भीतरी भाव सँ एहेन कोनो नीति-नीयति छहिये नहि जे मैथिली भाषा बचय, एकर उपयोग बढ़य, मिथिला संस्कृति आ एकर वैशिष्ट्यक रक्षा होइक । जबरदस्ती बिहारी आ मधेशी नामक पहिचान ओढ़ाकय मिथिला जेहेन प्राचीन सभ्यता केँ ‘मिथक’ रूप मे सिद्ध करबाक कुचक्र बुझू एकरा । ई सीधा-सीधा मिथिला सभ्यता केँ विनाश करबाक षड्यन्त्र थिकैक, आर किछु नहि ।
गोटेक संस्था सब पत्राचार करैत अछि । कतेको रंगक आह्वान सब करैत अछि । एहि पत्राचारक पत्रक प्रतिलिपि सब सामाजिक संजाल मे घुमैत अछि, आह्वान कयल तेकर पेपर कटिंग सब सेहो फेसबुक-व्हाट्सअप सब मे घुमैत अछि – मुदा मूल सरोकारक विषय भाषाक महत्व, भाषा सँ रोजगार, शासन-प्रशासन व न्याय व्यवस्था मे अपन भाषाक सम्मान भेटले सँ बढैछ आत्मसम्मान तथा बचैत अछि सभ्यता आ पहिचान – से बुझेबाक लेल जमीनी अभियान संचालन हेतु केकरो पास न समय छैक, न सोच छैक आ न तेहेन संचालने भ’ रहल छैक ।
अन्तिम आशा बचि जाइछ जे मनोरंजन (फिल्म, रंगकर्म, म्यूजिक, आदि) मे, संचार (मीडिया इलेक्ट्रानिक अथवा प्रिन्ट) मे, सामाजिक संजाल सब मे – एतहु जँ मैथिली भाषाक प्रयोग बढ़त, लोक मे आकर्षण बनायत – त कोहुना हुकुर-हुकुर करैत ई भाषा अवश्य टा जियत ।
एकटा आर नीक बात कि छैक जे मैथिली मे लिखनाय आ प्रकाशित कयनाय – भले लोक ३०० प्रति मात्र प्रकाशन कराबय आ लेखक बनबाक – किताब लिख देबाक ‘जीवन भरि स्मरण करयवला कृति’ कयलहुँ, एहेन आत्मानुभूति मात्र लेल सही, लेकिन मैथिली खूब लिखल जा रहल अछि से कहि सकैत छी ।
मैथिली सचमुच ‘मैथिली’ (जानकी) रूपा अवतारी शक्तिक कृपा मात्र सँ जिबैत आबि रहल अछि । लेकिन एतहु रावण जेहेन दसमुँहा राक्षस स्वरूपक स्वयं मैथिलीभाषी कुपुत्र राजनीतिज्ञ सभक कमी नहि छैक । कहियो ‘मधेशी भाषा’, कहियो ‘बिहारी भाषा’, कहियो ‘हिन्दीक बोली’, कहियो ‘बाभन-कायस्थक भाषा’, कहियो कि – कहियो कि ‘चिल्ल-पों – भौं-भौं’ मचेनहिये रहैछ एतुका अराजक नेता सब ।
नकारात्मकता एहनो छैक जे पोपगिरी सँ सेहो मैथिलीक अहित कयल गेलैक । ई शुद्ध भेल, ई अशुद्ध भेल, हमर सोतियानाक लोक सोइत-शैलीक मैथिली लिखैत-बजैत छी, तों रार-घोर आ सोलकन सब वला रेराह ठेंठ बोली बजैत छह, ओ दछिनाहा, ओ पछिमाहा, ओ अंगिका, ओ बज्जिका – आहि रौ बा, मैथिलीक विशालता केँ अपने जँ खण्डित करबैक त दोसर ‘हिन्दियाँ’ मे ‘हिन्दीक बोली’ कहिकय नहि गाँथत ?
राज्यप्रदत्त दुइ-चारि अवसर केँ हथियाबय वला सिन्डिकेट चलायब, पुरस्कार दियेबाक लेल बड़का-बड़का पुरोधा लोकनि भीतरघात करब, स्तरीयता प्रमाणपत्र बाँटब आ ताहि मे सेहो गुटबाजी करब, त भेलय बात ? हित करबैक कि अहाँ सेहो षड्यन्त्रकारी केँ बढ़ाबा देबैक ?
प्रश्नहि सँ शुरू, प्रश्नहि पर अन्त ! सोचब जे हमर किरदानी मैथिलीक हित मे अछि या अहित मे । धन्यवाद ।
हरिः हरः!!
