सीता आ हम

सब सँ पहिने ‘सीता’ एक अवतारी नारी रहथि से मन सँ कनिकाल लेल बगल मे राखू। आर, एकदम अपनहि जीवन जेकाँ सब कियो, नारी हो या पुरुष, सब कियो हुनकर जीवन सँ अपन जीवन केँ मिलाउ।
 
चलू पुनौराधाम। महाराजा (पिता, जनक) खेत जोतय गेलाह। महाराजा ई अभिमान छोड़िकय गेलाह जे हम राजा छी, हमरा लग अनेकों हरवाह अछि, हम कियैक खेत जोतय जाउ। जखन राजा स्वयं कर्मठता सँ खेत जोतलनि, तत्क्षण हुनका पुत्री रत्न प्राप्त भेलखिन। बेसी कथा-पिहानी जेकर आवश्यकता नहि अछि एहि लेख मे, ताहि पर दिमाग केँ जुनि दौड़ाउ, बस पुत्री यानी ‘हमर’ जन्म भेल, मातापिताक कोरा भेट गेल।
 
एतबा नहि, तीक्ष्ण अकाल जे पड़ल छल – अर्थात् अकर्मण्यता सँ जेना मिथिला एखन शिथिला बनि गेल अछि, तहिना जनककाल मे अकाल पड़ल छल से राजाक अपनहि हाथे खेत जोतला सँ तुरन्त दूर भ’ गेल। सिखू – अपन कर्म सँ परायब आ बड़का राजा बनब, त भरि जीवन ओंघराइते रहब… उपलब्धि भेटत ‘जीरो’।
 
आब जखन अहाँ (सीता) जन्म लय लेलहुँ त बचपन मोन पाड़ू। चलू जनकपुर राजदरबार (अपन मातापिताक घर) सँ फुलहर तक, संगी-सहेली सभक संग ‘गिरिजा भवानी’ केर पूजा करब, फुल लोढ़ब आ खूब खेलायब-धुपायब। यानि बचपन बितायब।
 
बचपने मे सीता भगवतीक घर निपैत वैह शिवधनुष बाम हाथ सँ उठा लेने छलीह, एकदम निर्दोष भाव सँ, आ दाहिना हाथे घर निपैत छलीह। पिता जनक ई देखि क्षुब्ध रहि गेल छलथि। हम सब बचपन मे एहेन कोनो बहादुरी कयलहुँ जे माता-पिता व परिजन आदि केँ विस्मित-प्रभावित कयलक, ताहि पर मनन करैत समाज मे चर्चा करबाक चाही।
 
सीता केँ सेहो प्रेम भेलन्हि। ओ जखन श्यामल किशोर श्री राम केँ भाइ लखन सहित फुलबारी मे देखलीह त नयनाचार भेलनि। स्वाभाविक छैक ई। प्रेम सब केँ होइत छैक। परञ्च सीता ओहि प्रेम केँ जीवन मे अपनेबाक लेल गिरिजा केँ पूजलीह। हुनका प्रसन्न कयलीह। भवानी दाय सीता दाय केँ आशीर्वाद देलखिन्ह, बुच्ची! अहाँ जिनका वरण कयलहुँ वैह भेटता। हम सब सेहो प्रेम करी त एतबे दृढ़ता राखिकय, एतबे आत्मविश्वास के संग… जे भवानी दाय (जन्म देनिहार मातापिता, पालन-पोषण व शिक्षा-दीक्षा मे संग पुरेनिहार समस्त परिजन, गुरुजन व श्रेष्ठजनक संग समाज) केर आशीर्वाद प्राप्त होयत आ हमर प्रेम सीता जेकाँ हमरो भेटत।
 
सीताक प्रेम विवाह मे परिणत हो ताहि लेल ओ मातापिता पर अटूट विश्वास कयलीह। आ भवानीक आशीर्वादक एहेन महिमा भेल जे राजा जनक सीता स्वयंवर लेल ओहि शिवधनुष केँ उठेबाक शर्त राखि एहेन वीरपुत्र सँ सीताक विवाह के प्रण कयलनि जे कम सँ कम हुनका बेटी योग्य होइथ। प्रसंग मोन पाड़ू, सीता बचपने सँ ओहि शिवधनुष केँ उठाकय भगवती घर निपैत छलीह। हम सब ई बुझबाक यत्न करी जे फिल्मी स्टाइल मे मातापिता सँ बागी बनिकय ‘मैंने प्यार किया’ के हिरो-हिरोइन जेकाँ नहि, अपितु सीता जेकाँ अपन मातापिताक सोच आ सिद्धान्त पर मौनरूप मे दृढ़ विश्वास स्थापित कएने रहलीह, परिणाम हुनकर पक्ष मे अयलनि, श्री रामहि संग हुनक विवाह भेलनि।
 
सीता मे सहिष्णुता सदिखन देखायल। लेकिन अतिसहिष्णुता प्रति विद्रोह सेहो रहल। से बड़ा तार्किकता सँ ओ अपन ज्येष्ठजन केँ सासुर मे बुझाबय मे सफल रहलीह – ओ कहलखिन जे धर्मपत्नीक भूमिका मे वनवास जेबाक आदेश प्राप्त पति प्रति हुनकर सोच कि हेबाक चाही। यदि राम कतहु सुखवास लेल पठायल जइतथि त सम्भव छल सीता ई स्वभाव बिल्कुल नहि देखबितथि… लेकिन कठिन वेश मे वनवास लेल जा रहल पतिक संग अनुगामिनी बनि रहबाक कठोर धर्म निर्वाह लेल ओ वीरतापूर्वक पारिवारिक सम्बन्धक भावुकता आ तेकर वर्जनाक विरूद्ध उद्यत् भेलीह। हम सब कि कय रहल छी, मनन करब।
 
ई लेख काफी लम्बा होयत… कारण सीता सौंसे मानव जीवन केँ पूर्ण आदर्शक संग जिलनि। लक्ष्मण रेखा सहज मानुसिक स्वभाव आ गलती जेकाँ गलतो कय देलीह, हुनकर केस मे एकरा लीला कहिकय कवि-मीमांसक वर्णन कयलनि अछि। हम सब सीताक जीवन के एक-एक प्रस्तुति सँ यदि अपन जीवनक गति केँ मात्र तुलना टा कय लेब त परमसुख प्राप्त करब आ कहियो जीवन मे भटकब नहि। विश्वास मानू।
 
हम ई लेख केँ निरन्तरता मे राखब, आब आइ एकरा एतहि विराम दय रहल छी। चूँकि हमर पाठक बड गम्भीर होइत छथि, ओ जरूर रुचि लयकय पढ़ता, बुझता भाव आ तदनुसार जीवन मे बढ़ता आगू।
 
वनवास क्रम मे सीताक विभिन्न चरित्र, अपहृता बनि जेबाक कठोर पीड़ा, दुर्जनक कैद मे हुनक शालीन जीवन, अपहृता सीताक मुक्ति आ अग्नि परीक्षा, पति व राज्यक रानीक रूप मे हुनक कर्तव्य, न्यायप्रेमी राम जेहेन पति केँ स्वयं केर परित्याग करयवला अत्यन्त साहसिक निर्णय आ तदनुसार निर्वासित वनवासक जीवन, लव-कुश समान वीरपुत्र केर जन्म आ शिक्षा-दीक्षा, गुरुआश्रम मे जीवन, अश्वमेध यज्ञक घोड़ा केँ पुत्रद्वय लवकुश द्वारा पकड़ल जायब आ सासुरक लोक केँ छक्का छोड़ायब परञ्च पिता राजा राघवक आगमन उपरान्त सीताक भूमिका, पुनः रामराज्य मे न्याय प्रक्रिया मे सीताक पेशी आ सीताक अन्तिम सत्य प्रमाणक प्रस्तुति – ई सब विषय पर लिखलाक बाद मात्र ई लेख पूर्ण होयत। एखन बस संकेत स्वरूप उपरोक्त कथ्य-तथ्य लिखल अछि। अपने सभक प्रतिक्रिया सँ लिखबाक आत्मबल वलिष्ठ होयत।
 
हरिः हरः!!