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प्रवीण नारायण चौधरी

ध्वनि आ सृजन – सृष्टि एवं वेद केर वैज्ञानिक प्रमाण

ध्वनि आ सृजन ध्वनि कि अछि ? आधुनिक विज्ञान एकरा कम्पन रूप मे परिभाषित करैत छथि । परमाणु विज्ञान आर आइंस्टीनक सिद्धान्त यैह निष्कर्ष प्रस्तुत कयलनि अछि जे परमाणुक स्तर पर सब पदार्थ एक्कहि होइछ – (वेदांतक अद्वैत सिद्धान्त) । लेकिन वस्तु सब आँखि केँ अलग-अलग देखाय दैत अछि कियैक तँ ऊर्जा विभिन्न बिन्दु पर ध्वनि आ सृजन – सृष्टि एवं वेद केर वैज्ञानिक प्रमाण

वेद – भूमिका

वेद वेदक कोनो आदि नहि छैक । ई सामान्य बुद्धिक विरुद्ध भ’ सकैछ । हमरा सभक आधुनिक वैज्ञानिक मन कोनो ऐतिहासिक घटनाक स्रोत, कारण आ तिथिक खोज मे रहैछ । आर वेद जेहेन जटिल रचनाक सेहो निश्चित रूप सँ कोनो आरम्भ रहल होयत । अनन्तकाल, अनादि, असीमता जेहेन अवधारणा सब कोनो वैज्ञानिक अध्ययन लेल वर्जित वेद – भूमिका

वर्तमान डबल इंजिन सरकारक मिथिला पर दहिन दृष्टि

मिथिला लेल ‘अच्छे दिन’ आ ‘बुरे दिन’ पूर्णिया हवाई अड्डा सेहो किछुए दिन मे आम यात्री लेल हवाई सेवा आरम्भ करय जा रहल अछि । रेलवे लाइन आ सड़क संजाल केर विकासक बात त विगत २-३ दशक सँ निरन्तरता मे अछि, परञ्च कतेको रास नया फोर लेन आ रेलवे लाइन विस्तार कयल गेल अछि । वर्तमान डबल इंजिन सरकारक मिथिला पर दहिन दृष्टि

सीकेडी – क्रोनिक किडनी डिजीज – खतरनाक रोग थिकः प्रवीण संस्मरण

कठिन समय सँ उबरबाक क्रम मे…. जीवन मे एहेन दुरुह पहर लगभग ३० साल बाद आयल । १९९५ मे पिताक देहावसान, २०२५ मे छोट भाइक देहावसान – जखन-जखन अपन कियो बिछुड़ैत छथि त बुझू अजीब हालत मे हम सब पड़ि जाइत छी । एक-एक क्षण मे पूरा जीवनक फ्लैश बैक (पूर्वघटित अनेकों प्रकरण) सब आँखिक सीकेडी – क्रोनिक किडनी डिजीज – खतरनाक रोग थिकः प्रवीण संस्मरण

मैथिली मिथिला हित मिथ्याचार सँ या मिथ्याचारी सँ कहियो सम्भव नहि होयत

असली तबला बजाउ तखन हेतय खरखांही (वाहवाही) लूटय लेल नहि, वास्तविक परिवर्तन लेल प्रयास करबय तखन मैथिली आ मिथिलाक हित हेतैक । ई उक्तिक प्रासंगिकता अछि ‘सामाजिक संजाल मे मैथिली-मिथिला पर गरमागरम चर्चा-वर्चा केर’ । कतेको रास चिन्तक, वैज्ञानिक, मर्मज्ञ, अभियन्ता आ विद्वान् लोकनि भाँति-भाँति केर चिन्तनयुक्त बात सब ‘सामाजिक संजाल’ मे ‘मैथिली विमर्श’ लेल मैथिली मिथिला हित मिथ्याचार सँ या मिथ्याचारी सँ कहियो सम्भव नहि होयत

वेदसारशिवस्तोत्र – स्वाध्याय – सावन मास विशेष शिवचर्चा

स्वाध्याय – सावन मास विशेष शिवचर्चा – शिवस्तवन् सावन मास २०८२ विक्रम संवत् साल – श्री श्री १०८ श्री आदिगुरु शंकराचार्य केँ बेर-बेर प्रणाम अर्पित करैत हुनकहि द्वारा कयल गेल ई सुन्दर रचना – ॥ वेदसारशिवस्तवः ॥ पशूनां पतिं पापनाशं परेशं गजेन्द्रस्य कृत्तिं वसानं वरेण्यम । जटाजूटमध्ये स्फुरद्गाङ्गवारिं महादेवमेकं स्मरामि स्मरारिम ॥१॥ हे समस्त जीव वेदसारशिवस्तोत्र – स्वाध्याय – सावन मास विशेष शिवचर्चा

मिथिला लोकसंस्कृति आ मधुश्रावणी पाबनिक गाथा-महत्ता

मिथिला लोकसंस्कृति मधुश्रावणी मिथिला के इतिहास संस्कृति, परम्परा, रीति रिवाज आ जीवन शैली के लेल जानल जाइत अछि । एहि क्षेत्रक नवविवाहिता विवाह के बाद आबएबाला पहिल साउन के कृष्णपक्षक पञ्चमी तिथि ( मौना पञ्चमी ) सँ शुरू कऽ शुक्ल पक्षक तृतीया धरि करीब तेरह सँ पन्द्रह दिन तक मधुश्रावणी पूजा करैत छथि । मधुश्रावणी मिथिला लोकसंस्कृति आ मधुश्रावणी पाबनिक गाथा-महत्ता

वेदक उपांग धर्मशास्त्रः स्मृति सभक आधार केवल वेद टा अछि

चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वती लिखित ‘द वेदाज’ नामक पुस्तक सँ लेल गेल आलेख – वेदक उपांग धर्मशास्त्र शीर्षक अन्तर्गतक उपशीर्षक कथा-वस्तु स्मृतिक आधार केवल वेद टा अछि एकर सब सँ पैघ प्रमाण महाकवि लोकनिक निर्णय मे अछि । हमरा लोकनिक धार्मिक आस्थाक संस्थापक लोकनि – शंकर, रामानुज और माधव – सेहो एहि बातक पुष्टि कयलनि अछि जे वेदक उपांग धर्मशास्त्रः स्मृति सभक आधार केवल वेद टा अछि

वेदक उपांग धर्मशास्त्र – स्मृति सब किनको स्वतंत्र इच्छा-प्रसन्नताक उपज नहि अपितु वेदक निर्देशन

स्मृति सब स्वतंत्र इच्छाक उपज नहि थिक एतय तक कि जे लोक स्मृति, अर्थात् धर्मशास्त्र, केर सम्मान करैत छथि, एहि बारे मे हुनको सब मे एकटा भ्रान्ति छन्हि । अर्थात्, ओ सब सोचैत छथि जे स्मृति सभक रचयिता लोकनि स्वतंत्र रूप सँ आर अपन इच्छा सँ एहि सिद्धान्त सभक प्रतिपादन कयलनि अछि । स्मृति सभक वेदक उपांग धर्मशास्त्र – स्मृति सब किनको स्वतंत्र इच्छा-प्रसन्नताक उपज नहि अपितु वेदक निर्देशन

धर्मशास्त्र अनुसार – विशेष चिह्न – निशानक महत्व

चिह्न – विशिष्ट निशान (चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वतीक लिखल ‘दे वेदाज’ पुस्तकक ‘वेदक उपांगः धर्मशास्त्र’ शीर्षक अन्तर्गतक विषय केर मैथिली भावानुवाद) जँ हम सब कोनो विशिष्ट धर्म सँ जुड़ल छी, त से देखेबाक लेल किछु बाहरी चिह्न या ‘निशान’ भेल करैत अछि । स्काउट्स केर एकटा विशिष्ट वर्दी होइत छैक । सेना, नौसेना आदि सँ जुड़ल लोक धर्मशास्त्र अनुसार – विशेष चिह्न – निशानक महत्व