स्मृति सब स्वतंत्र इच्छाक उपज नहि थिक
एतय तक कि जे लोक स्मृति, अर्थात् धर्मशास्त्र, केर सम्मान करैत छथि, एहि बारे मे हुनको सब मे एकटा भ्रान्ति छन्हि । अर्थात्, ओ सब सोचैत छथि जे स्मृति सभक रचयिता लोकनि स्वतंत्र रूप सँ आर अपन इच्छा सँ एहि सिद्धान्त सभक प्रतिपादन कयलनि अछि । स्मृति सभक रचयिता लोकनि केँ विधि-निर्माता कहल जाइत छन्हि । अर्थात्, हुनका सब केँ अपन इच्छा आ प्रसन्नता मुताबिक विधि-विधान निर्धारित करयवला मानल जाइत छन्हि, ठीक ओहि तरहें जेना न्यायविद लोकनिक एकटा समूह द्वारा लोक प्रशासन केर सिद्धान्त सभक प्रतिपादित करयवला (भारतीय) संविधानक निर्माण आर जन्म देल गेल छल । स्मृति सब केँ हुनका लोकनिक अपन बनायल विचार सब केँ व्यक्त करयवला मानल जाइत अछि ।
एहि सँ एकटा आरो उपपत्ति (युक्ति-प्रमाण) उत्पन्न होइत अछि । जखन संविधान केर कोनो विशेष प्रावधानक पालन करब कष्टदायक लगैत अछि, तखन हम सब ओकरा अपन इच्छानुसार संशोधित करबाक सहारा लैत छी । तहिना, ई प्रश्न पूछल जाइत अछि, “हम सब धर्मशास्त्र सब मे निहित पुरना नियम सब केँ आधुनिक परिस्थिति अनुसार संशोधित कियैक नहि कय सकैत छी ?”
हमरा लोकनि शास्त्र केँ वर्तमान प्रवृत्ति (चलन-चलती) अनुसार कियैक नहि संशोधित करैत छी ? एकर समर्थन मे सरकार द्वारा नियम सब मे संशोधनक उदाहरण देल गेल अछि ।
लेकिन धर्मशास्त्रक प्रति अत्यधिक सम्मान राखनिहा लोक सहित बहुते लोक ई नहि जनैत छथि जे, “ई स्मृति सब मे ओकर लेखक लोकनिक व्यक्तिगत राय नहि अछि । एहि मे केवल वेद मे पहिनहि सँ कहल गेल बात सभक सार आ संकलन अछि । चूँकि वैदिक आदेश केहनो परिस्थिति मे परिवर्तनशील नहि छैक, ताहि हेतु धर्मशास्त्र केर नियम केँ बदलबाक प्रश्नहि नहि उठैछ ।
यदि स्मृति सब केवल ऋषि सभक कृति होइतनि, त हमरा सब केँ ओकरा पूर्णतः स्वीकार करबाक कोनो बाध्यता नहि रहितय । यदि हमरा सब केँ ओ पसिन नहि अबितय, त हम सब ओकरा अस्वीकार कय सकैत छलहुँ । यदि ओहि मे वेद मे नहि भेटयवला बात सब शामिल रहितैक; यदि रचयिता लोकनि अपन बुद्धि सँ ई सोचने रहितथि जे मनुष्यक लेल कि नीक अछि आ कि नहि, तखन हमरा सब ओहि नियम के बिना सेहो काज चला सकैत छलहुँ । एहि तरहें, एहेन बहुते लोक छथि जे अपन मोनक बात लिखलनि अछि; हम सब सेहो अपना लेल ओहने कानून बना सकैत छी ।
वास्तव मे, स्मृति सब वैदिक सिद्धान्त सभक बड़ा मिहिन ढंग सँ पालन करैत अछि आर ताहि हेतु हमरा सब केँ ओकरा आइ आ हमेशा लेल अपन प्रमाण मनबाक चाही ।
तखन प्रश्न उठैत छैक जे स्मृति सब केवल वेदहि केर आधार पर लिखल गेल अछि एहि दावीक आधार या प्रमाण कि अछि ।
आगू – केवल वेदहि टा स्मृतिय सभक आधार अछि – जारी रहत…..
हरिः हरः!!
Smritis Are Not the Product of Independent Free-Will
Even those who regard the Smritis which are the Dharma Shaastras with a feeling of respect, have a mistaken notion about them. That is, they think that the authors of the Smritis have independently and of their own volition laid down these tenets. The authors of Smritis are dubbed as law-givers. That is, they are regarded as having laid down the law as per their own will and pleasure, just as a coterie of jurists had assembled and evolved the (Indian) Constitution, which lays down the principles of public administration. The Smritis are regarded as voicing views of their own making.
This leads to another corollary. When a particular provision in the Constitution is found irksome to follow, we resort to amending it suitably to our liking. Likewise, the question is asked, ‘why can’t we amend the old laws contained in the Dharma Shaastras to suit modern conditions?
Why not we trim the Shaastras according to the present-day trends? The example of Government amending the rules is cited in support.
But what is not known to many including those who have high regard for the Dharma Shaastras – is that, “These Smritis do not contain the personal opinion of their authors. The have merely abstracted and compiled what is already said in the Vedas. Since the Vedic injunctions are never under any circumstances changeable, there is no question of changing the rules in Dharma Shaastras.
If the Smritis were merely the handiwork of Rishis, there is no compulsion for us to accept them in toto. We can reject them if we do not like them. We can do without them if they had introduced matters not to be found in the Vedas; if they had thought by their intelligence as to what is good for man and what is not. That way, there are many who had written the way their minds traversed; we can similarly legislate for ourselves.
In actual fact the Smritis closely follow the Vedic dictums and therefore we must regard them as our authority for now and always.
Then the question arises as to the basis or proof of the claim that the Smritis are written solely on the basis of the Vedas.
Next – Vedas alone is the foundation of smritis – to be continued…..
Harih Harah!!
स्मृतियाँ स्वतंत्र इच्छा की उपज नहीं हैं
यहाँ तक कि जो लोग स्मृतियों, अर्थात् धर्मशास्त्रों, का सम्मान करते हैं, उनके बारे में भी एक भ्रांति है । अर्थात्, वे सोचते हैं कि स्मृतियों के रचयिताओं ने स्वतंत्र रूप से और अपनी इच्छा से इन सिद्धांतों का प्रतिपादन किया है । स्मृतियों के रचयिताओं को विधि-निर्माता कहा जाता है । अर्थात्, उन्हें अपनी इच्छा और प्रसन्नता अनुसार विधि-विधान निर्धारित करने वाला माना जाता है, ठीक उसी प्रकार जैसे न्यायविदों के एक समूह ने लोक प्रशासन के सिद्धांतों को प्रतिपादित करने वाले (भारतीय) संविधान का निर्माण और जन्म दिया था । स्मृतियों को उनके स्वयं के बनाए विचारों को व्यक्त करने वाला माना जाता है ।
इससे एक और उपपत्ति उत्पन्न होती है । जब संविधान के किसी विशेष प्रावधान का पालन करना कष्टदायक लगता है, तो हम उसे अपनी इच्छानुसार संशोधित करने का सहारा लेते हैं । इसी प्रकार, यह प्रश्न पूछा जाता है, ‘हम धर्मशास्त्रों में निहित पुराने नियमों को आधुनिक परिस्थितियों के अनुरूप संशोधित क्यों नहीं कर सकते ?’
हम शास्त्रों को वर्तमान प्रवृत्तियों के अनुसार क्यों नहीं संशोधित करते ? इसके समर्थन में सरकार द्वारा नियमों में संशोधन का उदाहरण दिया गया है ।
लेकिन धर्मशास्त्रों के प्रति अत्यधिक सम्मान रखने वाले लोगों सहित बहुत से लोग यह नहीं जानते कि, “इन स्मृतियों में उनके लेखकों की व्यक्तिगत राय नहीं है । इनमें केवल वेदों में पहले से कही गई बातों का सार और संकलन है । चूँकि वैदिक आदेश किसी भी परिस्थिति में परिवर्तनशील नहीं हैं, इसलिए धर्मशास्त्रों के नियमों को बदलने का प्रश्न ही नहीं उठता ।
यदि स्मृतियाँ केवल ऋषियों की कृति होतीं, तो हमें उन्हें पूर्णतः स्वीकार करने की कोई बाध्यता नहीं होती । यदि हमें वे पसंद नहीं आतीं, तो हम उन्हें अस्वीकार कर सकते हैं । यदि उनमें वेदों में न मिलने वाली बातें शामिल होतीं; यदि उन्होंने अपनी बुद्धि से यह सोचा होता कि मनुष्य के लिए क्या अच्छा है और क्या नहीं, तो हम उनके बिना भी काम चला सकते थे । इस प्रकार, ऐसे बहुत से लोग हैं जिन्होंने अपने मन की बात लिखी है; हम भी उसी प्रकार अपने लिए कानून बना सकते हैं ।
वास्तव में, स्मृतियाँ वैदिक सिद्धांतों का बारीकी से पालन करती हैं और इसलिए हमें उन्हें अभी और हमेशा के लिए अपना प्रमाण मानना चाहिए ।
तब प्रश्न उठता है कि कि स्मृतियाँ केवल वेदों के आधार पर ही लिखी गई हैं इस दावा का आधार या प्रमाण क्या है ।
आगे – केवल वेद ही स्मृतियों का आधार हैं – जारी रहेगा…..
हरिः हरः!!
