Search

मैथिली मिथिला हित मिथ्याचार सँ या मिथ्याचारी सँ कहियो सम्भव नहि होयत

504 भ्यूज

असली तबला बजाउ तखन हेतय

खरखांही (वाहवाही) लूटय लेल नहि, वास्तविक परिवर्तन लेल प्रयास करबय तखन मैथिली आ मिथिलाक हित हेतैक ।

ई उक्तिक प्रासंगिकता अछि ‘सामाजिक संजाल मे मैथिली-मिथिला पर गरमागरम चर्चा-वर्चा केर’ । कतेको रास चिन्तक, वैज्ञानिक, मर्मज्ञ, अभियन्ता आ विद्वान् लोकनि भाँति-भाँति केर चिन्तनयुक्त बात सब ‘सामाजिक संजाल’ मे ‘मैथिली विमर्श’ लेल राखैत रहैत छथि । मुदा वास्तविक संसार मे जखन पहुँचब त सारा चिन्तन आ मनन केवल भ्रान्तियुक्त अवधारणा टा बुझायत । जेना – एकटा उदाहरण देखू !

एक विद्यालय शिक्षक मैथिलीभाषी छात्र-छात्रा लेल संवैधानिक अधिकार आ विश्व भरि मे स्थापित ‘प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा माध्यम सँ’ – एकर वकालत करैत छथि । मुदा जखन अपनहिं विद्यालय मे एकर प्रायोगिक लाभ सँ छात्र-छात्रा व अभिभावक संग-संग आरो-आरो लोक लेल अनुकरण योग्य उदाहरण ठाढ़ करता से न त फुर्सति छन्हि, आ न अवगति । धरि, अहाँ कोनो विमर्शक मंच दियौन आ कहियौन चारि लाइन बाजय लेल, त देखब जे चारि नहि चौहत्तर लाइन ‘कौपी-पेस्ट लिखिकय आ बाजय लेल रट्टा मारिकय’ बेस मोटगर ‘कार्यपत्र’ सहित आबि गेल छथि वैह शिक्षक ।

दोसर उदाहरण लेल जाउ । एकटा भाषा वैज्ञानिक, नीक पढ़ल-लिखल आ काफी देश-विदेशक अनेकहुँ भाषाक उत्पत्ति, विकास आ परिवर्तनशील रूप-स्वरूपक विशद् जानकारी रखनिहार लोक छथि । आजुक युग मे मैथिली भाषा-साहित्यक उच्चशिक्षा ग्रहण कयनिहार छात्र-छात्रा लग आइ धरि एकहु टा व्याख्यान प्रस्तुत नहि कयलनि, मुदा भाषा-विज्ञान पर एखन धरि दर्जनों ‘कार्यपत्र’, ‘शोधपत्र’, ‘लेख-आलेख’ आ एतेक तक कि ‘पुस्तक’ सेहो लिखि देलनि । हुनकर बायोडाटा मे लेखक परिचय मे जखन नजरि देब त बुझायत जे एहेन विलक्षण आ दिव्य इजोत सँ परिपूर्ण विद्वान् – एतेक रास कृति सब रहितो आखिर हुनकर कृति वास्तविक सरोकार रखनिहार (विद्यार्थी, शोधार्थी, प्रशिक्षार्थी, परीक्षार्थी आदि) लेल अपन उपयोगिता कियैक नहि सिद्ध कय सकल अछि ।

फेर देखब जे मंच भेटि गेल, ओ मंच सामाजिक संजाले कियैक न हो, भाषण दय सँ अकर्मल – अभागल आ कोढ़िया सेहो वंचित नहि रहि जाइछ । जेतय देखू – मंच भेटि गेल कि लागत बाभन-सोलकन करय । शुद्ध-अशुद्धक मापक यंत्र बिना औपचारिक शिक्षा ‘अ, आ, इ, ई – हर्स्व-दीर्घ’ तकक जानकारी नहि रखनिहार मैथिली भाषा-साहित्यक समीक्षक बनि जायत । भाषा-साहित्य व संस्कृति-सभ्यता मे पर्यन्त बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक केर वोट बैंक वला सूत्र पर टीका-टिप्पणी तेना करत मानू नवका वाचस्पति-वृहस्पति जन्म लेने हुए ।

समावेशिकता-गैरसमावेशिकता आदिक सूत्र लगबैत संस्था सभक लेटर पैड मे ‘झाझा गाड़ी’क अतिरिक्त ‘भाभा-गाड़ी’ सब मैग्निफाइंग ग्लास सँ ताकय लागत । ओकरा जमीन यानि ओकर अपन गाम आ इलाका मे रहल संस्था, स्वयं केर प्रयास मे भ’ रहल अभियान आदि मे ‘भाभा गाड़ीक उदासीनता’ बारे परिचित रहितो दोसरक टेटर टटोलब आ हि-हि-हा-हा-हु-हु करब ओकरा बड़का सख । पूर्वाग्रह आ जातीय विद्वेषभाव सँ ग्रसित समीक्षक द्वारा ‘मैथिली-मिथिला’ आभिजात्य वर्गक ठिकेदारी-पटेदारीक विश्लेषण सब यत्र-तत्र भेटि जायत ।

कहबी छैक न जे चूत्तड़ पर तबला बजेनाय आ फेर असली तबला बजेनाय – दू अलग बात होइत छैक । पहिल काज कय लेला सँ तबलाक धुन-थाप कियो नहि सुनत, मुदा अपन चूत्तड़ सँ मोनक तार डायरेक्ट जुड़ल रहबाक कारण ई धुन-थाप अपना तँ नीके सँ सुनाइत छैक । याद रहय, वास्तविक परिवर्तन लेल जमीनक जोत आ चास आबाद रहनाय जरूरी छैक ।

एम्हर हम मैथिली-मिथिला सँ जुड़ल कला-संस्कृति, भाषा-साहित्य, राजनीतिक सरोकार आदिक बात करी आ ओम्हर आर्केस्ट्राक धुन पर रिमोट सँ लहंगा उठा-उठा अपन मनक मनोरंजन करी – त एहेन मिथ्याचार सँ कतेक हित कय सकब से स्वाभाविक सोचय योग्य विषय भेल । अस्तु ! यदि परिवर्तन चाहैत होइ त ‘विद्यापति’ जेकाँ सिद्ध करय मे लागि जाउ ‘देसिल वअना सभजन मिठ्ठा’, गपमारी आ टिप्पणीकारी वला आदति छोड़ू ।

हरिः हरः!!

Related Articles