असली तबला बजाउ तखन हेतय
खरखांही (वाहवाही) लूटय लेल नहि, वास्तविक परिवर्तन लेल प्रयास करबय तखन मैथिली आ मिथिलाक हित हेतैक ।
ई उक्तिक प्रासंगिकता अछि ‘सामाजिक संजाल मे मैथिली-मिथिला पर गरमागरम चर्चा-वर्चा केर’ । कतेको रास चिन्तक, वैज्ञानिक, मर्मज्ञ, अभियन्ता आ विद्वान् लोकनि भाँति-भाँति केर चिन्तनयुक्त बात सब ‘सामाजिक संजाल’ मे ‘मैथिली विमर्श’ लेल राखैत रहैत छथि । मुदा वास्तविक संसार मे जखन पहुँचब त सारा चिन्तन आ मनन केवल भ्रान्तियुक्त अवधारणा टा बुझायत । जेना – एकटा उदाहरण देखू !
एक विद्यालय शिक्षक मैथिलीभाषी छात्र-छात्रा लेल संवैधानिक अधिकार आ विश्व भरि मे स्थापित ‘प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा माध्यम सँ’ – एकर वकालत करैत छथि । मुदा जखन अपनहिं विद्यालय मे एकर प्रायोगिक लाभ सँ छात्र-छात्रा व अभिभावक संग-संग आरो-आरो लोक लेल अनुकरण योग्य उदाहरण ठाढ़ करता से न त फुर्सति छन्हि, आ न अवगति । धरि, अहाँ कोनो विमर्शक मंच दियौन आ कहियौन चारि लाइन बाजय लेल, त देखब जे चारि नहि चौहत्तर लाइन ‘कौपी-पेस्ट लिखिकय आ बाजय लेल रट्टा मारिकय’ बेस मोटगर ‘कार्यपत्र’ सहित आबि गेल छथि वैह शिक्षक ।
दोसर उदाहरण लेल जाउ । एकटा भाषा वैज्ञानिक, नीक पढ़ल-लिखल आ काफी देश-विदेशक अनेकहुँ भाषाक उत्पत्ति, विकास आ परिवर्तनशील रूप-स्वरूपक विशद् जानकारी रखनिहार लोक छथि । आजुक युग मे मैथिली भाषा-साहित्यक उच्चशिक्षा ग्रहण कयनिहार छात्र-छात्रा लग आइ धरि एकहु टा व्याख्यान प्रस्तुत नहि कयलनि, मुदा भाषा-विज्ञान पर एखन धरि दर्जनों ‘कार्यपत्र’, ‘शोधपत्र’, ‘लेख-आलेख’ आ एतेक तक कि ‘पुस्तक’ सेहो लिखि देलनि । हुनकर बायोडाटा मे लेखक परिचय मे जखन नजरि देब त बुझायत जे एहेन विलक्षण आ दिव्य इजोत सँ परिपूर्ण विद्वान् – एतेक रास कृति सब रहितो आखिर हुनकर कृति वास्तविक सरोकार रखनिहार (विद्यार्थी, शोधार्थी, प्रशिक्षार्थी, परीक्षार्थी आदि) लेल अपन उपयोगिता कियैक नहि सिद्ध कय सकल अछि ।
फेर देखब जे मंच भेटि गेल, ओ मंच सामाजिक संजाले कियैक न हो, भाषण दय सँ अकर्मल – अभागल आ कोढ़िया सेहो वंचित नहि रहि जाइछ । जेतय देखू – मंच भेटि गेल कि लागत बाभन-सोलकन करय । शुद्ध-अशुद्धक मापक यंत्र बिना औपचारिक शिक्षा ‘अ, आ, इ, ई – हर्स्व-दीर्घ’ तकक जानकारी नहि रखनिहार मैथिली भाषा-साहित्यक समीक्षक बनि जायत । भाषा-साहित्य व संस्कृति-सभ्यता मे पर्यन्त बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक केर वोट बैंक वला सूत्र पर टीका-टिप्पणी तेना करत मानू नवका वाचस्पति-वृहस्पति जन्म लेने हुए ।
समावेशिकता-गैरसमावेशिकता आदिक सूत्र लगबैत संस्था सभक लेटर पैड मे ‘झाझा गाड़ी’क अतिरिक्त ‘भाभा-गाड़ी’ सब मैग्निफाइंग ग्लास सँ ताकय लागत । ओकरा जमीन यानि ओकर अपन गाम आ इलाका मे रहल संस्था, स्वयं केर प्रयास मे भ’ रहल अभियान आदि मे ‘भाभा गाड़ीक उदासीनता’ बारे परिचित रहितो दोसरक टेटर टटोलब आ हि-हि-हा-हा-हु-हु करब ओकरा बड़का सख । पूर्वाग्रह आ जातीय विद्वेषभाव सँ ग्रसित समीक्षक द्वारा ‘मैथिली-मिथिला’ आभिजात्य वर्गक ठिकेदारी-पटेदारीक विश्लेषण सब यत्र-तत्र भेटि जायत ।
कहबी छैक न जे चूत्तड़ पर तबला बजेनाय आ फेर असली तबला बजेनाय – दू अलग बात होइत छैक । पहिल काज कय लेला सँ तबलाक धुन-थाप कियो नहि सुनत, मुदा अपन चूत्तड़ सँ मोनक तार डायरेक्ट जुड़ल रहबाक कारण ई धुन-थाप अपना तँ नीके सँ सुनाइत छैक । याद रहय, वास्तविक परिवर्तन लेल जमीनक जोत आ चास आबाद रहनाय जरूरी छैक ।
एम्हर हम मैथिली-मिथिला सँ जुड़ल कला-संस्कृति, भाषा-साहित्य, राजनीतिक सरोकार आदिक बात करी आ ओम्हर आर्केस्ट्राक धुन पर रिमोट सँ लहंगा उठा-उठा अपन मनक मनोरंजन करी – त एहेन मिथ्याचार सँ कतेक हित कय सकब से स्वाभाविक सोचय योग्य विषय भेल । अस्तु ! यदि परिवर्तन चाहैत होइ त ‘विद्यापति’ जेकाँ सिद्ध करय मे लागि जाउ ‘देसिल वअना सभजन मिठ्ठा’, गपमारी आ टिप्पणीकारी वला आदति छोड़ू ।
हरिः हरः!!
