चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वती लिखित ‘द वेदाज’ नामक पुस्तक सँ लेल गेल आलेख –
वेदक उपांग धर्मशास्त्र शीर्षक अन्तर्गतक उपशीर्षक कथा-वस्तु
स्मृतिक आधार केवल वेद टा अछि
एकर सब सँ पैघ प्रमाण महाकवि लोकनिक निर्णय मे अछि । हमरा लोकनिक धार्मिक आस्थाक संस्थापक लोकनि – शंकर, रामानुज और माधव – सेहो एहि बातक पुष्टि कयलनि अछि जे धर्मशास्त्र वेद सबपर आधारित अछि ।
लेकिन फेर ई शायद अचूक नहि मानल जा सकैछ कियैक तँ ओ सब अपन-अपन सिद्धान्त प्रति एकटा निश्चित निष्ठा रखैत छलथि । ओ सब प्राचीन मूल्य सभक रक्षा लेल प्रतिबद्ध छलथि । ताहि सँ ओ सब परम्पराक सीमा सँ बाहर जा कय उपदेश नहि दैत छलथि । लेकिन कवि मे एहेन कोनो हिचकिचाहट नहि रहैत छन्हि । ओ सब कोनो सिद्धान्त केर स्थापनाक वास्ते नहि त समर्पित छथि आ नहिये कटिबद्ध । ओ सब सत्य केर बात करैत छथि जेना कि हुनका देखाय पड़ैत छन्हि, बिना कोनो पन्थक प्रति पूर्वाग्रह रखने ।
महाकवि सब मे सबसँ प्रतिष्ठित, कालिदास अपन रघुवंश मे श्रुति सभक उल्लेख एहि प्रकारें कयने छथि: ओ कहैत छथि, “श्रुतेरिवार्थं स्मृतिरन्वगच्छत्” । सुदक्षिणा गाय केर पदचिन्ह पर चललिह, ठीक ओहि प्रकारें जेना स्मृति श्रुति केर अर्थक अनुसरण करैत अछि ।
एतय, जखन कालिदास ई वर्णन करैत छथि जे जखन दिलीप गाय केँ चराबय लय गेलाह त सुदक्षिणा गायक पदचिन्ह पर केना चललिह, त ओ बतबैत छथि जे ऋषि लोकनि स्मृति सभक संकलन केना कयलनि । हुनकर उद्देश्य हमरा सब केँ ई नहि बतेनाय नहि रहनि जे ऋषि कि करैत छलथि या स्मृति केना बनायल जाइत छल ।
ई प्रथा छैक जे उपमा (उपमान) केर विषय ओहि वस्तु सँ श्रेष्ठ होइत छैक जेकरा संग ओकर तुलना कयल जाइत छैक ( यानि उपमेय सँ उपमा श्रेष्ठ होइत छैक) । उदाहरण लेल, जखन केकरो मुँहक तुलना चन्द्रमा या कम सँ कयल जाइछ, त वास्तव मे चन्द्रमा या कम मुँहक तुलना मे देखय मे बेसी सुन्दर रहैत छैक । एतय उपमाक विषय अत्यन्त पवित्र सुदक्षिणा छथि जे अपन पति दिलीप केर अनुसरण कय रहल छथि । तार्कित रूप सँ ई निहित अछि जे स्मृति सब श्रुति सभक आर बेसी निकटता सँ अनुसरण करैत अछि । ताहि चलते उपमा सभक श्रेष्ठ गुरु, कालिदास, एहि तुलनाक सहारा लैत छथि । अतः ई सिद्ध करबाक लेल कोनो आर प्रमाणक आवश्यकता नहि अछि जे श्रुति सब स्मृति सभक अनुसरण करैत अछि ।
आब ओ अनुष्ठान जे वेद मे स्पष्ट रूप सँ वर्णित नहि अछि, लेकिन स्मृति सब मे स्पष्ट कयल गेल अचि, ओकरा स्मार्त-कर्म कहल जाइत छैक । ओ जे वेद मे स्पष्ट रूप सँ निर्धारित अछि, ओकरा श्रौत-कर्म कहल जाइत छैक । एहि सँ ई निष्कर्ष नहि निकलैछ जे स्मार्त कर्म कोनो हिसाबे श्रौत कर्म सँ निम्नतर (छोट) अछि ।
गृहस्थ लेल सबसँ महत्वपूर्ण उपासना, घरेलू रूप सँ कयल जाएवला कर्म जेकरा गृह्य-कर्म कहल जाइत छैक, वैदिक-कर्म सब मे सबसँ महत्वपूर्ण, पितृ-श्राद्ध, पाँच यज्ञ – ई सब स्मार्त कर्म अछि । एकर प्रदर्शन मे वेद मंत्रहि केर प्रयोग कयल जाइत अछि । अतः ई स्पष्ट अछि जे स्मृति सभक रचयिता एहि दायित्व केर निर्धारण करिते श्रुति सभक भाव केँ बुझने रहथि । ताहि सँ, ई सोचय के बदला जे स्मृति सब श्रुति सँ निम्न अछि या पुराण स्मृतिय सँ निम्न अछि, एकरा सभक एकीकृत रूप मे, एकटा समग्र पैकेज केर रूप मे देखल जेबाक चाही ।
पुराण वैदिक धर्म सभक वर्णन कथा रूप मे करैत अछि । वैदिक धर्म आर कर्म दंतकथाक रूप मे नहि, बल्कि स्मृति सब द्वारा देल गेल उपदेश तथा आदेश सभक रूप मे प्रस्तुत कयल गेल अछि । ओ कर्म करबाक प्रक्रिया केर सेहो संकेत दैत अछि । वेद सहज रूप सँ ऋषि सभक बोध मे आबि गेलनि । बाद मे, ऋषि सब जे देखने रहथि ओकरा स्मरण कयलनि आर ओ सब स्मृति बनि गेल । पुराण वेद मे निहित सत्यक वर्णन करैत अछि, कथा सभक वाचनक संग । सबटा प्रामाणिक अछि ।
एहि तरहें श्रुति, स्मृति आ पुराण सबटा धर्मक वर्णन करैत अछि ।
आर हमरा सभक आचार्य – आदि शंकराचार्य – श्रुति, स्मृति तथा पुराण सब मे निहित धर्मक भंडार रहथि । ताहि लेल हम सब नमन करैत छी, निम्नलिखित अभिवादनक संग हुनका नमस्कार करी:
श्रुति स्मृति पुराणामालयं करुणालयं
नमामि भगवत्पादशंकरं लोकशंकरं
हरिः हरः!!
Vedas Alone Is The Foundation Of Smritis
The biggest proof is in the verdict of the Maha Kavis – great poets. The founders of our faiths – Shankara, Ramanuja and Madhava – have affirmed that the Dharma Shaastras are based on the Vedas.
But then this cannot perhaps be accepted as infallible as they had a certain overriding loyalty to their individual doctrines. They were committed to safeguarding the ancient values. Therefore they would not preach outside the limits of tradition. But the poet has no such inhibitions. He is neither dedicated nor committed to the establishment of any doctrine. He talks of truth as it appears to him without any bias towards a creed.
The most distinguished of all Maha Kavi’s, Kalidasa, has thus referred to Srutis in his Raghu Vamsa: He says “Sruterivartam smritirangvagacchat’. Sudakshina followed the footsteps of the cow, even as Smriti followed the meaning of Sruti.
Here, when describing how Sudakshina followed the footsteps of the cow when Dilipa took the cow to graze, Kalidasa mentions how the Rishis compiled the Smritis. His object was not to tell us what the Rishis did or how the Smritis were made.
It is customary for the subjects of the simile (Upamaana) to be superior to the object with which it is compared (Upameya). For example when one’s face is compared to the moon or lotus, the moon or lotus will in fact be better to look at than the face. Here the subject of the simile is the very chaste Sudakshina following her husband Dilipa. It is logically implied that the Smritis follow the Srutis still more closely. Therefore the master par excellence of similes, Kalidasa, resorts to this comparison. No further proof would therefore be required to prove that the Srutis totally follow the Smritis.
Now those observances (Anushthana) which are not clearly spelt out in the Vedas but which are made clear in the Smritis are called Smaarta-Karma. Those that are clearly laid down in the Vedas are referred as Srouta-Karma. This should not give room for the conclusion that Smarta Karma is in any way inferior to Srouts Karma.
The Upaasana which is most important for householder (Grihastha), the Karmas which are required to be done domestically called Grihya-Karmas, the most important of the Vaidika-Karma, the Pitru-Shraadha, the five yajnas – are all Smaartha Karmas. Veda Mantras are used in their performance. It is therefore clear that the authors of Smritis had understood the spirit of the Srutis in prescribing these obligations. Therefore, instead of thinking that Smritis are inferior to Sruti or that Puranas are inferior to Smritis, they should all be regarded in an integrated way, as a composite package.
The Puranas narrate the Vedic dharmas in the form of stories. The Vedic dharmas and karmas are presented not in the form of fables but advice and injunctions by the Smritis. They also indicate the procedure for doing the Karmas. The Vedas intuitively flashed into the comprehension of the Rishis. Later on, the Rishis recollected what they had seen and they became Smritis. Puraanas deal with the truth contained in the Vedas, with the recital of stories. All are authoritative.
Thus the Sruti, Smriti and Puraanas all deal with Dharma.
And our Acharya – Adi Shankaracharya – was a repository of the Dharma contained in the Srutis, Smritis and Puraanas. Hence we bow down to him with the following salutation:
Shruti Smriti Puraanaamaalayam Karunaalayam
Namaami Bhagawatpaadashankaram Loksankaram
Harih Harah!!
स्मृतियों का आधार केवल वेद ही हैं
इसका सबसे बड़ा प्रमाण महाकवियों के निर्णय में है । हमारे धार्मिक आस्थाओं के संस्थापकों – शंकर, रामानुज और माधव – ने इस बात की पुष्टि की है कि धर्मशास्त्र वेदों पर आधारित हैं ।
लेकिन फिर इसे शायद अचूक नहीं माना जा सकता क्योंकि वे अपने-अपने सिद्धांतों के प्रति एक निश्चित निष्ठा रखते थे । वे प्राचीन मूल्यों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध थे । इसलिए वे परंपरा की सीमाओं से बाहर जाकर उपदेश नहीं देते थे । लेकिन कवि में ऐसी कोई हिचकिचाहट नहीं है । वह किसी भी सिद्धांत की स्थापना के लिए न तो समर्पित हैं और न ही प्रतिबद्ध । वह सत्य की बात करते हैं जैसा कि उन्हें दिखाई देता है, बिना किसी पंथ के प्रति पूर्वाग्रह के ।
महाकवियों में सबसे प्रतिष्ठित, कालिदास ने अपने रघुवंश में श्रुतियों का उल्लेख इस प्रकार किया है: वे कहते हैं, “श्रुतेरिवार्थं स्मृतिरन्वगच्छत्” । सुदक्षिणा गाय के पदचिन्हों पर चली, ठीक उसी प्रकार जैसे स्मृति श्रुति के अर्थ का अनुसरण करती है ।
यहाँ, जब कालिदास यह वर्णन करते हैं कि जब दिलीप गाय को चराने ले गए तो सुदक्षिणा गाय के पदचिन्हों पर कैसे चली, तो वे बताते हैं कि ऋषियों ने स्मृतियों का संकलन कैसे किया । उनका उद्देश्य हमें यह बताना नहीं था कि ऋषि क्या करते थे या स्मृतियाँ कैसे बनाई जाती थीं ।
यह प्रथा है कि उपमा (उपमान) के विषय उस वस्तु से श्रेष्ठ होते हैं जिससे उसकी तुलना की जाती है (उपमेय) । उदाहरण के लिए, जब किसी के मुख की तुलना चंद्रमा या कमल से की जाती है, तो वास्तव में चंद्रमा या कमल मुख की तुलना में देखने में अधिक सुंदर होगा । यहाँ उपमा का विषय अत्यंत पवित्र सुदक्षिणा है जो अपने पति दिलीप का अनुसरण कर रही है । तार्किक रूप से यह निहित है कि स्मृतियाँ श्रुतियों का और भी अधिक निकटता से अनुसरण करती हैं । इसलिए उपमाओं के श्रेष्ठ गुरु, कालिदास, इस तुलना का सहारा लेते हैं । अतः यह सिद्ध करने के लिए किसी और प्रमाण की आवश्यकता नहीं है कि श्रुतियाँ स्मृतियों का पूर्णतः अनुसरण करती हैं ।
अब वे अनुष्ठान जो वेदों में स्पष्ट रूप से वर्णित नहीं हैं, लेकिन स्मृतियों में स्पष्ट किए गए हैं, उन्हें स्मार्त-कर्म कहा जाता है । वे जो वेदों में स्पष्ट रूप से निर्धारित हैं, उन्हें श्रौत-कर्म कहा जाता है । इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि स्मार्त कर्म किसी भी प्रकार श्रौत कर्म से निम्नतर है ।
गृहस्थ के लिए सबसे महत्वपूर्ण उपासना, घरेलू रूप से किए जाने वाले कर्म जिन्हें गृह्य-कर्म कहा जाता है, वैदिक-कर्मों में सबसे महत्वपूर्ण, पितृ-श्राद्ध, पाँच यज्ञ – ये सभी स्मार्त कर्म हैं । इनके प्रदर्शन में वेद मंत्रों का प्रयोग किया जाता है । अतः यह स्पष्ट है कि स्मृतियों के रचयिता इन दायित्वों का निर्धारण करते हुए श्रुतियों के भाव को समझा था । इसलिए, यह सोचने के बजाय कि स्मृतियाँ श्रुति से निम्न हैं या पुराण स्मृतियों से निम्न हैं, इन सभी को एकीकृत रूप में, एक समग्र पैकेज के रूप में देखा जाना चाहिए ।
पुराण वैदिक धर्मों का वर्णन कथाओं के रूप में करते हैं । वैदिक धर्म और कर्म दंतकथाओं के रूप में नहीं, बल्कि स्मृतियों द्वारा दिए गए उपदेशों और आदेशों के रूप में प्रस्तुत किए गए हैं । वे कर्म करने की प्रक्रिया का भी संकेत देते हैं । वेद सहज रूप से ऋषियों के बोध में आ गए । बाद में, ऋषियों ने जो देखा था उसे स्मरण किया और वे स्मृतियाँ बन गए । पुराण वेदों में निहित सत्य का वर्णन करते हैं, कथाओं के वाचन के साथ । सभी प्रामाणिक हैं ।
इस प्रकार श्रुति, स्मृति और पुराण सभी धर्म का वर्णन करते हैं ।
और हमारे आचार्य – आदि शंकराचार्य – श्रुतियों, स्मृतियों और पुराणों में निहित धर्म के भंडार थे । इसलिए हम नमन करते हैं निम्नलिखित अभिवादन के साथ उन्हें नमस्कार करें:
श्रुति स्मृति पुराणामालयं करुणालयं
नमामि भगवत्पादशंकरं लोकशंकरं
हरिः हरः!!

1 Comment
Bahut sundar jankari milal paidh k.
श्रुति स्मृति पुराणामालयं करुणालयं
नमामि भगवत्पादशंकरं लोकशंकरं
🙏💐🙏