स्वाध्याय – सावन मास विशेष
शिवचर्चा – शिवस्तवन्
सावन मास २०८२ विक्रम संवत् साल – श्री श्री १०८ श्री आदिगुरु शंकराचार्य केँ बेर-बेर प्रणाम अर्पित करैत हुनकहि द्वारा कयल गेल ई सुन्दर रचना –
॥ वेदसारशिवस्तवः ॥
पशूनां पतिं पापनाशं परेशं गजेन्द्रस्य कृत्तिं वसानं वरेण्यम ।
जटाजूटमध्ये स्फुरद्गाङ्गवारिं महादेवमेकं स्मरामि स्मरारिम ॥१॥
हे समस्त जीव केर स्वामी ‘पशुपति’! हे समस्त पाप केर नाश करनिहार सभक ‘ईश्वर’ ! जे गजराजक चरम सँ बनल सुन्दर वस्त्र पहिरने छथि, जिनकर जटाक बीच सँ माँ गंगाक धारा निकलि रहल अछि, ताहि शिवजीक स्तुति (स्मरण-सुमिरन) आइ हम बेर-बेर करैत छी ।
महेशं सुरेशं सुरारातिनाशं विभुं विश्वनाथं विभूत्यङ्गभूषम् ।
विरूपाक्षमिन्द्वर्कवह्नित्रिनेत्रं सदानन्दमीडे प्रभुं पञ्चवक्त्रम् ॥२॥
हे महेश ! हे सुरेश ! समस्त देवता लोकनिक अहंकार केँ नाश करनिहार विभु विश्वनाथ संपूर्ण विश्व केर स्वामी ! अपन समस्त अंग मे विभूति सँ सुशोभित ! सर्वत्र विद्यमान रूपवला ! तीन नेत्रवला ! सदिखन आनन्द मे रहयवला ! पाँचो तत्त्व केर स्वामी शिव जी अपनहिं थिकहुँ ।
गिरीशं गणेशं गले नीलवर्णं गवेन्द्राधिरूढं गुणातीतरूपम् ।
भवं भास्वरं भस्मना भूषिताङ्गं भवानीकलत्रं भजे पञ्चवक्त्रम् ॥३॥
हे समस्त पर्वत (गिरि) केर ईश (स्वामी) ‘गिरिश’! हे भगवान् गणेश केर पिता ‘महेश’ ! नील वर्णक गलावला ! बसहा पर सवारी करयवला ! गुण सब सँ भरपूर ‘अतीत रूपवला’ ! विश्वक लेल सूर्यक समान, भस्म सँ अपन अंग केँ सुशोभित कयने, माता पार्वतीक स्वामी, शिव जी केँ हम पाँचो तत्त्व सँ बेर बेर भजन करैत छी ।
शिवाकान्त शंभो शशाङ्कार्धमौले महेशान शूलिञ्जटाजूटधारिन् ।
त्वमेको जगद्व्यापको विश्वरूप: प्रसीद प्रसीद प्रभो पूर्णरूप ॥४॥
हे एकांत मे रहनिहार ‘शिवाकान्त’ शम्भो ! मस्तक पर अर्धचन्द्र केँ धारण करनिहार ‘शशांक’ ! पार्वतीक स्वामी ‘महेश’ ! त्रिशूल धारण कयनिहार आ जटाजुट (जटा) सब धारण कयनिहार ! अपने एकमात्र सँ ई सम्पूर्ण जगत व्याप्त अछि हे ‘विश्वरूप’ ! अपने हमेशा प्रसन्न रहू हे प्रभो पूर्णरूप महादेव !
परात्मानमेकं जगद्बीजमाद्यं निरीहं निराकारमोंकारवेद्यम् ।
यतो जायते पाल्यते येन विश्वं तमीशं भजे लीयते यत्र विश्वम् ॥५॥
हे एकमात्र परमात्मन् ! एहि जगत् केर निर्माणक बीज प्रदाता ‘जगत्पिता’ ! एहि जगत के पालनहार ! जिनका कोनो मोह नहि अछि, जिनकर कोनो स्वरूप नहि अछि, जे सर्वत्र विद्यमान् ‘वेदस्वरूप’ छी ! जेतय कतहु जाउ, सम्पूर्ण विश्व केर अपने एकमात्र पालनहार छी । एहि विश्व केर कण-कण विद्यमान् अपनहिं केँ हम बेर बेर भजैत छी ।
न भूमिर्नं चापो न वह्निर्न वायुर्न चाकाशमास्ते न तन्द्रा न निद्रा ।
न गृष्मो न शीतं न देशो न वेषो न यस्यास्ति मूर्तिस्त्रिमूर्तिं तमीड ॥६॥
जे न माटि मे, न जल मे, न वायु मे, न आकाश आ न अग्नि मे; जे न तन्द्रा मे, न निद्रा मे; जिनका लेल न गर्मी न ठंढ़ा; जिनकर न देश न वेश आ न कोनो एक मूर्ति – ताहि त्रिमूर्ति केँ हम पुनः पुनः प्रणाम करैत छी ।
अजं शाश्वतं कारणं कारणानां शिवं केवलं भासकं भासकानाम् ।
तुरीयं तम:पारमाद्यन्तहीनं प्रपद्ये परं पावनं द्वैतहीनम ॥७॥
जे जन्म-मृत्यु सँ परे अर्थात ‘अजं शाश्वत्’ छथि ! जे सब कारणहु केर कारण छथि ! ‘शिवं केवलं’ यानि केवल कल्याण करयवला छथि ! प्रकाशकहु केर प्रकाशक छथि ! हम ताहि आदि ओ अन्त सँ हीन अन्धकार सँ परे परम पवित्र एवं द्वैतहीन ईश्वर केर शरण मे स्वयं केँ समर्पित करैत छी ।
नमस्ते नमस्ते विभो विश्वमूर्ते नमस्ते नमस्ते चिदानन्दमूर्ते ।
नमस्ते नमस्ते तपोयोगगम्य नमस्ते नमस्ते श्रुतिज्ञानगम्य ॥८॥
विश्वक कल्याण करयवला शिव ‘विश्वमूर्ते’ केँ हम प्रणाम करैत छी । चित्त केँ आनन्द देनिहार चिदानन्द स्वरूप केँ हम प्रणाम करैत छी । महान तप व योग मे गमन कयनिहार परम योगी केँ प्रणाम करैत छी । श्रुतिवर्णित अगम ज्ञानक भंडार परमज्ञानी परमेश्वर केँ हम प्रणाम करैत छी ।
प्रभो शूलपाणे विभो विश्वनाथ महादेव शंभो महेश त्रिनेत्र ।
शिवाकान्त शान्त स्मरारे पुरारी त्वदन्यो वरेण्यो न मान्यो न गण्य: ॥९॥
हे प्रभु, हे ‘शूलपाणि’ (कर मे त्रिशूल धारण कियनिहार) महादेव, हे ‘विश्वविभो’ (विश्वक विभु अर्थात् स्वामी) विश्वनाथ, हे महादेव, हे शम्भो, हे महेश, हे तिनेत्र (तीन आँखिवला), हे शिवकान्त एवं शान्त रहनिहार स्मरणीय पुरारी (जगपालक भगवान्), अहाँ सँ श्रेष्ठ आर किनको नहि मानल आ गानल जाइत छन्हि ।
शंभो महेश करुणामय शूलपाणे गौरीपते पशुपते पशुपाशनाशिन् ।
काशीपते करुणया जगदेतदेक स्त्वं हंसि पासि विदधासि महेश्वरोऽसि ॥१०॥
हे शम्भू, हे महेश, हे करुणामय (दयाक सागर), हे त्रिशूल धारण कयनिहार, हे माँ गौरीक पति, हे पशुपति, हे पशु (जीव) केँ पाश (बन्धन) सँ मुक्त करौनिहार ! हे काशीपते (काशी नगरीक स्वामी) ! अपने एहि विश्व पर करुणा (दया) करैत छी आर सभक उद्धार करैत छी, अपनहिं एहि जगत केर ईश्वर ‘महेश्वर’ छी ।
त्वत्तो जगद्भवति देव भव स्मरारे त्वय्येव तिष्ठति जगन्मृड विश्वनाथ ।
त्वय्येव गच्छति लयं जगदेतदीश लिङ्गात्मके हर चराचरविश्वरूपिन् ॥११॥
अहीं सँ ई जगत केर अस्तित्व अछि हे देव ! ई सम्पूर्ण भव (लोक) केर अहींक कृपा सँ विद्यमान् आ पालित अछि हे जगन्मृड विश्वनाथ (जगपालक विश्वनाथ ) । ई सम्पूर्ण जगत अहीं सँ निकलल अछि, हे लिङ्गस्वरूप हर, हे चराचर विश्वरूप महादेव, अहीं एकरा सम्हारैत छी आ अन्त मे ई अहीं मे लीन (समाहित) भ’ जाइत अछि ।
॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं वेदसारशिवस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
