चिह्न – विशिष्ट निशान
(चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वतीक लिखल ‘दे वेदाज’ पुस्तकक ‘वेदक उपांगः धर्मशास्त्र’ शीर्षक अन्तर्गतक विषय केर मैथिली भावानुवाद)
जँ हम सब कोनो विशिष्ट धर्म सँ जुड़ल छी, त से देखेबाक लेल किछु बाहरी चिह्न या ‘निशान’ भेल करैत अछि ।
स्काउट्स केर एकटा विशिष्ट वर्दी होइत छैक । सेना, नौसेना आदि सँ जुड़ल लोक सभक पहिचानक बहुत विशिष्ट चिह्न होइत छैक । पुलिस मे सेहो, एहि अन्तर्गत आरो कतेको उप-विभाग सब होइत छैक । यदि ओ अपन पोशाक या बैज बदलैत अछि त ओकर प्रदर्शन पर कोनो तरहक प्रभाव नहि पड़तैक । तैयो, ओकरा सभक लेल बहुते स्पष्ट नियम छैक जे ओ एहेन किछु नहि करय । नाविक पुलिसकर्मीक पोशाक नहि अपना सकैत अछि । प्रत्येक सेवा मे अनुशासन आ व्यवस्था हेबाक चाही । कि यैह अनुशासन आर व्यवस्था धर्म पर सेहो लागू नहि हेबाक चाही ? ताहि सँ विभिन्न व्यवसाय (जाति-वर्ण) व विभिन्न आश्रम – जीवनक चरण मे लोकक वास्ते अलग-अलग पहिचान चिह्न तथा अलग-अलग कर्तव्य निर्धारित कयल गेल अछि । स्थानीय रीति-रिवाज कहैत अछि जे अपन धोती एहि तरहें पहिरू; अपन साड़ी एहि तरहें पहिरू – अपन माथा पर एक विशेष तरहक निर्धारित चिह्न (चन्दन-टीका-छाप) लगाउ, आदि ।
ई केवल एकटा सामाजिक अनुशासन केर रूप मे नहि बनायल गेल छल । एहि मे सँ प्रत्येक केर एकटा आर सूक्ष्म पहलू (विशेषता) सेहो अछि, यानि लोक केँ शुद्ध करबाक आ आध्यात्मिक साधना मे आगू बढ़य मे ओकर सहायता करबाक ।
कार्यालय सब मे, चपरासी केँ वर्दी पहिरबाक रहैत छैक, अधिकारी सब केँ नहि । हम सब एहि पर सवाल नहि उठबैत छी जे एना कियैक, मुदा जखन शास्त्र प्रत्येक व्यवसाय व जीवनक प्रत्येक चरण वास्ते अलग-अलग विशिष्ट विशेषता सब निर्धारित करैत अछि, तखन हम सब समानता आ स्वतंत्रताक नाम पर एकर निरर्थकता पर विरोध करैत छी । वर्णक आधारपर अनादि काल सँ अस्तित्व पर आधारित हमरा सभक विशेष व्यवस्था, जाहि मे निर्धारित कर्तव्य अछि, से सार्वभौमिक कल्याण केर हित मे, केवल ओकर जीवन-शैलीक अनुरूप विभिन्न प्रकारक व्यक्तिगत आचरण (आचार) तथा उपाय (अनुष्ठान) निर्धारित कयल गेल अछि ।
एहि बात केँ नज़रअंदाज़ कय देल गेल अछि आ ऊँच-नीच (जाति) केर एक गैर-मौजूद वर्गीकरण स्थापित कय देल गेल अछि, जेकर परिणामस्वरूप आरोप-प्रत्यारोप आ विद्रोह सब भेल । अंततः आइ हम सब एहेन स्थिति मे पहुँचि गेल छी जेतय केकरहु पास पहिचानक कोनो धार्मिक चिह्न नहि अछि ।
हम सब अन्य सामाजिक प्रतीक सब केँ बेझिझक धारण करबाक लेल तैयार छी । लेकिन हम सब ओहि धार्मिक प्रतीक सब सँ लज्जित होइत छी जे आत्माक भलाइ करबाक वास्ते बनायल गेल छल । हम सब एकरा अंधविश्वास कहैत छी । हम सब सुधारक नाम पर एकरा त्यागि दैत छी; लेकिन ई देखाबय लेल जे हम सब सुधारवादी छी, हम सब एक खास टोपी पहिरि लैत छी । या हम सब एकटा खास रंगक टीशर्ट (गंजी, कमीज, आदि) या तौलिया (लुंगी) पहिरैत छी । हम सब एकरा ईश्वरहु सँ बेसी महत्व दैत छी ।
आगू: स्मृति स्वतंत्र इच्छाक उपज नहि छी – आगाँ जारी…
हरिः हरः!!
Chinha – Distinguishing Mark
If we belong to a certain faith, then there are certain external symbols or ‘chinhas’ to indicate it.
The scouts have a distinctive uniform. Those belonging to the army, navy, etc., have very distinctive marks of identification. In the police too, there are many sub-divisions thereunder. If they were to change their dresses or badges, their performance will not be affected in anyway. Even so, there are very definite regulations that they may not do any such thing. The sailor cannot adopt the policeman’s dress. There should be discipline and orderliness in each service. Should not the same discipline and order apply to religion? That is why different marks of identification and different duties have been prescribed for persons belonging to different occupations (Jaati-Varna) and for those in the various Ashram – stage of life. Local custom says wear your dhotis this way; your saree this way – wear a prescribed mark on your forehead, etc.
This was not merely designed as a social discipline. Each one of these has another subtle aspect to commend itself, viz., purifying the person and helping him onwards, in the spiritual pursuit.
In the offices, the peon is required to wear uniform, not the officers. We don’t question why but when the Shaastras prescribe various distinguishing features for each occupation and stage in life, we protest at the futility of it in the name of equality and freedom. Our special order based on the immemorial existence of Varnas, with ordained duties, has, in the interest of universal well-being, prescribed different types of personal conduct (Aacharam) and observances (Anushthanam) solely to suit their way of life.
This has been lost sight of and a non-existent gradation of high and low (caste) has been predicated which has resulted in recrimination and revolt. Ultimately today we have reached a position where no one has any religious mark of identification.
We are prepared to sport other social symbols unabashedly. But we feel abashed at the religious symbols which are designed to do good to the soul. We call it all superstition. We abandon it in the name of reform; but in order to indicate that we are reformists we wear a special cap. Or we wear shirts and towels of a particular colour. We attach more importance to these than even to God.
Next: Smritis are not the product of independent free-will – to be continued….
Harih Harah!!
चिन्ह – विशिष्ट चिह्न
यदि हम किसी विशिष्ट धर्म से जुड़े हैं, तो उसे दर्शाने के लिए कुछ बाहरी चिह्न या ‘निशान’ होते हैं।
स्काउट्स की एक विशिष्ट वर्दी होती है । सेना, नौसेना आदि से जुड़े लोगों की पहचान के बहुत विशिष्ट चिह्न होते हैं । पुलिस में भी, इसके अंतर्गत कई उप-विभाग होते हैं । यदि वे अपनी पोशाक या बैज बदलते हैं, तो उनके प्रदर्शन पर किसी भी तरह का प्रभाव नहीं पड़ेगा । फिर भी, उनके लिए बहुत ही स्पष्ट नियम हैं कि वे ऐसा कुछ भी न करें । नाविक पुलिसकर्मी की पोशाक नहीं अपना सकता । प्रत्येक सेवा में अनुशासन और व्यवस्था होनी चाहिए । क्या यही अनुशासन और व्यवस्था धर्म पर भी लागू नहीं होनी चाहिए ? इसीलिए विभिन्न व्यवसायों (जाति-वर्ण) और विभिन्न आश्रमों – जीवन के चरणों के लोगों के लिए अलग-अलग पहचान चिह्न तथा अलग-अलग कर्तव्य निर्धारित किए गए हैं । स्थानीय रीति-रिवाज कहते हैं कि अपनी धोती इस तरह पहनो; अपनी साड़ी इस तरह पहनो – अपने माथे पर एक निर्धारित चिह्न लगाओ, आदि ।
यह केवल एक सामाजिक अनुशासन के रूप में नहीं बनाया गया था । इनमें से प्रत्येक का एक और सूक्ष्म पहलू है, अर्थात् व्यक्ति को शुद्ध करना और आध्यात्मिक साधना में आगे बढ़ने में उसकी सहायता करना ।
कार्यालयों में, चपरासी को वर्दी पहननी होती है, अधिकारियों को नहीं । हम इस पर सवाल नहीं उठाते कि ऐसा क्यों है, लेकिन जब शास्त्र प्रत्येक व्यवसाय और जीवन के प्रत्येक चरण के लिए अलग-अलग विशिष्ट विशेषताएँ निर्धारित करते हैं, तो हम समानता और स्वतंत्रता के नाम पर इसकी निरर्थकता पर विरोध करते हैं । वर्णों के अनादि काल से अस्तित्व पर आधारित हमारी विशेष व्यवस्था, जिसमें निर्धारित कर्तव्य हैं, ने सार्वभौमिक कल्याण के हित में, केवल उनके जीवन-शैली के अनुरूप विभिन्न प्रकार के व्यक्तिगत आचरण (आचार) और अनुष्ठान (अनुष्ठान) निर्धारित किए हैं ।
इस बात को नज़रअंदाज़ कर दिया गया है और ऊँच-नीच (जाति) का एक गैर-मौजूद वर्गीकरण स्थापित कर दिया गया है, जिसके परिणामस्वरूप आरोप-प्रत्यारोप और विद्रोह हुए हैं । अंततः आज हम ऐसी स्थिति में पहुँच गए हैं जहाँ किसी के पास पहचान का कोई धार्मिक चिह्न नहीं है ।
हम अन्य सामाजिक प्रतीकों को बेझिझक धारण करने के लिए तैयार हैं । लेकिन हम उन धार्मिक प्रतीकों से शर्मिंदा होते हैं जो आत्मा का भला करने के लिए बनाए गए हैं । हम इसे अंधविश्वास कहते हैं । हम सुधार के नाम पर इसे त्याग देते हैं; लेकिन यह दिखाने के लिए कि हम सुधारवादी हैं, हम एक खास टोपी पहनते हैं । या हम एक खास रंग की कमीजें और तौलिए पहनते हैं । हम इन्हें ईश्वर से भी ज़्यादा महत्व देते हैं ।
आगे: स्मृतियाँ स्वतंत्र इच्छा की उपज नहीं हैं – आगे जारी…
हरिः हरः!!
