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प्रवीण नारायण चौधरी

मिथिलाक लोक मे मातृभाषा मैथिली प्रति उदासीनता कियैक आ एकर निदान कोना

लेख – प्रवीण नारायण चौधरी मिथिलाक लोक मे मातृभाषा प्रति उदासीनता कियैक आ एकर निदान कोना सच छैक जे अपन मातृभाषा ‘मैथिली’ प्रति ओहेन आकर्षण आ जुड़ाव मिथिलाक्षेत्रक लोक मे नहि अछि जेहेन आन क्षेत्रक लोक मे देखल जाइछ। ई एक रहस्यपूर्ण विषय थिक हमरा बुझाइ मे। जे भाषाक इतिहास आ साहित्य एतेक सम्पन्न अछि मिथिलाक लोक मे मातृभाषा मैथिली प्रति उदासीनता कियैक आ एकर निदान कोना

समूह एक गतिविधि अनेकः दहेज मुक्त मिथिला समूहक साप्ताहिक समीक्षा

सामाजिक संजाल मे मैथिली-मिथिला प्रति समर्पित गतिविधि – कीर्तिनारायण झा दहेज मुक्त मिथिला फेसबुक समूह केर साप्ताहिक समीक्षा – ७ जनवरी २०२३ । फोन उठेलहुं, उठा कहलियैन, खोलु दरबाजा आबि गेलौं। हमर हाथ दुनु बाझल अइ, पकड़ू झोरा यै, भरि अनलौं॥ “दुनू प्राणी गाम में” शीर्षक सँ उदय शंकर झा केर सुंदर पांती सँ आजुक समूह एक गतिविधि अनेकः दहेज मुक्त मिथिला समूहक साप्ताहिक समीक्षा

एक विशुद्ध मैथिली कथा जेकर भाव शायद सब बुझि सकी!!

कथा – प्रवीण नारायण चौधरी हूलन तहिया आ आइ (कथा) भोरे-भोरे भरि देह माटि-गर्दा सँ लेटायल, मात्र एकटा विष्ठी पहिरने हुलना केँ बेर-बेर उठैत, बरबराइत आ ओंघराइत देखि लोक सब क्षुब्ध अवस्था मे छल। हुलना या त भगता के भगल कय रहल छल, या ओ कोनो नशा मे पागल भ’ गेल छल, या फेर आरे एक विशुद्ध मैथिली कथा जेकर भाव शायद सब बुझि सकी!!

अहाँ ई करू – अहाँ ओ करू

अहाँ ई करू – अहाँ ओ करू समाज बदलबाक काज जखन असामाजिक लोक करत त समाज मे केहेन परिवर्तन आओत ई स्वतः बुझय योग्य प्रश्न भेल। मनन करू। तहिना भाषा आ साहित्यक अर्थ तक नहि बुझनिहार जखन भाषा-साहित्य पर विमर्श करत त ओहेन समाज मे भाषा-साहित्यक केहेन स्थिति रहत सेहो स्वतः बुझय योग्य प्रश्न भेल। अहाँ ई करू – अहाँ ओ करू

रामचरितमानस मोतीः यमुना केँ प्रणाम, वनवासी लोकनिक प्रेम

स्वाध्याय – प्रवीण नारायण चौधरी रामचरितमानस मोती यमुना केँ प्रणाम, वनवासी लोकनिक प्रेम १. श्री रामचन्द्रजी सखा गुह केँ अनेकों तरहें बुझेलनि आ घर घुरबाक आग्रह-आदेश कयलनि। तखन श्री रामचन्द्रजीक आज्ञा मानि ओ घर लेल प्रस्थान कयलाह। फेर सीताजी, श्री रामजी और लक्ष्मणजी हाथ जोड़िकय यमुनाजी केँ पुनः प्रणाम कयलनि आर सूर्यकन्या यमुनाजीक बड़ाई करिते रामचरितमानस मोतीः यमुना केँ प्रणाम, वनवासी लोकनिक प्रेम

रामचरितमानस मोतीः तापस प्रकरण

स्वाध्याय – प्रवीण नारायण चौधरी रामचरितमानस मोती तापस प्रकरण पिछला अध्याय मे श्री रामजी जानकीजी, लक्ष्मणजी आ निषादराज गुह सहित यमुना पार कय ओतय स्नान-ध्यान कयलनि आ तेकर बाद…. १. ताहि अवसर ओतय एक तपस्वी अयलाह जे तेजक पुंज, छोट अवस्थाक आर सुन्दर छलथि। हुनक गति कवि नहि जनैत छथि, या फेर ओ कवि रहथि रामचरितमानस मोतीः तापस प्रकरण

सगर राति दीप जरय द्वारा मैथिली भाषा-साहित्य सँ आमजन केँ जोड़ल जा रहल अछि

यैह जमीनी काज होइत रहबाक चाही मैथिली भाषा-साहित्यक उत्थान संग एकर लाभ जमीनी स्तर पर समाजक हर वर्ग केँ प्राप्त हो ताहि अभियानक नाम थिक “सगर राति दीप जरय”। परसू ३१ दिसम्बर २०२२ मधुबनी जिलाक रहुआ संग्राम मे एकर ११२म् आयोजन सम्पन्न भेल अछि। नियमानुसार हर आयोजन मे आगूक आयोजन लेल एक संयोजक आ स्थान सगर राति दीप जरय द्वारा मैथिली भाषा-साहित्य सँ आमजन केँ जोड़ल जा रहल अछि

मैथिली भाषा साहित्य के जमीनी अभियान: सगर राति दीप जरय 112म् सम्पन्न

साभार फेसबुक: श्री नारायण झा के रिपोर्ट 【 ‘सगर राति दीप जरय’- आयोजन क्रम सं. 112 】 【 दिनांक – 31 दिसम्बर 2022】 ‘सगर राति दीप जरय’ मैथिलीक कथा-कार्यक्रम जे 31 दिसम्बर 2022केँ पारसमणि धाम रहुआ संग्रामक अन्तर्गत आदिनाथ मधुसूदन पारसमणि संस्कृत महाविद्यालय, रहुआ-संग्रामक परिसरमे अशोक अविचलक संयोजकत्वमे सम्पन्न भेल। विधिवत कार्यक्रमक शुभारम्भ दीप प्रज्वलनसँ मैथिली भाषा साहित्य के जमीनी अभियान: सगर राति दीप जरय 112म् सम्पन्न

समूह एक गतिविधि अनेकः दहेज मुक्त मिथिला समूहक साप्ताहिक समीक्षा

सामाजिक संजालः दहेज मुक्त मिथिला समूह के साप्ताहिक समीक्षा – कीर्तिनारायण झा ३१ दिसम्बर २०२२ । “हमर पिया, हरलैथि जिया, बांचत कोना प्राण? सदिखन हुनके याद करै छी, आर किछु नै ध्यान” कलम सँ निकलल काव्यक धार कार्यक्रम में हमर सभक गुणी भाई श्री अखिलेश कुमार मिश्र जी के एहि पांती सँ आजुक साप्ताहिक समीक्षा समूह एक गतिविधि अनेकः दहेज मुक्त मिथिला समूहक साप्ताहिक समीक्षा

भाषा के भ’ओ नहि बुझनिहार नेताजी केँ भाषिक अधिकार सँ कोन मतलब, बस वोट टा चाही

भाषाक महत्व सब बुझथि (भाषा विमर्श) – प्रवीण नारायण चौधरी * शिक्षा आ संस्कारक काज अनधिकृत लोक नहि कय सकैछ * खाली मैथिली अभियानी टा कियैक हल्ला मचेने अछि सामाजिक संजाल आ नागरिक पत्रकारिता के लोकप्रियता दिनानुदिन बढ़ैत गेला सँ सक्षम-साकांक्ष मैथिलीभाषी मे अपन भाषा प्रति चिन्ता-चिन्तन स्वाभाविक रूप सँ बढ़ल अछि। पूर्वक समय सँ भाषा के भ’ओ नहि बुझनिहार नेताजी केँ भाषिक अधिकार सँ कोन मतलब, बस वोट टा चाही