जा रहल कतय समाजः ज्योति झा के कविता
कविता – ज्योति झा, काठमांडू जा रहल कतय समाजदहेज नै लेब नै देब कहिते कहिते उमेर तिस पार भ’ गेलै गे बहिना बेटा बेटी कुमारे रहिगेल सख रहि जायत जहिना तहिना माय बाप दहेज पर छैथ अटकल बेटा बेटी पढिलिख प्रगति पथमे परिकल असन्तुलन बढिरहल सामाजिक व्यवस्थामे जिम्मेवार अभिभावक निर्णय दुबिधामेजिनकर धिया गुणी, माय बाप … जा रहल कतय समाजः ज्योति झा के कविता






