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प्रवीण नारायण चौधरी

रामचरितमानस मोतीः किष्किन्धाकाण्ड मंगलाचरण

स्वाध्याय – प्रवीण नारायण चौधरी रामचरितमानस मोती मंगलाचरण श्लोक : कुन्देन्दीवरसुन्दरावतिबलौ विज्ञानधामावुभौ शोभाढ्यौ वरधन्विनौ श्रुतिनुतौ गोविप्रवृन्दप्रियौ। मायामानुषरूपिणौ रघुवरौ सद्धर्मवर्मौ हितौ सीतान्वेषणतत्परौ पथिगतौ भक्तिप्रदौ तौ हि नः ॥१॥ कुन्दपुष्प आर नीलकमल समान सुन्दर गौर एवं श्यामवर्ण, अत्यन्त बलवान्‌, विज्ञान केर धाम, शोभा संपन्न, श्रेष्ठ धनुर्धर, वेद द्वारा वन्दित, गौ एवं ब्राह्मण लोकनिक समूह केर प्रिय (अथवा रामचरितमानस मोतीः किष्किन्धाकाण्ड मंगलाचरण

मिथिलाक मूल संस्कृति मे ह्रास आ समाधान पर दृष्टि

विचार – संजय कुमार झा प्रवासी मैथिल जे सभ गाम-घर छोड़ला, नौकरी चाकरी के क्रम मे शहर गेला, ओ सबटा अपना केँ शहरी बुझय लगलाह। मैथिल सभ तेज़ त होयते छथि, शहर गेला सँ आरो खूब तेजी सँ दोसरक नकल करय मे अव्वल बनि गेलाह। कनियाँ सभ जे गेलखिन शहर मे तैं जे बच्चा सभक मिथिलाक मूल संस्कृति मे ह्रास आ समाधान पर दृष्टि

मनन करू – हम मिथिला सँ छी

विचार   – अंजू झा   आइ आदरणीय भाइ प्रवीण नारायण चौधरीक एकटा लेख “अपने सब मिथिला सँ छी, लेकिन ई की?” शीर्षक सँ दहेज मुक्त मिथिला समूह मे पढ़लहुँ। एहि लेख मे मैथिल ब्राह्मण समुदाय ओतय भ’ रहल ब्राह्मणक संस्कार मे अश्लील-फूहड़ गीतक व्यवहार पर किछु आक्रोश दृष्टिगत भेल जे स्वभाविक बुझायल। एक दिश मनन करू – हम मिथिला सँ छी

रामचरितमानस मोतीः संत लोकनिक लक्षण आर सत्संग भजन लेल प्रेरणा

स्वाध्याय – प्रवीण नारायण चौधरी रामचरितमानस मोती संत लोकनिक लक्षण आर सत्संग भजन लेल प्रेरणा (प्रसंग नारदजी आ श्री रामचन्द्रजीक बीच संवाद – नारदजी द्वारा पूछल गेल प्रश्न जे हुनका प्रभुक माया सँ विवाहक इच्छा जगलाक बाद प्रभु आखिर विवाह मे बाधा उत्पन्न कियैक कयलनि, तेकर जवाब प्रभुजी देलखिन आ आब नारदजीक हृदय मे प्रभुक रामचरितमानस मोतीः संत लोकनिक लक्षण आर सत्संग भजन लेल प्रेरणा

रामचरितमानस मोतीः नारद-राम संवाद

स्वाध्याय – प्रवीण नारायण चौधरी रामचरितमानस मोती नारद-राम संवाद १. भगवान्‌ केँ विरहयुक्त देखि नारदजीक मोन मे विशेष रूप सँ सोच भेलनि। ओ विचारय लगलाह जे हमरे श्राप केँ स्विकारि श्री रामजी नाना प्रकारक दुःख सभक भार सहि रहल छथि। ओहि चलते एतेक भारी दुःख उठा रहल छथि। एहेन भक्तवत्सल प्रभु केँ जाकय देखी। फेर रामचरितमानस मोतीः नारद-राम संवाद

पंजी परम्पराः मैथिल ब्राह्मणक महत्वपूर्ण धरोहर

पंजी परम्पराः मैथिल ब्राह्मणक महत्वपूर्ण धरोहर – प्रवीण नारायण चौधरी हमरा बुझने मैथिल ब्राह्मण सहित अन्य सम्भ्रान्त मैथिल जाति-समुदाय द्वारा सेहो एहि परम्परा केँ अपनायल गेल छल, लेकिन कालान्तर मे एहि सँ विभिन्न कारणे बहुतो जाति-समुदाय दूर भ’ गेलाह। तथापि, बहुल्य मैथिल ब्राह्मण परिवार संग मैथिल कायस्थ आ मैथिल देव समुदाय मे पंजी परम्परा एखनहुँ पंजी परम्पराः मैथिल ब्राह्मणक महत्वपूर्ण धरोहर

रामचरितमानस मोतीः शबरी पर कृपा, नवधा भक्ति उपदेश आर पम्पासर दिश प्रस्थान

स्वाध्याय – प्रवीण नारायण चौधरी रामचरितमानस मोती शबरी पर कृपा, नवधा भक्ति उपदेश आर पम्पासर दिश प्रस्थान १. उदार श्री रामजी कबन्ध केँ गति दय शबरीजीक आश्रम मे पधारलाह। शबरीजी श्री रामचन्द्रजी केँ घर आयल देखि मुनि मतंगजीक वचन मोन पाड़ैत खूब प्रसन्न भ’ गेलीह। (मुनि मतंगजी शबरीजीक भगवान् प्रति समर्पण आ ऋषि-मुनिजन लोकनिक सेवाक रामचरितमानस मोतीः शबरी पर कृपा, नवधा भक्ति उपदेश आर पम्पासर दिश प्रस्थान

रामचरितमानस मोतीः श्री रामजीक विलाप, जटायुक प्रसंग, कबन्ध उद्धार

स्वाध्याय – प्रवीण नारायण चौधरी रामचरितमानस मोती श्री रामजीक विलाप, जटायुक प्रसंग, कबन्ध उद्धार १. जाहि तरहें कपटमृग संग श्री रामजी दौड़ि पड़लथि, वैह छविक हृदय मे राखिकय ओ हरिनाम (रामनाम) रटैत रहैत छथि। एम्हर श्री रघुनाथजी छोट भाइ लक्ष्मणजी केँ अबैत देखिकय बाह्य रूप मे बहुत चिन्ता कयलनि आ कहलनि – “हे भाइ! तूँ रामचरितमानस मोतीः श्री रामजीक विलाप, जटायुक प्रसंग, कबन्ध उद्धार

मैथिली भाषा पर खतरा – रक्षा लेल सब आगू आउ आ समर्पण देखाउ

शुद्धता-अशुद्धताक प्रसंग मैथिली बोली आ लेख्यरूप मे फर्क के चर्चा सरेआम चलैत छैक। जे विधिवत् पढाइयो नहि कयलक ओहो सब शुद्ध-अशुद्धक फेरा मे पड़ि गेल करैत अछि। पढाई करबय हिन्दी, अंग्रेजी, नेपाली, बंगाली, आदि आन-आन भाषा के आ बुद्धि बघारबय मैथिली के त दुर्घटना हेब्बे करत। हमर मानब अछि जे विधिवत् पढाई कयल लोक जँ मैथिली भाषा पर खतरा – रक्षा लेल सब आगू आउ आ समर्पण देखाउ

रामचरितमानस मोतीः जटायु-रावण-युद्ध, अशोक वाटिका मे सीताजी केँ राखब

स्वाध्याय – प्रवीण नारायण चौधरी रामचरितमानस मोती जटायु-रावण-युद्ध, अशोक वाटिका मे सीताजी केँ राखब १. गृध्रराज जटायु सीताजीक दुःख सँ भरल चित्कार (पुकार) सुनि चिन्ह गेला जे ई रघुकुल तिलक श्री रामचन्द्रजीक भार्या थिकीह। ओ देखलथि जे नीच राक्षस हिनका जबर्दस्ती रथ मे लेने जा रहल छल, जेना कपिला गाय म्लेच्छक पाला पड़ि गेल छलीह। रामचरितमानस मोतीः जटायु-रावण-युद्ध, अशोक वाटिका मे सीताजी केँ राखब