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पंजी परम्पराः मैथिल ब्राह्मणक महत्वपूर्ण धरोहर

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पंजी परम्पराः मैथिल ब्राह्मणक महत्वपूर्ण धरोहर

– प्रवीण नारायण चौधरी

हमरा बुझने मैथिल ब्राह्मण सहित अन्य सम्भ्रान्त मैथिल जाति-समुदाय द्वारा सेहो एहि परम्परा केँ अपनायल गेल छल, लेकिन कालान्तर मे एहि सँ विभिन्न कारणे बहुतो जाति-समुदाय दूर भ’ गेलाह। तथापि, बहुल्य मैथिल ब्राह्मण परिवार संग मैथिल कायस्थ आ मैथिल देव समुदाय मे पंजी परम्परा एखनहुँ लागू देखि रहल छी।

कि थिकैक पंजी परम्परा?

जेना विवाह दर्त्ता (marriage registration) के व्यवस्था सरकारी नियमानुसार कयल जेबाक विधान वर्तमान समय मे संचालित अछि, ठीक तहिना पूर्व समय मिथिलाक राजा हर सिंह देव द्वारा चलायल गेल राजकीय व्यवस्था अन्तर्गत विवाहक पंजीकरण प्रथा केँ पंजी परम्परा कहल जाइछ। एहि मे वर आ कन्याक पैतृक पक्षक पाँच पीढ़ीक नाम अंकित कयल जाइछ आ मातृक पक्षक तीन पीढ़ीक नाम अंकित कयल जाइछ।

अधिकार निर्णय आ सिद्धान्त लेखन

मैथिल ब्राह्मणक विवाह निर्धारण प्रक्रिया सेहो अत्यन्त कठिन मानल जाइत अछि। कारण विवाह सम्बन्ध निर्धारण लेल सर्वप्रथम वर व कन्याक गोत्र भिन्नताक मापदंड बनायल गेल अछि। तदोपरान्त रक्त सम्बन्धक जाँच कयल जेबाक परम्परा (विधान) अछि। अर्थात् वर व कन्याक पैतृक ओ मातृक पक्षक क्रमशः पाँच व तीन पीढ़ी धरि सीधा रक्त सम्बन्ध ठहरि गेल त विवाहक अधिकार निषेधित मानल गेल अछि। एहि प्रक्रिया केँ अधिकार निर्णय कहल जाइत अछि। अधिकार निर्णय भेलाक बाद ‘सिद्धान्त लेखन’ केर काज पंजीकार द्वारा कयल जाइछ। यैह सिद्धान्त लेखन सँ दुइ आत्माक मिलन केर एकटा आधारशिला राखल जाइत अछि। लिखल गेल सिद्धान्त लोक कुलदेवीक आगू रखैत छथि, अपन इष्ट सँ निर्धारित विवाहक जोड़ा केँ आशीर्वादित होयबाक आ सफल दाम्पत्य जीवन (गृहस्थी) पेबाक कामना करैत छथि। विवाह राति जखन वर-बरियाती दुहरा लागि जाइत छथि तखन मांगडालाक चंगेरा मे यैह लिखित सिद्धान्त एवं धूप-दीप लयकय कुलदेवीक प्रार्थना करैत कन्यापक्षक लोक वरपक्षक सोझाँ आबि कन्या लेल आनल बिहौती साड़ी-चुड़ी-टिकुली-सिनूर-गहना आदि शुभ सामग्री वर सँ ग्रहण करय अबैत छथि। यैह शुभ सामग्री कन्या धारण करती आ तदनोपरान्त विवाहक अन्य प्रक्रिया आरम्भ होयत। वैदिक मंत्र सँ वर संकल्प लेता जे आगू भविष्यक जीवन मे अपन दाम्पत्य जीवन आ पत्नी प्रति जिम्मेदारी निभेता। विवाहक मूल विधान एतबा कहि सकैत छी।

बाकी विध-व्यवहार सँ एहि दुइ नव विवाहित जोड़ी केँ विवाहक अर्थ, महत्व आ जिम्मेदारीक विभिन्न विभाग सभक अनुभूति देल जेबाक परम्परा अछि। सन्तानोत्पत्ति सँ गृहस्थीक विभिन्न बात आ मानवीय संसार प्रति स्वयं केर जिम्मेदारी पर केन्द्रित कायदा-नियम सभक प्रशिक्षण सेहो निहित अछि मिथिला विवाह पद्धति मे। आध्यात्मिक आ लौकिक दुनू पक्ष केँ बुझबाक सीख अछि विवाह पद्धति मे। विदित हो जे पति मात्र मंत्र पढैत छथि। पति पर बेसी जिम्मेदारी रहैत छन्हि। परञ्च, सत्य इहो अछि जे पति-पत्नी दुनू अन्तरंग बनि जेबाक कारण पतिक हरेक जिम्मेदारी मे पत्नीक सहयोग सर्वोपरि रहैत छन्हि। पति कोनो निर्णय करता त पत्नीक सहमति आ सौहार्द्रताक ध्यान जरूरे रखता। पत्नी सेहो हुनक अनुसंगिनी बनिकय ताहि धर्म केँ पूरा करय मे पूर्ण सहयोग देती।

आब आखिरी मे हमर सवाल –

विवाहक विधान प्रति हम सब कतेक सजग रहैत छी? देखाबा हमरा सब पर कियैक राज करय लागल अछि?

हरिः हरः!!

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