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प्रवीण नारायण चौधरी

रामचरितमानस मोतीः सुबेल पर श्री रामजीक झाँकी आर चंद्रोदय वर्णन

स्वाध्याय – प्रवीण नारायण चौधरी रामचरितमानस मोती सुबेल पर श्री रामजीक झाँकी आर चंद्रोदय वर्णन १. एम्हर श्री रघुवीर सुबेल पर्वत पर सेनाक बड़ा भारी समूहक संग उतरलाह। पर्वत केर एक गोट खूब ऊँचगर आ परम रमणीय समतल आ विशेष रूप सँ उज्ज्वल शिखर देखिकय – ताहि ठाम लक्ष्मणजी गाछक कोमल-कोमल पत्ता सब आ सुन्दर रामचरितमानस मोतीः सुबेल पर श्री रामजीक झाँकी आर चंद्रोदय वर्णन

रामचरितमानस मोतीः रावण केँ मन्दोदरी द्वारा बुझेनाय, रावण-प्रहस्त संवाद

स्वाध्याय – प्रवीण नारायण चौधरी रामचरितमानस मोती रावण केँ मन्दोदरी द्वारा बुझेनाय, रावण-प्रहस्त संवाद १. रावण केँ जखन ई खबरि लगलैक जे श्री रामजी समुद्र पर सेतुबन्ध बनबा लेलनि आ लंकाक सीमा पर आबि गेलाह त ओ घोर विस्मित होइत स्वतः बाजि उठैछ – वननिधि, नीरनिधि, जलधि, सिंधु, वारीश, तोयनिधि, कंपति, उदधि, पयोधि, नदीश केँ रामचरितमानस मोतीः रावण केँ मन्दोदरी द्वारा बुझेनाय, रावण-प्रहस्त संवाद

सीता आ हम

सब सँ पहिने ‘सीता’ एक अवतारी नारी रहथि से मन सँ कनिकाल लेल बगल मे राखू। आर, एकदम अपनहि जीवन जेकाँ सब कियो, नारी हो या पुरुष, सब कियो हुनकर जीवन सँ अपन जीवन केँ मिलाउ।   चलू पुनौराधाम। महाराजा (पिता, जनक) खेत जोतय गेलाह। महाराजा ई अभिमान छोड़िकय गेलाह जे हम राजा छी, हमरा सीता आ हम

रामचरितमानस मोतीः श्री रामजीक सेना सहित समुद्र पार उतरब, सुबेल पर्वत पर निवास, रावणक व्याकुलता

स्वाध्याय – प्रवीण नारायण चौधरी रामचरितमानस मोती श्री रामजीक सेना सहित समुद्र पार उतरब, सुबेल पर्वत पर निवास, रावणक व्याकुलता १. सेतुबन्ध पर बहुते भीड़ भ’ गेलैक, ताहि सँ किछु बानर सब आकाश मार्ग सँ उड़य लागल आ दोसर कतेको रास जलचर जीव सब पर चढ़ि-चढ़ि ओहि पार जा रहल अछि। कृपालु रघुनाथजी (तथा लक्ष्मणजी) रामचरितमानस मोतीः श्री रामजीक सेना सहित समुद्र पार उतरब, सुबेल पर्वत पर निवास, रावणक व्याकुलता

रामचरितमानस मोतीः नल-नील द्वारा पुल निर्माण, श्री रामजी द्वारा श्री रामेश्वर केर स्थापना

स्वाध्याय – प्रवीण नारायण चौधरी रामचरितमानस मोती नल-नील द्वारा पुल निर्माण, श्री रामजी द्वारा श्री रामेश्वर केर स्थापना १. समुद्रक वचन सुनि प्रभु श्री रामजी मंत्री लोकनि केँ बजाकय कहलनि – “आब विलम्ब कियैक कय रहल छी? पुल तैयार करू जाहि सँ सेना पार उतरय।” जाम्बवान्‌ हाथ जोड़िकय कहलखिन – “हे सूर्यकुल के ध्वजास्वरूप (कीर्ति रामचरितमानस मोतीः नल-नील द्वारा पुल निर्माण, श्री रामजी द्वारा श्री रामेश्वर केर स्थापना

मैथिल आ वृहत् संयुक्त परिवार

  हम मैथिल जनसमुदाय केर एकटा बड पैघ खासियत छल, किछु-किछु एखनहुँ अछि – ओ ई अछि जे हम मैथिल वृहत् संयुक्त परिवार मे जिबय के परम्परा स्वतःस्फूर्त भाव सँ जिबैत छी। हम सब माता-पिता, काका-काकी, भैया-भौजी, बाबा-बाबी, मामा-मामी, नाना-नानी, मौसी-मौसा, पीसी-पीसा, मित्र-भाइ, गौआँ-अनगौआँ, इलाका-भाषा के लोक आदिक एतेक वृहत् सम्बन्ध केँ स्वाभाविक रूप सँ मैथिल आ वृहत् संयुक्त परिवार

शक्तिविहीन मिथिला – शक्तिहीन पुरुष

आइ मस्तिष्क मन्थन कय रहल अछि जे मिथिला केँ शिथिला बनय मे स्त्री शक्तिक भूमिका केहेन भ’ रहल अछि। जे मिथिलाक जीवनशैली मे गीतनाद आ मनन योग्य धर्मक व्यवहार प्रचलित अछि, ताहि ठाम वर्तमानक विपन्नता विद्रूप केना? एहि सवालक जवाब ताकैत एकटा व्यंग्य प्रसंग सँ शुरुआत करय छी। एकटा हास्य कवि बड नीक सँ कहैत शक्तिविहीन मिथिला – शक्तिहीन पुरुष

रामचरितमानसः लंकाकाण्ड – षष्ठ सोपान – मंगलाचरण

स्वाध्याय – प्रवीण नारायण चौधरी रामचरितमानस मोती लंकाकाण्डः षष्ठ सोपान- मंगलाचरण श्लोक : रामं कामारिसेव्यं भवभयहरणं कालमत्तेभसिंहं योगीन्द्रं ज्ञानगम्यं गुणनिधिमजितं निर्गुणं निर्विकारम्‌। मायातीतं सुरेशं खलवधनिरतं ब्रह्मवृन्दैकदेवं वन्दे कन्दावदातं सरसिजनयनं देवमुर्वीशरूपम्‌॥१॥ कामदेव केर शत्रु शिवजीक सेव्य, भव (जन्म-मृत्यु) केर भय केँ हरय वला, काल रूपी मतवाला हाथीक लेल सिंह केर समान, योगी सभक स्वामी (योगीश्वर), ज्ञान द्वारा रामचरितमानसः लंकाकाण्ड – षष्ठ सोपान – मंगलाचरण

रामचरितमानस मोतीः समुद्र पर श्री रामजीक क्रोध तथा समुद्रक विनती, श्री राम गुणगान केर महिमा

स्वाध्याय – प्रवीण नारायण चौधरी रामचरितमानस मोती समुद्र पर श्री रामजीक क्रोध तथा समुद्रक विनती, श्री राम गुणगान केर महिमा १. एम्हर तीन दिन बित गेल, लेकिन जड़ समुद्र विनय नहि मानलक। तखन श्री रामजी क्रोध सँ बजलाह – बिना भय के प्रीति नहि होइछ! हे लक्ष्मण! धनुष-बाण लाउ, हम अग्निबाण सँ समुद्र केँ सोखिये रामचरितमानस मोतीः समुद्र पर श्री रामजीक क्रोध तथा समुद्रक विनती, श्री राम गुणगान केर महिमा

रामचरितमानस मोतीः दूत द्वारा रावण केँ बुझेनाय आ लक्ष्मणजीक पत्र सौंपनाय

स्वाध्याय – प्रवीण नारायण चौधरी रामचरितमानस मोती दूत द्वारा रावण केँ बुझेनाय आ लक्ष्मणजीक पत्र सौंपनाय १. रावण दूत सँ कि सब खबरि अनलक से पुछि रहल अछि। पूर्वक अध्याय मे तपस्वी (श्री राम व लखनजी) बारे पुछलक आ ताहि सँ आगू पुछैत अछि – हुनका सब सँ तोरा भेटो भेलौक आ कि ओ सब रामचरितमानस मोतीः दूत द्वारा रावण केँ बुझेनाय आ लक्ष्मणजीक पत्र सौंपनाय