रामचरितमानस मोतीः दूत द्वारा रावण केँ बुझेनाय आ लक्ष्मणजीक पत्र सौंपनाय

स्वाध्याय

– प्रवीण नारायण चौधरी

रामचरितमानस मोती

दूत द्वारा रावण केँ बुझेनाय आ लक्ष्मणजीक पत्र सौंपनाय

१. रावण दूत सँ कि सब खबरि अनलक से पुछि रहल अछि। पूर्वक अध्याय मे तपस्वी (श्री राम व लखनजी) बारे पुछलक आ ताहि सँ आगू पुछैत अछि – हुनका सब सँ तोरा भेटो भेलौक आ कि ओ सब हमर सुयश सुनियेकय घुरि गेलाह? शत्रु सेनाक तेज आ बल बतबैत कियैक नहि छँ? तोहर चित्त बड़ा चौंकल जेकाँ लागि रहल अछि। कि बात छैक?

२. दूत कहलकैक – हे नाथ! अपने जेना कृपा कयकेँ पुछलहुँ हँ, तहिना क्रोध छोड़िकय हमर कहब सेहो मानू, हमर बात पर विश्वास करू।

जखन अहाँक छोट भाइ विभीषण श्री रामजी सँ जाकय मिलि गेल, तखन ओकर पहुँचिते श्री रामजी ओकरा राजतिलक लगा देलखिन।

हम रावण के दूत छी, ई कान सँ सुनिते बानर सब हमरा बान्हिकय बड कष्ट देलक, एतय तक जे ओ सब हमर नाक-कान काटय लागल। श्री रामजीक शप्पत देला पर कोहुना हमरा छोड़लक।

हे नाथ! अपने श्री रामजीक सेनाक बारे मे पुछलहुँ, से ओ त सौ करोड़ मुंह सँ पर्यन्त वर्णन नहि कयल जा सकैत अछि। अनेकों रंगक भालु आ बानर केर सेना छन्हि, जे भयंकर मुंह वला, विशाल शरीर वला आ बहुत भयानक देखाइत अछि। ओ जे नगर केँ जरेने छल आ अहाँक पुत्र अक्षय कुमार केँ मारलक, ओकर बल त सब बानर सँ कम अछि। असंख्य नामवला बड़ा कठोर आर भयंकर योद्धा सब अछि। ओहि मे असंख्य हाथी केर बल छैक आ सब बड विशाल अछि। द्विविद, मयंद, नील, नल, अंगद, गद, विकटास्य, दधिमुख, केसरी, निशठ, शठ आर जाम्बवान्‌ ई सब बड भारी बल केर राशि सब अछि।

ई सब बानर बल मे सुग्रीवक समान अछि आर एकरा सब जेहेन एक-दू टा नहि, करोड़ों सैन्यबल श्री रामक संग छन्हि, ओतेक केँ गानिये के सकैछ! श्री रामजीक कृपा सँ ओकरा सब मे अतुलनीय बल छैक। ओ तीनू लोक केँ तृण समान (तुच्छ) बुझैत अछि।

हे दशग्रीव! हम कान सँ एना सुनलहुँ जे अठारह पद्म त अकेले बानरक सेनापति सब अछि। हे नाथ! ओहि सेना मे एहेन कोनो बानर नहि अछि जे अहाँ केँ रण मे नहि जिति सकय। सब के सब अत्यन्त क्रोधित भ’ हाथ मलैत रहैत अछि, बस श्री रघुनाथजी ओकरा सब केँ आज्ञा नहि दैत छथिन। “हम सब मछरी आ साँप सहित समुद्र केँ सोखि लेब। नहि त बड़का-बड़का पर्वत सँ ओकरा पाटि देब। आर, रावण केँ मसलिकय धूल मे मिला देब।” सब बानर एहने वचन सब बाजि रहल छल। सब सहजहि निडर अछि। एहि तरहें गरजैत आ डपटैत अछि मानू लंके केँ निगलि लेबय चाहैत हो।

सब बानर-भालु सहजहि शूरवीर सब अछि फेर ओकरा माथ पर प्रभु (सर्वेश्वर) श्री रामजी छथि। हे रावण! ओ सब संग्राम मे करोड़ों काल तक केँ जिति सकैत अछि।

श्री रामचंद्रजीक तेज (सामर्थ्य), बल आ बुद्धि केर अधिकता केँ लाखों शेष तक नहि गाबि सकैत छथि। ओ एक्के बाण सँ सैकड़ों समुद्र केँ सोखि सकैत छथि, मुदा नीति मे निपुण श्री रामजी, नीतिक रक्षा लेल अहाँक भाइ सँ उपाय पुछलनि। अपनेक भाइ केर वचन सुनिकय ओ समुद्र सँ बाट माँगि रहल छथि, हुनकर मोन मे कृपा बहुत छन्हि ताहि सँ ओ समुद्र केँ सोखबाक काज नहि कय रहल छथि।

३. दूत केर ई वचन सुनिते रावण खूब हँसल आ बाजल – जखनहि एहेन बुद्धि छैक तखनहि न बानर सब केँ सहायक बनौलक अछि! स्वाभाविके डरपोक विभीषणक वचन केँ प्रमाण मानिकय ओ समुद्र संग बालहठ ठनलक अछि। अरे मूर्ख! झूठक बड़ाई कियैक करैत छँ? बस, हमरा शत्रु (राम) केर बल आ बुद्धि केर थाह भेटि गेल। जेकर सचिव विभीषण जेहेन डरपोक अछि, ओकरा लेल विजय विभूति एहि जग मे कतय सम्भव होयत!

४. दुष्ट रावणक अहंकारी वचन सुनि दूत केँ तामस चढ़ि गेलैक। उचित समय बुझि ओ लक्ष्मणजीक देल पत्र निकाललक आ बाजल – श्री रामजीक छोट भाइ लक्ष्मण ई पत्र देलनि अछि। हे नाथ! एकर वाचन करबाकय छाती ठंढा करू।

५. रावण हँसिकय ओ बायाँ हाथ सँ लेलक आ मंत्री केँ बजबाकय ओ मूर्ख ओकरा पढ़य लागल। पत्र मे लिखल छलैक – “अरे मूर्ख! केवल बाते टा सँ मोन केँ रिझाकय अपन कुल केँ नष्ट-भ्रष्ट जुनि कर। श्री रामजी सँ विरोध कयकेँ तूँ विष्णु, ब्रह्मा आ महेश केर शरण गेलोपर नहि बचमें। या त अभिमान छोड़िकय अपन छोट भाइ विभीषण जेकाँ प्रभुक चरण कमल केर भ्रमर बनि जो। अथवा, रे दुष्ट! श्री रामजीक बाणरूपी अग्नि मे परिवार सहित फतिंगा बनि जो, दुनू मे सँ जे नीक लागउ से कर।”

६. पत्र सुनिते रावण मोन मे त खूब भयभीत भेल, लेकिन उपर सँ हँसिकय ओ सब केँ सुनाकय कहय लागल – जेना कियो पृथ्वी पर पड़ल अवस्था मे आकाश केँ पकड़बाक चेष्टा करैत अछि, तहिना ई छोटका तपस्वी (लक्ष्मण) वाग्विलास करैत अछि, डींग हँकैत अछि।

७. शुक (दूत) कहलकैक – हे नाथ! अभिमानी स्वभाव केँ छोड़िकय एहि पत्र मे लिखल सब बात केँ सत्य बुझू। क्रोध छोड़िकय हमर वचन सुनू। हे नाथ! श्री रामजी सँ वैर त्यागि दिअ’। यद्यपि श्री रघुवीर समस्त लोकक स्वामी छथि, लेकिन हुनकर स्वभाव अत्यन्ते कोमल छन्हि। मिलिते देरी प्रभु अहाँ उपर कृपा करता आर अहाँक एकहु टा अपराध ओ हृदय मे नहि रखता। जानकीजी श्री रघुनाथजी केँ दय दिऔन। हे प्रभु! एतेक कहब हमर मानि लिअ’।

८. जखन ओ दूत जानकीजी केँ देबाक लेल कहलक, तखन दुष्ट रावण ओकरो लात मारलक। ओहो विभीषणहि जेकाँ चरण मे सिर नमाकय ओतहि लेल चलल जतय कृपासागर श्री रघुनाथजी रहथि। प्रणाम कयकेँ ओ अपन कथा सुनौलक आर श्री रामजीक कृपा स अपन गति (मुनिक स्वरूप) पाबि गेल।

९. शिवजी कहैत छथि – हे भवानी! ओ ज्ञानी मुनि छल, अगस्त्य ऋषिक शाप सँ राक्षस भ’ गेल छल। बेर-बेर श्री रामजीक चरण केर वन्दना कयकेँ ओ मुनि अपन आश्रम केँ चलि गेल।

हरिः हरः!!