रामचरितमानस मोतीः उत्तरकाण्ड मंगलाचरण
स्वाध्याय – प्रवीण नारायण चौधरी रामचरितमानस मोती सप्तम सोपान-मंगलाचरण श्लोक : केकीकण्ठाभनीलं सुरवरविलसद्विप्रपादाब्जचिह्नं शोभाढ्यं पीतवस्त्रं सरसिजनयनं सर्वदा सुप्रसन्नम्। पाणौ नाराचचापं कपिनिकरयुतं बन्धुना सेव्यमानं। नौमीड्यं जानकीशं रघुवरमनिशं पुष्पकारूढरामम्॥१। मोर केर कण्ठक आभा जेहेन (हरिताभ) नीलवर्ण, देवता लोकनि मे श्रेष्ठ, ब्राह्मण (भृगुजी) केर चरणकमल केर चिह्न सँ सुशोभित, शोभा सँ पूर्ण, पीताम्बरधारी, कमल नेत्र, सदा परम प्रसन्न, … रामचरितमानस मोतीः उत्तरकाण्ड मंगलाचरण



