विधवा नारी केर विभिन्न अधिकार पर बंधनक औचित्य की?
विचार – डा. लीना चौधरी विधवा ई शब्द अपनेआप मे सब किछ कहि दैत अछि। स्त्रीक स्थिति मात्र सांस लैत शरीर केर रहि जाइत छैक। जीवन सँ रंग, स्वाद, सम्मान सब छीन लैछ ई समाज ओहि बेचारी केर। ओकरा ओहि बात केर सजा देल जाइत छैक जाहि मे ओकर कोनो हाथ नहि होइछ। ई समाज ईहो … विधवा नारी केर विभिन्न अधिकार पर बंधनक औचित्य की?








