घर-घर केर कथा – एहनो होइत छैक सासु-पुतोहु

कथा

– डा. लीना चौधरी

गर्मी के छुट्टी छल। आमक मौसम छल। सब बच्चा क लक कनियाँ गांम ऐल छलीह। आंगन पैघ छलैन । चारिटा भइयारी रहइ छला। जखन हिनकर सभक मुखिया नइ रहला तखन सब के सोच छल जै आब ई सब बिखइर जैत । परंच मां और कनिया के सहयोग से बड़का बेटा बहुत नीक से सब के संभाइल लेला। अही बात से कीछ लोग के आंनद भेल त कीछ के तकलीफ। जेकर जेहेन स्वभाव!

आंगन में सब के ई बात बहुत अखरइ की दूनू सास पुतोहू में कखनो लड़ाई त दूर बाजाबाजियो नहि होइत अइछ। पुतोहु जे कहि देत सासु तुरंत हां कहि देथिन। आ सास जाहि काज लेल मना क देथिन पुतोहु ओ काज नइ करथीन। सब ठीक चलि रहल छल। आब आर्थिक मजबूती के कारण मां बेटा के सलाह से गाम में और जमीन सेहो खरीद रहल छलाह। ई बात बड़का बाबा के बड़की बेटी जे बाल विधवा छलीह आ नैहर में ही रहैत छलीह हुनका नीक नइ लाइग रहल छलैन। अपन परिवार केर कर्ता धर्ता ओहे छलीह। ओ अपन काकी से उम्र में बराबर छलीह। दादी दादा के दोसर कनियाँ छलखिन्ह त सब उनका कनियाँ काकी या दादी कहैन। जे माल जाल के देखभाल करइ छल ओकर एकटा जमीन क टुकड़ा छल। वो टुकड़ा पर बड़की दीदी के नजर बहुत दिन से छलैन। ओहि टुकड़ा से सटल हमर सभक जमीन छल। दीदी जानय छलखिन्ह जे एखन जीवछा के पाइ के जरूरत छैक। ओ कोशिश में छलखिन्ह जे ओकर मजबूरी के फायदा उठा कम पाइ में ओ लिखा ली।

ओहि दिन दादी अपन खेत पर बैंगन तोड़बा रहल छलखिन्ह तखने जीवछा सरपंच जी के संग दादी लग पहुंचि गेल। सरंपच जी आ जीवछा दादी के जमीन खरीद लेव लेल कहला। दादी पहिने ओकरा समझावय लगली की बेच नइ जमीन बरु भरना राखि ले। जहिया पाइ हेतौक तहिया छोड़ा लिहें। लेकिन ओ ओहि जमीन केँ नइ राखय चाहैत छलय कियैक त जमीन बहुत पैघो नहि छल आ बाकी जमीन से बहुत हंटिकय छल जाहि सँ देखभाल मे सेहो दिक्कत होइ छल ओकरा। सब बात सुनिकय दादी खरीदबाक लेल तैयार भ गेलखिन्ह। ओकरा तखन किछु पाइ केर दरकार छल त दादी कहलखिन्ह जे जो कनियां के कहिहनु कि कनियां काकी कहला हमरा पाइ देबय लेल। ओ अंगना आबि मां सँ पाइ मांगलक आर मां पाइ लाबय अंदर गेली त दीदी ओकरा ओइ जमीन लेल पुछ लगली ताहि पर जीवछा कही देलकैन की हम जमीन बेच देलिए कनियां काकी केँ, ओकरे पाइ नवकी कनियां सँ लेबय ऐल छीयैक।

आब दीदी केँ बहुत पित्त चढ़ि गेलनि आ ओ तखने सँ मां केँ किछ-किछ बाजय लगलीह। मां आंगन सँ उठि घर मे चलि गेलखिन्ह। ओहि दिन त बात ओतइ खत्म भ गेल। धरि दोसर दिन दीदी भोरे सँ बहाना खोजय लगलीह दादी सँ लड़य लेल। दस बजैत-बजैत दीदी लड़ाई ठानि लेलखिन्ह। दादी केँ बुझल छलैन हुनकर तामश त ओ टालइत रहलखिन्ह। जखन दीदी देखलखिन की हुनकर कौनो बात केर जबाब नइ द रहल छैन त ओ दादी के कमजोरी बड़का बेटा के गरियाबय लगली आ शाप देबय लगली। आब दादी केँ बरदाश्त नहि भेलनि। हुनकर बड़का बेटा हुनकर सब किछु छलैन। ओकरा शाप सुनि तिलमिला कय ओहो शाप देबय लगलखिन हुनकर परिवार के। ई देखि मां घर सँ आबि दादी केँ हाथ पकड़ि आंगन सँ बाहर लय गेलखिन्ह आ ठेल के अपन मसियौत बहिन जे दोसर आंगन मे बियाहल छलखिन्ह तेकरा ओतय भेज देलखिन्ह।

आब दादी तामश मे मां केँ कहथिन जे हमरा किया निकाललहुँ, ओ हमर बेटा केँ शरापैत अछि। मां कहलखिन्ह हिनकर बेटा त हमरे घरबला छथिन। हुनका कहने किछु नहि हेतइ। ई जानैत छथिन जे ओ जानिकय ई सब कय रहल छथिन त किया ई जबाब दइ छथिन। दादी तामश मे आंगन छोड़ि चइल त गेल पर मां सँ तमशा गेली। आब आगंन में सब केँ इंतजार छल की जखन आँगन ऐती तखन पुतोहु सँ धमगिजर हेतनि।  मां आराम सँ घरक काज करय लगलीह। दादी दोसर आंगन मे बैसि गप सप करय लगलीह त तामश शांत भ गेलैन। तखन हमर मौसी केँ कहलखिन्ह जे अहां के बहिन खेने नहि हैत आइ हमरा बिना। हम त खा लेलऊं अहां ओतय। जाइत छी माछ खरीद आनैत छी। कनियां केँ नीक लागैत छैक। दुएक घंटा बाद सब आंगन में देखलखिन कनियां काकी रंग बिरंग के माछ नेने आंगन आबि रहल छथि आ अपन कनियां केँ दुलार सँ कहि रहल छथि … कनियां बड़का माछ तइर लियऽ आ पहिने तरल बला मन भइर खा लियऽ तखन छोटका झोरा लेब । आ हमरा लेल चिंता नइ करब, हम दही आम आ रोटी खा लेब, तरकारी के जरूरत नहि अछि।