नीकक संग सँ नीक आ खराबक संग सँ खराबे भेटत

स्वाध्याय

– प्रवीण नारायण चौधरी

श्रीतुलसीदास रचित रामचरितमानस मे गूढ सँ गूढतम बात बड़ा सहज परिभाषा – सोदाहरण बुझायल गेल अछि। बेसी पांडित्यपूर्ण भाषा मे कोनो तत्त्वक निरूपण जनसामान्य केर रुचि मे नहि आबि पबैत छैक। जनसामान्य सदिखन कमे मे बेसी ग्रहण करबाक लौल मे रहैत अछि। गम्भीरतापूर्वक कोनो गूढ बात केँ बेर-बेर मनन करब, पढब, बुझब – ई सब हर व्यक्ति सँ संभव नहि छैक। हम सब अपना-आप सँ सेहो एहि मादे प्रश्न पूछि सकैत छी। हमरो बेसीकाल दिमाग स्थिर राखि पेनाय कठिन बुझाइत अछि। तखन हमरा सँ कतेको लोक बेसी हड़बड़ायल रहैत छथि। एहेन कम समय मे बेसी तत्त्व केँ ग्रहण करबाक लेल आतुर व्यक्ति लेल रामचरितमानस अमृतमयी वाणी सँ भरल खजाना सिद्ध भेल अछि।

आउ, रामचरितमानसरूपी महासागर सँ चुनल आजुक किछु मोती पर एक नजरि दीः

लखि सुबेष जग बंचक जेऊ। बेष प्रताप पूजिअहिं तेऊ॥
उघरहिं अंत न होइ निबाहू। कालनेमि जिमि रावन राहू॥३॥
जे (वेषधारी) ठग अछि, ओकरो नीक (साधु जेहेन) वेष बनौने देखिकय वेषक प्रताप सँ जगत पूजैत छैक, मुदा एक न एक दिन ओ देखार भ’ जाइत अछि, अंत धरि ओकर कपट नहि निमहैत छैक, जेना कालनेमि, रावण आर राहु केर हाल भेलैक।
किएहुँ कुबेषु साधु सनमानू। जिमि जग जामवंत हनुमानू॥
हानि कुसंग सुसंगति लाहू। लोकहुँ बेद बिदित सब काहू॥४॥
खराब वेष बना लेलापर सेहो साधुक सम्माने होइत छैक, जेना जगत मे जाम्बवान्‌ और हनुमान्‌जी केर भेलनि। खराब संग सँ हानि और नीक संग सँ लाभ होइत छैक, ई बात लोक और वेद मे अछि और सब कियो एकरा जनैत अछि।
हरिः हरः!!