गीताः स्वधर्म मे मरब नीक, परधर्म भय देमयवला
गीताक तेसर बेरुक स्वाध्याय (निरंतरता मे – प्रकृति अपन गुण अनुरूप चेष्टा करबे करत, ताहि अनुरूपे सब केँ कर्म करहे टा पड़ैत छैक, फेर एहि मे निग्रह कि कय सकत… गीताक तेसर अध्यायक ३१-३३ श्लोक उपरान्त) इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ। तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ॥ ३४॥ इन्द्रिय इन्द्रिय केर अर्थमे (प्रत्येक इन्द्रिय केर प्रत्येक विषयमे) मनुष्य केँ … गीताः स्वधर्म मे मरब नीक, परधर्म भय देमयवला








