गरीब पिताक बेटी हम छलहुँ – दहेजक भेंट चढल छी हम
दहेज मुक्त मिथिला केँ समर्पित एक कविता – साभार अरविन्द झा केर संकलन, अनुवादः प्रवीण नारायण चौधरी एक कवि नदीक कछेर पर ठाढ! तखनहि बहैत देखैछ एगो लड़कीक लाश… नदी मे हेलैत जा रहल छल। तऽ ओ कवि ओहि लाश सँ पूछैछ —- के छी अहाँ हे सुकुमारी, बहि रहल छी नदीक जल मे ? कियो तऽ होयत … गरीब पिताक बेटी हम छलहुँ – दहेजक भेंट चढल छी हम









