अर्थक महिमा अपरम्पार
अर्थक महिमा अपरंपार – मनीष झा, द्वालख (मधुबनी) अर्थक जुग छै, अर्थ सँ सब किछु अर्थ’हि सँ सबहक पहिचान बिनु अर्थक सब अर्थहीन अछि सऊँसे अर्थहि के गुणगान ॥ अर्थ पुरोहित, अर्थ ज्योतिषी अर्थ’हि सँ बिहुँसै चिनबार जँ अछि अर्थ तँ सउँसे जय – जय नहि त’ जग भरि सँ उपजै धिक्कार॥ प्रतिभा लए की … अर्थक महिमा अपरम्पार









