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प्रवीण नारायण चौधरी

औनलाइन योग शिविर – दहेज मुक्त मिथिला समूह तरफ सँ योगगुरु काजल चौधरीक योगदान

करू योग – रहू निरोग (सन्ध्या ६ः३० बजे सँ ७ः३० बजेक बैच मे ज्वाइन करू, कमेन्ट मे अपन नाम लिखाउ) दहेज मुक्त मिथिला समूह पर अपने समस्त सदस्य लोकनि लेल एक बेर फेर योगगुरु काजल चौधरीजी अपन अमूल्य योगदान लेल तैयार छथि। अपने सब २५ आदमी प्लस जँ भ’ जायब त आदरणीया काजलजी सन्ध्याकालीन ६ः३० औनलाइन योग शिविर – दहेज मुक्त मिथिला समूह तरफ सँ योगगुरु काजल चौधरीक योगदान

मनुष्य केँ दोसरक मन पर पकड़ नहि रहैछ

ताहि दिनक बात आइयो टटके अछि   आइ अचानक भेटल २००७ अक्टूबर अंक के ‘विजडम’ – हमर युवाकाल सँ हाल तक केर अति प्रिय मैगजीन (अन्तर्राष्ट्रीय अंग्रेजी पत्रिका)। करीब १६ साल बाद जखन पन्ना उल्टेलहुँ त पुनः प्रस्तुत भ’ आयल एक अति सुन्दर सन्देशमूलक लेख – जेम्स एलन के। हम चाहब जे ई मैथिली व मनुष्य केँ दोसरक मन पर पकड़ नहि रहैछ

मनुष्यक उमेर केर खिस्सा

खिस्सा – प्रवीण नारायण चौधरी ओ कथा जे सुनने रही   एकटा खिस्सा मे कहल गेल छैक जे मनुष्यक उमेर भगवान् मात्र २० वर्ष देलखिन। गदहा केँ ५० वर्ष। बानर केँ ३० वर्ष। कुकूर केँ सेहो २० वर्ष। भगवान् सभक जीवन मे केहेन भोग भेटतैक सेहो वर्णन कय देलखिन। मनुष्य केँ कहलखिन जे तोरा सब मनुष्यक उमेर केर खिस्सा

रामचरितमानस मोतीः सुग्रीव केर दुःख सुनायब, बालि बध केर प्रतिज्ञा, श्री रामजीक मित्र लक्षण वर्णन

स्वाध्याय – प्रवीण नारायण चौधरी रामचरितमानस मोती सुग्रीव केर दुःख सुनायब, बालि बध केर प्रतिज्ञा, श्री रामजीक मित्र लक्षण वर्णन १. हनुमान्‌जी दुनू दिशक सबटा कथा सुना अग्नि केँ साक्षी राखि आपस मे दृढ़ताक संग प्रीति जोड़ि देलनि। यानि अग्नि केँ साक्षी राखि प्रतिज्ञापूर्वक हुनका लोकनिक मैत्री करबा देलनि। दुनू हृदय सँ प्रीति कयलनि, कनिकबो रामचरितमानस मोतीः सुग्रीव केर दुःख सुनायब, बालि बध केर प्रतिज्ञा, श्री रामजीक मित्र लक्षण वर्णन

सन्तान आ जनक – एक छोट परञ्च महत्वपूर्ण दर्शन

सन्तान आ जनक   जखन-जखन चिन्तन करब आ स्वयं पर केन्द्रित होयब त पता लागत जे हम-अहाँ वास्तव मे के छी। के छी हम-अहाँ? हम प्रवीण, हम वन्दना, हम पंकज, हम कल्पना, हम रूबी त हम रंजना… ई ‘हम आ विभिन्न नाम’ यथार्थतः एहि सुन्दर संसारक सुन्दर सन्तान सब छी। सन्तान जँ अपन कर्तव्य बुझि सन्तान आ जनक – एक छोट परञ्च महत्वपूर्ण दर्शन

मैथिली धारावाहिकः हम आबि रहल छी भाग ११ आ १२

मैथिली उपन्यास ‘हम आबि रहल छी’ पर आधारित धारावाहिक लेख – रबीन्द्र नारायण मिश्र हम आबि रहल छी – भाग एगारह आ बारह ११. गंगा कतेको सालक बाद माए-बाबूक संगे अपन गाम पहुँचल । गामक संपूर्ण परिदृश्य बदलि गेल रहैक । सभसँ आश्चर्य ओकरा ई देखि कए लगलैक जे मालिकक कोठा ढनमना कए खसि रहल मैथिली धारावाहिकः हम आबि रहल छी भाग ११ आ १२

रामचरितमानस मोतीः श्री राम संग श्री हनुमान केर भेंट आ सुग्रीव सँ मित्रता

स्वाध्याय – प्रवीण नारायण चौधरी रामचरितमानस मोती श्री राम संग श्री हनुमान केर भेंट आ सुग्रीव सँ मित्रता १. श्री रघुनाथजी आगू बढ़लाह। ऋष्यमूक पर्वत नजदीक आबि गेल। ऋष्यमूक पर्वत पर मंत्री लोकनिक संग सुग्रीव रहैत छलथि। अतुलनीय बल केर सीमा श्री रामचंद्रजी आर लक्ष्मणजी केँ अबैत देखि सुग्रीव बहुते डरा गेलाह, डराइते ओ बजलाह रामचरितमानस मोतीः श्री राम संग श्री हनुमान केर भेंट आ सुग्रीव सँ मित्रता

व्यंग्य प्रसंगः सम्मान आ सम्मानित

कथा – प्रवीण नारायण चौधरी व्यंग्य प्रसंगः सम्मान आ सम्मानित भारतक लोकप्रिय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र भाइ मोदी सेहो ओतेक सम्मान पत्र प्राप्त नहि कयलनि जतेक हमर भाइ-बहिन/सखी-सखा सब पाबि गेलथि आ पेबाक क्रम मे छथि। हमर भैयाजी अमेरिकावला, गायिका बहिन दिल्लीवाली, सखी जनकपुरवाली, दीदी लहानवाली, साइर इटहरीवाली आ साढ़ू चम्पारणवला – हिनका सब लग सम्मान व्यंग्य प्रसंगः सम्मान आ सम्मानित

रामचरितमानस मोतीः किष्किन्धाकाण्ड मंगलाचरण

स्वाध्याय – प्रवीण नारायण चौधरी रामचरितमानस मोती मंगलाचरण श्लोक : कुन्देन्दीवरसुन्दरावतिबलौ विज्ञानधामावुभौ शोभाढ्यौ वरधन्विनौ श्रुतिनुतौ गोविप्रवृन्दप्रियौ। मायामानुषरूपिणौ रघुवरौ सद्धर्मवर्मौ हितौ सीतान्वेषणतत्परौ पथिगतौ भक्तिप्रदौ तौ हि नः ॥१॥ कुन्दपुष्प आर नीलकमल समान सुन्दर गौर एवं श्यामवर्ण, अत्यन्त बलवान्‌, विज्ञान केर धाम, शोभा संपन्न, श्रेष्ठ धनुर्धर, वेद द्वारा वन्दित, गौ एवं ब्राह्मण लोकनिक समूह केर प्रिय (अथवा रामचरितमानस मोतीः किष्किन्धाकाण्ड मंगलाचरण

मिथिलाक मूल संस्कृति मे ह्रास आ समाधान पर दृष्टि

विचार – संजय कुमार झा प्रवासी मैथिल जे सभ गाम-घर छोड़ला, नौकरी चाकरी के क्रम मे शहर गेला, ओ सबटा अपना केँ शहरी बुझय लगलाह। मैथिल सभ तेज़ त होयते छथि, शहर गेला सँ आरो खूब तेजी सँ दोसरक नकल करय मे अव्वल बनि गेलाह। कनियाँ सभ जे गेलखिन शहर मे तैं जे बच्चा सभक मिथिलाक मूल संस्कृति मे ह्रास आ समाधान पर दृष्टि