मनुष्य केँ दोसरक मन पर पकड़ नहि रहैछ

ताहि दिनक बात आइयो टटके अछि
 
आइ अचानक भेटल २००७ अक्टूबर अंक के ‘विजडम’ – हमर युवाकाल सँ हाल तक केर अति प्रिय मैगजीन (अन्तर्राष्ट्रीय अंग्रेजी पत्रिका)। करीब १६ साल बाद जखन पन्ना उल्टेलहुँ त पुनः प्रस्तुत भ’ आयल एक अति सुन्दर सन्देशमूलक लेख – जेम्स एलन के। हम चाहब जे ई मैथिली व अंग्रेजी दुनू मे अपने सब लग प्रस्तुत करी। पहिने अंग्रेजी –
 
Man Has No Power Over Others’ Minds
 
– James Allen
 
Within the area of his own mind man has all power, but in respect of others’ minds his power is extremely limited. He can command his own mind, but he cannot command the minds of others. He can choose what he shall think.
 
Therefore, a man can reform hiw own mind. If not, he cannot avoid the results of his own thoughts and actions. It will be in the nature of his thought and action which produces painful or blissful result.
 
Knowing that a man can think and do as chooses and that all others have the same liberty, a man should have consideration for others’ thoughts. To think and act, ignorin the consideration for others is violabtion of others’ liberty. One must harmonize oneself with others’ minds, acknowledging their freedom of choice.
 
Selfishness and oppression from the spiritual standpoint are one and the same thing. Every selfish thought or act is a manifestation of egoism and is an action of unfairness. It is met with suffering and defeat.
 
The unsefish man is he who, abondoning the “I” as the source of judgement, refrains from encroachment upon the boundless freedom of others, realizing the right to their choice.
 
आब एकर मैथिली रूप राखि रहल छीः
मनुष्य केँ दोसरक दिमाग पर कोनो शक्ति काज नहि करैछ
– जेम्स एलन
अपन मोनक भीतर क्षेत्र मे मनुष्यक पास सबटा शक्ति होइत छैक, मुदा दोसरक मोन पर ओकर शक्ति अत्यन्त सीमित होइत छैक । ओ अपना मोन केँ आज्ञा दय सकैत अछि, मुदा दोसरक मोन केँ ओ आज्ञा नहि दय सकैत अछि। ओ जे सोचत से चुनि सकैत अछि।
तेँ, मनुष्य अपन मोन मे सुधार कय सकैत अछि । जँ नहि, तँ ओ अपन विचार आ कर्मक परिणाम सँ नहि बचि सकैत अछि । ई ओकर विचार आ कर्महि केर स्वभाव सँ होयत जे कष्टदायक वा आनन्ददायक परिणाम उत्पन्न करैत अछि ।
ई जानि लिअ जे मनुष्य अपन पसन्दहि अनुसार सोचि सकैत अछि आ अपने चुनल कर्म करैत अछि आर एहिना करबाक स्वतंत्रता दोसरो सभ केँ छैक, आदमी केँ दोसरक विचार प्रति यैह विचार हेबाक चाही । सोचय आ करय लेल, दोसर लेल विचार केर अनदेखी करब दोसरक स्वतंत्रताक हनन होइछ। दोसरक मोन सँ सामंजस्य ओकर पसिनक स्वतंत्रता केँ आत्मसात करैत बनेनाय जरूरी होइत छैक ।
आध्यात्मिक दृष्टिकोण सँ स्वार्थ आ अत्याचार एक्के बात थिक । हर स्वार्थी विचार या कर्म अहंकारक प्रकटीकरण थिकैक आर से अन्यायपूर्ण कर्म थिकैक । एहि सँ दुःख आ हारि भेटनाय सुनिश्चित होइत छैक।
निःस्वार्थ आदमी ओ भेल जे “हम” (स्वयं मात्र) केँ न्याय केर स्रोतक रूप मे परित्याग करय, दोसरक असीम स्वतंत्रता केँ अतिक्रमण करय सँ परहेज दोसरक पसिन करबाक अधिकार बुझैत अवश्य करय ।
ओ बुझैत अछि जे ओकर कर्तव्य दोसरक प्रति सही व्यवहार करब होइत छैक ।
अस्तु! आशा करैत छी जे ई लेख जाहि पर हम करीब १ घन्टा सँ बेर-बेर पठन-मनन करैत रहलहुँ अछि आ अपन व्यवहार आ बुद्धि पर समीक्षा करैत रहलहुँ, तहिना पाठक वर्ग मे सेहो ई छोट लेकिन अत्यन्त महत्वपूर्ण लेख उचित प्रभाव छोड़त। पढ़नाय एहि लेल जरूरी होइत छैक। चाहे अहाँक उमेर कतबू कियैक न भ’ गेल, पढ़नाय नहि छोड़ू।
हरिः हरः!!