कि हेतय आगू?
विचार-मंथनः प्रवीण नारायण चौधरी किछु मोनक बात…. आइ कतेको दिन सँ आन्तरिक उद्वेलित मन बहुत किछु चाहियो कय लिखय नहि चाहैत अछि…. पता नहि एहेन स्थिति केँ कोन संज्ञा दी! लेकिन अजीब हाल अछि। कतेको बेर अपना केँ बुझबैत छी, बौंसैत छी, खेलबैत छी, हँसबैत छी…. लेकिन घुरि-फिरिकय वैह अजीब अनिश्चितता सँ भरल भविष्य … कि हेतय आगू?









