अशोक कुमार सहनीक मैथिली गजलः सरल वार्णिक बहर – १६
।। गजल ।। नहिं एलै राति निन्द बस लिखैत गेलहुँ अपन दर्द कागज पऽ निखारैत गेलहुँ रही जमिनपऽ कोना छुबि सकब अकाश बस तरेगन बिच, चाँद निहारैत गेलहुँ कमजोर रहितौँ तऽ कहिया टूटि जैतहुँ छी नरम ठाढि सभ आगु झुकैत गेलहुँ ओ जहिना-जहिना बदलैत गेलै रस्ता हम ई जीनगीकेँ ओहिना पिसैत गेलहुँ आयल अशोककें जीनगीमे हावा … अशोक कुमार सहनीक मैथिली गजलः सरल वार्णिक बहर – १६









