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मिथिलाक ग्रामीण भेग मे बौद्धिक चिन्तनः मैथिली लेल एमएलएफ गाम-गाम धरि

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विराटनगर, ९ अप्रैल २०२६ । मैथिली जिन्दाबाद !!

नेपालक धनुषा जिलाक परवाहा गाम मे युवा नाट्यकला परिषद् द्वारा दुइ दिवसीय लोक संस्कृति महोत्सवक आयोजन होमय जा रहल अछि । एहि महोत्सव मे मैथिली भाषा, साहित्य आ लोक संस्कृतिक संरक्षण, संवर्धन आ प्रवर्धनक उद्देश्य सँ विभिन्न तरहक प्रदर्शनीय प्रस्तुति कयल जायत । एहि मे मैथिली जिन्दाबादक सम्पादक प्रवीण नारायण चौधरी केँ सेहो मिथिला मे संस्कृति आ कर्मकाण्ड विषयक वक्ता रूप मे आमंत्रित कयल गेल अछि । आमंत्रण पर लिखल उद्गार (फेसबुक पोस्ट) केर उतार निम्न अछिः

आमंत्रण लेल हार्दिक आभार युवा नाट्यकला परिषद् – परवाहा (धनुषा, नेपाल) !

पत्र प्राप्त करैत बहुत हर्ष भेल । परवाहा गाम मे होबय जा रहल लोक संस्कृति उत्सव-२०८२ केर समाचार सेहो अत्यन्त विशिष्ट लागल ।

मैथिली भाषा-संस्कृति प्रति सजग समाज मूल क्षेत्र सँ पलायन भेल दुरावस्था के नहि जनैत अछि । मिथिलाक लोक लेल – भाषा-साहित्य व संस्कृतिक संरक्षण-संवर्धन-प्रवर्धन लेल मूल मिथिलाक्षेत्र विपन्न भ’ गेल अछि । तेहेन स्थिति मे पर्यन्त मैथिल लोक प्रवासक क्षेत्र सँ बौद्धिक चिन्तन करैत विभिन्न महत्वपूर्ण कार्य लगभग सवा सौ वर्ष सँ करैत आबि रहल छथि । बड कम लोक देखाइछ जे ग्रामीण क्षेत्र मे बौद्धिक चिन्तन आ कोनो महत्वपूर्ण कार्यक शुरुआत करैछ । एहेन स्थिति मे अहाँ लोकनि ‘युवा नाट्यकला परिषद्, परवाहा’ केर विगत चारि दशक केर योगदान केँ प्रणाम करैत मौलिक लोक – मौलिक क्षेत्र – मौलिक चिन्तन केर विषय मे हमरा आमंत्रित करब निश्चय हमरो गौरवबोध करौलक ।

हम निश्चित आयब । हमर जीवनक एकटा जरूरी अभीष्ट जनक-जानकीक मिथिलाक मूल रूप केँ जियाकय राखब आ एकरा एतबे जगजियार करैत रहब जे भूलल-भटकल मैथिल लोक पुनः अपन जैड़ केँ पकड़ि सकैथ । खासकय युवा पीढ़ी आ गाँव छोड़ि शहर दिश भागि रहलि बेटी-बहिन सब लेल हमर प्रयास बेसी होयत जे ओ सब आर नीक सँ बुझथि । अपन माटि-पानि सँ विरक्त नहि होइथ ।

जे मूल गाम-ठाम छोड़ि देलक, से बुझू मृगमरीचिका मे फँसि ‘पानि-पानि’ कय केँ मरि जायत, कियो पुछहोवला नहि भेटतैक । भले कियो प्रवासक्षेत्र कतबो कोठा-सोफा पीटि लियए, मुदा गामक भितघर-पर्णकुटी आ माटि-पानिक सोन्हायल रोटी-भातक स्वाद कतहु नहि भेटतैक ।

बाहरो रहू – आनन्द मे रहू । गामक याद केँ अपन स्मरण आ अंक मे समेटने रहू । समय-समय पर गाम आउ । हवा-पानि पीबू । फेर परदेश जाउ । कमाउ-खटाउ । कि करबैक ? मिथिलादेश कि मिथिलाराज्य नहि अछि । नहिये अछि राजा जनक समान कियो शासक । घोर कलिकाल मे जानकीभाव मे सेहो हम-अहाँ नहि जा पबैत छी । ओझरायल छी टका-टका, टके-टका आ टकैव च मे । तेँ, टका सँ कनिकबो साइड हंटिकय गाम आबि शान्ति पाउ, धियो-पुता केँ बुझाउ ।

परवाहा गाम – धनुषा जिला – नेपालक विशिष्टता

बौद्धिकता खान सँ भरल अपनेक गाम-समाज आ सौंसे धनुषा जिला कहू कि जनकपुर अंचल कहू या फेर सम्पूर्ण मिथिलाक मूल केन्द्र कहू –

आइयो कर्मकांड अनुरूप जीवन पद्धति पर चलयवला समाज कहू या मिथिलाक वास्तविक लोक कहू – जेना कही तेना सही अछि ।

चूँकि हमर सासुर अछि अगले-बगल, आर दरभंगा मे पढ़ाइ करबाक समय जे सैलून मे टीक कटा गेल छल से पुनः पोसायल सासुरहिक कृपा सँ – तेँ हम अपने सभक गाम-क्षेत्रक विशिष्टताक आभारी छी आ जीवनक सूत्र प्राप्ति मे बड सहयोग भेटल एहिठाम सँ ।

हमरा लेल निर्धारित विषयः संस्कृति आ कर्मकाण्ड

इहो बेजोड़ लागल । बुझि पड़ैत अछि जे सासुर सँ जे प्राप्त भेल ताहि पर सोदाहरण लोकसमाज केँ अपनेक गाम मे किछु स्पष्ट करहे पड़त । तखन गौर करैत छी विषय-विवेचना परः

Quote:

“संस्कृति स्थूल नहि होइछ । ओ त अविरल बहैत रहैत अछि । मिथिला मे संस्कृति केँ स्थूल बनेबाक प्रयत्न होइत रहलैए । परिणामतः संस्कृति आ कर्मकाण्ड बीचक भेद समाप्ति दिस जा रहल छै । आमलोक भ्रमित अछि । ओ निष्कर्ष धरि पहुँचय मे असमर्थ भ’ रहल अछि ।

एहि भ्रम आ अनिर्णय कारण समाजक सोच मे संकीर्णता त नइ अएलय ? आमलोकक जीवन आओर जटिल त नइ बनाओल जा रहल छै ? कर्मकाण्डीय चेतना वर्चस्ववादी समूह केँ आओर प्रभावशाली आ तृण समूह केँ कमजोर त नइ बनौलकैए ? एहि के संग आओर बहुत रास प्रश्न छै जे आजुक समाज केँ उत्तर भेटबाक चाही । एहि सत्र मे उत्तरक खोजबाक प्रयत्न होइक ।”

Unquote.

अत्यन्त आह्लादित हृदय सँ कहि रहल छी जे ससमय कार्यक्रम मे उपस्थित रहब । मैथिली जिन्दाबाद होइत रहबाक चाही । पराम्बा जानकी ओ पाहुन राघवक संग मिथिलालोकक बेटी पर्वतराज हिमालयक बेटी पार्वती संग मैनाक जमाय महादेव स्वयं सहाय रहथि । बेसी कि कहू एखन ! कार्यक्रम सफलताक अग्रिम शुभकामना अछि ।

एहि तरहक ग्रामीण आयोजनक सोच जिनका किनको मे आयल ताहि महान व्यक्तित्व यानि अग्रज ‘रमेश रंजन भाइजी’ सहित समस्त केँ हम प्रणाम करैत धन्यवाद दैत छी ।

हरिः हरः!!

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