अंतिम इच्छा आ नेत्रहीन ( दू टा लघुकथा :: गोपाल मोहन मिश्र )
अंतिम इच्छा
जिंदगी के पचासम साल राजनीति में बिता देला के बाद पुरान नेताजी के अंतिम समय आबि चुकल छलनि।
‘पिता जी के साँस अटकि रहल छनि…शायद हिनकर कोई अंतिम इच्छा छनि, जे कहs चाहैत छैथ, किंतु कहि नहि पाबि रहल छैथ।’ पैघ बेटा अप्पन छोट भाई के कहलक।
‘भैया, अहीं एहि बात के समझू, कियेक कि अहूँ राजनीति में छी आ हम तs सुनलहूँ अछि कि एक नेता पुत्र …अप्पन नेता पिता के अंतिम इच्छा किछू जल्दीये समझि लैत छैथ।’ नेताजी के छोटका पुत्र कहलक।
‘ हम तs समझि रहल छी, किंतु अहाँ के बतायब तs शायद अहाँ अस्वीकार कs देब…।’ पैघ भाई गंभीरता सँ कहलक।
‘बताऊ तs सही… पिता जी के एहन कोन अंतिम इच्छा छनि , जेकरा हमहीं पूर्ण कs सकैत छी ?’ छोटका भाई घड़ी के तरफ देखैत पूछलक।
‘पिता जी कहs चाहैत छैथ कि हुनका चलि गेला के बाद उपचुनाव अहाँ लडू… ई खानदानी सीट कोनो आर के लsग नहि जेबाक चाही।’ पैघ भाई समझबैत कहलक !
छोटका भाई के मन में पहिने सँ ई बात छलैया, खाली पैघ भाई के मुँह सँ सुनs चाहैत छल I
नेत्रहीन
‘सर कार्यक्रम के अध्यक्षता के लेल आई अहाँ आबि रहल छी ने ?’
‘एकदम आबि रहल छी …पहिने ई बताऊ कि भीड़ कतेक आबि जायत।’
‘भीड़-भाड़ के कोई कार्यक्रम नहि छै सर… नेत्रहीन लोकनि के लेल किछू गिफ्ट भेंट करबाक छै… हुनका सभ के प्रोत्साहित करबाक लेल किछू योजना के शुरुआत करबाक छै।’
‘नेत्रहीन सभक कार्यक्रम छै ?’
‘जी सर…।’
‘अरे हँ भाई…हमरा अखने याद आयल, पार्टी के एक अर्जेंट मीटिंग छै। ओतय निकलबाक अछि।’
‘ठीक छै जेहन अहाँक मर्जी।’
ओही समय हुनकर पीए आबि कs कहलक, ‘अहाँ के कार्यक्रम में जाई सँ मना नहि करबाक चाही।’
‘नेत्रहीन सभक कार्यक्रम में जा कs कोई कियेक समय के बर्बाद करय। कोन ऊ हमरा देख सकता ?’
‘ओ नहि देख सकता, लेकिन… पार्टी अध्यक्ष तs देखता ।’
‘तोहर मतलब की छौ ?’
‘जाहि कार्यक्रम में आई अहाँ के अध्यक्ष बनाओल गेल अछि, ओही कार्यक्रम के मुख्य अतिथि तs पार्टी अध्यक्ष जी छैथ।’
‘की कहि रहल छें ?’
‘सच कहि रहल छी,देखू एहि आमंत्रण पत्र के।’
स्वयं पर खिसियायल भेल बजलाह, ‘नेत्रहीन तs हम छी, जे एकरा नहि पढ़ि सकलौं !’
अंतिम इच्छा आ नेत्रहीन ( दू टा लघुकथा :: गोपाल मोहन मिश्र )
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