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अप्पन-अप्पन , अलग-अलग :: गोपाल मोहन मिश्र

430 भ्यूज



अलग-अलग दृष्टिकोण होइ छै,अप्पन-अप्पन नजरि में,
क्यो चुप रहि कs कहि दैत छै,क्यो वर्णन करय शव्द में।

अलग-अलग करनी होइ छै, तs अप्पन-अप्पन भरनी हेतै,
क्यो कs रहल बग़ावत,क्यो जीतैत छै समावेश में।

अलग-अलग सोच सभक,अप्पन-अप्पन बात होइ छै ,
क्यो बेनामी नाम कमाइत छै,क्यो रहैत छै ख़ूब चर्चा में ।

अप्पन-अप्पन नेतागिरी,अलग-अलग हर नेता छै,
क्यो अपनो, समाज के संग आगू बढ़त,क्यो रहत लूट में ।

अलग-अलग दृष्टिकोण छै,अप्पन-अप्पन कोशिश छै,
क्यो बैसल अथाह सागर में,क्यो नाव चलाबय लहरि में ।

अप्पन-अप्पन समझ छै,अलग-अलग हृदय केर बात,
क्यो मिट गेल मनोभाव में,क्यो फंसि गेल चेहरा में।

अलग-अलग छै परिस्थिति,अप्पन-अप्पन मस्ती छै,
क्यो गुलाम छै आज़ाद रहि कs,क्यो आज़ाद छै पहरा में।

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