विवाह पंचमीक शुभकामना
सर्वप्रथम ‘विवाह-पंचमी’ पर हमर इष्टदेव ‘सीताराम’ भगवान् केँ सादर प्रणाम करैत, आस्थावान सम्पूर्ण हिन्दू समाज व अन्य लेल अवसर-विशेषक मंगलमय शुभकामना ।
आजुक दिवस बेटीक विवाह नहि करैछ मिथिला मे, कारण एहि धरती पर पराम्बा प्रकट भेलिह आ आजुक दिन हुनक कठिन व्रत सँ विवाहक पूर्णता भेटलनि । विवाहोपरान्त अवध-नरेश दशरथक पुत्रवधू – श्री रामचन्द्रक भार्या बनि – मनुष्यक कल्याण लेल स्वयं कष्टभोग्या बनिकय जेहेन कष्ट सब भोगिकय हमरा सब केँ सावधान कयलिह, तेकरा सब गृहस्थ परिवार आ खासकय प्रत्येक युवा-युवती नीक सँ मनन करी ।
हम समस्त मानवलोक आजुक धियारूपी सिया लेल मर्यादा पुरुषोत्तम समान वरक अभिलाषा सदिखन करैत छी । कतेक लोक उल्टा सेहो बुझैत छथि । एम्हर विवाह पंचमी सेहो मनबैत छथि, ओम्हर मर्यादा पुरुषोत्तमहि पर सवाल सेहो ठाढ़ करैत छथि । लेकिन यथार्थ सँ अवगत कम आ जबर्दस्ती अधिक हावी रहबाक कारण दुर्दशा भोगि रहल छी हम मनुष्य आइ । दिवस विशेषहु केँ बना देने छी केवल दिखाबटी-ढकोसला ।
तेँ, हमर मन व्यथित भ’ समाजक दुराचार पर प्रहार करैत कहैछ –
विवाह या ढकोसला
विवाहोक आध्यात्मिकता केँ आब
लगभग समाप्त कय लेलक लोक सब,
समाज आ कानूनी तौर पर मान्यता लेल बस
दाम्पत्य जीवनक आरम्भ ई,
दुइ आत्माक मिलन कम नगण्य
बस दैहिक मिलनक अनुज्ञप्ति छी,
वैदिक विधान गेल भाँड़ मे देखू
बनावटी सजावट आ आडम्बरक खेल छी,
न कुलदेवताक मान न पितरक सम्मान
बस विध लेल भ’ रहल विवाह ई,
सृष्टिक निरन्तरता लेल पवित्र सम्बन्धक अवधारणा
ई विवाह या फेर ढकोसला मात्र छी ?
सिया वरण कयलिह राम केँ
विवाह पंचमी तिथि छल तहिया,
कि छल मतलब विवाह केर
सिद्ध कएने छलाह विदेहराज जनकजी,
आइयो कहय लेल सिये धियाक विवाह होइछ
मुदा जनके कटाइत छथि दहेजुआ तलवार सँ,
मुफ्तक मालपर होइछ रंग-बिरंगक छहर-महर
साँठ देखबैत फुर्सत नहि वरक माय कँ,
बाप अलगे छँटैछ गप बिग्घाक बिग्घा
पाहुनो करैछ वाहवाही झूठ जोर मँ,
सोचि रहल प्रवीण मन बेर-बेर
ई विवाह या फेर ढकोसला मात्र छी ?
हरिः हरः!!
