अहमदाबाद केर साबरमती रिवर फ्रंट पर मैथिलानी संग संवाद – शाश्वत मिथिलाक शाश्वत सोच

अहमदाबाद, सितम्बर ११, २०१८. मैथिली जिन्दाबाद!!

शाश्वत मिथिला आ मिथिला मिरर द्वारा आयोजित “मैथिलानी संग संवाद” कार्यक्रम दिनांक ९ सितम्बर, २०१८ केँ रवि दिन सार्थक विमर्शक संग संपन्न भेल। कार्यक्रम मे दर्जनों मैथिलानी भाग लेलीह आ बहुत मुखर भऽ कय महिला सशक्तीकरण तथा दहेज उन्मूलन केर विषय पर अपन-अपन विचार राखय जाय गेलीह।

रंजनाजी, कल्पनाजी, नीतू सिंहजी, प्रीतिजी, प्रतिभाजी कहलीह जे शिक्षा आ पारिवारिक समानता महिला हो वा पुरुष सभक लेल जरूरी अछि। शिक्षाक बाद रोजगार, व्यापार, सामाजिक कार्य आ विभिन्न अन्य क्षेत्र मे महिला केँ प्रोत्साहित करबाक जरूरति छैक। घर आ समाजक माहौल अनुकूल रहला सँ हुनका सभकेँ आगाँ बढि अपन प्रतिभा केँ देखेबाक संग-संग कमी-कमजोरी केँ दूर करबाक अवसर सेहो भेटतन्हि।

सोनिकाजी, प्रभाजी, पूनमजी, रानीजी, रूबीजी आदि दहेज प्रथा केँ रोकबाक दिशा मे अनेकों तरहक अनुकरणीय सुझाव दैत कहलीह जे जँ पुरुष प्रधान समाज एकरा रोकमा मे असमर्थ रहलाह तऽ महिला केँ आगू आएब समयक मांग अछि आर तैँ आब महिला समाज केँ एहि दिशा मे डेग बढेबाक चाही। परिवार सँ लय कय समाज केर हरेक स्तर धरि दहेजक खिलाफ लोक मे जनजागरण आ एकजुटता सँ विरोध करबाक पहल हो। जँ महिला समाज ठानि लेती तँ पुरुष समाजक दिन नहि छन्हि जे ओ दहेजक बोझ सँ कोनो परिवारक पवित्रता केँ अपवित्र कय सकताह।

रूबी झा जिनक परिचय एक नीक शायरा आ कवियित्रीक रूप मे एहि क्षेत्र मे प्रसिद्ध अछि हुनका द्वारा बेटीक जीवन आ दहेज पर आधारित कइएको स्वरचित रचना गुनगुनाकय प्रस्तुत कयल गेल।

किछेक मैथिलानी द्वारा कोनो कन्याक विवाह प्रस्ताव पर माता-पिता वा परिजनक निर्णय सँ पहिने स्वयं कन्याक सहमति लेनाय अनिवार्य आवश्यकता बतेलन्हि। संगहि, कथनी आ करणी मे कदापि दू व्यवहार करब बन्द करबाक मांग कयलन्हि। हिनकला लोकनिक तर्क ईहो छलन्हि जे जँ वर आ कन्या दुनूक सहमति सँ कोनो वैवाहिक सम्बन्ध निर्धारण करब तँ लोकलज्जाक कारण पर्यन्त दहेजक लेनदेन संग-संग विवाहोपरान्त होमयवला तरह-तरहक केर लेनदेन स्वतः बन्द होयत।

मिथिला मिरर केर संपादक ललित नारायण झा द्वारा संचालित एहि संवाद मे गोटेक मैथिलानी युग परिवर्तन आ नारी महत्ता पर पुरुषवर्गक समझदारी पहिने सँ सुधार भऽ रहल कहितो किछु गोटाक नजरि मे एखनहुँ कतेको नवयुवक अपन पत्नी केँ कमजोर बुझि बात-बात मे प्रताड़ित करबाक काज करैत छथि जाहि सँ घरेलू हिंसा आ बात-विवाद बढैत अछि आर परिवार मे टूट, तलाक केर नौबत तक आबि जाइत अछि कहलीह। “समय बदलि रहल छैक, मुदा एखनहुँ किछु लोक परिवर्तन सँ अनभिज्ञ रहि नारी केँ कमजोर बता अपन पुरुषार्थ पर स्वगौरवान्वित होइत छथि।” एक सम्भ्रान्त महिलाक कथन छल। एक अन्य महिला पुरुष समाज दिश कनेक हास्य-व्यंग्य सँ इशारा करैत कहलीह जे “घरे-घर हमरे राज चलैत अछि लेकिन पुरुष बुझइ छथि हमहीं कमजोर छी, तखन एहि मे हमर कोन कोष!” हुनकर स्पष्ट भाव रहन्हि जे नारी केँ कमजोर कहनाइ स्वयं हास्यक पात्र बनबाक समान अछि। हिनका लोकनि केँ सहानुभूति कम आ अवसर बेसी चाही।

शाश्वत मिथिला आशावादी आ भविष्य गढबाक सोच केर प्रबल समर्थक अछि। शाश्वत केर सोच छैक जे आजुक समय मे कियो केकरो ऊपर जबरदस्ती कोनो संस्कृति, रीति-रेबाज वा पृथक् विचार केँ नहि थोपि सकैत अछि। समाजक नेतृत्वकर्त्ता केँ अपन धरोहरक प्रति नव पीढी केँ एकटा आकर्षण आ लगाव उत्पन्न करबाक लेल यथेष्ठ प्रयास करय पड़तन्हि, खासकय तखन जखन मैथिल नव-पीढी मात्र मिथिलहि केर रीति-रेबाज वा परम्परा सँ नहि बल्कि ग्लोबल विलेज केर तर्ज पर वैश्विक परिवेश मे आधुनिक चलन-चलतीक रीति-रेबाज केँ बेसी अनुसरण कय रहल अछि। मिथिलाक पौराणिकता आ जीवनपद्धतिक विभिन्न पारंपरिक मान्यताक वर्तमान प्रासंगिकता सिद्ध करब पुरान लोक लेल चुनौतीपूर्ण छैक। दहेजक विषय अप्रासंगिक एवम् नकारात्मक भेल जा रहल अछि अतः एकर दुष्प्रभाव आब बहुत दिन धरि समाज मे नहि रहि सकत, ई तय छैक। सामाजिक दशा सेहो एहि विषय मे बहुत तेजी सँ सकारात्मक दिशा मे बढि रहल छैक। सरकारी हो वा गैर सरकारी – सब संस्था अपना तरीका सँ एहि कूप्रथा केँ समाप्त करय मे लागल अछि। एकर निदान सुनिश्चित अछि। संस्थाक परिकल्पना सँ एहि तरहक सोच एहि आयोजनक मुख्य अवधारणा छल।

संस्थाक परिकल्पक लोकनि अपन विचार रखैत कहलनि जे आबय वला समय मे समाज ‘लड़काक विवाह एक जटिल समस्या’ विषय पर संगोष्ठी करैत देखायत। जँ स्त्री-पुरुष केर लिंगानुपात मे सुधार नहि भेल तऽ ई भयावहता मे कतेको लड़का यथार्थतः कुमारे रहि जायत आर एहि सँ असन्तुलित समाज केँ एहि दिशा मे बढब आवश्यक भऽ जेतैक। मिथिलाक नारी होइथ वा आन समाजक, लेकिन आइ ई लोकनि वगैर समुचित सुविधा हर क्षेत्र मे सफलताक नव-नव आयाम स्थापित कय रहली अछि। परिणामतः पुरुषवर्ग जँ समाज मे अनुकूल माहौल नहि बना सकत तँ मिथिलाक महिला स्वाभाविक रूप सँ गैर-मैथिल समुदाय दिश बेसी आकर्षित हेतीह जेकरा रोकब सहजहि संभव नहि भऽ सकत।

मैथिली जिन्दाबाद सँ बातचीत करैत परिकल्पकवर्ग केर प्रगतिशील सचेतक राजकिशोर झा कहलनि जे हमरा लोकनि केँ मिथिलाक विद्वत् इतिहास आ सांस्कृतिक धरोहर पर गर्व करबाक अछि लेकिन मिथिलाक उज्ज्वल भविष्य निर्माणक प्रति चेतना सेहो हासिल करब ओतबा आवश्यक अछि। मिथिलाक स्तुतिगान करब हमरा लोकनिक अधिकार थिक मुदा समृद्ध मिथिलाक परिकल्पना करब कर्तव्य सेहो थिक, ई बुझय पड़त। अतीत मे पृथकवादी अनुवांशिक सोच सँ समावेशी आ समग्रतापूर्ण समाजक दर्शण केँ प्रबल करबाक अछि। दोसर सँ बेसी सामाजिक अपेक्षा राखबाक स्थानपर अपन कि सामाजिक योगदान अछि तेकर आत्मसमीक्षा जरूरी अछि। समाज मे आशावादी विचार, सहयोगक भाव, प्रोत्साहनक वातावरण आ व्यक्तिगत विचार मे भिन्नता रहलाक बावजूद साझा उद्देश्यक लेल एकजुटताक संग काज करब समयक मांग थिक। अतः सब कियो मिलिकय तन्मयतापूर्वक दहेजक उन्मूलन लेल घर-घर मे महिलाक सम्मान हेतु, विवाहोपरांत घर मे आयल नव-कनियां हेतु समुचित सहज वातावरण बनाबय मे यथोचित सहयोगी दी। मैथिली भाषा, साहित्य, संगीत, संस्कृति आ सांस्कृतिक धरोहरक समयानुकूल प्रासंगिकता देखि ओकर महत्ता आ गौरव गाथा केँ आगू बढबैत नवतुरिया केँ हस्तान्तरित करैत रही। संस्कृति एहन निर्मित होमय जहाँ “ब्लेम के जगह समाधान पर फोकस रहय” – “अधिकार के जगह कर्तव्यपरायणता” हावी होमय, मतभिन्नता पर मनभिन्नता भारी नै पड़य, कम्युनिटी सपोर्टक अनुभूति होमय आ कथनी-करनी में अंतर कम होइक।

बिनु स्वार्थ करहि जब प्रीती ।
स्वस्थ समाज सुन्दर संस्कृति।

निश्चित, शाश्वत मिथिलाक सोच आ कार्यक्रम समाजक नारी-पुरुष आ नवतुरिया केँ एक संग सही दिशा मे बढा रहल अछि, हर तरहें यैह निष्कर्ष निकलैत अछि आर ई अन्य समाज द्वारा सेहो अनुकरणीय अछी।